आप यहाँ हैं
होम > 2017 > September

राम की शक्तिपूजा -निराला

रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमररह गया राम-रावण का अपराजेय समरआज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,प्रतिपल - परिवर्तित - व्यूह - भेद कौशल समूहराक्षस - विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध - कपि विषम हूह,विच्छुरित वह्नि - राजीवनयन - हतलक्ष्य - बाण,लोहितलोचन - रावण मदमोचन - महीयान,राघव-लाघव - रावण - वारण - गत - युग्म - प्रहर,उद्धत - लंकापति मर्दित - कपि - दल-बल - विस्तर,अनिमेष - राम-विश्वजिद्दिव्य - शर - भंग - भाव,विद्धांग-बद्ध - कोदण्ड - मुष्टि - खर - रुधिर - स्राव,रावण - प्रहार - दुर्वार - विकल वानर - दल - बल,मुर्छित - सुग्रीवांगद - भीषण - गवाक्ष - गय - नल,वारित - सौमित्र - भल्लपति - अगणित - मल्ल - रोध,गर्ज्जित - प्रलयाब्धि - क्षुब्ध हनुमत् - केवल प्रबोध,उद्गीरित - वह्नि - भीम - पर्वत - कपि चतुःप्रहर,जानकी - भीरू - उर - आशा भर - रावण सम्वर।लौटे युग - दल - राक्षस - पदतल पृथ्वी

हूक-चंद्रगुप्त विद्यालंकार

जब तक गाड़ी नहीं चली थी, बलराज जैसे नशे में था। यह शोरगुल से भरी दुनिया उसे एक निरर्थक तमाशे के समान जान पड़ती थी। प्रकृति उस दिन उग्र रूप धारण किए हुए थी। लाहौर का स्टेशन। रात के साढ़े नौ बजे। कराँची एक्सप्रेस जिस प्लेटफार्म पर खड़ा था, वहाँ हजारों मनुष्य जमा थे। ये सब लोग बलराज और उसके साथियों के प्रति, जो जान-बूझ कर जेल जा रहे थे, अपना हार्दिक सम्मान प्रकट करने आए थे। प्लेटफार्म पर छाई हुई टीन की छतों पर वर्षा की बौछारें पड़ रही थीं। धू-धू कर गीली और भारी हवा इतनी तेजी से चल रही थी कि मालूम होता था, वह इन सब संपूर्ण मानवीय निर्माणों को उलट-पुलट कर देगी; तोड़-मोड़ डालेगी। प्रकृति के इस महान उत्पात के साथ-साथ जोश में आए हुए उन हजारों छोटे-छोटे निर्बल-से देहधारियों का जोशीला कंठस्वर, जिन्हें 'मनुष्य' कहा जाता है।बलराज राजनीतिक पुरुष नहीं है। मुल्क की बातों

दुर्गा का मंदिर -प्रेमचंद

बाबू ब्रजनाथ क़ानून पढ़ने में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में.श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता.मुन्नू रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली.ब्रजनाथ ने क्रुद्ध हो कर भामा से कहा-तुम इन दुष्टों को यहाँ से हटाती हो कि नहीं ? नहीं तो मैं एक-एक की खबर लेता हूँ.भामा चूल्हे में आग जला रही थी, बोली-अरे तो अब क्या संध्या को भी पढ़ते ही रहोगे ? जरा दम तो ले लो.ब्रज.-उठा तो न जायेगा; बैठी-बैठी वहीं से क़ानून बघारोगी.अभी एक-आध को पटक दूँगा, तो वहीं से गरजती हुई आओगी कि हाय-हाय बच्चे को मार डाला !भामा-तो मैं कुछ बैठी या सोयी तो नहीं हूँ.जरा एक घड़ी तुम्हीं लड़कों को बहलाओगे, तो क्या होगा ! कुछ मैंने ही तो उनकी नौकरी नहीं लिखायी !ब्रजनाथ से कोई जवाब न देते बन पड़ा.क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग न पा कर और भी प्रबल हो जाता है. यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों

जहाँ लक्ष्मी कैद है – राजेन्द्र यादव

ज़रा ठहरिए, यह कहानी विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के बारे में नहीं, लक्ष्मी नाम की एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अपनी कैद से छूटना चाहती है. इन दो नामों में ऐसा भ्रम होना स्वाभाविक है जैसाकि कुछ क्षण के लिए गोविन्द को हो गया था.एकदम घबराकर जब गोविन्द की आँखें खुलीं तो वह पसीने से तर था और उसका दिल इतने ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा, कहीं अचानक उसका धड़कना बन्द न हो जाये. अँधेरे में उसने पाँच-छ: बार पलकें झपकाई, पहली बार तो उसकी समझ में ही न आया कि वह कहाँ है, कैसा है—एकदम दिशा और स्थान का ज्ञान उसे भूल गया. पास के हॉल की घड़ी ने एक का घंटा बजाया तो उसकी समझ में ही न आया कि वह घड़ी कहाँ है,वह स्वयं कहाँ है और घंटा कहाँ बज रहा है. फिर धीरे-धीरे उसे ध्यान आया, उसने ज़ार से अपने

खेल -जैनेन्द्र

मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुकास्थल पर एक बालक और बालिका सारे विश्व को भूल, गंगा-तट के बालू और पानी से खिलवाड़ कर रहे थे।बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को उछाल रहा था। बालिका अपने पैर पर रेत जमाकर और थोप-थोपकर एक भाड़ बना रही थी।बनाते-बनाते बालिका भाड़ से बोली- "देख ठीक नहीं बना, तो मैं तुझे फोड़ दूंगी।" फिर बड़े प्यार से थपका-थपकाकर उसे ठीक करने लगी। सोचती जाती थी- "इसके ऊपर मैं एक कुटी बनाउंगी, वह मेरी कुटी होगी। और मनोहर...? नहीं, वह कुटी में नहीं रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ में पत्ते झोंकेगा। जब वह हार जाएगा, बहुत कहेगा, तब मैं उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूंगी।मनोहर उधर पानी से हिल-मिलकर खेल रहा था। उसे क्या मालूम कि यहाँ अकारण ही उस पर रोष और अनुग्रह किया जा रहा है।बालिका सोच रही थी- "मनोहर कैसा

साबुन-द्विजेंद्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’

1.सुखदेव ने जोर से चिल्ला कर पूछा - 'मेरा साबुन कहाँ है?'श्यामा दूसरे कमरे में थी. साबुनदानी हाथ में लिए लपकी आई, और देवर के पास खड़ी हो कर हौले से बोली - 'यह लो.'सुखदेव ने एक बार अँगुली से साबुन को छू कर देखा, और भँवें चढ़ा कर पूछा - 'तुमने लगाया था, क्यों?'श्यामा हौले से बोली - 'जरा मुँह पर लगाया था.''क्यों तुमने मेरा साबुन लिया? तुमसे हजार बार मना कर चुका हूँ. लेकिन तुम तो बेहया हो न!''गाली मत दो! समझे?'श्यामा ने डिब्बी वहीं जमान पर पटक दी, और तेज कदमों से बाहर जाती-जाती बोली - 'जरा साबुन छू लिया मैंने, तो मानो गजब हो गया!' फिर दूसरे कमरे की चौखट पर मुड़ कर, बोली - 'मैं क्या चमार हूँ?'सुखदेव ने वहीं से चिल्ला कर कहा - 'हो चमार! तुम चमार हो! खबरदार जो अब कभी मेरा साबुन छुआ!'अँगीठी पर तरकारी पक रही थी. श्यामा भुन-भुन करती,

दो आस्थाएं – अमृतलाल नागर

अरी कहाँ हो? इंदर की बहुरिया! - कहते हुए आँगन पार कर पंडित देवधर की घरवाली सँकरे, अँधेरे, टूटे हुए जीने की ओर बढ़ीं.इंदर की बहू ऊपर कमरे में बैठी बच्‍चे का झबला सी रही थी. मशीन रोककर बोली - आओ, बुआजी, मैं यहाँ हूँ. - कहते हुए वह उठकर कमरे के दरवाजे तक आई.घुटने पर हाथ टेककर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पंडिताइन इस कदर हाँफ रही थीं कि कि ऊपर आते ही जीने के बाहर की दीवाल से पीठ टेककर बैठ गई.इंदर की बहू आगे बढ़कर पल्‍ले को दोनों हाथों की चुटकियों से पकड़ सात बार अपनी फुफिया सास के पैरों पड़ी.- ठंडी सीरी बूढ़ सुहागन, दूधन नहाओ पूतन फलो - आशीर्वाद देती हुई पंडिताइन रुकीं, दम लेकर अपने आशीर्वाद को नया बल देते हुए कहा-हम तो, बहुरिया, रात-दिन यही मनाएँ हैं. पहलौठी का होता तो आज दिन ब्‍याव की फिकर पड़ती. (दबी आह) राम करै मारकंडे की आर्बल लैके

टेसू राजा अड़े खड़े

आज प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्मदिन है. प्रस्तुत है उनकी एक बाल कविता टेसू राजा अड़े खड़ेमाँग रहे हैं दही बड़े।बड़े कहाँ से लाऊँ मैं?पहले खेत खुदाऊँ मैं,उसमें उड़द उगाऊँ मैं,फसल काट घर लाऊँ मैं।छान फटक रखवाऊँ मैं,फिर पिट्ठी पिसवाऊँ मैं,चूल्हा फूँक जलाऊँ मैं,कड़ाही में डलवाऊँ मैं,तलवा कर सिकवाऊँ मैं।फिर पानी में डाल उन्हें,मैं लूँ खूब निचोड़ उन्हें।निचुड़ जाएँ जब सबके सब,उन्हें दही में डालूँ तब।नमक मिरच छिड़काऊँ मैं,चाँदी वरक लगाऊँ मैं,चम्मच एक मँगाऊँ मैं,तब वह उन्हें खिलाऊँ मैं।

एक प्लेट सैलाब -मन्नू भंडारी

मई की साँझ!साढ़े छह बजे हैं। कुछ देर पहले जो धूप चारों ओर फैली पड़ी थी, अब फीकी पड़कर इमारतों की छतों पर सिमटकर आयी है, मानो निरन्तर समाप्त होते अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उसने कसकर कगारों को पकड़ लिया हो।आग बरसाती हुई हवा धूप और पसीने की बदबू से बहुत बोझिल हो आयी है। पाँच बजे तक जितने भी लोग ऑफि़स की बड़ी-बड़ी इमारतों में बन्द थे, इस समय बरसाती नदी की तरह सड़कों पर फैल गये हैं। रीगल के सामनेवाले फुटपाथ पर चलनेवालों और हॉकर्स का मिला-जुला शोर चारों और गूँज रहा हैं गजरे बेचनेवालों के पास से गुज़रने पर सुगन्ध भरी तरावट का अहसास होता है, इसीलिए न ख़रीदने पर भी लोगों को उनके पास खड़ा होना या उनके पास से गुज़रना अच्छा लगता है।टी-हाउस भरा हुआ है। उसका अपना ही शोर काफ़ी है, फिर बाहर का सारा शोर-शराबा बिना किसी रुकावट के खुले

बैंक का दिवाला- प्रेमचंद

लखनऊ नेशनल बैंक के दफ्तर में लाला साईंदास आराम कुर्सी पर लेटे हुए शेयरो का भाव देख रहे थे और सोच रहे थे कि इस बार हिस्सेदारों को मुनाफ़ा कहां से दिया जायगा. चाय, कोयला या जुट के हिस्से खरीदने, चॉदी, सोने या रूई का सट्टा करने का इरादा करते; लेकिन नुकसान के भय से कुछ तय न कर पाते थे. नाज के व्यापार में इस बार बड़ा घाटा रहा; हिस्सेदारों के ढाढस के लिए हानि- लाभ का कल्पित ब्योरा दिखाना पड़ा ओर नफा पूँजी से देना पड़ा. इससे फिर नाज के व्यापार में हाथ डालते जी कांपता था.पर रूपये को बेकार डाल रखना असम्भव था. दो-एक दिन में उसे कहीं न कहीं लगाने का उचित उपाय करना जरूरी था; क्योंकि डाइरेक्टरों की तिमाही बैठक एक ही सप्ताह में होनेवाली थी, और यदि उस समय कोई निश्चय न हुआ, तो आगे तीन महीने तक फिर कुछ न हो सकेगा, और

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top