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आज हृदय भर-भर आता है – शमशेर

आज हृदय भर-भर आता है,
सारा जीवन रुक-सा जाता;
वह आँखों में छाए जाते
कुछ भी देख नहीं मैं पाता !

कौन पाप हैं पूर्व-जन्म के,
जिनका मुझको फल मिलता है?
मैंने नगर जलाए होंगे,
जो मेरा सब तन जलता है !
पथ नदियों के मोड़े होंगे,
देश-देश तरसाया होगा,
विकल सहस्त्र मीन सा तब तो
यह पापी मन पाया होगा !
अनगिनती हृदयों की बस्ती,
मैंने, आह! उजाड़ी होंगी,
तब तो इतनी सूनी मेरे-
प्राणों की फुलवाड़ी होगी!

अपने लघु जीवन में कैसा
छवि का निर्दय स्वप्न बसाया,
जो सब कुछ हो स्वप्न गया है,
मुझे बनाकर अपनी छाया !
घेर-घेर लेती है मुझको
कैसी पतझर की सी आहें?
बरसे आंसू का धुँधलापन
रोक रहा है उर की राहें !

कितने करुणा के बादल हैं
मेरे काल-क्षितिज के बाहर,
जिनकी शीतल गति की छाया
कभी-कभी पड़ती है मुझपर !
उठता सुख से सिहर मरुस्थल
मेरे उर का- दो कण पाकर
उस सुषमा की छाँह-निमिष का;
जिस में अस्फुट-सा आशा-स्वर !
इस प्रकार कितनी आशाएँ .
छोड़ गयीं निज शांत प्रतिस्वर,
कितने प्रश्न हो गए उत्तर
मौनह्रदय में ही उठ- उठ कर !

आज न जाने किसको खोकर
धन्य हुए हैं प्राण-पुजारी,
रूकती है तम के चौखट पर
यह जीवन-आरती हमारी !
आदि सत्य के मौन कठिनतम,
सुन्दरता के ध्यान, रूप, लय !

चिर निर्ममता से ढक लो यह
मेरा चिर-आकर्षण का भय !
तुम पाषाण हुए हो सुन्दर !
युग युग तुमको शीश नवाएँ !
आगत के चिर आत्म समर्पण
मानव डर के दीप दिखाएँ

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