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सरोज स्मृति

सरोज स्मृति एक शोकगीति है, जो निराला ने अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु के पश्चात लिखी थी।कवि अन्यत्र कहता है-‘गीत गाने दो मुझे तो वेदना को रोकने को’। यहाँ भी कवि अपनी पुत्री, जो उसके जीवन का एकमात्र सहारा थी’ की मृत्यु से उत्पन्न वेदना को कविता के माध्यम से कम करना चाहता है।पुत्री कवि के जीवन का एकमात्र सहारा थी-‘मुझ भाग्यहीन की तु संबल’..। उसी पुत्री की मृत्यु ने कवि को पूरी तरह तोड़ डाला। यहाँ यह पुत्री के बहाने दुःख भरे अपने पूरे जीवन पर दृष्टिपात कर रहा है – ‘दुःख ही जीवन की कथा रही,क्या कहा आज जो नहीं कही’। धीरे-धीरे बात सिर्फ पुत्री और कवि के जीवन की नहीं रह जाती बल्कि तत्कालीन सामाजिक परिवेश की हो जाती है- ये कान्यकुब्ज़ कुलकुलांगार खाकर पत्तल में करे छेद। पुत्री के सौंदर्य वर्णन में कवि की निर्वैयक्तिकता श्लाघनीय है। पूरी कविता में पिता और कवि का द्वन्द्व चलता

गोदान में प्रेमचंद का उद्देश्य

किसान समस्या प्रेमचन्द के उपन्यासों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्या के रूप में सामने आती है।प्रेमचन्द का पहला उपन्यास ‘सेवासदन’ यद्यपि स्त्री समस्या को लेकर लिखा गया है,लेकिन यहाँ भी चैतू की कहानी के माध्यम से उन्होँने यह संकेत दे ही दिया है कि किसान समस्या और किसान जीवन ही उनके उपन्यासों का मुख्य विषय होने वाला है।प्रेमाश्रम, कर्मभूमि और गोदान मिलकर प्रेमचन्द के किसान जीवन पर लिखे गये उपन्यासों की त्रयी पूरी करते हैं।इन तीनों उपन्यासों को तत्कालीन राजनीतिक संदर्भों के साथ रखकर देखना समीचीन होगा। प्रेमाश्रम की रचना 1927 में होती है। कर्मभूमि की रचना 1932 में होती है, जबकि गोदान का प्रकाशन वर्ष 1936 है।इन तीनों उपन्यासों को कालक्रमिक दृष्टि से देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि किसान समस्या के संबंध में प्रेमचन्द का दृष्टिकोण लगातार परिपक्व हुआ है।प्रेमाश्रम और कर्मभूमि में जहाँ प्रेमचन्द आश्रम बनाकर या किसान आंदोलन की सफलता दिखाकर समस्या का आदर्शवादी हल

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