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बीस साल बाद -धूमिल

बीस साल बाद मेरे चेहरे में वे आंखें वापस लौट आई हैं जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है : हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड डूब गए हैं। और जहां हर चेतावनी खतरे को टालने के बाद एक हरी आंख बनकर रह गई है। बीस साल बाद मैं अपने आप से एक सवाल करता हूँ जानवर बनने के लिए कितने सब्र की जरूरत होती है? और बिना किसी उत्तर के चुपचाप आगे बढ जाता हूँ क्योंकि आजकल मौसम का मिजाज यूं है कि खून में उडने वाली पत्तियों का पीछा करना लगभग बेमानी है। दोपहर हो चुकी है हर तरफ ताले लटक रहे हैं दीवारों से चिपके गोली के छर्रों और सडकों पर बिखरे जूतों की भाषा में एक दुर्घटना लिखी गई है हवा से फडफडाते हुए हिन्दुस्तान के नक्शे पर गाय ने गोबर कर दिया है। मगर यह वक्त घबराए हुए लोगों की शर्म आंकने का नहीं और न यह पूछने का- कि संत और सिपाही में देश का सबसे बडा दुर्भाग्य कौन है! आह! वापस लौटकर छूटे हुए जूतों में पैर डालने का

भेड़ें और भेड़िये – हरिशंकर परसाई

एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए | और,एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो | पशु-समाज में इस `क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गयी कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया |जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं,उसमें भेंडें बहुत थीं–निहायत नेक , ईमानदार, दयालु , निर्दोष पशु जो घास तक को फूँक-फूँक कर खाता है |भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा | हम अपने प्रतिनिधियों से क़ानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारीकिसी को न सताए, न मारे | सब जिएँ और जीने दें | शान्ति,स्नेह,बन्धुत्त्व और सहयोग पर समाज आधारित हो |इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया | भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका

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