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चंद्रकांता संतति-भाग-2 (बयान-6 से 10)

बयान - 6 कुंअर इंद्रजीतसिंह अभी तक उस रमणीक स्थान में विराज रहे हैं। जी कितना ही बेचैन क्यों न हो मगर उन्हें लाचार माधवी के साथ दिन काटना ही पड़ता है। खैर जो होगा देखा जायगा मगर इस समय दो पहर दिन बाकी रहने पर भी कुंअर इंद्रजीतसिंह कमरे के अंदर सुनहले पावों की चारपाई पर आराम कर रहे हैं और एक लौंडी धीरे-धीरे पंखा झल रही है। हम ठीक नहीं कह सकते कि उन्हें नींद दबाये हुए है या जान-बूझकर हठियाये पड़े हैं और अपनी बदकिस्मती के जाल को सुलझाने की तरकीब सोच रहे हैं। खैर इन्हें इसी तरह पड़े रहने दीजिए और आप जरा तिलोत्तमा के कमरे में चलकर देखिए कि वह माधवी के साथ किस तरह की बातचीत कर रही है। माधवी का हंसता हुआ चेहरा कहे देता है कि बनिस्बत और दिनों के आज वह खुश है, मगर तिलोत्तमा के चेहरे से किसी तरह की खुशी

चंद्रकांता संतति-भाग-2 (बयान-1 से 5)

दूसरा भाग बयान-1 घंटा भर दिन बाकी है। किशोरी अपने उसी बाग में जिसका कुछ हाल पीछे लिख चुके हैं कमरे की छत पर सात-आठ सखियों के बीच में उदास तकिए के सहारे बैठी आसमान की तरफ देख रही है। सुगंधित हवा के झोंके उसे खुश किया चाहते हैं मगर वह अपनी धुन में ऐसी उलझी हुई है कि दीन-दुनिया की खबर नहीं है। आसमान पर पश्चिम की तरफ लालिमा छाई है। श्याम रंग के बादल ऊपर की तरफ उठ रहे हैं, जिनमें तरह-तरह की सूरतें बात की बात में पैदा होती और देखते-देखते बदलकर मिट जाती हैं। अभी यह बादल का टुकड़ा खंड पर्वत की तरह दिखाई देता था, अभी उसके ऊपर शेर की मूरत नजर आने लगी, लीजिए, शेर की गर्दन इतनी बढ़ी की साफ ऊंट की शक्ल बन गई और लमहे-भर में हाथी का रूप धर सूंड दिखाने लगी, उसी के पीछे हाथ में बंदूक लिए एक सिपाही की

चंद्रकांता संतति-भाग-1 (बयान-11 से 15)

बयान - 11 सूर्य भगवान अस्त होने के लिए जल्दी कर रहे हैं, शाम की ठंडी हवा अपनी चाल दिखा रही है। आसमान साफ है क्योंकि अभी-अभी पानी बरस चुका है और पछुआ हवा ने रुई के पहल की तरह जमे हुए बादलों को तूम-तूमकर उड़ा दिया है। अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा ने आसमान पर अपना दखल जमा लिया है और निकले हुए इंद्रधनुष पर की शोभा और उसके रंगदार जौहर को अच्छी तरह उभाड़ रखा है। बाग की रविशों पर जिन पर कुदरती भिश्ती अभी घंटा भर हुआ छिड़काव कर गया है, घूम-घूमकर देखने से धुले-धुलाये रंग-बिरंगे पत्तों की कैफियत और उन सफेद कलियों की बहार दिल और जिगर को क्या ही ताकत दे रही है जिनके एक तरफ का रंग तो असली मगर दूसरा हिस्सा अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा पड़ने से ठीक सुनहला हो रहा है। उस तरफ से आये हुए खुशबू के झपेटे कहे

चंद्रकांता संतति-भाग-1 (बयान-6 से 10)

बयान - 6 बहुत-सी तकलीफें उठाकर महाराज सुरेंद्रसिंह और वीरेंद्रसिंह तथा इन्हीं की बदौलत चंद्रकांता, चपला, चंपा, तेजसिंह और देवीसिंह वगैरह ने थोड़े दिन खूब सुख लूटा मगर अब वह जमाना न रहा। सच है, सुख और दुख का पहरा बदलता रहता है। खुशी के दिन बात की बात में निकल गये कुछ मालूम न पड़ा, यहां तक कि मुझे भी कोई बात उन लोगों की लिखने लायक न मिली, लेकिन अब उन लोगों से मुसीबत की घड़ी काटे नहीं कटती। कौन जानता था कि गया-गुजरा शिवदत्त फिर बला की तरह निकल आवेगा किसे खबर थी कि बेचारी चंद्रकांता की गोद से पले-पलाए दोनों होनहार लड़के यों अलग कर दिए जाएंगे कौन साफ कह सकता था कि इन लोगों की वंशावली और राज्य में जितनी तरक्की होगी, यकायक उतनी ही ज्यादे आफतें आ पड़ेंगी खैर खुशी के दिन तो उन्होंने काटे, अब मुसीबत की घड़ी कौन झेले हां बेचारे जगन्नाथ ज्योतिषी

घीसा – महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा के जन्मदिन पर विशेष  वर्तमान की कौन-सी अज्ञात प्रेरणा हमारे अतीत की किसी भूली हुई कथा को सम्पूर्ण मार्मिकता के साथ दोहरा जाती है, यह जान लेना सहज होता तो मैं भी आज गांव के उस मलिन सहमे नन्हे-से विद्यार्थी की सहसा याद आ जाने का कारण बता सकती, जो एक छोटी लहर के समान ही मेरे जीवन-तट को अपनी सारी आर्द्रता से छूकर अनन्त जलराशि में विलीन हो गया है। गंगा पार झूंसी के खंडहर और उसके आस-पास के गांवों के प्रति मेरा जैसा अकारण आकर्षण रहा है, उसे देखकर ही सम्भवत: लोग जन्म-जन्मान्तर के संबंध का व्यंग करने लगे हैं। है भी तो आश्चर्य की बात! जिस अवकाश के समय को लोग इष्ट-मित्रों से मिलने, उत्सवों में सम्मिलित होने तथा अन्य आमोद-प्रमोद के लिए सुरक्षित रखते हैं, उसी को मैं इस खंडहर और उसके क्षत-विक्षत चरणों पर पछाड़ें खाती हुई भागीरथी के तट पर काट ही नहीं, सुख

जाग तुझको दूर जाना – महादेवी वर्मा

आज महादेवी के जन्मदिन पर...... चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले! या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले; आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया जागकर विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले! पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना! जाग तुझको दूर जाना! बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले? पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले? विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन, क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस गीले? तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना! जाग तुझको दूर जाना! वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया, दे किसे जीवन-सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया! सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्या? विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया? अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना? जाग तुझको दूर जाना! कह न ठंढी साँस में

चंद्रकांता संतति-भाग-1 (बयान-1 से 5)

बयान - 1 नौगढ़ के राजा सुरेंद्रसिंह के लड़के वीरेंद्रसिंह की शादी विजयगढ़ के महाराज जयसिंह की लड़की चंद्रकांता के साथ हो गई। बारात वाले दिन तेजसिंह की आखिरी दिल्लगी के सबब चुनार के महाराज शिवदत्त को मशालची बनना पड़ा। बहुतों की यह राय हुई कि महाराज शिवदत्त का दिल अभी तक साफ नहीं हुआ इसलिए अब इनको कैद ही में रखना मुनासिब है मगर महाराज सुरेंद्रसिंह ने इस बात को नापसंद करके कहा, कि ''महाराज शिवदत्त को हम छोड़ चुके हैं, इस वक्त जो तेजसिंह से उनकी लड़ाई हो गई यह हमारे साथ वैर रखने का सबूत नहीं हो सकता। आखिर महाराज शिवदत्त क्षत्रिय हैं, जब तेजसिंह उनकी सूरत बना बेइज्जती करने पर उतारू हो गए तो यह देखकर भी वह कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? मैं यह भी नहीं कह सकता कि महाराज शिवदत्त का दिल हम लोगों की तरफ से बिल्कुल साफ हो गया क्योंकि उनका अगर दिल

पद्मावत रत्नसेन जन्म खंड

चित्रसेन चितउर गढ राजा । कै गढ कोट चित्र सम साजा ॥ तेहि कुल रतनसेन उजियारा । धनि जननी जनमा अस बारा ॥ पंडित गुनि सामुद्रिक देखा । देखि रूप औ लखन बिसेखा ॥ रतनसेन यह कुल-निरमरा । रतन-जोति मन माथे परा ॥ पदुम पदारथ लिखी सो जोरी । चाँद सुरुज जस होइ अँजोरी ॥ जस मालति कहँ भौंर वियोघी । तस ओहि लागि होइ यह जोगी । सिंघलदीप जाइ यह पावै । सिद्ध होइ चितउर लेइ आवै ॥ मोग भोज जस माना, विक्रम साका कीन्ह । परखि सो रतन पारखी सबै लखन लिखि दीन्ह ॥1॥   अर्थ:  चितौड़ का राजा चित्रसेन था, उसने अपने किले को विचित्र परकोटों से सुसज्जित किया था. रत्नसेन ने उसके यहाँ जन्म लेकर उसके कुल को प्रकाशित कर दिया. ऐसे बालक को जन्म देने वाली माता भी धन्य है. पंडितों, विद्वानों और ज्योतिषियों ने उसके रूप और लक्षणों को देख कर उसके भविष्य के बारे में बताया. उनके अनुसार, यह बालक निर्मल रत्न के

नींद उचट जाती है – नरेंद्र शर्मा

जब-तब नींद उचट जाती है पर क्‍या नींद उचट जाने से रात किसी की कट जाती है? देख-देख दु:स्‍वप्‍न भयंकर, चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर; पर भीतर के दु:स्‍वप्‍नों से अधिक भयावह है तम बाहर! आती नहीं उषा, बस केवल आने की आहट आती है! देख अँधेरा नयन दूखते, दुश्चिंता में प्राण सूखते! सन्‍नाटा गहरा हो जाता, जब-जब श्‍वन श्रृगाल भूँकते! भीत भवना, भोर सुनहली नयनों के न निकट लाती है! मन होता है फिर सो जाऊँ, गहरी निद्रा में खो जाऊँ; जब तक रात रहे धरती पर, चेतन से फिर जड़ हो जाऊँ! उस करवट अकुलाहट थी, पर नींद न इस करवट आती है! करवट नहीं बदलता है तम, मन उतावलेपन में अक्षम! जगते अपलक नयन बावले, थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम! साँस आस में अटकी, मन को आस रात भर भटकाती है! जागृति नहीं अनिद्रा मेंरी, नहीं गई भव-निशा अँधेरी! अंधकार केंद्रित धरती पर, देती रही ज्‍योति च‍कफेरी! अंतर्यानों के आगे से शिला न तम की हट पाती है!

चंद्रकांता -देवकीनंदन खत्री-अध्याय -4-आखिरी भाग ( सिद्धनाथ की चाल )

बयान - 13 खोह वाले तिलिस्म के अंदर बाग में कुँवर वीरेंद्रसिंह और योगी जी मे बातचीत होने लगी जिसे वनकन्या और इनके ऐयार बखूबी सुन रहे थे। कुमार - ‘पहले यह कहिए चंद्रकांता जीती है या मर गई?’ योगी – ‘राम-राम, चंद्रकांता को कोई मार सकता है? वह बहुत अच्छी तरह से इस दुनिया में मौजूद है।’ कुमार - ‘क्या उससे और मुझसे फिर मुलाकात होगी?’ योगी – ‘जरूर होगी।’ कुमार - ‘कब?’ योगी - (वनकन्या की तरफ इशारा करके) – ‘जब यह चाहेगी।’ इतना सुन कुमार वनकन्या की तरफ देखने लगे। इस वक्त उसकी अजीब हालत थी। बदन में घड़ी-घड़ी कँपकँपी हो रही थी, घबराई-सी नजर पड़ती थी। उसकी ऐसी गति देख कर एक दफा योगी ने अपनी कड़ी और तिरछी निगाह उस पर डाली, जिसे देखते ही वह सँभल गई। कुँवर वीरेंद्रसिंह ने भी इसे अच्छी तरह से देखा और फिर कहा - कुमार - ‘अगर आपकी कृपा होगी तो मैं चंद्रकांता से अवश्य मिल सकूँगा।’ योगी

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