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न सताइश की तमन्ना…

'न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह न सही मेरे अशआर में मानी न सही' सोचता हूँ, ग़ालिब ने शेर किन परिस्थितियों में कहा होगा। इस बेपरवाही के पीछे कितनी पीड़ा छिपी है,अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है। लगातार व्यंग्यवाणों के प्रहार से छलनी सीने से निकली यह आहत निःश्वास बेपरवाही के आवरण में छिपाये नहीं छिपती। कैसा लगा होगा सदी के महानतम शायर को, जब उनके सामने ही किसी ने उनके अशआर पर यह टिप्पणी की होगी कि-'कलामे मीर समझे या कलामे मीरज़ा समझे

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