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नारीवाद और विज्ञापनी संस्कृति

‘स्त्री न स्वंय ग़ुलाम रहना चाहती है और न ही पुरुष को ग़ुलाम बनाना चाहती है। स्त्री चाहती है मानवीय अधिकार्। जैविक भिन्नता के कारण वह निर्णय के अधिकार से वंचित नहीं होना चाहती।’ यह कथन विश्व की पहली नारीवादी मानी जाने वाली मेरी उल्स्टोनक्राफ़्ट का है। इस घोषणा को हुए दो सौ साल बीत चुके हैं।इन दो सौ सालों में नारीवाद की संकल्पना और नारी की स्थिति में काफी बदलाव आया है।पुरुष को ‘मेल शाउनिस्ट पिग’(MCP) कहने से लेकर ‘ब्रा बर्निंग मूवमेंट’ के नाम पर खुलेआम अपने अंतर्वस्त्रों को जलाने तक नारीवादी आंदोलन ने कई मुक़ाम तय किये हैं,परन्तु ‘निर्णय का अधिकार’ नारी को मिल पाया है या नहीं, यह विवाद का विषय है।नारीवाद में मूल में स्त्री पुरुष समानता को स्थापित करने की चेष्टा काम कर रही थी। लेकिन, ऐसा लगता है बीच रास्ते में ही नारीवाद अपनी राह भटक गया है। स्वतंत्रता की अदम्य लालसा और पुरुष

नागमती का विरह वर्णन

पद्मावत की व्याख्या आमतौर पर एक सूफ़ी काव्य के रूप में होती रही है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचकों ने भी पद्मावत के लौकिक प्रेम की अलौकिक व्याख्या करने की कोशिश की है. यदि गौर से देखें तो पायेंगे कि पद्मावत में मुल्ला दाऊद, उस्मान और कुतुबन जैसे रचनाकारों के प्रेमाख्यानों की अपेक्षा आध्यात्मिकता का पुट  काफ़ी कम है. जायसी का जोर लौकिक प्रेम पर ज्यादा है. पद्मावत मूलतः युद्ध और प्रेम की ही कथा प्रतीत होती है, जिसमें यत्र-तत्र किंचित आध्यात्मिकता का पुट भी है. अपने पूर्ववर्तियों की तरह जायसी कथा को गूढ़ प्रभाव से युक्त नहीं मानते और न ही इसके पढ़ने से किसी आध्यात्मिक लाभ की आशा दिलाते हैं. जायसी के अनुसार, पद्मावत ‘प्रेम की पीर’ का काव्य है, जिसे पढ़कर पाठक की आंखों में आंसू ही आयेंगे.मुहम्मद कवि यह जोरि सुनावाIसुना सो प्रेम पीर गा पावा II                जोरि   लाई  रकत   के   लेई I गाढि  प्रीति नैन जल भेई

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