आप यहाँ हैं
होम > 2017 > October

अशोक के फूल -हजारी प्रसाद द्विवेदी

अशोक के फिर फूल आ गए हैं। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! बहुत सोच-समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिर्फ़ पाँच को ही अपने तूणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है।लेकिन पुष्पित अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है। इसलिए नहीं कि सुंदर वस्तुओं को हतभाग्य समझने में मुझे कोई विशेष रस मिलता है। कुछ लोगों को मिलता है। वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अंतिम मुहूर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृष्टि इतनी दूर तक नहीं जाती। फिर भी मेरा मन इस फूल को देखकर उदास हो जाता है। असली कारण तो मेरे अंतर्यामी ही जानते होंगे, कुछ थोड़ा-सा मैं भी अनुमान कर सका हूँ। बताता हूँ।भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही

मुसीबत है बड़ा भाई होना- शांति मेहरोत्रा

बड़ा भाई होना कितनी बड़ी मुसीबत है, इसे वे ही समझ सकते हैं, जो सीधे दिखाई पड़ने वाले चालाक छोटे भाई-बहनों के जाल में फंसकर आये दिन उनकी शरारतों के लिए मेरी तरह खुद ही डांट खाते नजर आते हैं. घर में जिसे देखो वही दो-चार उपदेश दे जाता है और दो-चार काम सौंप जाता है. चाचाजी को फ़ौरन पानी चाहिए, चाचीजी को ऊपर के कमरे से ब्रुश मंगवाना है. पिताजी के मेहमानों के लिए भाग कर चौराहे से पान लाने हैं. छोटे भाई ने सुबह से जलेबी के लिए रट लगा रखी है. फिर मुझे भी अपने कपड़ों पर इस्तिरी करनी है, बस्ता लगाना है, जूते पॉलिश करने हैं और पौने नौ बजे स्कूल के लिए रवाना हो जाना है. यों हूँ तो मैं भी अभी छठी क्लास में ही, लेकिन तीन भाइयों में सबसे बड़ा होने के नाते सुबह से शाम तक चकरघिन्नी की तरह नाचता रहता हूँ.          

दौड़ – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

नौगढ़ के टूर्नामेंट की बड़ी तैयारी की गई थी. सारा नगर सुसज्जित था. स्टेशन से लेकर स्कूल तक सड़क के दोनों ओर झंडियाँ लगाईं गई थीं. मोटरें खूब दौड़ रही थीं. टूर्नामेंट में पारितोषिक वितरण के लिए स्वयं कमिश्नर साहब आने वाले थे. इसीलिए शहर के सब अफसर और रईस व्यस्त थे. आज स्कूल के विस्तृत मैदान में दर्शकों की बड़ी भीड़ थी. नगरपालिका के सदस्य, सचिव, अध्यक्ष आदि सभी उपस्थित थे. दर्शकों में सेठों और साहूकारों का भी अभाव न था.    हेडमास्टर साहब तो प्रतिष्ठित लोगों का आदर-सत्कार करने में लगे हुए थे. पर इधर लड़कों में कुछ दूसरा ही जोश फैला हुआ था. यों तो कितने ही स्कूलों से लड़के आए थे, पर होड़ दो ही स्कूलों में थी – नौगढ़ और विजयगढ़. विजयलक्ष्मी भी इन्हीं दोनों के बीच में झूल रही थी. कभी वह नौगढ़ की ओर झुकती तो कभी विजयगढ़ की ओर. सभी लड़कों के ह्रदय

गिल्लू- महादेवी वर्मा

PC: VICKKYसोनजुही में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और फिर मेरे निकट पहुँचते ही कंधे पर कूदकर मुझे चौंका देता था। तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राण की खोज है।परंतु वह तो अब तक इस सोनजुही की जड़ में मिट्टी होकर मिल गया होगा। कौन जाने स्वर्णिम कली के बहाने वही मुझे चौंकाने ऊपर आ गया हो!अचानक एक दिन सवेरे कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा, दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छूआ-छुऔवल जैसा खेल खेल रहे हैं। यह काकभुशुंडि भी विचित्र पक्षी है - एक साथ समादरित, अनादरित, अति सम्मानित, अति अवमानित।हमारे बेचारे पुरखे न गरूड़ के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के, न हंस के। उन्हें पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर

विश्व का प्रथम साम्यवादी – हरिशंकर परसाई

स्वयं वामपंथ से प्रेरित होते हुए भी परसाई जी ने भारतीय वामपंथ पर चुटकी लेने का कोई मौका नहीं छोड़ा. पढ़िए दिवाली के बहाने ऐसा ही एक व्यंग्य जिस दिन राम रावण को परास्त करके अयोध्या आए , सारा नगर दीपों से जगमगा उठा . यह दीपावली पर्व अनंत काल तक मनाया जाएगा . पर इसी पर्व पर व्यापारी खाता -बही बदलते हैं और खाता-बही लाल कपडे में बाँधी जाती है .प्रश्न है - राम के अयोध्या आगमन से खाता -बही बदलने का क्या संबंध ? और खाता -बही लाल कपडे में ही क्यों बाँधी जाती है ?बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गयी .वे कहने लगे - सेठजी , अब बड़ी आफत है .शत्रुघ्न के राज में तो पोल चल गयी . पर राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं . वे सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स की चोरी बर्दाश्त नहीं करेंगे .वे

अंतरिक्ष में भस्मासुर – जयंत नार्लीकर

सवेरे का नाश्ता समाप्त करके दिलीप ने घड़ी की ओर देखा- सात बजकर अड़तालीस मिनट हो चुके थे. यानी सुबह की डाक आने में बारह मिनट बचे थे.   आज डाक की प्रतीक्षा दिलीप कुछ अधिक उत्सुकता के साथ कर रहा था, क्योंकि उसमें 'पराग' का वह अंक आने वाला था, जिसमें उसका सनसनीखेज लेख छपा था. लेख का शीर्षक था ‘अंतरिक्ष निवास के संभावित खतरे’. इस लेख के प्रकाशन के बारे में दिलीप के, पराग के संपादक के साथ, बहुत वाद-विवाद हो चुके थे. दिलीप के लेख का पहला मसविदा इतना भड़काने वाला था कि संपादक महोदय उसे उस रूप में छापने को तैयार नहीं थे और दिलीप लेख की काट-छांट करने में राजी नहीं था. आखिर दोनों ओर से कुछ रियायतें दी गयीं और लेख का अंतिम स्वरूप निश्चित हो सका. ऐसी सनसनीखेज बातें क्या थीं, जिन्हें प्रकाशित करने के बारे में ‘पराग’ के सम्पादक सतर्कता का रवैया अपनाना

अंतरिक्ष के पार भी –डॉ. हरिकृष्ण देवसरे

डॉ. लोबो ने आज खासतौर पर छुट्टी ली थी क्योंकि उनका चौदह वर्षीय बेटा पीटरोविच अंतर्ग्रहीय यात्राओं का कोर्स पूरा करके वापस चंद्रलोक पर आ रहा था. पीटरोविच ने ‘अंतर्ग्रहीय समझौते’ के अंतर्गत पृथ्वी के अलावा बृहस्पति और मंगल गृह पर भी प्रशिक्षण प्राप्त किया था.“कैसी रही तुम्हारी ट्रेनिंग?” डॉ. लोबो ने पीटरोविच से मिलते ही पहला सवाल यही किया था.“अच्छी रही...बहुत अच्छी.” पीटरोविच ने कहा था “लेकिन डैड! आज आप काम पर नहीं गए ?”“आज तुमसे जो मिलना था ! वैसे कल ही तो लौटा हूँ --- मंगल ग्रह से, और कल ही शनिग्रह जाना होगा. शायद तुम्हे मालूम नहीं कि मंगल ग्रह और शनि ग्रह में फिर तनाव बढ़ गया है!” “आपके साथ मैं भी चलूँगा ...”“तुम तो अभी बच्चे हो....” डॉ. लोबो ने कहा.यह सुनते ही पीटरोविच ने जोर का ठहाका लगाया , “ क्या डैडी ! आपने भी बीसवीं शताब्दी वाली घिसीपिटी बात कह दी! मैं चौदह

पहलवान की ढोलक – फणीश्वरनाथ रेणु

जाड़े का दिन . अमावस्या की रात – ठंढी और काली . मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव भयार्त शिशु की तरह थर-थर कांप रहा था. पुरानी और उजड़ी बांस-फूस की झोंपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य ! अँधेरा और निस्तब्धता !अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी. निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने ह्रदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी. आकाश में तारे चमक रहे थे. पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं . आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी. अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे.       सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी . गाँव की झोंपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज़ , ‘हे राम! हे भगवान!’ की टेर

लोहार और तलवार -मोहनलाल महतो वियोगी

पुष्पदंतपुर के चौड़े राजपथ के एक किनारे जिस लोहार की दूकान थी , वह अपनी कला में प्रवीण था. किन्तु बहुत ही कम व्यक्ति उसे जानते थे.     वह लोहार सिर झुकाए अनवरत परिश्रम करता .उसकी दुकान के सामने से जुलूस जाते. सम्राट की सवारी जाती. फिर भी वह कभी सिर उठाकर किसी ओर नहीं देखता था. भाथी चलाता हुआ वह लोहार अपने काम में तन्मय रहता. उसके भारी घन की चोट से तपे हुए शुद्ध लोहे से चिंगारियों की फुलझड़ियाँ सी छूटा करतीं, जिन्हें वह बहुत ही पुलकित मन से देखा करता था. उसका सारा शरीर धूल और कालिख से भरा होता. काफी रात बीतने पर वह दुकान बंद करता और चुपचाप घर की राह लेता. नागरिक उस लोहार को गूंगा और बहरा कहा करते थे. किन्तु वह था कारीगर और कलाकार. उसके घन के नीचे पहुँचते ही वज्र से भी कठोर लोहा मोम की तरह मृदुल हो जाता. वह

बैल की बिक्री – सियारामशरण गुप्त

मोहन बरसों से ज्वालाप्रसाद का ऋण चुकाने की चेष्टा में था. परन्तु चेष्टा कभी सफल न होती थी. मोहन का ऋण दरिद्र के वंश की तरह दिन पर दिन बढ़ता ही जाता था. इधर कुछ दिनों से ज्वालाप्रसाद भी कुछ अधीर से हो उठे थे. रूपये अदा करने के लिए वह मोहन के यहाँ आदमी पर आदमी भेज रहे थे.समय की खराबी और महाजन की अधीरता के साथ मोहन को एक चिंता और थी. वह थी जवान लड़के शिबू की निश्चिन्तता. उसे घर के कामकाज से सरोकार न था.उस दिन कलेवा करके शिबू बाहर निकल रहा था. मोहन ने पीछे से कहा : 'लल्लू, आज मुझे एक जगह काम पर जाना है. बैल की सार साफ करके तुम उसे पानी पिला देना.'शिबू ने बाप की ओर मुड़कर कहा : 'मुझसे यह बेगार न होगी. मुझे भी एक जगह जाना है. वाहियात काम के लिए मुझे फुरसत नहीं.'मोहन झुंझला पड़ा. क्रुद्ध

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top