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महाभोज : टूटे सपनों की किरचों के बीच एक खतरनाक सम्मोहन भरी दुर्निवार अग्निलीक …

स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति को आधार बनाकर लिखे गये उपन्यासों में मैला आंचल, रागदरबारी और महाभोज सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं। मन्नू भण्डारी का महाभोज, प्रेमचन्द का ‘गोदान’ और फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ तीनों ही मोहभंग जनित परिस्थितियों की उपज हैं। प्रेमचन्द के मोहभंग का कारण तत्कालीन स्वाधीनता आन्दोलन का सामन्ती चरित्र था तो रेणु के मोहभंग का कारण आजादी से जुड़ी आशाओं-आकांक्षाओं का खण्डित होना था। लोगों ने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं। उम्मीद थी कि सत्ता का चेहरा बदलेगा, शोषण और भ्रष्टाचार का निरंकुश रथ थमेगा, लेकिन चन्द ही दिनों में ये सारी उम्मीदें धूल धूसरित हो गयीं। लोगों ने देखा कि नयी व्यवस्था में न चेहरे बदले और न उनका वास्तविक चरित्र। शोषण और भ्रष्टाचार का रथ द्विगुणीत रफ्तार से चलता रहा। यही मोहभंग ‘महाभोज’ की आधार भूमि है। महाभोज का अर्थ है किसी की मृत्यु पर होने वाली दावत! यहाँ

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