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पुष्टि मार्ग

बल्लभाचार्य द्वारा प्रतिपादित शुद्धाद्वैतवाद दर्शन के भक्तिमार्ग को ‘पुष्टिमार्ग’ कहते हैं।शुद्धाद्वैतवाद के अनुसार ब्रह्म माया से अलिप्त है,इसलिये शुद्ध है।माया से अलिप्त होने के कारण ही यह अद्वैत है। यह ब्रह्म सगुण भी है और निर्गुण भी। सामान्य बुद्धि को परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली बातों का ब्रह्म में सहज अन्तर्भाव हो जाता है।वह अणु से भी छोटा और सुमेरु से भी बड़ा है।वह अनेक होकर भी एक है।यह ब्रह्म स्वाधीन होकर भी भक्त के अधीन हो जाता है।विशिष्टाद्वैत की तरह शुद्धाद्वैतवादी ने भी ब्रह्म के साथ साथ जगत को भी सत्य बताया है।कारणरूप ब्रह्म के सत्य होने पर कार्यरूप जगत मिथ्या नहीं हो सकता। ब्रह्म की प्रतिकृति होने के कारण जगत की त्रिकालाबाध सत्ता है।जीव और जगत का नाश नहीं होता,सिर्फ़ आविर्भाव और तिरोभाव होता है।पुष्टिमार्ग शुद्धाद्वैत के दर्शन को ही भक्ति में ढालता है।पुष्टि का शाब्दिक अर्थ है ‘पोषण’।श्रीमद्भागवत में ईश्वर के अनुग्रह को पोषण कहा गया है-“पोषणं

आषाढ़ का एक दिन: शिल्प

आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश का ही श्रेष्ठ नाटक नहीं है,बल्कि यह हिन्दी के सार्वकालिक श्रेष्ठ नाटकों में से एक भी है। जिस नाटक को रंगमंच से जोड़कर भारतेंदु ने जन आंदोलन के एक उपकरण के रूप में विकसित करने का प्रयत्न किया था,वह प्रसाद तक आते आते रंगमंच से पूरी तरह कट जाता है।प्रसाद के साहित्यिक नाटक रंगमंच पर लगातार विफलता स्वीकार करते रहे। मोहन राकेश ने न सिर्फ नाटकों की साहित्यिकता बरकरार रखी,बल्कि नाटक और रंगमंच के बीच की खाई को भी सफलतापूर्वक पाटा। भारतेंदु के नाटक रंगमंच के लिये थे,दर्शकों के लिये थे।साहित्यिकता का मुद्दा वहाँ नहीं था। जयशंकर प्रसाद के नाटक पाठक के लिये है। प्रसाद ने तो घोषणा ही कर दी कि, ‘नाटक रंगमंच के लिये नहीं होते बल्कि रंगमंच नाटक के लिये होता है’।रंगमंच के प्रति पूर्वग्रह के कारण प्रसाद के नाटक पाठकों की नज़र में तो श्रेष्ठ है,परन्तु दर्शकों को ये ज़्यादा

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