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दो बाँके -भगवतीचरण वर्मा

शायद ही कोई ऐसा अभागा हो जिसने लखनऊ का नाम न सुना हो; और युक्‍तप्रांत में ही नहीं, बल्कि सारे हिंदुस्‍तान में, और मैं तो यहाँ तक कहने को तैयार हूँ कि सारी दुनिया में लखनऊ की शोहरत है। लखनऊ के सफेदा आम, लखनऊ के खरबूजे, लखनऊ की रेवड़ियाँ - ये सब ऐसी चीजें हैं जिन्‍हें लखनऊ से लौटते समय लोग सौगात की तौर पर साथ ले जाया करते हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं जो साथ नहीं ले जाई जा सकतीं, और उनमें लखनऊ की जिंदादिली और लखनऊ की नफासत विशेष रूप से आती हैं। ये तो वे चीजें हैं, जिन्‍हें देशी और परदेशी सभी जान सकते हैं, पर कुछ ऐसी भी चीजें हैं जिन्‍हें कुछ लखनऊवाले तक नहीं जानते, और अगर परदेसियों को इनका पता लग जाए, तो समझिए कि उन परदेसियों के भाग खुल गए। इन्‍हीं विशेष चीजों में आते हैं लखनऊ के 'बाँके'। 'बाँके' शब्‍द

बड़े घर की बेटी – प्रेमचंद

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं की कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं, इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ शेष न रहा था; पर दूध शायद बहुत देती थी; क्योंकि एक न एक आदमी हाँड़ी लिये उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान आय एक हजार रुपये वार्षिक से अधिक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी. ए. की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लालबिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। भरा हुआ

कप्तान – शिवरानी देवी

प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी अपनी रचना 'प्रेमचंद घर में' के लिए चर्चित रही हैं , पर शायद कई लोगों को यह न पता हो कि वे अपने समय की चर्चित कथाकार भी रही हैं . प्रस्तुत है , उनकी कहानी 'कप्तान'ज़ोरावर सिंह की जिस दिन शादी हुई, बहू आई, उसी रोज़ ज़ोरावर सिंह की कप्तानी को जगह मिली। घर में आकर बोला ज़ोरावर अपनी बीवी से -- 'तुम बड़ी भाग्यवान हो। कल तुम आई नहीं, आज मैं कप्तान बन बैठा ।'उसकी बीवी का नाम सुभद्रा; सुभद्रा यह सब सुन करके ख़ुश होने के बजाय चिन्तित हो गई। ज़ोरावर--तुम तो ख़ुश नहीं मालूम हो रही हो। सुभद्रा-- जिसकी लोग ख़ुशी कहते हैं, उस ख़ुशी के अन्दर गम भी तो छिपा रहता है। ज़ोरावर--कैसा ग़म ! इस उमंग के दिनों में ग़म का नाम ही क्या ! बहू आई शाम को, सुबह अच्छा ओहदा ! इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात मेरे लिये और तुम्हारे

काबुलीवाला – रविंद्रनाथ टैगोर

1892 में प्रकाशित काबुलीवाला रविंद्रनाथ टैगोर की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है . 1957 में तपन सिन्हा ने इस कहानी को आधार बना कर इसी नाम से एक बांग्ला फिल्म का निर्देशन किया . बाद में बिमल राय ने हिंदी में काबुलीवाला का निर्माण किया , जिसे हेमेन गुप्ता ने निर्देशित किया. हिंदी फिल्म में रहमत का केन्द्रीय चरित्र प्रख्यात अभिनेता बलराज साहनी ने निभाया था. मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह 'काक' को 'कौआ' कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है - आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग

पाजेब – जैनेंद्र

बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे। बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी।मैंने कहा, कैसी पाजेब?बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है।मैंने कहा, अच्छा-अच्छा।बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी।मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही।उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी।बुआ ने

रोज (गैंग्रीन) – अज्ञेय

दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते ही मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य, किन्तु फिर भी बोझिल और प्रकम्पमय और घना-सा फैल रहा था...मेरी आहट सुनते ही मालती बाहर निकली। मुझे देखकर, पहचानकर उसकी मुरझायी हुई मुख-मुद्रा तनिक-सी मीठे विस्मय से जागी-सी और फिर पूर्ववत् हो गयी। उसने कहा, ‘‘आ जाओ।’’ और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये भीतर की ओर चली। मैं भी उसके पीछे हो लिया।भीतर पहुँचकर मैंने पूछा, ‘‘वे यहाँ नहीं हैं?’’‘‘अभी आए नहीं, दफ्तर में हैं। थोड़ी देर में आ जाएँगे। कोई डेढ़-दो बजे आया करते हैं।’’‘‘कब से गये हुए हैं?’’‘‘सवेरे उठते ही चले जाते हैं।’’मैं ‘हूँ’ कहकर पूछने को हुआ, ‘‘और तुम इतनी देर क्या करती हो?’’ पर फिर सोचा आते ही एकाएक प्रश्न ठीक नहीं है। मैं कमरे के चारों ओर देखने लगा।मालती एक पंखा उठा लायी, और

राजा भोज का सपना – शिवप्रसाद सितारे हिंद

हिंदी की पहली कहानी किसे माना जाए , इसे लेकर विद्वानों में बड़ा मतभेद है. कुछ विद्वान शिवप्रसाद सितारे हिन्द की 'राजा भोज का सपना' (आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार 1856 के आसपास प्रकाशित ) को हिंदी की पहली कहानी मानते हैं , लेकिन शुक्ल जी की कहानी की कसौटी पर यह खरी नहीं उतरती.वह कौन-सा मनुष्‍य है जिसने महा प्रतापी राजा भोज महाराज का नाम न सुना हो। उसकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत में व्‍याप रही है और बड़े-बड़े महिपाल उसका नाम सुनते ही कांप उठते थे और बड़े-बड़े भूपति उसके पांव पर अपना सिर नवाते। सेना उसकी समुद्र की तरंगों का नमूना और खजाना उसका सोने-चांदी और रत्‍नों की खान से भी दूना। उसके दान ने राजा करण को लोगों के जी से भुलाया और उसके न्‍याय ने विक्रम को भी लजाया। कोई उसके राजभर में भूखा न सोता और न कोर्ड उघाड़ा रहने पाता। जो

शेख मखमूर – प्रेमचंद

मुल्के जन्नतनिशॉँ के इतिहास में वह अँधेरा वक्त था जब शाह किशवर की फतहों की बाढ़ बड़े जोर-शोर के साथ उस पर आयी। सारा देश तबाह हो गया। आजादी की इमारतें ढह गयीं और जानोमाल के लाले पड़ गए। शाह बामुराद खूब जी तोड़कर लड़ा, खूब बहादुरी का सबूत दिया और अपने खानदान के तीन लाख सूरमाओं को अपने देश पर चढ़ा दिया मगर विजेता की पत्थर काट देनेवाली तलवार के मुकाबले में उसकी यह मर्दाना जॉँबाजियॉँ बेअसर साबित हुईं। मुल्क पर शाह किशवरकुशा की हुकूमत का सिक्का जम गया और शाह बामुराद अकेला तनहा बेयारो मददगार अपना सब कुछ आजादी के नाम पर कुर्बान करके एक झोंपड़ें में जिन्दगी बसर करने लगा।यह झोंपड़ा पहाड़ी इलाके में था। आस-पास जंगली कौमें आबाद थीं और दूर-दूर तक पहाड़ों के सिलसिले नजर आते थे। इस सुनसान जगह में शाह बामुराद मुसीबत के दिन काटने लगा। दुनिया में अब उसका कोई दोस्त न

ईदगाह – प्रेमचंद

रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गॉंव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके

टॉर्च बेचने वाले – हरिशंकर परसाई

फोटो कर्टसी : पत्रिका डॉट कॉमवह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था । बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा । कल फिर दिखा । मगर इस बार उसने दाढी बढा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था ।मैंने पूछा, '' कहाँ रहे? और यह दाढी क्यों बढा रखी है? ''उसने जवाब दिया, '' बाहर गया था । ''दाढीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढी पर हाथ फेरने लगा । मैंने कहा, '' आज तुम टार्च नहीं बेच रहे हो? ''उसने कहा, '' वह काम बंद कर दिया । अब तो आत्मा के भीतर टार्च जल उठा है । ये ' सूरजछाप ' टार्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं । ''मैंने कहा, '' तुम शायद संन्यास ले रहे हो । जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है । किससे दीक्षा ले आए? ''मेरी बात से उसे

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