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चंद्रकांता -देवकीनंदन खत्री-अध्याय -3-भाग-2 ( मरना चंद्रकांता का )

बयान – 11

तेजसिंह को तिलिस्म में से खजाने के संदूकों को निकलवा कर नौगढ़ भेजवाने में कई दिन लगे क्योंकि उसके साथ पहरे वगैरह का बहुत कुछ इंतजाम करना पड़ा। रोज तिलिस्म में जाते और पहर दिन जब बाकी रहता तिलिस्म से बाहर निकल आया करते। जब तक कुल असबाब नौगढ़ रवाना नहीं कर दिया गया, तब तक तिलिस्म तोड़ने की कार्रवाई बंद रही।

एक रात कुमार अपने पलँग पर सोए हुए थे। आधी रात जा चुकी थी,कुमारी चंद्रकांता और वनकन्या की याद में अच्छी तरह नींद नहीं आ रही थी, कभी जागते कभी सो जाते। आखिर एक गहरी नींद ने अपना असर यहाँ तक जमाया कि सुबह क्या, बल्कि दो घड़ी दिन चढ़े तक आँख खुलने न दीं।

जब कुमार की नींद खुली अपने को उस खेमे में न पाया जिसमें सोए थे अथवा जो तिलिस्म के पास जंगल में था, बल्कि उसकी जगह एक बहुत सजे हुए कमरे को देखा जिसकी छत में कई बेशकीमती झाड़ और शीशे लटक रहे थे। ताज्जुब में पड़ इधर-उधर देखने लगे। मालूम हुआ कि यह एक बहुत भारी दीवानखाना है, जिसमें तीन तरफ संगमरमर की दीवार और चौथी तरफ बड़े-बड़े खूबसूरत दरवाजे हैं जो इस समय बंद हैं। दीवारों पर कई दीवारें लगी हुई हैं, जिनमें दिन निकल आने पर भी अभी तक मोमबत्तियाँ जल रही हैं। ऊपर उसके चारों तरफ बड़ी-बड़ी खूबसूरत और हसीन औरतों की तस्वीरें लटक रही थीं। लंबी दीवार के बीचोंबीच एक तस्वीर, आदमी के कद के बराबर सोने के चौखटे में जड़ी, दीवार के साथ लगी हुई थी।

कुमार की निगाह तमाम तस्वीरों पर से दोड़ती हुई उस बड़ी तस्वीर पर आ कर अटक गई। सोचने लगे बल्कि धीमी आवाज में इस तरह बोलने लगे जैसे अपने ‘बगल’ में बैठे हुए किसी दोस्त को कोई कहता हो – ‘अहा, इस तस्वीर से बढ़ कर इस दीवानखाने में कोई चीज नहीं है और बेशक यह तस्वीर भी उसी की है जिसके इश्क ने मुझे तबाह कर रखा है। वाह क्या साफ भोली सूरत दिखलाई है।’

कुमार झट से उठ बैठे और उस तस्वीर के पास जा कर खड़े हो गए। दीवानखाने के दरवाजे बंद थे मगर हर एक दरवाजे के ऊपर छोटे-छोटे मोखे (सूराख) बने हुए थे जिनमें शीशे की टट्टियाँ लगी हुई थीं, उन्हीं में से सीधी रोशनी ठीक उस लंबी-चौड़ी तस्वीर पर पड़ रही थी जिसको देखने के लिए कुमार पलँग पर से उतर कर उसके पास गए थे। असल में वह तस्वीर कुमारी चंद्रकांता की थी।

कुमार उस तस्वीर के पास जा कर खड़े हो गए और फिर उसी तरह बोलने लगे जैसे किसी दूसरे को जो पास ही खड़ा हो सुना रहे हैं – ‘अहा, क्या अच्छी और साफ तस्वीर बनी हुई है। इसमें ठीक उतना ही बड़ा कद है, वैसी ही बड़ी-बड़ी आँखें हैं जिनमें काजल की लकीरें कैसी साफ मालूम हो रही हैं। अहा। गालों पर गुलाबीपन कैसा दिखलाया है, बारीक होंठों में पान की सुर्खी और मुस्कुराहट साफ मालूम हो रही है, कानों में बाले, माथे में बेंदी और नाक में नथ तो हई है मगर यह गले की गोप क्या ही अच्छी और साफ बनाई है जिसके बीच के चमकते हुए मानिक और अगल-बगल के कुंदन की उभाड़ (हसली) में तो हद दर्जे की कारीगरी खर्च की गई है। ‘गोप’ ही क्या, सभी गहने अच्छे हैं। गले की माला, हाथों के बाजूबंद, कंगन, छंद, पहुँची, अँगूठी सभी चीजें अच्छी बनाई हैं, और देखो एक बगल चपला दूसरी तरफ चंपा क्या मजे में अपनी ठुड्डी पर उँगली रखे खड़ी हैं।’

‘हाय, चंद्रकांता कहाँ होगी।’ इतना कह एक लंबी साँस ले एकटक उस तस्वीर की तरफ देखने लगे।

ऊपर की तरफ कहीं से पाजेब की छन्न से आवाज आई जिसे सुनते ही कुमार चौंक पड़े। ऊपर की तरफ कई छोटी-छोटी खिड़कियाँ थीं जो सब-की-सब बंद थीं। यह आवाज कहाँ से आई? इस घर में कौन औरत है? इतनी देर तक तो कुमार अपने पूरे होशो-हवास में न थे मगर अब चौंके और सोचने लगे – ‘हैं, इस जगह मैं कैसे आ गया? कौन उठा लाया? उसने मेरे साथ बड़ी नेकी की जो मेरी प्यारी चंद्रकांता की तस्वीर मुझे दिखला दी, मगर कहीं ऐसा न हो कि मैं यह बातें स्वप्न में देखता होऊँ? जरूर यह स्वप्न है, चलो फिर उसी पलँग पर सो रहें।’

यह सोच फिर कुमार उसी पलँग पर आ कर लेट गए, आँखें बंद कर लीं, मगर नींद कहाँ से आती। इतने में फिर पाजेब की आवाज ने कुमार को चौंका दिया। अबकी दफा उठते ही सीधे दरवाजों की तरफ गए और सातों दरवाजों को धक्का दिया, सब खुल गए। एक छोटा-सा हरा-भरा बाग दिखाई पड़ा। दिन अनुमानत पहर-भर के चढ़ चुका होगा।

यह बाग बिल्कुल जंगली फूलों और लताओं से भरा हुआ था, बीच में एक छोटा-सा तालाब भी दिखाई पड़ा। कुमार सीधे तालाब के पास चले गए जो बिल्कुल पत्थर का बना हुआ था। एक तरफ उसके खूबसूरत सीढ़ियाँ उतरने के लिए बनी हुई थीं, ऊपर उन सीढ़ियों के दोनों तरफ दो बड़े-बड़े जामुन के पेड़ लगे हुए थे जो बहुत ही घने थे। तमाम सीढ़ियों पर बल्कि कुछ जल तक उन दोनों की छाया पहुँची हुई थी और दोनों पेड़ों के नीचे छोटे-छोटे संगमरमर के चबूतरे बने हुए थे। बाएँ तरफ के चबूतरे पर नरम गलीचा बिछा हुआ था, बगल में एक टोंटीदार चाँदी का गड़वा, उसके पास ही शहतूत के पत्तो पर बना-बनाया दातून एक तरफ से चिरा हुआ था, बगल में एक छोटी-सी चाँदी की चौकी पर धोती-गमछा और पहनने के खूबसूरत और कीमती कपड़े भी रखे हुए थे।

दाहिनी तरफ वाले संगमरमर के चबूतरे पर चाँदी की एक चौकी थी जिस पर पूजा का सामान धारा हुआ था। छोटे-छोटे कई जड़ाऊ पँचपात्र, तश्तरी, कटोरियाँ सब साफ की हुई थीं और नरम ऊनी आसन बिछा हुआ था जिस पर एक छोटा-सा बेल भी पड़ा था।

कुमार इस बात पर गौर कर रहे थे कि वे कहाँ आ पहुँचे, उन्हें कौन लाया, इस जगह का नाम क्या है तथा यह बाग और कमरा किसका है? इतने में ही उस पेड़ की तरफ निगाह जा पड़ी जिसके नीचे पूजा का सब सामान सजाया हुआ था। एक कागज चिपका हुआ नजर पड़ा। उसके पास गए, देखा कि कुछ लिखा हुआ है। पढ़ा, यह लिखा था –

‘कुँवर वीरेंद्रसिंह, यह सब सामान तुम्हारे ही वास्ते है। इसी बावड़ी में नहाओ और इन सब चीजों को बरतो, क्योंकि आज के दिन तुम हमारे मेहमान हो।’

कुमार और भी सोच में पड़ गए कि यह क्या, सामान तो इतना लंबा-चौड़ा रखा गया है मगर आदमी कोई भी नजर नहीं पड़ता, जरूर यह जगह परियों के रहने की है और वे लोग भी इसी बाग में फिरती होंगी, मगर दिखाई नहीं पड़तीं। अच्छा इस बाग में पहले घूम कर देख लें कि क्या-क्या है फिर नहाना-धोना होगा, आखिर इतना दिन तो चढ़ ही चुका है। अगर कहीं दरवाजा नजर पड़ा तो इस बाग के बाहर हो जाएँगे, मगर नहीं, इस बाग का मालिक कौन है और वह मुझे यहाँ क्यों लाया, जब तक इसका हाल मालूम न हो इस बाग से कैसे जाने को जी चाहेगा? यही सब सोच कर कुमार उस बाग में घूमने लगे।

जिस कमरे में नींद से कुमार की आँख खुली थी वह बाग के पश्चिम तरफ था। पूरब तरफ कोई इमारत न थी क्योंकि निकलता हुआ सूरज पहले ही से दिखाई पड़ा था जो इस वक्त नेजे बराबर ऊँचा आ चुका होगा। घूमते हुए बाग के उत्तर तरफ एक और कमरा नजर पड़ा जो पूरब तरफ वाले कमरे के साथ सटा हुआ था।

कुमार ने चाहा कि उस कमरे की भी सैर करें मगर न हो सका, क्योंकि उसके सब दरवाजे बंद थे, अस्तु आगे बढ़े और जंगली फूलों, बेलों और खूबसूरत क्यारियों को देखते हुए बाग के दक्षिण तरफ पहुँचे। एक छोटी-सी कोठरी नजर पड़ी जिसकी दीवार पर कुछ लिखा हुआ था, पढ़ने से मालूम हुआ कि पाखाना है। उसी जगह लकड़ी की चौकी पर पानी से भरा हुआ एक लोटा भी रखा था।

दिन डेढ़ पहर से ज्यादा चढ़ चुका होगा, कुमार की तबीयत घबराई हुई थी, आखिर सोच-विचार कर चौकी पर से लोटा उठा लिया और पाखाने गए, बाद इसके बावड़ी में हाथ-मुँह धोए, सीढ़ियों के ऊपर जामुन के पेड़ तले चौकी पर बैठ कर दातुन किया, बावली में स्नान करके उन्हीं कपड़ों को पहना जो उनके लिए संगमरमर के चबूतरे पर रखे हुए थे, दूसरे पर बैठ के संध्या-पूजा की।

जब इन सब कामों से छुट्टी पा चुके तो फिर उसी कमरे की तरफ आए जिसमें सोते से आँख खुली थी और कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर देखी थी, मगर उस कमरे के कुल किवाड़ बंद पाए, खोलने की कोशिश की मगर खुल न सके। बाहर दालान में खूब कड़ी धूप फैली हुई थी। धूप के मारे तबीयत घबरा उठी, यही जी चाहता था कि कहीं ठंडी जगह मिले तो आराम किया जाए। आखिर उस जगह से हट कुमार घूमते हुए उस दूसरी तरफ वाले कमरे को देखने चले जिसमें किवाड़ पहर भर पहले बंद पाए थे, वे अब खुले हुए दिखलाई पड़े, अंदर गए।

भीतर से यह कमरा बहुत साफ संगमरमर के फर्श का था, मालूम होता था कि अभी कोई इसे धो कर साफ कर गया है। बीच में एक कश्मीरी गलीचा बिछा हुआ था। आगे उसके कई तरह की भोजन की चीजें चाँदी और सोने के बरतनों में सजाई हुई रखी थीं। आसन पर एक खत पड़ा था जिसे कुमार ने उठा कर पढ़ा, यह लिखा हुआ था –

‘आप किसी तरह घबराएँ नहीं, यह मकान आपके एक दोस्त का है जहाँ हर तरह से आपकी खातिर की जाएगी। इस वक्त आप भोजन करके बगल की कोठरी में जहाँ आपके लिए पलँग बिछा है कुछ देर आराम करें।’

इसे पढ़ कर कुमार जी में सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए? भूख बड़े जोर की लगी है पर बिना मालिक के इन चीजों को खाने को जी नहीं चाहता और कुछ पता भी नहीं लगता कि इस मकान का मालिक कौन है जो छिप-छिप कर हमारी खातिरदारी की चीजें तैयार कर रहा है, पर मालूम नहीं होता कि कौन किधर से आता है, कहाँ खाना बनाता है, मालिक मकान या उसके नौकर-चाकर किस जगह रहते हैं या किस राह से आते-जाते हैं। उन लोगों को जब इसी जगह छिपे रहना मँजूर था तो मुझे यहाँ लाने की जरूरत ही क्या थी?

उसी आसन पर बैठे हुए बड़ी देर तक कुमार तरह-तरह की बातें सोचते रहे, यहाँ तक कि भूख ने उन्हें बेताब कर दिया, आखिर कब तक भूखे रहते? लाचार भोजन की तरफ हाथ बढ़ाया, मगर फिर कुछ सोच कर रुक गए और हाथ खींच लिया।

भोजन करने के लिए तैयार होकर फिर कुमार के रुक जाने से बड़े जोर के साथ हँसने की आवाज आई जिसे सुन कर कुमार और भी हैरान हुए। इधर-उधर देखने लगे मगर कुछ पता न लगा, ऊपर की तरफ कई खिड़कियाँ दिखाई पड़ीं मगर कोई आदमी नजर न आया।

कुमार ऊपर वाली खिड़कियों की तरफ देख ही रहे थे कि एक आवाज आई – ‘आप भोजन करने में देर न कीजिए, कोई खतरे की जगह नहीं है।’

भूख के मारे कुमार विकल हो रहे थे, लाचार हो कर खाने लगे। सब चीजें एक-से-एक स्वादिष्ट बनी हुई थीं। अच्छी तरह से भोजन करने के बाद कुमार उठे, एक तरफ हाथ धोने के लिए लोटे में जल रखा हुआ था। अपने हाथ से लोटा उठा, हाथ धोए और उस बगल वाली कोठरी की तरफ चले। जैसा कि पुरजे में लिखा हुआ था उसी के मुताबिक सोने के लिए उस कोठरी में निहायत खूबसूरत पलँग बिछा हुआ पाया।

मसहरी पर लेट कर तरह-तरह की बातें सोचने लगे। इस मकान का मालिक कौन है और मुलाकात न करने में उसने क्या फायदा सोचा है, यहाँ कब तक पड़े रहना होगा, वहाँ लश्कर वालों की हमारी खोज में क्या दशा होगी इत्यादि बातों को सोचते-सोचते कुमार को नींद आ गई और बेखबर सो गए।

दो घंटे रात बीते तक कुमार सोए रहे। इसके बाद बीन की और उसके साथ ही किसी के गाने की आवाज कानों में पड़ी, झट आँखें खोल इधर-उधर देखने लगे, मालूम हुआ कि यह वह कमरा नहीं है जिसमें भोजन करके सोए थे, बल्कि इस वक्त अपने को एक निहायत खूबसूरत सजी हुई बारहदरी में पाया जिसके बाहर से बीन और गाने की आवाज आ रही थी।

कुमार पलँग पर से उठे और बाहर देखने लगे। रात बिल्कुल अधेरी थी मगर रोशनी खूब हो रही थी जिससे मालूम पड़ा कि यह बाग भी वह नहीं है जिसमें दिन को स्नान और भोजन किया था।

इस वक्त यह नहीं मालूम होता था कि यह बाग कितना बड़ा है क्योंकि इसके दूसरे तरफ की दीवार बिल्कुल नजर नहीं आती थी। बड़े-बड़े दरख्त भी इस बाग में बहुत थे। रोशनी खूब हो रही थी। कई औरतें जो कमसिन और खूबसूरत थीं, टहलती और कभी-कभी गाती या बजाती हुई नजर पड़ीं, जिनका तमाशा दूर से खड़े हो कर कुमार देखने लगे। वे आपस में हँसती और ठिठोली करती हुई एक रविश से दूसरी और दूसरी से तीसरी पर घूम रही थीं। कुमार का दिल न माना और ये धीरे धीरे उनके पास जा कर खड़े हो गए।

वे सब कुमार को देख कर रुक गईं और आपस में कुछ बातें करने लगीं, जिसको कुमार बिल्कुल नहीं समझ सकते थे, मगर उनके हाथ-पैर हिलाने के भाव से मालूम होता था कि वे कुमार को देख कर ताज्जुब कर रही हैं। इतने में एक औरत आगे बढ़ कर कुमार के पास आई और उनसे बोली – ‘आप कौन हैं और बिना हुक्म इस बाग में क्यों चले आए?’

कुमार ने उसे नजदीक से देखा तो निहायत हसीन और चंचल पाया। जवाब दिया – ‘मैं नहीं जानता यह बाग किसका है, अगर हो सके तो बताओ कि यहाँ का मालिक कौन है?’

औरत – ‘हमने जो कुछ पूछा है पहले उसका जवाब दे लो फिर हमसे जो पूछोगे सो बता देंगे।’

कुमार – ‘मुझे कुछ भी मालूम नहीं कि मैं यहाँ क्यों कर आ गया।’

औरत – ‘क्या खूब। कैसे सीधे-सादे आदमी हैं (दूसरी औरत की तरफ देख कर) बहिन, जरा इधर आना, देखो कैसे भोले-भाले चोर इस बाग में आ गए हैं जो अपने आने का सबब भी नहीं जानते।’

उस औरत के आवाज देने पर सभी ने आ कर कुमार को घेर लिया और पूछना शुरू किया – ‘सच बताओ तुम कौन हो और यहाँ क्यों आए?’

दूसरी औरत – ‘जरा इनके कमर में तो हाथ डालो, देखो कुछ चुराया तो नहीं?’

तीसरी – ‘जरूर कुछ न कुछ चुराया होगा।’

चौथी – ‘अपनी सूरत इन्होंने कैसी बना रखी है, मालूम होता है कि किसी राजा के लड़के हैं।’

पहली – ‘भला यह तो बताइए कि ये कपड़े आपने कहाँ से चुराए?’

इन सभी की बातें सुन कर कुमार बड़े हैरान हुए। जी में सोचने लगे कि अजब आफत में आ फँसे, कुछ समझ में नहीं आता, जरूर इन्हीं लोगों की बदमाशी से मैं यहाँ तक पहुँचा और यही लोग अब मुझे चोर बनाती हैं। यों ही कुछ देर तक सोचते रहे, बाद इसके फिर बातचीत होने लगी।

कुमार – ‘मालूम होता है कि तुम्हीं लोगों ने मुझे यहाँ ला कर रखा है।’

एक औरत – ‘हम लोगों को क्या गरज थी जो आपको यहाँ लाते या आप ही खुश हो हमें क्या दे देंगे जिसकी उम्मीद में हम लोग ऐसा करते। अब यह कहने से क्या होता है, जरूर चोरी की नीयत से ही आप आए हैं।’

कुमार – ‘मुझको यह भी मालूम नहीं कि यहाँ आने या जाने का रास्ता कौन-सा है। अगर यह भी बतला दो तो मैं यहाँ से चला जाऊँ।’

दूसरी – ‘वाह, क्या बेचारे अनजान बनते हैं। यहाँ तक आए भी और रास्ता भी नहीं मालूम।’

तीसरी – ‘बहिन, तुम नहीं समझतीं यह चालाकी से भागना चाहते हैं।’

चौथी – ‘अब इनको गिरफ्तार करके ले चलना चाहिए।’

कुमार – ‘भला मुझे कहाँ ले चलोगी?’

एक औरत – ‘अपने मालिक के सामने।’

कुमार – ‘तुम्हारे मालिक का क्या नाम है?’

एक – ‘ऐसी किसकी मजाल है जो हमारे मालिक का नाम ले।’

कुमार – ‘क्या तुम्हें अपने मालिक का नाम बताने में भी कुछ हर्ज है।’

दूसरी – ‘हर्ज! नाम लेते ही जुबान कट कर गिर पड़ेगी।’

कुमार – ‘तो तुम लोग अपने मालिक से बातचीत कैसे करती हो?’

दूसरी – ‘मालिक की तस्वीर से बातचीत करते हैं, सामना नहीं होता।’

कुमार – ‘अगर कोई पूछे कि तुम किसकी नौकर हो तो कैसे बताओगी?’

तीसरी – ‘हम लोग अपने मालिक राजकुमारी की तस्वीर अपने गले में लटकाए रहती हैं जिससे मालूम हो कि हम सब फलाने की लौंडी हैं।’

कुमार – ‘क्या यहाँ कई राजकुमारी हैं जो लौंडियों की पहचान में गड़बड़ी हो जाने का डर है?’

पहली – ‘नहीं, यहाँ सिर्फ दो राजकुमारी हैं और दोनों के यहाँ यही चलन है, कोई अपने मालिक का नाम नहीं ले सकता। जब पहचान की जरूरत होती है तो गले की तस्वीर दिखा दी जाती है।’

कुमार – ‘भला मुझे भी वह तस्वीर दिखाओगी?’

‘हाँ-हाँ, लो देख लो।’ कह कर एक ने अपने गले की छोटी-सी तस्वीर जो धुकधुकी की तरह लटक रही थी निकाल कर कुमार को दिखाई जिसे देखते ही उनके होश उड़ गए।

‘हैं। यह तस्वीर तो कुमारी चंद्रकांता की है। तो क्या ये सब उन्हीं की लौंडी हैं। नहीं-नहीं, कुमारी चंद्रकांता यहाँ भला कैसे आएँगी? उनका राज्य तो विजयगढ़ है। अच्छा पूछें तो यह मकान किस शहर में है?’

कुमार – ‘भला यह तो बताओ इस शहर का क्या नाम है जिसमें हम इस वक्त हैं।’

एक – इस शहर का नाम चित्रनगर है क्योंकि सभी के गले में कुमारी की तस्वीर लटकती रहती है।’

कुमार – ‘और इस शहर का यह नाम कब से पड़ा?’

एक – ‘हजारों बरस से यही नाम है और इसी रंग की तस्वीर कई पुश्त से हम लोगों के गले में है। पहले मेरी परदादी को सरकार से मिली थी, होते-होते अब मेरे गले में आ गई।’

कुमार – ‘क्या तब से यही राजकुमारी यहाँ का राज्य करती आई हैं, कोई इनका माँ-बाप नहीं है?’

दूसरी – ‘अब यह सब हम लोग क्या जानें, कुछ राजकुमारी से तो मुलाकात होती नहीं जो मालूम हो कि यही हैं या दूसरी, जवान हैं या बूढ़ी हो गईं।’

कुमार – ‘तो कचहरी कौन करता है?’

दूसरी – ‘एक बड़ी-सी तस्वीर हम लोगों के मालिक राजकुमारी की है, उसी के सामने दरबार लगता है। जो कुछ हुक्म होता है उसी तस्वीर से आवाज आती है।’

कुमार – ‘तुम लोगों की बातों ने तो मुझे पागल बना दिया है। ऐसी बातें करती हो जो कभी मुमकिन ही नहीं, अक्ल में नहीं आ सकतीं। अच्छा उस दरबार में मुझे भी ले जा सकती हो?’

औरत – ‘इसमें कहने की कौन-सी बात है, आखिर आपको गिरफ्तार करके उसी दरबार में तो ले चलना है, आप खुद ही देख लीजिएगा।’

कुमार – ‘जब तुम लोगों का मालिक कोई भी नहीं या अगर है तो एक तस्वीर, तब हमने उसका क्या बिगाड़ा? क्यों हमें बाँध के ले चलोगी?’

औरत – ‘हमारी राजकुमारी सभी की नजरों से छिप कर अपने राज्य भर में घूमा करती हैं और अपने मकान और बगीचों की सैर किया करती हैं मगर किसी की निगाह उन पर नहीं पड़ती। हम लोग रोज बाग और कमरों की सफाई करती हैं, और रोज ही कमरों का सामान, फर्श, पलँग के बिछौने वगैरह ऐसे हो जाते हैं जैसे किसी के मसरफ (इस्तेमाल) में आए हों। वह रौंदे जाते और मैले भी हो जाते हैं, इससे मालूम होता है कि हमारी राजकुमारी सभो की नजरों से छिप कर घूमा करती हैं, जिनकी हजारों बरस की उम्र है, और इसी तरह हमेशा जीती रहेंगी।

दूसरी – ‘बहिन तुम इनकी बातों का जवाब कब तक देती रहोगी? ये तो इसी तरह जान बचाना चाहते हैं?’

पहली – ‘नहीं-नहीं, ये जरूर किसी रईस राजा के लड़के हैं, इनकी बातों का जवाब देना मुनासिब है और इनको इज्जत के साथ कैद करके दरबार में ले चलना चाहिए।’

तीसरी – भला इनका और इनके बाप का नामधाम भी तो पूछ लो कि इसी तरह राजा का लड़का समझ लोगी। (कुमार की तरफ देख कर) क्यों जी आप किसके लड़के हैं और आपका नाम क्या है?’

कुमार – ‘मैं नौगढ़ के महाराज सुरेंद्रसिंह का लड़का वीरेंद्रसिंह हूँ।’

इनका नाम सुनते ही वे सब खुश हो कर आपस में कहने लगीं – ‘वाह, इनको तो जरूर पकड़ के ले चलना चाहिए, बहुत कुछ इनाम मिलेगा, क्योंकि इन्हीं को गिरफ्तार करने के लिए सरकार की तरफ से मुनादी की गई थी, इन्होंने बड़ा भारी नुकसान किया है, सरकारी तिलिस्म तोड़ डाला और खजाना लूट कर घर ले गए। अब इनसे बात न करनी चाहिए। जल्दी इनके हाथ-पैर बाँधो और इसी वक्त सरकार के पास ले चलो। अभी आधी रात नहीं गई है, दरबार होता होगा, देर हो जाएगी तो कल दिन भर इनकी हिफाजत करनी पड़ेगी, क्योंकि हमारे सरकार का दरबार रात ही को होता है।’

इन सभी की ये बातें सुन कर कुमार की तो अक्ल चकरा गई। कभी ताज्जुब, कभी सोच, कभी घबराहट से इनकी अजब हालत हो गई। आखिर, उन औरतों की तरफ देख कर बोले – ‘फसाद क्यों करती हो, हम तो आप ही तुम लोगों के साथ चलने को तैयार हैं, चलो देखें तुम्हारी राजकुमारी का दरबार कैसा है।’

एक – ‘जब आप खुद चलने को तैयार हैं तब हम लोगों को ज्यादा बखेड़ा करने की क्या जरूरत है, चलिए।’

कुमार – ‘चलो।’

वे सब औरतें गिनती में नौ थीं, चार कुमार के आगे चार पीछे हो उनको ले कर रवाना हुईं और एक यह कह कर चली गई कि मैं पहले खबर करती हूँ कि फलाने डाकू को हम लोगों ने गिरफ्तार किया है जिसको साथ वाली सखियाँ लिए आती हैं।

वे सब कुमार को लिए बाग के एक कोने में गईं जहाँ दूसरी तरफ निकल जाने के लिए छोटा-सा दरवाजा नजर पड़ा जिसमें शीशे की सिर्फ एक सफेद हाँडी जल रही थी।

वे सब कुमार को लिए हुए इसी दरवाजे में घुसीं। थोड़ी दूर जा कर दूसरा बाग जो बहुत सजा था नजर पड़ा जिसमें हद से ज्यादा रोशनी हो रही थी और कई चोबदार हाथ में सोने-चाँदी के आसे लिए इधर-उधर टहल रहे थे। इनके अलावे और भी बहुत से आदमी घूमते-फिरते दिखाई पड़े।

उन औरतों से किसी ने कुछ बातचीत या रोक-टोक न की, ये सब कुमार को लिए हुए बराबर धड़धड़ाती हुई एक बड़े भारी दीवानखाने में पहुँचीं जहाँ की सजावट और कैफियत देख कुमार के होश जाते रहे।

सबसे पहले कुमार की निगाह उस बड़ी तस्वीर के ऊपर पड़ी जो ठीक सामने सोने के जड़ाऊ सिंहासन पर रखी हुई थी। मालूम होता था कि सिंहासन पर कुमारी चंद्रकांता सिर पर मुकुट धारे बैठी हैं, ऊपर छत्र लगा हुआ है, और सिंहासन के दोनों तरफ दो जिंदा शेर बैठे हुए हैं जो कभी-कभी डकारते और गुर्राते भी थे। बाद इसके बड़े-बड़े सरदार बेशकीमती पोशाकें पहने सिंहासन के सामने दो-पट्टी कतार बाँधे सिर झुकाए बैठे थे। दरबार में सन्नाटा छाया हुआ था, सब चुप मारे बैठे थे।

चंद्रकांता की तस्वीर और ऐसे दरबार को देख कर एक दफा तो कुमार पर भी रोब छा गया। चुपचाप सामने खड़े हो गए, उनके पीछे और दोनों बगल वे सब औरतें खड़ी हो गईं जिन्होंने कुमार को चोरों की तरह हाजिर किया था।

तस्वीर के पीछे से आवाज आई – ‘ये कौन हैं?’

उन औरतों में से एक ने जवाब दिया – ‘ये सरकारी बाग में घूमते हुए पकड़े गए हैं और पूछने से मालूम हुआ कि इनका नाम वीरेंद्रसिंह है, विक्रमी तिलिस्म इन्होंने ही तोड़ा है।’ फिर आवाज आई – ‘अगर यह सच है तो इनके बारे में बहुत कुछ विचार करना पड़ेगा, इस वक्त ले जा कर हिफाजत से रखो, फिर हुक्म पा कर दरबार में हाजिर करना।’

उन लौंडियों ने कुमार को एक अच्छे कमरे में ले जा कर रखा जो हर तरह से सजा हुआ था मगर कुमार अपने ख्याल में डूबे हुए थे। नए बाग की सैर और तस्वीर के दरबार ने उन्हें और अचंभे में डाल दिया था। गरदन झुकाए सोच रहे थे। पहले बाग में जो ताज्जुब की बातें देखीं उनका तो पता लगा ही नहीं, इस बाग में तो और भी बातें दिखाई देती हैं जिसमें कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर और उनके दरबार का लगना और भी हैरान कर रहा है। इसी सोच-विचार में गरदन झुकाए लौंडियों के साथ चले गए, इसका कुछ भी ख्याल नहीं कि कहाँ जाते हैं, कौन लिए जाता है, या कैसे सजे हुए मकान में बैठाए गए हैं।

जमीन पर फर्श बिछा हुआ और गद्दी लगी हुई थी, बड़े तकिए के सिवाय और भी कई तकिए पड़े हुए थे। कुमार उस गद्दी पर बैठ गए और दो घंटे तक सिर झुकाए ऐसा सोचते रहे कि तनोबदन की बिल्कुल खबर न रही। प्यास मालूम हुई तो पानी के लिए इधर-उधर देखने लगे। एक लौंडी सामने खड़ी थी, उसने हाथ जोड़ कर पूछा – ‘क्या हुक्म होता है?’ जिसके जवाब में कुमार ने हाथ के इशारे से पानी माँगा। सोने के कटोरे में पानी भर के लौंडी ने कुमार के हाथ में दिया, पीते ही एकदम उनके दिमाग तक ठंडक पहुँच गई, साथ ही आँखों में झपकी आने लगी और धीरे-धीरे बिल्कुल बेहोश हो कर उसी गद्दी पर लेट गए।

बयान – 12

कुँवर वीरेंद्रसिंह के गायब होने से उनके लश्कर में खलबली पड़ गई।

तेजसिंह और देवीसिंह ने घबरा कर चारों तरफ खोज की मगर कुछ पता न लगा। दिन भर बीत जाने पर ज्योतिषी जी ने तेजसिंह से कहा – ‘रमल से जान पड़ता है कि कुमार को कई औरतें बेहोशी की दवा सुँघा बेहोश कर उठा ले गई हैं और नौगढ़ के इलाके में अपने मकान के अंदर कैद कर रखा है, इससे ज्यादा कुछ मालूम नहीं होता।’

ज्योतिषी जी की बात सुन कर तेजसिंह बोले – ‘नौगढ़ में तो अपना ही राज्य है, वहाँ कुमार के दुश्मनों का कहीं ठिकाना नहीं। महाराज सुरेंद्रसिंह की अमलदारी से उनकी रियाया बहुत खुश तथा उनके और उनके खानदान के लिए वक्त पर जान देने को तैयार है, फिर कुमार को ले जा कर कैद करने वाला कौन हो सकता है।’

बहुत देर तक सोच-विचार करते रहने के बाद तेजसिंह, कुमार की खोज में जाने के लिए तैयार हुए। देवीसिंह और ज्योतिषी जी ने भी उनका साथ दिया और ये तीनों नौगढ़ की तरफ रवाना हुए। जाते वक्त महाराज शिवदत्त के दीवान को चुनारगढ़ विदा करते गए जो कुँवर वीरेंद्रसिंह की मुलाकात को महाराज शिवदत्त की तरफ से तोहफा और सौगात ले कर आए हुए थे, और तिलिस्मी किताब फतहसिंह सिपहसालार के सुपुर्द कर दी, जो कुँवर वीरेंद्रसिंह के गायब हो जाने के बाद उनके पलँग पर पड़ी हुई पाई गई थी।

ये तीनों ऐयार आधी रात गुजर जाने के बाद नौगढ़ की तरफ रवाना हुए। पाँच कोस तक बराबर चले गए, सवेरा होने पर तीनों एक घने जंगल में रुके और अपनी सूरतें बदल कर फिर रवाना हुए। दिन भर चल कर भूखे-प्यासे शाम को नौगढ़ की सरहद पर पहुँचे। इन लोगों ने आपस में यह राय ठहराई कि किसी से मुलाकात न करें बल्कि जाहिर भी न होकर छिपे-ही-छिपे कुमार की खोज करें।

तीनों ऐयारों ने अलग-अलग हो कर कुमार का पता लगाना शुरू किया। कहीं मकान में घुस कर, कहीं बाग में जा कर, कहीं आदमियों से बातें करके उन लोगों ने दरियाफ्त किया मगर कहीं पता न लगा। दूसरे दिन तीनों इकट्ठे हो कर सूरत बदले हुए राजा सुरेंद्रसिंह के दरबार में गए और एक कोने में खड़े हो बातचीत सुनने लगे।

उसी वक्त कई जासूस दरबार में पहुँचे जिनकी सूरत से घबराहट और परेशानी साफ मालूम होती थी। तेजसिंह के बाप दीवान जीतसिंह ने उन जासूसों से पूछा – ‘क्या बात है जो तुम लोग इस तरह घबराए हुए आए हो?’

एक जासूस ने कुछ आगे बढ़ कर जवाब दिया – ‘लश्कर से कुमार की खबर लाया हूँ।’

जीतसिंह – ‘क्या हाल है, जल्द कहो?’

जासूस – ‘दो रोज से उनका कहीं पता नहीं है।’

जीतसिंह – ‘क्या कहीं चले गए?’

जासूस – ‘जी नहीं, रात को खेमे में सोए हुए थे, उसी हालत में कुछ औरतें उन्हें उठा ले गईं, मालूम नहीं कहाँ कैद कर रखा है।’

जीतसिंह – (घबरा कर) ‘यह कैसे मालूम हुआ कि उन्हें कई औरतें ले गईं?’

जासूस – ‘उनके गायब हो जाने के बाद ऐयारों ने बहुत तलाश किया। जब कुछ पता न लगा तो ज्योतिषी जगन्नाथ जी ने रमल से पता लगा कर कहा कि कई औरतें उन्हें ले गई हैं और इस नौगढ़ के इलाके में ही कहीं कैद कर रखा है?’

जीतसिंह – (ताज्जुब से) ‘इसी नौगढ़ के इलाके में। यहाँ तो हम लोगों का कोई दुश्मन नहीं है।’

जासूस – ‘जो कुछ हो, ज्योतिषी जी ने तो ऐसा ही कहा है।’

जीतसिंह – ‘फिर तेजसिंह कहाँ गया?’

जासूस – ‘कुमार की खोज में कहीं गए हैं, देवीसिंह और ज्योतिषी जी भी उनके साथ हैं। मगर उन लोगों के जाते ही हमारे लश्कर पर आफत आई?’

जीतसिंह – (चौंक कर) ‘हमारे लश्कर पर क्या आफत आई?’

जासूस – ‘मौका पा कर महाराज शिवदत्त ने हमला कर दिया।’

हमले का नाम सुनते ही तेजसिंह वगैरह ऐयार लोग जो सूरत बदले हुए एक कोने में खड़े थे आगे की सब बातें बड़े गौर से सुनने लगे।

जीतसिंह – ‘पहले तो तुम लोग यह खबर लाए थे कि महाराज शिवदत्त ने कुमार की दोस्ती कबूल कर ली और उनका दीवान बहुत कुछ नजर ले कर आया है, अब क्या हुआ?’

जासूस – उस वक्त की वह खबर बहुत ठीक थी, पर आखिर में उसने धोखा दिया और बेईमानी पर कमर बाँध ली।’

जीतसिंह – ‘उसके हमले का क्या नतीजा हुआ?’

जासूस – ‘पहर भर तक तो फतहसिंह सिपहसालार खूब लड़े, आखिर शिवदत्त के हाथ से जख्मी हो कर गिरफ्तार हो गए। उनके गिरफ्तार होते ही बेसिर की फौज तितिर-बितिर हो गई।’

अभी तक सुरेंद्रसिंह चुपचाप बैठे इन बातों को सुन रहे थे। फतहसिंह के गिरफ्तार हो जाने और लश्कर के भाग जाने का हाल सुन आँखें लाल हो गईं, दीवान जीतसिंह की तरफ देख कर बोले – ‘हमारे यहाँ इस वक्त फौज तो है नहीं, थोड़े-बहुत सिपाही जो कुछ हैं, उनको ले कर इसी वक्त कूच करूँगा। ऐसे नामर्द को मारना कोई बड़ी बात नहीं है।’

जीतसिंह – ‘ऐसा ही होना चाहिए, सरकार के कूच की बात सुन कर भागी हुई फौज भी इकट्ठी हो जाएगी।

ये बातें हो ही रही थीं कि दो जासूस और दरबार में हाजिर हुए। पूछने से उन्होंने कहा – ‘कुमार के गायब होने, ऐयारों के उनकी खोज में जाने, फतहसिंह के गिरफ्तार हो जाने और फौज के भाग जाने की खबर सुन कर महाराज जयसिंह अपनी कुल फौज ले कर चुनारगढ़ पर चढ़ गए हैं। रास्ते में खबर लगी कि फतहसिंह के गिरफ्तार होने के दो ही पहर बाद रात को महाराज शिवदत्त भी कहीं गायब हो गए और उनके पलँग पर एक पुर्जा पड़ा हुआ मिला जिसमें लिखा हुआ था कि इस बेईमान को पूरी सजा दी जाएगी, जन्म भर कैद से छुट्टी न मिलेगी। बाद इसके सुनने में आया कि फतहसिंह भी छूट कर तिलिस्म के पास आ गए और कुमार की फौज फिर इकट्ठी हो रही है।’

इस खबर को सुन कर राजा सुरेंद्रसिंह ने दीवान जीतसिंह की तरफ देखा।

जीतसिंह – ‘जो कुछ भी हो महाराज जयसिंह ने चढ़ाई कर ही दी, मुनासिब है कि हम भी पहुँच कर चुनारगढ़ का बखेड़ा ही तय कर दें, यह रोज-रोज की खटपट अच्छी नहीं।’

राजा – तुम्हारा कहना ठीक है, ऐसा ही किया जाए, क्या कहें हमने सोचा था कि लड़के के ही हाथ से चुनारगढ़ फतह हो, जिससे उसका हौसला बढ़े, मगर अब बर्दाश्त नहीं होता।

इन सब बातों और खबरों को सुन तीनों ऐयार वहाँ से रवाना हो गए और एकांत में जा कर आपस में सलाह करने लगे।

तेजसिंह – ‘अब क्या करना चाहिए?’

देवीसिंह – ‘चाहे जो भी हो पहले तो कुमार को ही खोजना चाहिए।’

तेजसिंह – ‘मैं कहता हूँ कि तुम लश्कर की तरफ जाओ और हम दोनों कुमार की खोज करते हैं।’

ज्योतिषी – ‘मेरी बात मानो तो पहले एक दफा उस तहखाने (खोह) में चलो जिसमें महाराज शिवदत्त को कैद किया था।’

तेजसिंह – ‘उसका तो दरवाजा ही नहीं खुलता।’

ज्योतिषी – ‘भला चलो तो सही, शायद किसी तरकीब से खुल जाए।’

तेजसिंह – ‘इसकी कोशिश तो आप बेफायदे करते हैं, अगर दरवाजा खुला भी तो क्या काम निकलेगा?’

ज्योतिषी – ‘अच्छा चलो तो।’

तेजसिंह – ‘खैर, चलो।’

तीनों ऐयार तहखाने की तरफ रवाना हुए।

बयान – 13

कुँवर वीरेंद्रसिंह धीरे-धीरे बेहोश हो कर उस गद्दी पर लेट गए। जब आँख खुली अपने को एक पत्थर की चट्टान पर सोए पाया। घबरा कर इधर-उधर देखने लगे। चारों तरफ ऊँची-ऊँची पहाड़ी, बीच में बहता चश्मा, किनारे-किनारे जामुन के दरख्तों की बहार देखने से मालूम हो गया कि यह वही तहखाना है जिसमें ऐयार लोग कैद किए जाते थे, जिस जगह तेजसिंह ने महाराज शिवदत्त

को मय उनकी रानी के कैद किया था या कुमार ने पहाड़ी के ऊपर चंद्रकांता और चपला को देखा था। मगर पास न पहुँच सके थे।

कुमार घबरा कर पत्थर की चट्टान पर से उठ बैठे और उस खोह को अच्छी तरह पहचानने के लिए चारों तरफ घूमने और हर एक चीज को देखने लगे। अब शक जाता रहा और बिल्कुल यकीन हो गया कि यह वही खोह है, क्योंकि उसी तरह कैदी महाराज शिवदत्त को जामुन के पेड़ के नीचे पत्थर की चट्टान पर लेटे और पास ही उनकी रानी को बैठे और पैर दबाते देखा। इन दोनों का रुख दूसरी तरफ था, कुमार ने उनको देखा मगर उनको कुमार का कुछ गुमान तक भी न हुआ।

कुँवर वीरेंद्रसिंह दौड़े हुए उस पहाड़ी के नीचे गए जिसके ऊपर वाले दालान में कुमारी चंद्रकांता और चपला को छोड़ तिलिस्म तोड़ने, खोह के बाहर गए थे। इस वक्त भी कुमारी को उस दिन की तरह वही मैली और फटी साड़ी पहने, उसी तौर से चेहरे और बदन पर मैल चढ़ी और बालों की लट बाँधे बैठे हुए देखा।

देखते ही फिर वही मुहब्बत की बला सिर पर सवार हो गई। कुमारी को पहले की तरह बेबसी की हालत में देख आँखों में आँसू भर आए, गला रुक गया और कुछ शर्मा के सामने से हट एक पेड़ की आड़ में खड़े हो जी में सोचने लगे – ‘हाय, अब कौन मुँह ले कर कुमारी चंद्रकांता के सामने जाऊँ और उससे क्या बातचीत करूँ? पूछने पर क्या यह कह सकूँगा कि तुम्हें छुड़ाने के लिए तिलिस्म तोड़ने गए थे लेकिन अभी तक वह नहीं टूटा। हा। मुझसे तो यह बात कभी नहीं कही जाएगी। क्या करूँ वनकन्या के फेर में तिलिस्म तोड़ने की भी सुध जाती रही और कई दिन का हर्ज भी हुआ। जब कुमारी पूछेगी कि तुम यहाँ कैसे आए तो क्या जवाब दूँगा? शिवदत्त भी यहाँ दिखाई देता है। लश्कर में तो सुना था कि वह छूट गया बल्कि उसका दीवान खुद नजर ले कर आया था, तब यह क्या मामला है।’

इन सब बातों को कुमार सोच ही रहे थे कि सामने से तेजसिंह आते दिखाई पड़े, जिनके कुछ दूर पीछे देवीसिंह और पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी भी थे। कुमार उनकी तरफ बढ़े। तेजसिंह सामने से कुमार को अपनी तरफ आते देख दौड़े और उनके पास जा कर पैरों पर गिर पड़े, उन्होंने उठा कर गले से लगा लिया। देवीसिंह से भी मिले और ज्योतिषी जी को दंडवत किया। अब ये चारों एक पेड़ के नीचे पत्थर पर बैठ कर बातचीत करने लगे।

कुमार – ‘देखो तेजसिंह, वह सामने कुमारी चंद्रकांता उसी दिन की तरह उदास और फटे कपड़े पहने बैठी है और बगल में उसकी सखी चपला बैठी अपने आँचल से उनका मुँह पोछ रही है।’

तेजसिंह – ‘आपसे कुछ बातचीत भी हुई?’

कुमार – ‘नहीं कुछ नहीं, अभी मैं यही सोच रहा था कि उसके सामने जाऊँ या नहीं।’

तेजसिंह – ‘कितने दिन से आप यह सोच रहे हैं?’

कुमार – ‘अभी मुझको इस घाटी में आए दो घड़ी भी नहीं हुई।’

तेजसिंह – (ताज्जुब से) ‘क्या आप अभी इस खोह में आए हैं? इतने दिनों तक कहाँ रहे? आपको लश्कर से आए तो कई दिन हुए। इस वक्त आपको यकायक यहाँ देख के मैंने सोचा कि कुमारी के इश्क में चुपचाप लश्कर से निकल कर इस जगह आ बैठे हैं।’

कुमार – ‘नहीं, मैं अपनी खुशी से लश्कर से नहीं आया, न मालूम कौन उठा ले गया था।’

तेजसिंह – (ताज्जुब से) ‘हैं। क्या अभी तक आपको यह भी मालूम नहीं हुआ कि लश्कर से आपको कौन उठा ले गया था।’

कुमार – ‘नहीं, बिल्कुल नहीं।’

इतना कह कर कुमार ने अपना कुल हाल पूरा-पूरा कह सुनाया। जब तक कुमार अपनी कैफियत कहते रहे तीनों ऐयार अचंभे में भरे सुनते रहे। जब कुमार ने अपनी कथा समाप्त की तब तेजसिंह ने ज्योतिषी जी से पूछा – ‘यह क्या मामला है, आप कुछ समझे?’

ज्योतिषी – ‘कुछ नहीं, बिल्कुल ख्याल में ही नहीं आता कि कुमार कहाँ गए थे और उन्हें ऐसे तमाशे दिखलाने वाला कौन था।’

कुमार – ‘तिलिस्म तोड़ने के वक्त जो ताज्जुब की बातें देखी थीं, उनसे बढ़ कर इन दो-तीन दिनों में दिखाई पड़ीं।’

देवीसिंह – ‘किसी छोटे दिल के डरपोक आदमी को ऐसा मौका पड़े तो घबरा के जान ही दे दे।’

ज्योतिषी – ‘इसमें क्या संदेह है।’

कुमार – ‘और एक ताज्जुब की बात सुनो, शिवदत्त भी यहाँ दिखाई पड़ रहा है।’

तेजसिंह – ‘सो कहाँ?’

कुमार – (हाथ का इशारा करके) ‘उस पेड़ के नीचे नजर दौड़ाओ।’

तेजसिंह – ‘हाँ ठीक तो है, मगर यह क्या मामला है। चलो उससे बात करें, शायद कुछ पता लगे।’

कुमार – ‘उसके सामने ही कुमारी चंद्रकांता पहाड़ी के ऊपर है, पहले उससे कुछ हाल पूछना चाहिए। मेरा जी तो अजब पेच में पड़ा हुआ है, कोई बात बैठती ही नहीं कि वह क्या पूछेगी और मैं क्या जवाब दूँगा।’

तेजसिंह – ‘आशिकों की यही दशा होती है, कोई बात नहीं, चलिए मैं आपकी तरफ से बात करूँगा।’

चारों आदमी शिवदत्त की तरफ चले। पहले उस पहाड़ी के नीचे गए जिसके ऊपर छोटे दालान में कुमारी चंद्रकांता और चपला बैठी थीं। कुमारी की निगाह दूसरी तरफ थी, चपला ने इन लोगों को देखा, वह उठ खड़ी हुई और आवाज दे कर कुमार के राजी-खुशी का हाल पूछने लगी, जिसका जवाब खुद कुमार ने दे कर कुमारी चंद्रकांता के मिजाज का हाल पूछा। चपला ने कहा – ‘इनकी हालत तो देखने ही से मालूम होती होगी, कहने की जरूरत ही नहीं।’

कुमारी अभी तक सिर नीचे किए बैठी थी। चपला के बातचीत की आवाज सुन चौंक कर उसने सिर उठाया। कुमार को देखते ही हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई और आँखों से आँसू बहाने लगी।

कुँवर वीरेंद्रसिंह ने कहा – ‘कुमारी तुम थोड़े दिन और सब्र करो। तिलिस्म टूट गया, थोड़ा बाकी है। कई सबबों से मुझे यहाँ आना पड़ा, अब मैं फिर उसी तिलिस्म की तरफ जाऊँगा।’

चपला – ‘कुमारी कहती हैं कि मेरा दिल यह कह रहा है कि इन दिनों या तो मेरी मुहब्बत आपके दिल से कम हो गई है या फिर मेरी जगह किसी और ने दखल कर ली। मुद्दत से इस जगह तकलीफ उठा रही हूँ जिसका ख्याल मुझे कभी भी न था मगर कई दिनों से यह नया ख्याल जी में पैदा हो कर मुझे बेहद सता रहा है।’

चपला इतना कह के चुप हो गई। तेजसिंह ने मुस्कुराते हुए कुमार की तरफ देखा और बोले – ‘क्यों, कहो तो भंडा फोड़ दूँ।’

कुमार इसके जवाब में कुछ कह न सके, आँखों से आँसू की बूँदे गिरने लगीं और हाथ जोड़ के उनकी तरफ देखा। हँस कर तेजसिंह ने कुमार के जुड़े हाथ छुड़ा दिए और उनकी तरफ से खुद चपला को जवाब दिया – ‘कुमारी को समझा दो कि कुमार की तरफ से किसी तरह का अंदेशा न करें, तुम्हारे इतना ही कहने से कुमार की हालत खराब हो गई।’

चपला – ‘आप लोग आज यहाँ किसलिए आए?’

तेजसिंह – ‘महाराज शिवदत्त को देखने आए हैं, वहाँ खबर लगी थी कि ये छूट कर चुनारगढ़ पहुँच गए।’

चपला – ‘किसी ऐयार ने सूरत बदली होगी, इन दोनों को तो मैं बराबर यहीं देखती रहती हूँ।’

तेजसिंह – ‘जरा मैं उनसे भी बातचीत कर लूँ।’

तेजसिंह और चपला की बातचीत महाराज शिवदत्त कान लगा कर सुन रहे थे। अब वे कुमार के पास आए, कुछ कहना चाहते थे कि ऊपर चंद्रकांता और चपला की तरफ देख कर चुप हो रहे।

तेजसिंह – ‘शिवदत्त, हाँ क्या कहने को थे, कहो रुक क्यों गए?’

शिवदत्त – ‘अब न कहूँगा।’

तेजसिंह – ‘क्यों?’

शिवदत्त – ‘शायद न कहने से जान बच जाए।’

तेजसिंह – ‘अगर कहोगे तो तुम्हारी जान कौन मारेगा?’

शिवदत्त – ‘जब इतना ही बता दूँ तो बाकी क्या रहा?’

तेजसिंह – ‘न बताओगे तो मैं तुम्हें कब छोडूँगा।’

शिवदत्त – ‘जो चाहो करो मगर मैं कुछ न बताऊँगा।’

इतना सुनते ही तेजसिंह ने कमर से खंजर निकाल लिया, साथ ही चपला ने ऊपर से आवाज दी – ‘नहीं, ऐसा मत करना।’ तेजसिंह ने हाथ रोक कर चपला की तरफ देखा।

चपला – ‘शिवदत्त के ऊपर खंजर खींचने का क्या सबब है?’

तेजसिंह – ‘यह कुछ कहने आए थे मगर तुम्हारी तरफ देख कर चुप हो गए, अब पूछता हूँ तो कुछ बताते नहीं, बस कहते हैं कि कुछ बोलूँगा तो जान चली जाएगी। मेरी समझ में नहीं आता कि यह क्या मामला है। एक तो इनके बारे में हम लोग आप ही हैरान थे, दूसरे कुछ कहने के लिए हम लोगों के पास आना और फिर तुम्हारी तरफ देख कर चुप हो रहना और पूछने से जवाब देना कि कहेंगे तो जान चली जाएगी इन सब बातों से तबीयत और परेशान होती है?’

चपला – ‘आजकल ये पागल हो गए हैं, मैं देखा करती हूँ कि कभी-कभी चिल्लाया और इधर-उधर दौड़ा करते हैं। बिल्कुल हालत पागलों की-सी पाई जाती है, इनकी बातों का कुछ ख्याल मत करो?’

शिवदत्त – ‘उल्टे मुझी को पागल बनाती है।’

तेजसिंह – (शिवदत्त से) ‘क्या कहा, फिर तो कहो?’

शिवदत्त ‘कुछ नहीं, तुम चपला से बातें करो, मैं तो आजकल पागल हो गया हूँ।’

देवीसिंह – ‘वाह, क्या पागल बने हैं।’

शिवदत्त – ‘चपला का कहना बहुत सही है, मेरे पागल होने में कोई शक नहीं।’

कुमार – ‘ज्योतिषी जी, जरा इन नई गढ़ंत के पागल को देखना।’

ज्योतिषी – (हँस कर) ‘जब आकाशवाणी हो ही चुकी कि ये पागल हैं तो अब क्या बाकी रहा?’

कुमार – ‘दिल में कई तरह के खुटके पैदा होते हैं।’

तेजसिंह – ‘इसमें जरूर कोई भारी भेद है। न मालूम वह कब खुलेगा, लाचारी यही है कि हम कुछ कर नहीं सकते।’

देवीसिंह – ‘हमारी उस्तादिन इस भेद को जानती हैं, मगर उनको अभी इस भेद को खोलना मंजूर नहीं।’

कुमार – ‘यह बिल्कुल ठीक है।’

देवीसिंह की बात पर तेजसिंह हँस कर चुप हो रहे। महाराज शिवदत्त भी वहाँ से उठ कर अपने ठिकाने जा बैठे।

तेजसिंह ने कुमार से कहा – ‘अब हम लोगों को लश्कर में चलना चाहिए। सुनते हैं कि हम लोगों के पीछे महाराज शिवदत्त ने लश्कर पर धावा मारा, जिससे बहुत कुछ खराबी हुई। मालूम नहीं पड़ता वह कौन शिवदत्त था, मगर फिर सुनने में आया कि शिवदत्त भी गायब हो गया। अब यहाँ आ कर फिर शिवदत्त को देख रहे हैं।’

कुमार – ‘इसमें तो कोई शक नहीं कि ये सब बातें बहुत ही ताज्जुब की हैं, खैर, तुमने जो कुछ जिसकी जुबानी सुना है साफ-साफ कहो।’

तेजसिंह ने अपने तीनों आदमियों का कुमार की खोज में लश्कर से बाहर निकलना, नौगढ़ राज्य में सुरेंद्रसिंह के दरबार में भेष बदले हुए पहुँच कर दो जासूसों की जुबानी लश्कर का हाल सुनना, महाराज जयसिंह और राजा सुरेंद्रसिंह का चुनारगढ़ पर चढ़ाई करना इत्यादि सब हाल कहा, जिसे सुन कुमार परेशान हो गए, खोह के बाहर चलने के लिए तैयार हुए। कुमारी चंद्रकांता से फिर कुछ बातें कर और धीरज दे आँखों से आँसू बहाते, कुँवर वीरेंद्रसिंह उस खोह के बाहर हुए।

शाम हो चुकी थी जब ये चारों खोह के बाहर आए। तेजसिंह ने देवीसिंह से कहा कि हम लोग यहाँ बैठते हैं तुम नौगढ़ जा कर सरकारी अस्तबल में से एक उम्दा घोड़ा खोल लाओ जिस पर कुमार को सवार कराके तिलिस्म की तरफ ले चलें, मगर देखो किसी को मालूम न हो कि देवीसिंह घोड़ा ले गए हैं।

देवीसिंह – ‘जब किसी को मालूम हो ही गया तो मेरे जाने से फायदा क्या?’

तेजसिंह – ‘कितनी देर में आओगे?’

देवीसिंह – ‘यह कोई भारी बात तो है नहीं जो देर लगेगी, पहर भर के अंदर आ जाऊँगा।’

यह कह कर देवीसिंह नौगढ़ की तरफ रवाना हुए, उनके जाने के बाद ये तीनों आदमी घने पेड़ों के नीचे बैठ बातें करने लगे।

कुमार – ‘क्यों ज्योतिषी जी, शिवदत्त का भेद कुछ न खुलेगा?’

ज्योतिषी – ‘इसमें तो कोई शक नहीं कि वह असल में शिवदत्त ही था जिसने कैद से छूट कर अपने दीवान के हाथ, आपके पास तोहफा भेज कर सुलह के लिए कहलाया था, और विचार से मालूम होता है कि वह भी असली शिवदत्त ही है जिसे आप इस वक्त खोह में छोड़ आए हैं, मगर बीच का हाल कुछ मालूम नहीं होता कि क्या हुआ।’

कुमार – ‘पिता जी ने चुनारगढ़ पर चढ़ाई की है, देखें इसका नतीजा क्या होता है। हम लोग भी वहाँ जल्दी पहुँचते तो ठीक था।’

ज्योतिषी – ‘कोई हर्ज नहीं, वहाँ बोलने वाला कौन है? आपने सुना ही है कि शिवदत्त फिर गायब हो गया, बल्कि उस पुरजे से जो उसके पलँग पर मिला, मालूम होता है फिर गिरफ्तार हो गया।’

तेजसिंह – ‘हाँ चुनारगढ़ को जीतने में कोई शक नहीं है, क्योंकि सामना करने वाला कोई नहीं, मगर उनके ऐयारों का खौफ जरा बना रहता है।’

कुमार – ‘बद्रीनाथ वगैरह भी गिरफ्तार हो जाते तो बेहतर था।’

तेजसिंह – ‘अबकी चल कर जरूर गिरफ्तार करूँगा।’

इसी तरह की बात करते इनको पहर-भर से ज्यादा गुजर गया। देवीसिंह घोड़ा ले कर आ पहुँचे जिस पर कुमार सवार हो तिलिस्म की तरफ रवाना हुए, साथ-साथ तीनों ऐयार पैदल बातें करते जाने लगे।

बयान – 14

कुमार के गायब हो जाने के बाद तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी उनकी खोज में निकले हैं। इस खबर को सुन कर महाराज शिवदत्त के जी में फिर बेईमानी पैदा हुई। एकांत में अपने ऐयारों और दीवान को बुला कर उसने कहा – ‘इस वक्त कुमार लश्कर से गायब हैं और उनके ऐयार भी उन्हें खोजने गए हैं, मौका अच्छा है, मेरे जी में आता है कि चढ़ाई करके कुमार के लश्कर को खतम कर दूँ और उस खजाने को भी लूट लूँ जो तिलिस्म में से उनको मिला है।’

इस बात को सुन दीवान तथा बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल ने बहुत कुछ समझाया कि आपको ऐसा न करना चाहिए क्योंकि आप कुमार से सुलह कर चुके हैं। अगर इस लश्कर को आप जीत ही लेंगे तो क्या हो जाएगा, फिर दुश्मनी पैदा होने में ठीक नहीं है इत्यादि बहुत-सी बातें कहके इन लोगों ने समझाया मगर शिवदत्त ने एक न मानी। इन्हीं ऐयारों में नाजिम और अहमद भी थे, जो शिवदत्त की राय में शरीक थे और उसे हमला करने के लिए उकसाते थे।

आखिर महाराज शिवदत्त ने कुँवर वीरेंद्रसिंह के लश्कर पर हमला किया और खुद मैदान में आ फतहसिंह सिपहलासार को मुकाबले के लिए ललकारा। वह भी जवांमर्द था, तुरंत मैदान में निकल आया और पहर भर तक खूब लड़ा, लेकिन आखिर शिवदत्त के हाथ से जख्मी हो कर गिरफ्तार हो गया।

सेनापति के गिरफ्तार होते ही फौज बेदिल होकर भाग गई। सिर्फ खेमा वगैरह महाराज शिवदत्त के हाथ लगा, तिलिस्मी खजाना उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा क्योंकि तेजसिंह ने बंदोबस्त करके उसे पहले ही नौगढ़ भेजवा दिया था, हाँ तिलिस्मी किताब उसके कब्जे में जरूर पड़ गई जिसे पा कर वह बहुत खुश हुआ और बोला – ‘अब इस तिलिस्म को मैं खुद तोड़ कुमारी चंद्रकांता को उस खोह से निकाल कर ब्याहूँगा।’

फतहसिंह को कैद कर शिवदत्त ने जलसा किया। नाच की महफिल से उठ कर खास दीवानखाने में आ कर पलँग पर सो रहा। उसी रोज वह पलँग पर से गायब हुआ, मालूम नहीं कौन कहाँ ले गया, सिर्फ वह पुर्जा पलँग पर मिला जिसका हाल ऊपर लिख चुके हैं। उसके गायब होने पर फतहसिंह सिपहसालार भी कैद से छूट गया, उसकी आँख सुनसान जंगल में खुली। यह कुछ मालूम न हुआ कि उसको कैद से किसने छुड़ाया बल्कि उसके उन जख्मों पर जो शिवदत्त के हाथ से लगे थे, पट्टी भी बाँधी गई थी, जिससे बहुत आराम और फायदा मालूम होता था।

फतहसिंह फिर तिलिस्म के पास आए जहाँ उनके लश्कर के कई आदमी मिले बल्कि धीरे-धीरे वह सब फौज इकट्ठी हो गई, जो भाग गई थी। इसके बाद ही यह खबर लगी कि महाराज शिवदत्त को भी कोई गिरफ्तार कर ले गया।

अकेले फतहसिंह ने सिर्फ थोड़े से बहादुरों पर भरोसा कर चुनारगढ़ पर चढ़ाई कर दी। दो कोस गया होगा कि लश्कर लिए हुए महाराज जयसिंह के पहुँचने की खबर मिली। चुनारगढ़ का जाना छोड़, जयसिंह के इस्तकबाल (अगुआनी) को गया और उनका भी इरादा अपने ही-सा सुन उनके साथ चुनारगढ़ की तरफ बढ़ा।

जयसिंह की फौज ने पहुँच कर चुनारगढ़ का किला घेर लिया। शिवदत्त की फौज ने किले के अंदर घुस कर दरवाजा बंद कर लिया, फसीलों पर तोपें चढ़ा दीं और कुछ रसद का सामान कर फसीलों और बुर्जों पर लड़ाई करने लगे।

बयान – 15

चुनारगढ़ के पास दो पहाड़ियों के बीच के एक नाले के किनारे शाम के वक्त पंडित बद्रीनाथ, रामनारायण, पन्नालाल, नाजिम और अहमद बैठे आपस में बातें कर रहे हैं।

नाजिम – ‘क्या कहें हमारा मालिक तो बहिश्त में चला गया, तकलीफ उठाने को हम रह गए।’

अहमद – ‘अभी तक इसका पता नहीं लगा कि उन्हें किसने मारा।’

बद्रीनाथ – ‘उन्हें उनके पापों ने मारा और तुम दोनों की भी बहुत जल्द वही दशा होगी। कहने के लिए तुम लोग ऐयार कहलाते हो मगर बेईमान और हरामखोर पूरे दर्जे के हो, इसमें कोई शक नहीं।’

नाजिम – ‘क्या हम लोग बेईमान हैं?’

बद्रीनाथ – ‘जरूर, इसमें भी कुछ कहना है? जब तुम अपने मालिक महाराज जयसिंह के न हुए तो किसके होवोगे? आप भी गारत हुए, क्रूरसिंह की भी जान ली, और हमारे राजा को भी चौपट बल्कि कैद कराया। यही जी में आता है कि खाली जूतियाँ मार-मार कर तुम दोनों की जान ले लूँ।’

अहमद – ‘जुबान सँभाल कर बातें करो नहीं तो कान पकड़ के उखाड़ लूँगा।’

अहमद का इतना कहना था कि मारे गुस्से के बद्रीनाथ काँप उठे, उसी जगह से पत्थर का एक टुकड़ा उठा कर इस जोर से अहमद के सिर में मारा कि वह तुरंत जमीन सूँघ कर दोजख (नर्क) की तरफ रवाना हो गया। उसकी यह कैफियत देख नाजिम भागा मगर बद्रीनाथ तो पहले ही से उन दोनों की जान का प्यासा हो रहा था, कब जाने देता। बड़ा-सा पत्थर छागे में रख कर मारा जिसकी चोट से वह भी जमीन पर गिर पड़ा और पन्नालाल वगैरह ने पहुँच कर मारे लातों के भुरता करके उसे भी अहमद के साथ क्रूर की ताबेदारी को रवाना कर दिया। इन लोगों के मरने के बाद फिर चारों ऐयार उसी जगह आ बैठे और आपस में बातें करने लगे।

पन्नालाल – ‘अब हमारे दरबार की झँझट दूर हुई।’

बद्रीनाथ – ‘महाराज को जरा भी रंज न होगा।’

पन्नालाल – ‘किसी तरह गद्दी बचाने की फिक्र करनी चाहिए। महाराज जयसिंह ने चारों तरफ से आ घेरा है और बिना महाराज के फौज मैदान में निकल कर लड़ नहीं सकती।’

चुन्नीलाल – ‘आखिर किले में भी रह कर कब तक लड़ेंगे? हम लोगों के पास सिर्फ दो महीने के लायक गल्ला किले के अंदर है, इसके बाद क्या करेंगे।’

रामलाल – ‘यह भी मौका न मिला कि कुछ गल्ला बटोर कर रख लेते।’

बद्रीनाथ – ‘एक बात है, किसी तरह महाराज जयसिंह को उनके लश्कर से उड़ाना चाहिए, अगर वह हम लोगों की कैद में आ जाएँ तो मैदान में निकल कर उनकी फौज को भगाना मुश्किल न होगा।’

पन्नालाल – ‘जरूर ऐसा करना चाहिए, जिसका नमक खाया उसके साथ जान देना हम लोगों का धर्म है।’

रामलाल – ‘हमारे राजा ने भी तो बेईमानी पर कमर बाँधी है। बेचारे कुँवर वीरेंद्रसिंह का क्या दोष है?’

चुन्नीलाल – ‘चाहे जो हो मगर हम लोगों को मालिक का साथ देना जरूरी है।’

बद्रीनाथ – ‘नाजिम और अहमद ये ही दोनों हमारे राजा पर क्रूर ग्रह थे, सो निकल गए। अबकी दफा जरूर दोनों राजाओं में सुलह कराऊँगा, तब वीरेंद्रसिंह की चोबदारी नसीब होगी। वाह, क्या जवांमर्द और होनहार कुमार हैं?

पन्नालाल – ‘अब रात भी बहुत गई, चलो कोई ऐयारी करके महाराज जयसिंह को गिरफ्तार करें और गुप्त राह से किले में ले जा कर कैद करें।’

बद्रीनाथ – ‘हमने एक ऐयारी सोची है, वही ठीक होगी।’

पन्नालाल – ‘वह क्या?’

बद्रीनाथ – ‘हम लोग चल के पहले उनके रसोइए को फाँसें। मैं उसकी शक्ल बना कर रसोई बनाऊँ और तुम लोग रसोईघर के खिदमतगारों को फाँस कर उनकी शक्ल बना कर हमारे साथ काम करो। मैं खाने की चीजों में बेहोशी की दवा मिला कर महाराज को और बाद में उन लोगों को भी खिलाऊँगा जो उनके पहरे पर होंगे, बस फिर हो गया।’

पन्नालाल – ‘अच्छी बात है, तुम रसोइया बनो क्योंकि ब्राह्मण हो, तुम्हारे हाथ का महाराज जयसिंह खाएँगे तो उनका धर्म भी न जाएगा, इसका भी ख्याल जरूर होना चाहिए, मगर एक बात का ध्यान रहे कि चीजों में तेज बेहोशी की दवा न पड़ने पाए।’

बद्रीनाथ – ‘नहीं-नहीं, क्या मैं ऐसा बेवकूफ हूँ, क्या मुझे नहीं मालूम कि राजे लोग पहले दूसरे को खिला कर देख लेते हैं। ऐसी नरम दवा डालूँगा कि खाने के दो घंटे बाद तक बिल्कुल न मालूम पड़े कि हमने बेहोशी की दवा मिली हुई चीजें खाई हैं।

रामनारायण – ‘बस, यह राय पक्की हो गई, अब यहाँ से उठो।’

बयान – 16

राजा सुरेंद्रसिंह भी नौगढ़ से रवाना हो, दौड़े-दौड़े बिना मुकाम किए दो रोज में चुनारगढ़ के पास पहुँचे। शाम के वक्त महाराज जयसिंह को खबर लगी। फतहसिंह सेनापति को, जो उनके लश्कर के साथ थे, इस्तकबाल के लिए रवाना किया।

फतहसिंह की जुबानी राजा सुरेंद्रसिंह ने सब हाल सुना। सुबह होते-होते इनका लश्कर भी चुनारगढ़ पहुँचा और जयसिंह के लश्कर के साथ मिल कर पड़ाव डाला गया। राजा सुरेंद्रसिंह ने फतहसिंह को, महाराज जयसिंह के पास भेजा कि आ कर मुलाकात के लिए बातचीत करें।

फतहसिंह राजा सुरेंद्रसिंह के खेमे से निकल कुछ ही दूर गए थे कि महाराज जयसिंह के दीवान हरदयालसिंह सरदारों को साथ लिए परेशान और बदहवास आते दिखाई पड़े जिन्हें देख यह अटक गए, कलेजा धक-धक करने लगा। जब वे लोग पास आए तो पूछा – ‘क्या हाल है जो आप लोग इस तरह घबराए हुए आ रहे हैं?’

एक सरदार – ‘कुछ न पूछो बड़ी आफत आ पड़ी।’

फतहसिंह – (घबरा कर) ‘सो क्या?’

दूसरा सरदार – ‘राजा साहब के पास चलो, वहीं सब-कुछ कहेंगे।’

उन सभी को लिए हुए फतहसिंह राजा सुरेंद्रसिंह के खेमे में आए। कायदे के माफिक सलाम किया, बैठने के लिए हुक्म पा कर बैठ गए।

राजा सुरेंद्रसिंह को भी इन लोगों के बदहवास आने से खुटका हुआ। हाल पूछने पर हरदयालसिंह ने कहा – ‘आज बहुत सवेरे किले के अंदर से तोप की आवाज आई, जिसे सुन कर खबर करने के लिए मैं महाराज के खेमे में आया। दरवाजे पर पहरे वालों को बेहोश पड़े देख कर ताज्जुब मालूम हुआ मगर मैं बराबर खेमे के अंदर चला गया। अंदर जा कर देखा तो महाराज का पलँग खाली पाया। देखते ही जी सन्न हो गया, पहरे वालों को देख कर कविराज जी ने कहा इन लोगों को बेहोशी की दवा दी गई है, तुरंत ही कई जासूस महाराज का पता लगाने के लिए इधर-उधर भेजे गए मगर अभी तक कुछ भी खबर नहीं मिली।’

यह हाल सुन कर सुरेंद्रसिंह ने जीतसिंह की तरफ देखा, जो उनके बाईं तरफ बैठे हुए थे।

जीतसिंह ने कहा – ‘अगर खाली महाराज गायब हुए होते तो मैं कहता कि कोई ऐयार किसी दूसरी तरकीब से ले गया, मगर जब कई आदमी अभी तक बेहोश पड़े हैं तो विश्वास होता है कि महाराज के खाने-पीने की चीजों में बेहोशी की दवा दी गई। अगर उनका रसोइया आए तो पूरा पता लग सकता है।’ सुनते ही राजा सुरेंद्रसिंह ने हुक्म दिया कि महाराज के रसोइए हाजिर किए जाएँ।

कई चोबदार दौड़ गए। बहुत दूर जाने की जरूरत न थी, दोनों लश्करों का पड़ाव साथ ही साथ पड़ा था। चोबदार खबर ले कर बहुत जल्द लौट आए कि रसोइया कोई नहीं है। उसी वक्त कई आदमियों ने आ कर यह भी खबर दी कि महाराज के रसोइए और खिदमतगार लश्कर के बाहर पाए गए जिनको डोली पर लाद कर लोग यहाँ लिए आते हैं।

दीवान तेजसिंह ने कहा – ‘सब डोलियाँ बाहर रखी जाएँ, सिर्फ एक रसोइए की डोली यहाँ लाई जाए।’

बेहोश रसोइया खेमे के अंदर लाया गया, जिसे जीतसिंह लखलख सूँघा कर होश में लाए और उससे बेहोश होने का सबब पूछा।

जवाब में उसने कहा – ‘पहर रात गए हम लोगों के पास एक हलवाई खोमचा लिए हुए आया जो बोलने में बहुत ही तेज और अपने सौदे की बेहद तारीफ करता था, हम लोगों ने उससे कुछ सौदा खरीद कर खाया, उसी समय सिर घूमने लगा, दाम देने की भी सुधा न रही, इसके बाद क्या हुआ कुछ मालूम नहीं।’

यह सुन दीवान जीतसिंह ने कहा – ‘बस-बस, सब हाल मालूम हो गया, अब तुम अपने डेरे में जाओ।’ इसके बाद थोड़ा सा लखलखा दे कर उन सरदारों को भी विदा किया और यह कह दिया कि इसे सूँघा कर आप उन लोगों को होश में लाइए, जो बेहोश हैं और दीवान हरदयालसिंह को कहा कि अभी आप यहीं बैठिए।

सब आदमी विदा कर दिए गए, राजा सुरेंद्रसिंह, जीतसिंह और दीवान हरदयालसिंह रह गए।

राजा सुरेंद्र – (दीवान जीतसिंह की तरफ देख कर) ‘महाराज को छुड़ाने की कोई फिक्र होनी चाहिए।’

जीतसिंह – ‘क्या फिक्र की जाए, कोई ऐयार भी यहाँ नहीं जिससे कुछ काम लिया जाए, तेजसिंह और देवीसिंह कुमार की खोज में गए हुए हैं, अभी तक उनका भी कुछ पता नहीं।’

राजा – ‘तुम ही कोई तरकीब करो।’

जीतसिंह – ‘भला मैं क्या कर सकता हूँ। मुद्दत हुई ऐयारी छोड़ दी। जिस रोज तेजसिंह को इस फन में होशियार करके सरकार के नजर किया उसी दिन सरकार ने ऐयारी करने से ताबेदार को छुट्टी दे दी, अब फिर यह काम लिया जाता है। ताबेदार को यकीन था कि अब जिंदगी भर ऐयारी की नौबत न आएगी, इसी ख्याल से अपने पास ऐयारी का बटुआ तक भी नहीं रखता।’

राजा – ‘तुम्हारा कहना ठीक है मगर इस वक्त दब जाना या ऐयारी से इनकार करना मुनासिब नहीं, और मुझे यकीन है कि चाहे तुम ऐयारी का बटुआ न भी रखते हो मगर उसका कुछ न कुछ सामान जरूर अपने साथ लाए होगे।’

जीतसिंह – (मुस्कराकर) ‘जब सरकार के साथ हैं और इस फन को जानते हैं तो सामान क्यों न रखेंगे।’

राजा – ‘तब फिर क्या सोचते हो, इस वक्त अपनी पुरानी कारीगरी याद करो और महाराज जयसिंह को छुड़ाओ।’

जीतसिंह – ‘जो हुक्म। (हरदयालसिंह की तरफ देख कर) आप एक काम कीजिए, इन बातों को जो इस वक्त हुई हैं छिपाए रहिए और फतहसिंह को ले कर शाम होने के बाद लड़ाई छेड़ दीजिए। चाहे जो हो मगर आज भर लड़ाई बंद न होने पाए यह काम आपके जिम्मे रहा।’

हरदयालसिंह – ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा।’

जीतसिंह – ‘आप जा कर लड़ाई का इंतजाम कीजिए, मैं भी महाराज से विदा हो अपने डेरे जाता हूँ क्योंकि समय कम और काम बहुत है।’

दीवान हरदयालसिंह राजा सुरेंद्रसिंह से विदा हो अपने डेरे की तरफ रवाना हुए। दीवान जीतसिंह ने फतहसिंह को बुला कर लड़ाई के बारे में बहुत कुछ समझा-बुझा के विदा किया और आप भी हुक्म ले कर अपने खेमे में गए। पहले पूजा, भोजन इत्यादि से छुट्टी पाई, तब ऐयारी का सामान दुरुस्त करने लगे।

दीवान जीतसिंह का एक बहुत पुराना बूढ़ा खिदमतगार था जिसको ये बहुत मानते थे। इनका ऐयारी का सामान उसी के सुपुर्द रहा करता था। नौगढ़ से रवाना होते दफा अपना ऐयारी का असबाब दुरुस्त करके ले चलने का इंतजाम, इसी बूढ़े के सुपुर्द किया। इनको ऐयारी छोड़े मुद्दत हो चुकी थी मगर जब उन्होंने अपने राजा को लड़ाई पर जाते देखा और यह भी मालूम हुआ कि हमारे ऐयार लोग कुमार की खोज में गए है, शायद कोई जरूरत पड़ जाए, तब बहुत-सी बातों को सोच इन्होंने अपना सब सामान दुरुस्त करके साथ ले लेना ही मुनासिब समझा था। उसी बूढ़े खिदमतगार से ऐयारी का संदूक मँगवाया ओैर सामान दुरुस्त करके बटुए में भरने लगे। इन्होंने बेहोशी की दवाओं का तेल उतारा था, उसे भी एक शीशी में बंद कर बटुए में रख लिया। पहर दिन बाकी रहे तक सामान दुरुस्त कर एक जमींदार की सूरत बना अपने खेमे के बाहर निकल गए।

जीतसिंह लश्कर से निकल कर किले के दक्खिन की एक पहाड़ी की तरफ रवाना हुए और थोड़ी दूर जाने के बाद सुनसान मैदान पा कर एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गए। बटुए में से कलम-दवात और कागज निकाला और कुछ लिखने लगे जिसका मतलब यह था – ‘तुम लोगों की चालाकी कुछ काम न आई और आखिर मैं किले के अंदर घुस ही आया। देखो क्या ही आफत मचाता हूँ। तुम चारों ऐयार हो और मैं ऐयारी नहीं जानता इस पर भी तुम लोग मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकते, लानत है तुम्हारी ऐयारी पर।’

इस तरह के बहुत से पुरजे लिख कर और थोड़ी-सी गोंद तैयार कर बटुए में रख ली और किले की तरफ रवाना हुए। पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई, अस्तु किले के इधर-उधर घूमने लगे। जब खूब अँधेरा हो गया, मौका पा कर एक दीवार पर जो नीची और टूटी हुई थी, कमंद लगा कर चढ़ गए। अंदर सन्नाटा पा कर उतरे और घूमने लगे।

किले के बाहर दीवान हरदयालसिंह और फतहसिंह ने दिल खोल कर लड़ाई मचा रखी थी, दनादन तोपों की आवाजें आ रही थीं, किले की फौज बुर्जियों या मीनारों पर चढ़ कर लड़ रही थी और बहुत से आदमी भी दरवाजे की तरफ खड़े घबराए हुए लड़ाई का नतीजा देख रहे थे, इस सबब से जीतसिंह को बहुत कुछ मौका मिला।

उन पुरजों को जिन्हें पहले से लिख कर बटुए में रख छोड़ा था, इधर-उधर दीवारों और दरवाजों पर चिपकाना शुरू किया, जब किसी को आते देखते हट कर छिप रहते और सन्नाटा होने पर फिर अपना काम करते, यहाँ तक कि सब कागजों को चिपका दिया।

किले के फाटक पर लड़ाई हो रही है, जितने अफसर और ऐयार हैं सब उसी तरफ जुटे हुए हैं, किसी को यह खबर नहीं कि ऐयारों के सिरताज जीतसिंह किले के अंदर आ घुसे और अपनी ऐयारी की फिक्र कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि इतने लंबे-चौड़े किले में महाराज जयसिंह कहाँ कैद हैं इस बात का पता लगावें और उन्हें छुड़ावें, और साथ ही शिवदत्त के भी ऐयारों को गिरफ्तार करके लेते चलें, एक ऐयार भी बचने न पाए जो फँसे हुए ऐयारों को छुड़ाने की फिक्र करे या छुड़ाए।

बयान – 17

फतहसिंह सेनापति की बहादुरी ने किले वालों के छक्के छुड़ा दिए। यही मालूम होता था कि अगर इसी तरह रात-भर लड़ाई होती रही तो सवेरे तक किला हाथ से जाता रहेगा और फाटक टूट जाएगा। आश्चर्य में पड़े बद्रीनाथ वगैरह ऐयार इधर-उधर घबराए घूम रहे थे कि इतने में एक चोबदार ने आ कर गुल-शोर मचाना शुरू किया जिससे बद्रीनाथ और भी घबरा गए। चोबदार बिल्कुल जख्मी हो रहा था ओैर उसके चेहरे पर इतने जख्म लगे हुए थे कि खून निकलने से उसको पहचानना मुश्किल हो रहा था।

बद्रीनाथ – ‘(घबरा कर) ‘यह क्या, तुमको किसने जख्मी किया?’

चोबदार – ‘आप लोग तो इधर के ख्याल में ऐसा भूले हैं कि और बातों की कोई सुध ही नहीं। पिछवाड़े की तरफ से कुँवर वीरेंद्रसिंह के कई आदमी घुस आए हैं और किले में चारों तरफ घूम-घूम कर न मालूम क्या कर रहे हैं। मैंने एक का मुकाबिला भी किया मगर वह बहुत ही चालाक और फुर्तीला था, मुझे इतना जख्मी किया कि दो घंटे तक बदहोशो-हवास जमीन पर पड़ा रहा, मुश्किल से यहाँ तक खबर देने आया हूँ। आती दफा रास्ते में उसे दीवारों पर कागज चिपकाते देखा, मगर खौफ के मारे कुछ न बोला।’

पन्नालाल – ‘यह बुरी खबर सुनने में आई।’

बद्रीनाथ – ‘वे लोग कितने आदमी हैं, तुमने देखा है?’

चोबदार – ‘कई आदमी मालूम होते हैं मगर मुझे एक ही से वास्ता पड़ा था।’

बद्रीनाथ – ‘तुम उसे पहचान सकते हो?’

चोबदार – ‘हाँ, जरूर पहचान लूँगा क्योंकि मैंने रोशनी में उसकी सूरत बखूबी देखी है।’

बद्रीनाथ – ‘मैं उन लोगों को ढूँढ़ने चलता हूँ, तुम साथ चल सकते हो?’

चोबदार – ‘क्यों न चलूँगा, मुझे उसने अधमरा कर डाला था, अब बिना गिरफ्तार कराए कब चैन पड़ना है।

बद्रीनाथ – ‘अच्छा चलो।’

बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल चारों आदमी अंदर की तरफ चले, साथ-साथ जख्मी चोबदार भी रवाना हुआ। जनाने महल के पास पहुँच कर देखा कि एक आदमी जमीन पर बदहवास पड़ा है, एक मशाल थोड़ी दूर पर पड़ी हुई है जो कुछ जल रही है, पास ही तेल की कुप्पी भी नजर पड़ी, मालूम हो गया कि कोई मशालची है। चोबदार ने चौंक कर कहा – ‘देखो-देखो एक और आदमी उसने मारा।’ यह कह कर मशाल और कुप्पी झट से उठा ली और उसी कुप्पी से मशाल में तेल छोड़ उसके चेहरे के पास ले गया। बद्रीनाथ ने देख कर पहचाना कि यह अपना ही मशालची है। नाक पर हाथ रख के देखा, समझ गए कि इसे बेहोशी की दवा दी गई है।

चोबदार ने कहा – ‘आप इसे छोड़िए, चल कर पहले उस बदमाश को ढुँढ़िए, मैं यही मशाल लिए आपके साथ चलता हूँ। कहीं ऐसा न हो कि वे लोग महाराज जयसिंह को छुड़ा ले जाएँ।’

बद्रीनाथ ने कहा – ‘पहले उसी जगह चलना चाहिए जहाँ महाराज जयसिंह कैद हैं।’ सभी की राय यही हुई और सब उसी जगह पहुँचे। देखा तो महाराज जयसिंह कोठरी में हथकड़ी पहने लेटे हैं। चोबदार ने खूब गौर से उस कोठरी और दरवाजे को देख कर कहा – ‘नहीं, वे लोग यहाँ तक नहीं पहुँचे, चलिए दूसरी तरफ ढूँढ़े।’ चारों तरफ ढूँढ़ने लगे। घूमते-घूमते दीवारों और दरवाजों पर सटे हुए कई पुर्जे दिखे जिसे पढ़ते ही इन ऐयारों के होश जाते रहे, सोच ही रहे थे कि चोबदार चिल्ला उठा और एक कोठरी की तरफ इशारा करके बोला – ‘देखो-देखो, अभी एक आदमी उस कोठरी में घुसा है, जरूर वही है जिसने मुझे जख्मी किया था।’ यह कह, उस कोठरी की तरफ दौड़ा मगर दरवाजे पर रुक गया, तब तक ऐयार लोग भी पहुँच गए।

बद्रीनाथ – (चोबदार से) ‘चलो, अंदर चलो।’

चोबदार – ‘पहले तुम लोग हाथों में खंजर या तलवार ले लो, क्योंकि वह जरूर वार करेगा।’

बद्रीनाथ – ‘हम लोग होशियार हैं, तुम अंदर चलो क्योंकि तुम्हारे हाथ में मशाल है।’

चोबदार – ‘नहीं बाबा, मैं अंदर नहीं जाऊँगा, एक दफा किसी तरह जान बची, अब कौन-सी कंबख्ती सवार है कि जान-बूझ कर भाड़ में जाऊँ।’

बद्रीनाथ – ‘वाह रे डरपोक! इसी जीवट पर महाराजों के यहाँ नौकरी करता है? ला मेरे हाथ में मशाल दे, मत जा अंदर।’

चोबदार – ‘लो मशाल लो, मैं डरपोक सही, इतने जख्म खाए अभी डरपोक ही रह गया, अपने को लगती तो मालूम होता, इतनी मदद कर दी यही बहुत है।’

इतना कह चोबदार मशाल और कुप्पी बद्रीनाथ के हाथ में दे कर अलग हो गया। चारों ऐयार कोठरी के अंदर घुसे। थोड़ी दूर गए होंगे कि बाहर से चोबदार ने किवाड़ बंद करके जंजीर चढ़ा दी, तब अपनी कमर से पथरी निकाल आग झाड़ कर बत्ती जलाई और चौखट के नीचे जो एक छोटी-सी बारूद की चुपड़ी हुई पलीती निकाली हुई थी, उसमें आग लगा दी। वह रस्सी बन कर सुरसुराती हुई अंदर घुस गई।

पाठक समझ गए होंगे कि यह चोबदार साहब कौन थे। ये ऐयारों के सिरताज जीतसिंह थे। चोबदार बन ऐयारों को खौफ दिला कर अपने साथ ले आए और घुमाते-फिराते वह जगह देख ली जहाँ महाराज जयसिंह कैद थे, फिर धोखा दे कर इन ऐयारों को उस कोठरी में बंद कर दिया जिसे पहले ही से अपने ढंग का बना रखा था।

इस कोठरी के अंदर पहले ही से बेहोशी की बारूद पाव भर के अंदाज कोने में रख दी थी और लंबी पलीती बारूद के साथ लगा कर, चौखट के बाहर निकाल दी थी।

पलीती में आग लगा और दरवाजे को उसी तरह बंद छोड़, उस जगह गए जहाँ महाराज जयसिंह कैद थे। वहाँ बिल्कुल सन्नाटा था, दरवाजा खोल बेड़ी और हथकड़ी काट कर उन्हें बाहर निकाला और अपना नाम बता कर कहा – ‘जल्द यहाँ से चलिए।’

जिधर से जीतसिंह कमंद लगा कर किले में आए थे उसी राह से महाराज जयसिंह को नीचे उतारा और तब कहा – ‘आप नीचे ठहरिए, मैंने ऐयारों को भी बेहोश किया है, एक-एक करके कमंद में बाँध कर उन लोगों को लटकाता जाता हूँ आप खोलते जाइए। अंत में मैं भी उतर कर आपके साथ लश्कर में चलूँगा।’ महाराज जयसिंह ने खुश हो कर इसे मंजूर किया।

जीतसिंह ने लौट कर उस कोठरी की जंजीर खोली जिसमें बद्रीनाथ वगैरह चारों ऐयारों को फँसाया था। अपने नाक में लखलखे से तर की हुई रूई डाल कोठरी के अंदर घुसे, तमाम कोठरी को धुएँ से भरा हुआ पाया, बत्ती जला बद्रीनाथ वगैरह बेहोश ऐयारों को घसीट कर बाहर लाए और किले की पिछली दीवार की तरफ ले जा कर एक-एक करके सभी को नीचे उतार आप भी उतर आए। चारो ऐयारो को एक तरफ छिपा, महाराज जयसिंह को लश्कर में पहुँचाया, फिर कई कहारों को साथ ले उस जगह जा, ऐयारों को उठवा लाए, हथकड़ी-बेड़ी डाल कर खेमे में कैद कर पहरा मुकर्रर कर दिया।

महाराज जयसिंह और सुरेंद्रसिंह गले मिले, जीतसिंह की बहुत कुछ तारीफ करके दोनों राजों ने कई इलाके उनको दिए, जिनकी सनद भी उसी वक्त मुहर करके उनके हवाले की गई।

रात बीत गई, पूरब की तरफ से धीरे-धीरे सफेदी निकलने लगी और लड़ाई बंद कर दी गई।

बयान – 18

तेजसिंह वगैरह ऐयारों के साथ कुमार खोह से निकल कर तिलिस्म की तरफ रवाना हुए। एक रात रास्ते में बिता कर दूसरे दिन सवेरे जब रवाना हुए तो एक नकाबपोश सवार दूर से दिखाई पड़ा, जो कुमार की तरफ ही आ रहा था। जब इनके करीब पहुँचा, घोड़े से उतर जमीन पर कुछ रख दूर जा खड़ा हुआ। कुमार ने वहाँ जा कर देखा तो तिलिस्मी किताब नजर पड़ी और एक खत, जिसे देख वे बहुत खुश हो कर तेजसिंह से बोले – ‘तेजसिंह, क्या करें, यह वनकन्या मेरे ऊपर बराबर अपने अहसान के बोझ डाल रही है। इसमें कोई शक नहीं कि यह उसी का आदमी है तो तिलिस्मी किताब मेरे रास्ते में रख दूर जा खड़ा हुआ है। हाय, इसके इश्क ने भी मुझे निकम्मा कर दिया है। देखें इस खत में क्या लिखा है।’

यह कह कर कुमार ने खत पढ़ा –

‘किसी तरह यह तिलिस्मी किताब मेरे हाथ लग गई जो तुम्हें देती हूँ। अब जल्दी तिलिस्म तोड़ कर कुमारी चंद्रकांता को छुड़ाओ। वह बेचारी बड़ी तकलीफ में पड़ी होगी। चुनारगढ़ में लड़ाई हो रही है, तुम भी वहीं जाओ और अपनी जवाँमर्दी दिखा कर फतह अपने नाम लिखाओ।

– तुम्हारी दासी…

वियोगिनी।’

कुमार – ‘तेजसिंह तुम भी पढ़ लो।’

तेजसिंह – (खत पढ़ कर) ‘न मालूम यह वनकन्या मनुष्य है या अप्सरा, कैसे-कैसे काम इसके हाथ से होते हैं।’

कुमार – (ऊँची साँस ले कर) ‘हाय, एक बला हो तो सिर से टले?’

देवीसिंह – ‘मेरी राय है कि आप लोग यहीं ठहरें, मैं चुनारगढ़ जा कर पहले सब हाल दरियाफ्त कर आता हूँ।’

कुमार – ‘ठीक है, अब चुनारगढ़ सिर्फ पाँच कोस होगा, तुम वहाँ की खबर ले आओ, तब हम चलें क्योंकि कोई बहादुरी का काम करके हम लोगों का जाहिर होना ज्यादा मुनासिब होगा।’

देवीसिंह चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए। कुमार को रास्ते में एक दिन और अटकना पड़ा, दूसरे दिन देवीसिंह लौट कर कुमार के पास आए और चुनारगढ़ की लड़ाई का हाल, महाराज जयसिंह के गिरफ्तार होने की खबर, और जीतसिंह की ऐयारी की तारीफ कर बोले – ‘लड़ाई अभी हो रही है, हमारी फौज कई दफा चढ़ कर किले के दरवाजे तक पहुँची मगर वहाँ अटक कर दरवाजा नहीं तोड़ सकी, किले की तोपों की मार ने हमारा बहुत नुकसान किया।’

इन खबरों को सुन कर कुमार ने तेजसिंह से कहा – ‘अगर हम लोग किसी तरह किले के अंदर पहुँच कर फाटक खोल सकते तो बड़ी बहादुरी का काम होता।’

तेजसिंह – ‘इसमें तो कोई शक नहीं कि यह बड़ी दिलावरी का काम है, या तो किले का फाटक ही खोल देंगे, या फिर जान से हाथ धोवेंगे।’

कुमार – ‘हम लोगो के वास्ते लड़ाई से बढ़ कर मरने के लिए और कौन-सा मौका है? या तो चुनारगढ़ फतह करेंगे या बैकुंठ की ऊँची गद्दी दखल करेंगे, दोनों हाथ लड्डू हैं।’

तेजसिंह – ‘शाबाश, इससे बढ़ कर और क्या बहादुरी होगी, तो चलिए हम लोग भेष बदल कर किले में घुस जाएँ। मगर यह काम दिन में नहीं हो सकता।’

कुमार – ‘क्या हर्ज है, रात ही को सही। रात-भर किले के अंदर ही छिपे रहेंगे, सुबह जब लड़ाई खूब रंग पर आएगी उसी वक्त फाटक पर टूट पड़ेंगे। सब ऊपर फसीलों पर चढ़े होंगे, फाटक पर सौ-पचास आदमियों में घुस कर दरवाजा खोल देना कोई बात नहीं है।’

देवीसिंह – ‘कुमार की राय बहुत सही है, मगर ज्योतिषी जी को बाहर ही छोड़ देना चाहिए।’

ज्योतिषी – ‘सो क्यों?’

देवीसिंह – ‘आप ब्राह्मण हैं, वहाँ क्यों ब्रह्महत्या के लिए आपको ले चलें, यह काम क्षत्रियों का है, आपका नहीं।’

कुमार – ‘हाँ ज्योतिषी जी, आप किले में मत जाइए।’

ज्योतिषी – ‘अगर मैं ऐयारी न जानता होता तो आपका ऐसा कहना मुनासिब था, मगर जो ऐयारी जानता है उसके आगे जवाँमर्दी और दिलावरी हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं।’

देवीसिंह – ‘अच्छा चलिए फिर, हमको क्या, हमें तो और फायदा ही है।’

कुमार – ‘फायदा क्या?’

देवीसिंह – इसमें तो कोई शक नहीं ज्योतिषी जी हम लोगों के पूरे दोस्त हैं, कभी संग न छोड़ेंगे, अगर यह मर भी जाएँगे तो ब्रह्मराक्षस होंगे, और भी हमारा काम इनसे निकला करेगा।’

ज्योतिषी – ‘क्या हमारी ही अवगति होगी? अगर ऐसा हुआ तो तुम्हें कब छोडूँगा तुम्हीं से ज्यादा मुहब्बत है।’

इनकी बातों पर कुमार हँस पड़े और घोड़े पर सवार हो ऐयारों को साथ ले चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए। शाम होते-होते ये लोग चुनारगढ़ पहुँचे और रात को मौका पा कमंद लगा किले के अंदर घुस गए।

बयान – 19

दिन अनुमानतः पहर भर के आया होगा कि फतहसिंह की फौज लड़ती हुई, फिर किले के दरवाजे तक पहुँची। शिवदत्त की फौज बुर्जियों पर से गोलों की बौछार मार कर उन लोगों को भगाना चाहती थी कि यकायक किले का दरवाजा खुल गया और जर्द रंग की चार झंडियाँ दिखाई पड़ीं जिन्हें राजा सुरेंद्रसिंह, महाराज जयसिंह और उनकी कुल फौज ने दूर से देखा। मारे खुशी के फतहसिंह अपनी फौज के साथ धड़ाधड़ कर फाटक के अंदर घुस गया और बाद इसके धीरे-धीरे कुल फौज किले में दाखिल हुई। फिर किसी को मुकाबले की ताब न रही, साथ वाले आदमी चारों तरफ दिखाई देने लगे। फतहसिंह ने बुर्ज पर से महाराज शिवदत्त का सब्ज झंडा गिरा कर अपना जर्द झंडा खड़ा कर दिया और अपने हाथ से चोब उठा कर जोर से तीन चोट डंके पर लगाई जो उसी झंडे के नीचे रखा हुआ था। ‘क्रूम-धूम फतह’ की आवाज निकली जिसके साथ ही किले वालों का जी टूट गया और कुँवर वीरेंद्रसिंह की मुहब्बत दिल में असर कर गई।

अपने हाथ से कुमार ने फाटक पर चालीस आदमियों के सिर काटे थे, मगर ऐयारों के सहित वे भी जख्मी हो गए थे। राजा सुरेंद्रसिंह किले के अंदर घुसे ही थे कि कुमार, तेजसिंह और देवीसिंह झंडियाँ लिए चरणों पर गिर पड़े, ज्योतिषी जी ने आशीर्वाद दिया। इससे ज्यादा न ठहर सके, जख्मों के दर्द से चारों बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़े और बदन से खून निकलने लगा।

जीतसिंह ने पहुँच कर चारों के जख्मों पर पट्टी बाँधी, चेहरा धुलने से ये चारों पहचाने गए। थोड़ी देर में ये सब होश में आ गए। राजा सुरेंद्रसिंह अपने प्यारे लड़के को देर तक छाती से लगाए रहे और तीनों ऐयारों पर भी बहुत मेहरबानी की। महाराज जयसिंह कुमार की दिलावरी पर मोहित हो तारीफ करने लगे। कुमार ने उनके पैरों को हाथ लगाया और खुशी-खुशी दूसरे लोगों से मिले। हमारा कोई आदमी जनाने महल में नहीं गया बल्कि वहाँ इंतजाम करके पहरा मुकर्रर कर दिया गया।

कई दिन के बाद महाराज जयसिंह और राजा सुरेंद्रसिंह कुँवर वीरेंद्रसिंह को तिलिस्म तोड़ने की ताकीद करके खुशी-खुशी विजयगढ़ और नौगढ़ रवाना हुए। उनके जाने के बाद कुँवर वीरेंद्रसिंह अपने ऐयारों और कुछ फौज साथ ले तिलिस्म की तरफ रवाना हुए।

बयान – 20

तिलिस्म के दरवाजे पर कुँवर वीरेंद्रसिंह का डेरा खड़ा हो गया। खजाना पहले ही निकाल चुके थे, अब कुल दो टुकड़े तिलिस्म के टूटने को बाकी थे, एक तो वह चबूतरा जिस पर पत्थर का आदमी सोया था, दूसरे अजदहे वाले दरवाजे को तोड़ कर वहाँ पहुँचना जहाँ कुमारी चंद्रकांता और चपला थीं। तिलिस्मी किताब कुमार के हाथ लग ही चुकी थी, उसके कई पन्ने बाकी रह गए थे, आज बिल्कुल पढ़ गए। कुमारी चंद्रकांता के पास पहुँचने तक जो-जो काम इनको करने थे, सब ध्यान में चढ़ा लिए, मगर उस चबूतरे के तोड़ने की तरकीब किताब में न देखी जिस पर पत्थर का आदमी सोया हुआ था, हाँ उसके बारे में इतना लिखा था कि वह चबूतरा एक दूसरे तिलिस्म का दरवाजा है जो इस तिलिस्म से कहीं बढ़-चढ़ कर है और माल-खजाने की तो इंतहा नहीं कि कितना रखा हुआ है। वहाँ की एक-एक चीज ऐसे ताज्जुब की है कि जिसके देखने से बड़े-बड़े दिमाग वालों की अक्ल चकरा जाए। उसके तोड़ने की तरकीब दूसरी ही है, ताली भी उसकी उसी आदमी के कब्जे में है जो उस पर सोया हुआ है।’

कुमार ने ज्योतिषी जी की तरफ देख कर कहा – ‘क्यों ज्योतिषी जी, क्या वह चबूतरे वाला तिलिस्म मेरे हाथ से न टूटेगा?’

ज्योतिषी – ‘देखा जाएगा, पहले आप कुमारी चंद्रकांता को छुड़ाइए।’

कुमार – ‘अच्छा चलिए, यह काम तो आज ही खत्म हो जाए।’

तीनों ऐयारों को साथ ले कर कुँवर वीरेंद्रसिंह उस तिलिस्म में घुसे। जो कुछ उस तिलिस्मी किताब में लिखा हुआ था खूब ख्याल कर लिया और उसी तरह काम करने लगे।

खँडहर के अंदर जा कर उस मालूमी दरवाजे को खोला जो उस पत्थर वाले चबूतरे के सिरहाने की तरफ था। नीचे उतर कर कोठरी में से होते हुए उसी बाग में पहुँचे जहाँ खजाने और बारहदरी के सिंहासन के ऊपर का वह पत्थर हाथ लगा था, जिसको छू कर चपला बेहोश हो गई थी और जिसके बारे में तिलिस्मी किताब में लिखा हुआ था कि वह एक डिब्बा है और उसके अंदर एक नायाब चीज रखी है।

चारों आदमी नहर के रास्ते गोता मार कर उसी तरह बाग के उस पार हुए जिस तरह चपला उसके बाहर गई थी और उसी की तरह पहाड़ी के नीचे वाली नहर के किनारे-किनारे चलते हुए उस छोटे-से दालान में पहुँचे जिसमें वह अजदहा था जिसके मुँह में चपला घुसी थी।

एक तरफ दीवार में आदमी के बराबर काला पत्थर जड़ा हुआ था। कुमार ने उस पर जोर से लात मारी, साथ ही वह पत्थर पल्ले की तरह खुल के बगल में हो गया और नीचे उतरने की सीढ़ियाँ दिखाई पड़ीं।

मशाल वाले चारों आदमी नीचे उतरे, यहाँ उस अजदहे की बिल्कुल कारीगरी नजर पड़ी। कई चरखी और पुरजों के साथ लगी हुई भोजपत्र की बनी मोटी भाथी उसके नीचे थी जिसको देखने से कुमार समझ गए कि जब अजदहे के सामने वाले पत्थर पर कोई पैर रखता है तो यह भाथी चलने लगती है और इसकी हवा की तेजी सामने वाले आदमी को खींच कर अजदहे के मुँह में डाल देती है।

बगल में एक खिड़की थी जिसका दरवाजा बंद था। सामने ताली रखी हुई थी जिससे ताला खोल कर चारों आदमी उसके अंदर गए। यहाँ से वे लोग छत पर चढ़ गए जहाँ से गली की तरह एक खोह दिखाई पड़ी।

किताब से पहले ही मालूम हो चुका था कि यही खोह की-सी गली उस दालान में जाने के लिए राह है, जहाँ चपला और चंद्रकांता बेबस पड़ी हैं।

अब कुमारी चंद्रकांता से मुलाकात होगी, इस ख्याल से कुमार का जी धड़कने लगा, चपला की मुहब्बत ने तेजसिंह के पैर हिला दिए। खुशी-खुशी ये लोग आगे बढ़े। कुमार सोचते जाते थे कि आज जैसे निराले में कुमारी चंद्रकांता से मुलाकात होगी वैसी पहले कभी न हुई थी। मैं अपने हाथों से उसके बाल सुलझाउँगा, अपनी चादर से उसके बदन की गर्द झड़ूँगा। हाय, बड़ी भारी भूल हो गई, कि कोई धोती उसके पहनने के लिए नहीं लाए, किस मुँह से उसके सामने जाऊँगा, वह फटे कपड़ों में कैसी दु:खी होगी? मैं उसके लिए कोई कपड़ा नहीं लाया इसलिए वह जरूर खफा होगी और मुझे खुदगर्ज समझेगी। नहीं-नहीं वह कभी रंज न होगी। उसको मुझसे बड़ी मुहब्बत है, देखते ही खुश हो जाएगी, कपड़े का कुछ ख्याल न करेगी। हाँ, खूब याद पड़ा, मैं अपनी चादर अपनी कमर में लपेट लूँगा और अपनी धोती उसे पहिनाऊँगा, इस वक्त का काम चल जाएगा। (चौंक कर) यह क्या, सामने कई आदमियों के पैरों की चाप सुनाई पड़ती है? शायद मेरा आना मालूम करके कुमारी चंद्रकांता और चपला आगे से मिलने को आ रही हैं। नहीं-नहीं, उनको क्या मालूम कि मैं यहाँ आ पहुँचा।

ऐसी-ऐसी बातें सोचते और धीरे-धीरे कुमार बढ़ रहे थे कि इतने में ही आगे दो भेड़ियों के लड़ने और गुर्राने की आवाज आई जिसे सुनते ही कुमार के पैर दो-दो मन के हो गए। तेजसिंह की तरफ देख कर कुछ कहना चाहते थे मगर मुँह से आवाज न निकली। चलते-चलते उस दालान में पहुँचे जहाँ नीचे खोह के अंदर से कुमारी और चपला को देखा था।

पूरी उम्मीद थी कि कुमारी चंद्रकांता और चपला को यहाँ देखेंगे, मगर वे कहीं नजर न आईं, हाँ जमीन पर पड़ी दो लाशें जरूर दिखाई दीं जिनमें मांस बहुत कम था, सिर से पैर तक नुची हड्डियाँ दिखाई देती थीं, चेहरे किसी के भी दुरुस्त न थे।

इस वक्त कुमार की कैसी दशा थी वे ही जानते होंगे। पागलों की-सी सूरत हो गई, चिल्ला कर रोने और बकने लगे – ‘हाय चंद्रकांता, तुझे कौन ले गया? नहीं, ले नहीं बल्कि मार गया। जरूर इन्हीं भेड़ियों ने तुझे मुझसे जुदा किया जिनकी आवाज यहाँ पहुँचने के पहले मैंने सुनी थी। हाय। वह भेड़िया बड़ा ही बेवकूफ था जो उसने तेरे खाने में जल्दी की, उसके लिए तो मैं पहुँच ही गया था, मेरा खून पी कर वह बहुत खुश होता क्योंकि इसमें तेरी मुहब्बत की मिठास भरी हुई है। तेरे में क्या बचा था, सूख के पहले ही काँटा हो रही थी। मगर क्या सचमुच तुझे भेड़िया खा गया या मैं भूलता हूँ? क्या यह दूसरी जगह तो नहीं है?

नहीं-नहीं, वह सामने दुष्ट शिवदत्त बैठा है। हाय अब मैं जी कर क्या करूँगा, मेरी जिंदगी किस काम आएगी, मैं कौन-सा मुँह ले कर महाराज जयसिंह के सामने जाऊँगा, जल्दी मत करो, धीरे-धीरे चलो, मैं भी आता हूँ, तुम्हारा साथ मरने पर भी न छोडूँगा। आज नौगढ़, विजयगढ़ और चुनारगढ़ तीनों राज्य ठिकाने लग गए। मैं तो तुम्हारे पास आता ही हूँ, मेरे साथ ही और कई आदमी आएँगे जो तुम्हारी खिदमत के लिए बहुत होंगे। हाय, इस सत्यानाशी तिलिस्म ने, इस दुष्ट शिवदत्त ने, इन भेड़ियों ने, आज बड़े-बड़े दिलावरों को खाक में मिला दिया। बस हो गया, दुनिया इतनी ही बड़ी थी, अब खतम हो गई। हाँ-हाँ, दौड़ी क्यों जाती हो, लो मैं भी आया।’

इतना कह और पहाड़ी के नीचे की तरफ देख कुमार कूद कर अपनी जान देना ही चाहते थे और तीनों ऐयार सन्न खड़े देख ही रहे थे कि यकायक भारी आवाज के साथ दालान के एक तरफ की दीवार फट गई और उसमें से एक वृद्ध महापुरुष ने निकल कर कुमार का हाथ पकड़ लिया।

कुमार ने फिर कर देखा। लगभग अस्सी वर्ष की उम्र, लंबी-लंबी सफेद रूई की तरह दाढ़ी नाभी तक आई हुई, सिर की लंबी जटा जमीन तक लटकती हुई, तमाम बदन में भस्म लगाए, लाल और बड़ी-बड़ी आँखें निकाले, दाहिने हाथ में त्रिशूल उठाए, बाएँ हाथ से कुमार को थामे, गुस्से से बदन कँपाते, तापसी रूप शिव जी की तरह दिखाई पड़े जिन्होंने कड़क कर आवाज दी और कहा – ‘खबरदार जो किसी को विधवा करेगा।’

यह आवाज इस जोर की थी कि सारा मकान दहल उठा, तीनों ऐयारों के कलेजे काँप उठे। कुँवर वीरेंद्रसिंह का बिगड़ा हुआ दिमाग फिर ठिकाने आ गया। देर तक उन्हें सिर से पैर तक देख कर कुमार ने कहा – ‘मालूम हुआ, मैं समझ गया कि आप साक्षात शिव जी या कोई योगी हैं, मेरी भलाई के लिए आए हैं। वाह-वाह खूब किया जो आ गए। अब मेरा धर्म बच गया, मैं क्षत्रिय होकर आत्महत्या न कर सका। एक हाथ आपसे लड़ूँगा और इस अद्भुत त्रिशूल पर अपनी जान न्यौछावर करूँगा? आप जरूर इसीलिए आए हैं, मगर महात्मा जी, यह तो बताइए कि मैं किसको विधवा करूँगा? आप इतने बड़े महात्मा होकर झूठ क्यों बोलते हैं? मेरा है कौन? मैंने किसके साथ शादी की है? हाय, कहीं यह बात कुमारी सुनती तो उसको जरूर यकीन हो जाता कि ऐसे महात्मा की बात भला कौन काट सकता है?’

वृद्ध योगी ने कड़क कर कहा – ‘क्या मैं झूठा हूँ? क्या तू क्षत्रिय है? क्षत्रियों के यही धर्म होते हैं? क्यों वे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाते हैं? क्या तूने किसी से विवाह की प्रतिज्ञा नहीं की? ले देख, पढ़ किसका लिखा हुआ है?’

यह कह कर अपनी जटा के नीचे से एक खत निकाल कर कुमार के हाथ में दे दिया।

पढ़ते ही कुमार चौंक उठे। ‘हैं, यह तो मेरा ही लिखा है। क्या लिखा है? ‘मुझे सब मंजूर है।’ इसके दूसरी तरफ क्या लिखा है? हाँ, अब मालूम हुआ, यह तो उस वनकन्या का खत है। इसी में उसने अपने साथ ब्याह करने के लिए मुझे लिखा था, उसके जवाब में मैंने उसकी बात कबूल की थी। मगर खत इनके हाथ कैसे लगा? वनकन्या का इनसे क्या वास्ता?’

कुछ ठहर कर कुमार ने पूछा – ‘क्या इस वनकन्या को आप जानते हैं?’

इसके जवाब में फिर कड़क के वृद्ध योगी बोले – ‘अभी तक जानने को कहता है? क्या उसे तेरे सामने कर दूँ?’

इतना कह कर एक लात जमीन पर मारी, जमीन फट गई और उसमें से वनकन्या ने निकल कर कुमार के पाँव पकड़ लिए।

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