आप यहाँ हैं
होम > 2017 > July

महाजनी सभ्यता – प्रेमचंद

जागीरदारी सभ्यता में बलवान भुजाएँ और मजबूत कलेजा जीवन की आवश्यकताओें में परिगणित थे, और साम्राज्यवाद में बुद्धि और वाणी के गुण तथा मूक आज्ञापालन उसके आवश्यक साधन थे। पर उन दोनों स्थितियों में दोषों के साथ कुछ गुण भी थे। मनुष्य के अच्छे भाव लुप्त नहीं हो गये थे। जागीरदार अगर दुश्मन के खून से अपनी प्यास बुझाता था, तो अकसर अपने किसी मित्र या उपकारक के लिए जान की बाजी भी लगा देता था। बादशाह अगर अपने हुक्म को कानून समझता था और उसकी अवज्ञा को कदापि सहन न कर सकता था, तो प्रजापालन भी करता था, न्यायशील भी होता था। दूसरे के देश पर चढ़ार्इ वह या तो किसी अपमान-अपकार का बदला फेरने के लिए करता था या अपनी आन-बान, रोब-दाब कायम करने के लिए या फिर देश-विजय और राज्य-विस्तार की वीरोचित महत्वाकांक्षा से प्रेरित होता था। उसकी विजय का उददेश्य प्रजा का खून चूसना कदापि न होता था। कारण यह कि राजा

रेल की रात – इलाचन्द्र जोशी

प्रेमचंद जहाँ कथा साहित्य को सामाजिक समस्याओं से लड़ने के अस्त्र के रूप में विकसित करने का प्रयत्न कर रहे थे, वहीं उन्हीं के समकालीन जैनेन्द्र इसे समाज से व्यक्ति की ओर, बाहर से भीतर की ओर ले जा रहे थे. जैनेन्द्र, अज्ञेय और इलाचन्द्र जोशी जैसे कथाकारों ने व्यक्ति मन की गहराइयों की छानबीन को ही अपने कथा लेखन का उद्देश्य बनाया.... गाड़ी आने के समय से बहुत पहले ही महेंद्र स्टेशन पर जा पहुँचा था। गाड़ी के पहुँचने का ठीक समय मालूम न हो, यह बात नहीं कही जा सकती। जिस छोटे शहर में वह आया हुआ था, वहाँ से जल्दी भागने के लिए वह ऐसा उत्सुक हो उठा था कि जान-बूझ कर भी अज्ञात मन से शायद किसी अबोध बालक की तरह वह समझा था कि उसके जल्दी स्टेशन पर पहुँचने से संभवत: गाड़ी भी नियत समय से पहले ही आ जायगी। होल्डाल में बँधे हुए बिस्तरे और

पंचलाइट – फणीश्वरनाथ रेणु

पिछले पंद्रह महीने से दंड-जुर्माने के पैसे जमा करके महतो टोली के पंचों ने पेट्रोमेक्स खरीदा है इस बार, रामनवमी के मेले में | गाँव में सब मिलाकर आठ पंचायतें हैं | हरेक जाति की अलग अलग 'सभाचट्टी ' है | सभी पंचायतों में दरी, जाजिम , सतरंजी और पेट्रोमेक्स हैं - पेट्रोमेक्स, जिसे गाँव वाले पंचलैट कहते हैं | पंचलैट खरीदने के बाद पंचो ने मेले में ही तय किया - दस रुपये जो बच गए हैं, इससे पूजा सामग्री खरीद ली जाए - बिना नेम टेम के कल-कब्जे वाली चीज़ का पुन्याह नहीं करना चाहिए | अँगरेज़ बहादुर के राज में भी पुल बनाने के पहले बलि दी जाती थी | मेले में सभी दिन-दहाड़े ही गाँव लौटे; सबसे आगे पंचायत का छडीदार पंचलैट का डिब्बा माथे पर लेकर और उसके पीछे सरदार, दीवान, और पंच वगैरह | गाँव के बाहर ही ब्रह्मण टोली के फुटंगी झा

एक बूंद सहसा उछली (यात्रा वृतांत) – अज्ञेय

अप्रैल के उत्तरार्द्ध की एक रात का पिछला पहर। खुला आकाश। वास्तव में खुला आकाश, क्योंकि आकाश के जिस अंश में धूल या धुन्ध होती है वह तो हमारे नीचे है। और धूल उसमें है भी नहीं, हलकी-सी वसन्ती धुन्ध ही है, बहुत बारीक धुनी हुई रुई की-सी:यह ऊपर आकाश नहीं, हैरूपहीन आलोक-मात्र। हम अचल-पंखतिरते जाते हैंभार-मुक्त।नीचे यह ताजी धुनी रुई की उजलीबादल-सेज बिछी हैस्वप्न-मसृण:या यहाँ हमीं अपना सपना हैं ?हम नीचे उतर रहे हैं। धीरे-धीरे आकाश कुछ कम खुला हो आता है और फिर नीचे बहुत धुँधली रोशनी दीखने लगती है। विमान के भीतर, चालक के कैबिन को यात्रियों के कमरे से अलग करनेवाले द्वार के ऊपर बत्ती जल उठती है। ‘पेटियाँ लगा लीजिए’-‘सिगरेट बुझा दीजिए।’ एक गूँज-सी होती है, फिर स्वर आता है; ‘‘थोड़ी देर में हम लोग रोम के चाम्पीनो हवाई अड्डे पर उतरेंगे।’’भारत से रोम (इटालीय रोमा का अँगरेजी रूप) तक 22 घण्टे लगे। देश से

दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी – आचार्य चतुरसेन शास्त्री 

गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फाल्गुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के सब झंझटों से दूर रहकर नई दुलहिन के साथ प्रेम और आनन्द की कलोलें करने, वह सलीमा को लेकर कश्मीर के दौलतखाने में चले आए थे।रात दूध में नहा रही थी। दूर के पहाड़ों की चोटियाँ बर्फ से सफेद होकर चाँदनी में बहार दिखा रही थीं। आरामबाग के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी।मोतीमहल के एक कमरे में शमादान जल रहा था, और उसकी खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात का सौन्दर्य निहार रही थी। खुले हुए बाल उसकी फिरोजी रंग की ओढ़नी पर खेल रहे थे। चिकन के काम से सजी और मोतियों से गुँथी हुई उस फीरोजी रंग की ओढ़नी पर, कसी हुई कमखाब की कुरती और पन्नों की कमर-पेटी पर, अंगूर के बराबर बड़े मोतियों की माला झूम रही थी। सलीमा का रंग भी मोती

स्मृति – श्रीराम शर्मा

सन् 1908 ई. की बात है। दिसंबर का आखीर या जनवरी का प्रारंभ होगा। चिल्ला  जाड़ा  पड़ रहा था। दो-चार दिन पूर्व कुछ बूँदा-बाँदी हो गई थी, इसलिए शीत की भयंकरता और भी बढ़ गई थी। सायंकाल के साढ़े तीन या चार बजे होंगे। कई साथियों के साथ मैं झरबेरी के बेर तोड़-तोड़कर खा रहा था कि गाँव के पास से एक आदमी ने ज़ोर  से पुकारा कि तुम्हारे भाई बुला रहे हैं, शीघ्र ही घर लौट जाओ। मैं घर को चलने लगा। साथ में छोटा भाई भी था। भाई साहब की मार का डर था इसलिए सहमा हुआ चला जाता था। समझ में नहीं आता था कि कौन-सा कसूर बन पड़ा। डरते-डरते घर में घुसा। आशंका थी कि बेर खाने के अपराध में ही तो पेशी न हो। पर आँगन में भाई साहब को पत्र लिखते पाया। अब पिटने का भय दूर हुआ। हमें देखकर भाई साहब ने कहा-  इन पत्रों को ले जाकर मक्खनपुर डाकखाने में डाल आओ। तेजी से जाना, जिससे शाम की डाक

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top