साहित्य विमर्श

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13 जनवरी 2018

अमीर खुसरो

4:50 pm 0

अमीर खुसरो को खड़ी बोली हिन्‍दी का पहला कवि माना जाता है. इस भाषा का हिन्‍दवी नाम से उल्‍लेख सबसे पहले उन्‍हीं की रचनाओं में मिलता है. हालांकि वे फारसी के भी अपने समय के सबसे बड़े भारतीय कवि थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता का मूल आधार उनकी हिन्‍दी रचनाएं ही हैं. अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद का उपनाम खुसरो था, जिसे दिल्ली के सुलतान ज़लालुद्दीन खिलज़ी ने अमीर की उपाधि दी. उन्होंने स्वयं कहा है- ‘’मैं तूती-ए-हिन्‍द हूं. अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो. मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा.’’ एक अन्‍य स्थान पर उन्होंने लिखा है, ‘’तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब (अर्थात् मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूं, हिन्दवी में जवाब देता हूं.)’’

 अमीर खुसरो को दिल्‍ली सल्‍तनत का राज्‍याश्रय हासिल था. अपनी दीर्घ जीवन-अवधि में उन्‍होंने गुलाम वंश, खिलजी वंश से लेकर तुगलक वंश तक 11 सुल्‍तानों का सत्ता-संघर्ष देखा था,लेकिन राजनीति का हिस्‍सा बनने के बजाए वे निर्लिप्‍त भाव से साहित्‍य सृजन व सूफी संगीत साधना में लीन रहे. अक्‍सर कव्‍वाली व गजल की परंपरा की शुरुआत अमीर खुसरो से ही मानी जाती है. उनकी रचना ‘जब यार देखा नैन भर।।’ को अनेक विद्वान हिन्‍दी की पहली गजल मानते हैं. उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की खयाल गायकी के ईजाद का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने ध्रुपद गायन में फारसी लय व ताल को जोड़कर खयाल पैदा किया था. लोकमान्यता है कि उन्होंने पखावज (मृदंग) को दो हिस्सों में बांटकर ‘तबला’ नाम के एक नए साज का ईजाद किया.
माना जाता है कि अमीर खुसरो का जन्म ईस्‍वी सन् 1253 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पटियाली नामक गांव में गंगा किनारे हुआ था. खुसरो की मां दौलत नाज़ एक भारतीय मुलसलमान महिला थीं. वे बलबन के युद्धमंत्री अमीर एमादुल्मुल्क की पुत्री थीं, जो राजनीतिक दवाब के कारण हिन्‍दू से नए-नए मुसलमान बने थे. इस्लाम धर्म ग्रहण करने के बावजूद इनके घर में सारे रीति-रिवाज हिन्दुओं के थे. इस मिले जुले घराने एवं दो परम्पराओं के मेल का असर बालक खुसरो पर पड़ा. आठ वर्ष की अवस्था में खुसरो के पिता का देहान्त हो गया. किशोरावस्था में उन्होंने कविता लिखना प्रारम्भ किया और बीस वर्ष के होते होते वे कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए.
जब खुसरो केवल सात वर्ष के थे,उनके पिता उन्हें लेकर हज़रत निजामुद्दीन औलिया की सेवा में उपस्थित हुए. इसी समय से आजीवन खुसरो औलिया के अनुयायी बने रहे.
अमीर खुसरो बहुभाषा विद् थे. वे फ़ारसी, तुर्की और अरबी भाषा के प्रकांड पंडित थे. खड़ी बोली उन्हें विरासत में मिली थी. संस्कृत पर भी उन्हें पूरा अधिकार था. बंगाल, पंजाब, अवध, मुलतान, देवगिरी आदि स्थानों पर रहकर उन्होंने भारत की अनेक भाषाओं की जानकारी प्राप्त की थी. अमीर खुसरो भारत के पहले ऐसे कवि हैं जिन्होंने समस्त भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण अपनी मसनवी नूह सिपहर में किया है जिसका ऐतिहासिक महत्व है. सर जार्ज ग्रियर्सन के लगभग छ: सौ वर्ष पूर्व भाषाओं की जो स्थिति खुसरो द्वारा बताई गई थी, वह आज भी विद्यमान है. खुसरो ने स्वंय अपने ग्रंथ में लिखा है कि उन्होंने स्वंय कई भाषाओं के संबंध में जानकारी प्राप्त की है और उनमें से कई वे बोलते व समझते हैं.
ख़ुसरो में भाषा संबंधी पूर्वाग्रह नाम भर का भी न था. यही कारण है कि उन्होंने अनेक रचनाओं में फ़ारसी के साथ-साथ हिन्दी का प्रयोग किया. अमीर खुसरो द्वारा रचित एक चर्चित ग़ज़ल है -
"जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ.
किताबे हिज्राँ, न दारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाय छतियाँ।।
शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ बरोजे वसलत चूँ उम्र कोताह.
सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ.
यकायक अज़दिल दू चश्मे जादू बसद फरेबम बवुर्द तस्कीं.
किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियाँ
चूँ शम्आ सोजाँ, चूँ जर्रा हैराँ, हमेशा गिरियाँ ब इश्के आँ माह.
न नींद नैंना, न अंग चैना, न आप आये न भेजे पतियाँ।।
बहक्के रोजे विसाले दिलबर के दाद मारा फरेब खुसरो.
सपीत मन के दराये राखूँ जो जाय पाऊँ पिया की खतियाँ।।
अमीर खुसरो की 99 पुस्तकों का उल्लेख मिलता है, किन्तु 22 ही अब उपलब्ध हैं. हिन्दी में खुसरो की तीन रचनाएं मानी जाती हैं, किन्तु इन तीनों में केवल एक ‘खालिकबारी’ ही उपलब्ध है, जो कविता के रूप में हिन्‍दवी-फारसी शब्‍दकोश है. इसके अतिरिक्त खुसरो की फुटकर रचनाएं भी संकलित हैं, जिनमें पहेलियां, मुकरियां, गीत, निस्बतें, अनमेलियां आदि हैं.
अमीर खुसरो की पहेलियाँ
अमीर खुसरो ने हिन्दी साहित्य को पहेलियाँ दी है. पहेलियाँ मूलत: आम जनता की चीज है. खुसरो ने भी कदाचित लोक के प्रभाव से ही पहेलियों की रचना की. अमीर खुसरो ने दो प्रकार की पहेलियाँ लिखी :
(1)     बूझ पहेली (अंतर्लापिका)
यह वो पहेलियाँ हैं जिनका उत्तर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप में पहेली में दिया होता है यानि जो पहेलियाँ पहले से ही बूझी गई हों. जैसे -
(क)               गोल मटोल और छोटा-मोटा, हर दम वह तो जमीं पर लोटा.
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बूझे अकिल का खोटा।।
उत्तर - लोटा.
(ख)               श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी.
          दोनों हाथ से खुसरो खींचे और कहे तू आ री।।
उत्तर - आरी
(ग)                हाड़ की देही उज्ला रंग, लिपटा रहे नारी के संग.
           चोरी की ना खून किया वाका सर क्यों काट लिया.
उत्तर - नाखून.
(घ)                बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया.
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
उत्तर - दिया.
 (2)    बिन बूझ पहेली या बहिर्लापिका, जिसका उत्तर पहेली से बाहर होता है-
(क) एक जानवर रंग रंगीला, बिना मारे वह रोवे.
   उस के सिर पर तीन तिलाके, बिन बताए सोवे।।
उत्तर - मोर.
(ख) चाम मांस वाके नहीं नेक, हाड़ मास में वाके छेद.
    मोहि अचंभो आवत ऐसे, वामे जीव बसत है कैसे।।
उत्तर - पिंजड़ा.
(ग)    स्याम बरन की है एक नारी, माथे ऊपर लागै प्यारी.
      जो मानुस इस अरथ को खोले, कुत्ते की वह बोली बोले।।
उत्तर - भौं (भौंए आँख के ऊपर होती हैं.)
(घ)    एक गुनी ने यह गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना.
       देखा जादूगर का हाल, डाले हरा निकाले लाल.
उत्तर - पान.

दो सखुने
सखुन फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ कथन या उक्ति है. अमीर खुसरो के दोसखुनों में दो कथनों या उक्तियों का एक ही उत्तर होता है. इसका मूल आधार शब्द के एक से अधिक अर्थ हैं.
(क)    दीवार क्यों टूटी? राह क्यों लूटी ? उत्तर - राज न था.
दीवार बनाने वाला राजगीर नहीं था,अत: दीवार टूटी रह गई. राज्य (राज) व्यवस्था नहीं थी अत: राह लुट गई.
(ख)    जोगी क्यों भागा? ढोलकी क्यों न बजी? उत्तर - मढ़ी न थी. रहने के लिए झोंपड़ी (मढ़ी) या कुटी न थी और ढोलकी चमड़े से मढ़ी हुई नहीं थी.
(ग)    पथिक प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों? उत्तर - लोटा न था. पथिक (यात्री) के पास पानी पीने के लिए कोई लोटा (बर्तन) न था. अत: वह प्यासा रह गया. गधा मिट्टी में लोटा नहीं था अत: वह उदास था.
(घ)    रोटी जली क्यो? घोड़ा अड़ा क्यों? पान सड़ा क्यो? उत्तर - फेरा न था. रोटी को फेरा (पलटा) नहीं गया था. अत: वह जल गई. घोड़े की पैदाइशी आदत होती है, एक जगह खड़े होकर फेरा लगाना. न लगा सकने की स्थिति में वह चलता नहीं और एक जगह पर ही अड़ जाता है. पानी में पड़े पान के पत्तों को पनवाड़ी बार-बार फेरता रहता है. इससे पान का पत्ता सड़ता नहीं. न फेरो तो सड़ जाता है.
कहमुकरियाँ या मुकरियाँ
कहमुकरियों का अर्थ है कि किसी उक्ति को कह भी दिया और मानने से भी मुकर गए. यह चार पंक्तियों में होती है. तीन या उससे अधिक में पहेली होती है और चौथी या आखिरी पंक्ति में पहले तो खुसरो 'ए सखी साजन' के रुप में पहेली का उत्तर देते हैं. इनमें से अधिकांश पहेलीनुमा गीतों का जवाब साजन है यानि प्रियतम और साथ में एक दूसरा जवाब भी है - जो इस उक्ति का आखिरी शब्द है-
(क)    बरस-बरस वह देस में आवे, मुँह से मुँह लाग रस प्यावे.
       वा खातिर मैं खरचे दाम, ऐ सखी साजन न सखी आम।।
(ख)    सगरी रैन मोरे संग जागा, भोर भई तब बिछुड़न लागा.
       वाके बिछुड़त फाटे हिया, ऐ सखी साजन न सखी दिया।।
(ग)    नित मेरे घर आवत है, रात गए फिर जावत है.
       फँसत अमावस गोरी के फंदा, ऐ सखी साजन न सखी चंदा।।
(घ)    आठ प्रहर मेरे संग रहे, मीठी प्यारी बातें करे.
       श्याम बरन और राती नैंना, ऐ सखी साजन न सखी मैंना।।




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10 जनवरी 2018

हिन्दी साहित्य का आदिकाल -नामकरण की समस्या

9:58 pm 0
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल को वीरगाथा काल नाम दिया है. इसके लिए तर्क देते हुए वो कहते हैं- “ राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, श्रृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबंध परंपरा 'रासो' के नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने, 'वीरगाथाकाल' कहा है।
            प्रवृत्ति के निर्धारण के लिए भी आचार्य शुक्ल ने दो कसौटियां निर्धारित की हैं:
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9 जनवरी 2018

हिन्दी साहित्य का इतिहास -प्रारम्भ

8:05 pm 0
राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘काव्यधारा’ में 7वीं सदी के अपभ्रंश के कवि सरहपा को हिन्दी का पहला कवि माना है. डॉ रामकुमार वर्मा हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ संवत् 750 से मानते हैं. जॉर्ज ग्रियर्सन के अनुसार, हिन्दी साहित्य की शुरुआत संवत् 700 (643 ई) से होती है. स्पष्टतया, अधिकांश विद्वान अपभ्रंश के उस दौर से प्रारम्भिक हिन्दी की शुरुआत मानते हैं, जहाँ सहायक क्रियाओं और परसर्गों का विकास साफ़ परिलक्षित होने लगता है.
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भाई-बहन -सत्यवती मल्लिक

4:47 pm 0
अभिषेक कुमार के सौजन्य से 
"माँ जी!...हाय!माँ जी!...हाय!"
एक बार,दो बार,पर तीसरी बार,"हाय हाय!" की करुण पुकार सावित्री सहन न कर सकी।कार्बन पेपर और डिजाइन की कॉपी वहीं कुर्सी पर पटककर शीघ्र ही उसने बाथरूम के दरवाजे से बाहर खड़े कमल को गोद में उठा लिया और पुचकारते हुए कहा,"बच्चे सवेरे-सवेरे नहीं रोते।"
"तो निर्मला मेरा गाना क्यों गाती है,और उसने क्यों मेरी सारी कमीज छींटे डालकर गीली कर दी है?"
        स्नानागार में अभी तक पतली आवाज में निर्मला गुनगुना रही थी,"एक...लड़का....था....वह...रोता..रहता।"
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8 जनवरी 2018

दावत की अदावत - अन्नपूर्णानंद वर्मा

9:47 pm 2
यह मैंने आज ही जाना कि जिस सड़क पर एक फुट धूल की परत चढ़ी हो, वह फिर भी पक्की सड़क कहला सकती है. पर मेरे दोस्त झूठ तो बोलेंगे नहीं. उन्होंने कहा था कि पक्की सड़क है, साइकिल उठाना, आराम से चले आना.
         धूल भी ऐसी-वैसी नहीं. मैदे की तरह बारीक होने के कारण उड़ने में हवा से बाजी मारती थी. मेरी नाक को तो उसने बाप का घर समझ लिया था. जितनी धूल इस समय मेरे बालों में और कपड़ों पर जमा हो गई थी, उतनी से ब्रह्मा नाम का कुम्हार मेरे ही जैसा एक और मिट्टी का पुतला गढ़ देता.
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6 जनवरी 2018

हींगवाला- सुभद्राकुमारी चौहान

8:14 pm 1
लगभग 35 साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी - ''अम्मा... हींग लोगी?''
पीठ पर बँधे हुए पीपे को खोलकर उसने, नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया । भीतर बरामदे से नौ - दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया - ''अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ !"
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अलबम -सुदर्शन

7:39 pm 1

अभिषेक कुमार के सौजन्य से 

पंडित शादीराम ने ठंडी साँस भरी और सोचने लगे-क्या यह ऋण कभी सिर से न उतरेगा?
वे निर्धन थे,परंतु दिल के बुरे न थे।वे चाहते थे कि चाहे जिस भी प्रकार हो,अपने यजमान लाला सदानंद का रुपया अदा कर दें।उनके लिए एक-एक पैसा मोहर के बराबर था।अपना पेट काटकर बचाते थे,परंतु जब चार पैसे इकट्ठे हो जाते,तो कोई ऐसा खर्च निकल आता कि सारा रुपया उड़ जाता।शादीराम के हृदय पर बर्छियाँ चल जाती थीं।उनका हाल वही होता था,जो उस डूबते हुए मनुष्य का होता है,जो हाथ-पाँव मारकर किनारे तक पहुँचे और किनारा टूट जाए।उस समय उसकी दशा कैसी करुणा-जनक,कैसी हृदय-बेधक होती है।वह प्रारब्ध को गालियाँ देने लगता है।यही दशा शादीराम की थी।

     इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए,शादीराम ने पैसा बचा-बचाकर अस्सी रूपये जोड़ लिए।उन्हें लाला सदानंद को पांच सौ रूपये देने थे।इन अस्सी रूपये की रकम से ऋण उतारने का समय निकट प्रतीत हुआ।आशा धोखा दे रही थी।एकाएक उनका छोटा लड़का बीमार हुआ और लगातार चार महीने बीमार रहा,पैसा-पैसा करके बचाये हुए रूपये दवा-दारू में उड़ गए।पंडित शादीराम ने सिर पीट लिया।अब चारों ओर फिर अंधकार था।उसमें प्रकाश की हल्की सी किरण भी दिखाई न देती थी।उन्होंने ठंडी साँस भरी और सोचने लगे-क्या यह ऋण कभी सिर से न उतरेगा?
     लाला सदानंद अपने पुरोहित की विवशता जानते थे और न चाहते थे कि वह रूपये देने का प्रयत्न करें।उन्हें इस रकम की रत्ती भर भी परवाह न थी।उन्होंने इसके लिए कभी तगादा तक नहीं किया;न कभी शादीराम से इस विषय की बात छेड़ी।इस बात से वे इतना डरते थे मानों रूपये स्वयं उन्हीं को देने हों,परंतु शादीराम के हृदय में शांति न थी।प्रायः सोचा करते कि "ये कैसे भलेमानस हैं,जो अपनी रकम के बारे में मुझसे बात तक नहीं करते? खैर,ये कुछ नहीं करते सो ठीक है,परंतु इसका तात्पर्य यह थोड़े ही है कि मैं निश्चिन्त हो जाऊँ।"
    उन्हें लाला सदानंद के सामने सिर उठाने का साहस न था।उन्हें ऋण के बोझ ने नीचे झुका दिया था।यदि लाला सदानंद ऐसी सज्जनता न दिखाते और शादीराम को बार-बार तगादा करके तंग करते ,तो उन्हें ऐसा मानसिक कष्ट न होता।हम अत्याचार का सामना सिर उठाकर कर सकते हैं,परंतु भलमनसी के सामने आँखें नहीं उठतीं।
     एक दिन लाला सदानंद किसी काम से पंडित शादीराम के घर गए और उनकी अलमारी में से कई सौ बांग्ला,हिंदी,अंग्रेजी आदि भाषाओं की मासिक पत्रिकाएँ देखकर बोले-"यह क्या!"
     पंडित शादीराम ने पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदते हुए उत्तर दिया-"पुरानी पत्रिकाएँ हैं।बड़े भाई को पढ़ने का बड़ा चाव था;वे प्रायः मँगवाते रहते थे।जब जीते थे तो किसी को हाथ न लगाने देते थे।अब इन्हें कीड़े खा रहे हैं।"
"रद्दी में क्यों नहीं बेच देते?"
"इनमें चित्र हैं।जब कभी बच्चे रोने लगते हैं तो एक साथ निकाल कर देता हूँ।इससे उनके आँसू थाम जाते हैं।"
लाला सदानंद ने आगे बढ़कर कहा-"दो-चार परचे दिखाओ तो?"
   पंडित शादीराम ने कुछ परचे दिखाए।हर एक परचे में कई-कई सुन्दर और रंगीन चित्र थे।लाला सदानंद कुछ देर तक उलट-पुलटकर देखते रहे।सहसा उनके हृदय में एक विचित्र विचार उठा।चौंककर बोले-"पंडित जी!"
"कहिए'"
"ये चित्र कला-सौंदर्य के अति उत्तम नमूने हैं।अगर किसी शौकीन को पसंद आ जाएँ, तो हजार,दो हजार रुपये कमा लो।
पंडित शादीराम ने एक ठंडी साँस लेकर कहा-"ऐसे भाग्य होते ,तो यों धक्के न खाता फिरता।"
लाला सदानंद बोले-"एक काम करो।"
"क्या?"
"आज बैठकर इन पत्रिकाओं में जितनी अच्छी-अच्छी तसवीरें हैं सबको छाँटकर अलग कर लो।"
"बहुत अच्छा।"
"जब यह कर चुको तो मुझे बता देना।"
"आप क्या करेंगे?"
"मैं इनका अलबम बनाऊँगा और तुम्हारी ओर से विज्ञापन दे दूँगा।संभव है,यह विज्ञापन किसी शौकीन हाथ पड़ जाए,और तुम चार पैसे कमा लो।"
    पंडित शादीराम को यह आशा न थी कि कोयलों में हीरा मिल जायेगा।घोर निराशा ने आशा के द्वार चारों ओर से बंद कर दिए थे।वे उन हतभाग्य मनुष्यों में से थे जो संसार में असफल और केवल असफल रहने के लिए उत्पन्न होते हैं।सोने को हाथ लगाते थे तो वह भी मिट्टी हो जाता था।उनकी ऐसी धारणा ही नहीं,पक्का विश्वास था कि यह प्रयत्न भी कभी सफल न होगा।परंतु लाला सदानन्द के आग्रह से दिन-भर बैठकर तस्वीरें छाँटते रहे।
    न मन में लगन थी,न ह्रदय में चाव।परंतु लाला सदानंद की बात को टाल न सके।शाम को देखा,दो सौ एक-से-एक बढ़िया चित्र हैं।उस समय उन्हें देखकर वे स्वयं उछल पड़े।उनके मुख पर आनंद की आभा नृत्य करने लगी,जैसे फेल हो जाने का विश्वास करके अपनी प्रारब्ध पर रो चुके विद्यार्थी को पास हो जाने का तार मिल गया।उस समय वह कैसा प्रसन्न होता है।चारों और कैसी विस्मित और प्रफुल्लित दृष्टि से देखता है।यही अवस्था पंडित शादीराम की थी।वे उन चित्रों की ओर इस तरह से देखते थे मानों उनमें से प्रत्येक दस-दस का नोट हो।बच्चों को उधर देखने न देते थे।वे सफलता के विचार से ऐसे प्रसन्न हो रहे थे, जैसे सफलता प्राप्त हो चुकी हो,यद्यपि वह अभी कोसों दूर थी।लाला सदानंद की आशा उनके मष्तिष्क में निश्चय का रूप धारण कर चुकी थी।
   लाला सदानंद ने चित्रों को अलबम में लगवाया और कुछ उच्च कोटि के समाचार पत्रों में विज्ञापन दे दिया।अब पंडित शादीराम हर समय डाकिये की प्रतीक्षा करते रहते थे।रोज़ सोचते थे कि आज कोई चिट्ठी आएगी।दिन बीत जाता,और कोई उत्तर न आता था।रात को आशा सड़क की धूल की तरह बैठ जाती थी,परंतु दूसरे दिन लाला सदानंद की बातों से टूटी हुई आशा फिर बँध जाती थी,जिस प्रकार गाड़ियाँ चलने से पहले दिन की बैठी हुई धूल हवा में  उड़ने लगती है।आशा फिर अपना चमकता हुआ मुख दिखाकर दरवाजे पर खड़ा कर देती थी;डाक का समय होता तो बाजार में ले जाती,और वहां से डाकखाने पहुँचती थी।इस प्रकार एक महीना बीत गया,परंतु कोई पत्र न आया।पंडित शादीराम सर्वथा निराश हो गए।परंतु फिर भी कभी-कभी सफलता का विचार आ जाता था,जिस प्रकार अँधेरे में जुगनू की चमक निराश हृदयों के लिए कैसी जीवन-दायिनी,कैसी हृदयहरिणी होती है।इसके सहारे भूले हुए पथिक मंजिल पर पहुँचने का प्रयत्न करते और कुछ देर के लिए अपना दुख भूल जाते हैं।इस झूठी आशा के अंदर सच्चा प्रकाश नहीं होता,परंतु यह दूर के संगीत के समान मनोहर अवश्य होती है।इसमें वर्षा की नमी हो या न हो,परंतु इससे काली घटा का जादू कौन छीन सकता है।
  आखिर एक दिन शादीराम के भाग्य जागे।कलकत्ता के एक मारवाड़ी सेठ ने पत्र लिखा कि अलबम भेज दो,यदि पसंद आ गया तो खरीद लिया जाएगा।मूल्य की कोई चिंता नहीं,चीज अच्छी होनी चाहिए।यह पत्र उस करवट के समान  था,जो सोया हुआ मनुष्य जागने से पहले बदलता है और उसके पश्चात् उठकर बिस्तरे पर बैठ जाता है।यह किसी पुरुष की करवट न थी,किसी स्त्री की करवट न थी,यह भाग्य की करवट थी।पंडित शादीराम दौड़ते हुए लाल सदानंद के पास पहुँचे, और उन्हें पत्र दिखाकर बोले-"भेज दूँ?"
लाल सदानंद ने पत्र को अच्छी तरह देखा  और उत्तर दिया-"रजिस्टर्ड कराकर भेज दो।शौकीन आदमी है,खरीद लेगा।"
"और मूल्य?"
"लिख दो,एक हजार रूपये से कम पर सौदा न होगा।"
   कुछ दिन बाद उन्हें उत्तर में एक बीमा मिला।पंडित शादीराम के हाथ पैर काँपने लगे।परंतु हाथ-पैरों से अधिक उनका हृदय काँप रहा था।उन्होंने जल्दी से लिफाफा खोला और उछल पड़े।उसमें सौ-सौ रुपये के दस नोट थे।पहले उनके भाग्य ने करवट बदली थी,अब वह पूर्ण रूप से जाग उठा।पंडित शादीराम खड़े थे,बैठ गए।सोचने लगे-अगर दो हज़ार रुपये लिख देता,तो शायद ही उतने मिलते।इस विचार ने उनकी सारी प्रसन्नता किरकिरी कर दी।
  सायंकाल के समय वे लाल सदानंद के पास गए,और पाँच सौ रुपये के नोट सामने रखकर बोले-"परमात्मा का धन्यवाद है कि मुझे इस भार से छुटकारा मिला।आपने जो दया और सज्जनता दिखाई है उसे मैं मरण-पर्यन्त न भूलूँगा।"
  लाला सदानंद ने विस्मित होकर पूछा-"पंडित जी!क्या सेठ ने अलबम खरीद लिया?"
"जी हाँ!नहीं तो मुझ निर्धन ब्राह्मण के पास क्या था,जो आपका ऋण चुका देता?परमात्मा ने मेरी सुन ली।"
  "मैं पहले भी कहना चाहता था,परंतु कहते हुए हिचकिचाता था कि आपके हृदय को ठेस न पहुँचे।पर अब मुझे यह भय नहीं है क्योंकि रुपए आपके हाथ में हैं।मेरा विचार है कि आप ये रुपए अपने ही पास रखें।मैं आपका यजमान हूँ।मेरा धर्म है कि मैं आपकी सेवा करूँ।"
    पंडित जी की आँखों में आँसू आ गए;दुपट्टे से पोंछते हुए बोले-"आप जैसे सज्जन संसार में बहुत थोड़े हैं।परमात्मा आपको चिरंजीवी रखें।अब तो मैं ये रुपए न लूँगा।इतने वर्ष आपने माँगे तक नहीं,यह उपकार कोई थोड़ा नहीं है।मुझे इससे उऋण होने दीजिए।ये पाँच सौ रुपए देकर मैं हृदय की शांति खरीद लूँगा।"
    "निर्धन ब्राह्मण की यह उदारता और सच्चरित्रता देखकर सदानंद का मन-मयूर नाचने लगा।उन्होंने नोट ले लिए।मनुष्य रुपए देकर भी ऐसा प्रसन्न हो सकता है,इसका अनुभव उन्हें पहली ही बार हुआ।पंडित जी के चले जाने के बाद उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और किसी विचार में मग्न हो गए।इस समय उनके मुख मंडल पर एक विशेष आत्मिक तेज था।
छह मास बीत गए।
    लाला सदानंद बीमार थे।ऐसे बीमार वह सारी आयु में न हुए थे।पंडित शादीराम उनके लिए दिन-रात माला ही फेरा करते थे।वे वैद्य न थे,डॉक्टर न थे।वे ब्राह्मण थे,उनकी औषधि माला फेरना थी,और यह काम वे आत्मा की पूरी शक्ति,अपने मन की पूरी श्रद्धा से करते थे।उन्हें औषधि की अपेक्षा आशीर्वाद और प्रार्थना पर अधिक भरोसा था।
     एक दिन लाला सदानंद चारपाई पर लेटे थे।उनके पास उनकी बूढ़ी माँ उनके दुर्बल और पीले मुख को देख-देखकर अपनी आँखों के आँसू अंदर पी रही थीं।थोड़ी दूर पर एक कोने में,उनकी नवोढ़ा स्त्री घूँघट निकाले खड़ी थी और देख रही थी कोई काम ऐसा तो नहीं,जो रह गया हो।पास पड़ी हुई चौकी पर बैठकर पंडित शादीराम रोगी को भगवद्गीता सुना रहे थे।
   एकाएक लाला सदानंद बेसुध हो गए।पंडित जी ने गीता छोड़ दी,और उठकर उनके सिरहाने बैठ गए।स्त्री गर्म दूध लेने के लिए बाहर दौड़ी,और माँ अपने बेटे को घबराकर आवाज देने लगी।इस समय पंडित जी को रोगी के सिरहाने के नीचे कोई कड़ी-सी चीज चुभती हुई जान पड़ी।उन्होंने नीचे हाथ डालकर देखा,तो उनके आश्चर्य की सीमा न रही,वह सख्त चीज वही अलबम थी,जिसे किसी सेठ ने नहीं,बल्कि स्वयं लाला सदानंद ने खरीद लिया था।
    पंडित शादीराम इस विचार से बहुत प्रसन्न थे क्योंकि उन्होंने सदानंद का ऋण उतार दिया है।परंतु यह जानकर उनके हृदय पर चोट-सी लगी कि ऋण उतारा नहीं,बल्कि पहले से दूना हो गया है।
       उन्होंने अपने बेसुध यजमान के पास बैठे-बैठे एक साँस भरी,और सोचने लगे-"क्या यह ऋण कभी न उतरेगा?"
कुछ देर बाद लाला सदानंद को होश आया।उन्होंने पंडित जी से अलबम छीन लिया और कहा-"यह अलबम सेठ साहब से अब मैंने मँगवा लिया है।"

   पंडित जी जानते थे कि यजमान जी झूठ बोल रहे हैं।परंतु वे उन्हें पहले की अपेक्षा अधिक सज्जन,अधिक उपकारी और अधिक ऊँचा समझने लगे थे।
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5 जनवरी 2018

चचा छक्कन ने केले ख़रीदे -इम्तियाज़ अली

9:58 pm 2
एक बात मैं शुरु में ही कह दूँ. इस घटना का वर्णन करने से मेरी इच्छा यह हरगिज़ नहीं है कि इससे चचा छक्कन के स्वभाव के जिस अंग पर प्रकाश पड़ता है, उसके संबंध में आप कोई स्थाई राय निर्धारित कर लें. सच तो यह है कि चचा छक्कन से संबंधित इस प्रकार की घटना मुझे सिर्फ़ यही एक मालूम है. न इससे पहले कोई ऐसी घटना मेरी नज़र से गुजरी और न बाद में. बल्कि ईमान की पूछिए तो इसके विपरीत बहुत - सी घटनाएँ मेरे देखने में आ चुकी हैं. कई बार मैं खुद देख चुका हूँ कि शाम के वक्त चचा छक्कन बाज़ार से कचौरियाँ या गँड़ेरियाँ या चिलगोज़े और मूंगफलियाँ एक बड़े-से रुमाल में बांध कर घर पर सबके लिए ले आए हैं. और फिर क्या बड़ा और क्या छोटा, सबमें बराबर - बराबर बाँटकर खाते-खिलाते रहे हैं. पर उस रोज़ अल्लाह जाने क्या बात हुई कि....! पर इसका विस्तृत वर्णन तो मुझे यहाँ करना है.
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2 जनवरी 2018

ब्रजभाषा और खड़ी बोली : तुलना

8:18 pm 0
ब्रजभाषा और खड़ी बोली का अन्तर

  • ब्रजभाषा मथुरा, वृंदावन, आगरा, अलीगढ़ में बोली जाती है, खड़ी बोली मेरठ, सहारनपुर एवं हरियाणा के .प्र. से सटे इलाको में बोली जाती है.
  • ब्रजभाषा आकारान्त या औकारान्त है. यह प्रवृति संज्ञा, विशेषण, सर्वनाम, क्रिया सबमें पाई जाती है. जैसे: घोड़ौ, छोरो, गोरो, सावरो, मेरो, तेरो, जाऊँगो; खड़ी बोली में घोड़ा, छोरा, गोरा, साँवला, मेरा, तेरा, जाऊँगा जैसे आकारान्त रूप मिलते हैं.
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अवधी और ब्रजभाषा : तुलना

7:34 pm 0
अवधी और ब्रजभाषा में अंतर
  • ·         अवधी अर्धमागधी से विकसित कोसली अपभ्रंश से निकली है। यह लखनऊँ उन्नाव, अयोध्या, गौंडा, बहराहच, फतेहपुर, रायबरेली आदि में बोली जाती है। ब्रजभाषा शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है। यह मैनपुर, बदायूँ आदि में बोली जाती है।
  • ·         अवधी में इकार की प्रधानता है, ब्रजभाषा में यकार की
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