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असाध्य वीणा – जीवन के परम सत्य का उद्घाटन

असाध्य वीणा

असाध्य वीणा अज्ञेय की एक लम्बी कविता है, लेकिन जैसी चर्चा मुक्तिबोध (अंधेरे में, चांद का मुंह टेढ़ा है) और धूमिल (पटकथा) की लम्बी कविताओं को मिली, वैसी असाध्य वीणा को नहीं मिली. यद्यपि इसका प्रकाशन इनसे पूर्व (आंगन के पार द्वार-1961) हुआ था. इसका कारण कई आलोचक असाध्य वीणा के रहस्यवाद को मानते है.
असाध्य वीणा की मूलकथा बौध धर्म के एक सम्प्रदाय जेन या ध्यान संप्रदाय से ली गयी है. ताओवादियों के यहाँ भी इसकी कहानी मिलती है. यह ओकाकुरा काकुजो के The Book of Tea  में The Taming of the Harp के नाम से संकलित है. आरम्भिक बौद्ध धर्म भौतिकवादी है, परन्तु महायान जेन सम्प्रदाय तक आते-आते यह  काफी हद तक औपनिषदिक भाववाद के निकट पहुंच जाता है. महायान के विज्ञानवाद एवं शून्यवाद सम्प्रदाय भी क्रमशः विज्ञान और शून्य की परमता स्वीकारते हैं, जिनकी संकल्पना काफी हद तक  उपनिषदों के ब्रह्म जैसी है. वस्तुतः महायान बौद्ध धर्म के औपनिषदिक चिन्तन से इतनी निकटता के कारण ही शंकराचार्य को ‘‘प्रच्छन्न बौद्ध’’ होने का आरोप झेलना पड़ा था.
                जेन सम्प्रदाय यह मानता है कि सत्य का ज्ञान वस्तुतः आत्मज्ञान है. इसे बाह्य आडम्बरो और पुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता. अज्ञेय ने इसी जेन सम्प्रदाय की एक कथा को अपनी विचार प्रक्रिया के साथ मिलाकर असाध्यवीणा में प्रस्तुत किया है. यहाँ किरीटी तरू परम सत्य का ही प्रतीक है, जिससे निर्मित वीणा का संगीत उस सत्य की अभिव्यक्ति है. बहुत जाने-माने कलावंत और संगीतकार इस वीणा को बजाने में इसलिए निष्फल होते हैं, क्योंकि उनमें न सिर्फ उस परमसत्ता के प्रति समर्पण का अभाव था, बल्कि अपने कलावंत होने का अभिमान भी कूट-कूट कर भरा था. प्रियंवद कलावन्त नहीं है. वह स्वयं को साक्षी कहता है- जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी.
यह सत्य अनकहा है. वाणी की गति इस तक नहीं है . इस सत्य का सिर्फ साक्षी हुआ जा सकता है. यह सत्य सिर्फ अनुभूति का विषय है और इस अनुभूति के लिए आवश्यक है अहम् का पूर्ण परित्याग. अपने अहम् को गलाकर ही जीवन सत्य का अनुभव किया जा सकता है. प्रियंवद स्वयं को तरुतात की गोद में बैठा हुआ मोद भरा बालक मानता है-

वीणा यह मेरी गोद रखी है, रहे,
 किन्तु मैं ही तो तेरी गोदी बैठा मोद-भरा बालक हूं.

परम सत्य के प्रति समर्पण के बिना उससे एकाकार नहीं हुआ जा सकता. प्रियवंद समर्पित होकर किरीटी तरू में जैसे परकाया प्रवेश कर लेता है और जीवन सत्य के विभिन्न रूप उसके स्मृति पटल पर क्रमशः आने लगते है.

                हां मुझे स्मरण है……………

वीणा का बोलना उस परम सत्य की ही अभिव्यक्ति है.

जो शब्द हीन होकर भी सबमें गाता है

 परन्तु, इस सत्य का प्रभाव सब पर एक नहीं होता- जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी.
राजसभा में उपस्थित सभी व्यक्तियों ने अपनी-अपनी समझ समझ सोच और संस्कार के अनुसार इस सत्य को ग्रहण किया. कवि ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से उदाहरण देकर इस सत्ता के प्रभाव को व्यक्त किया है-

बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सौंधी खुदबुद

                अज्ञेय की काव्य यात्रा की सबसे बड़ी चिन्ता रही है, सर्जना प्रक्रिया या रचना प्रक्रिया. आज तुम शब्द न दो, नया कवि आत्म स्वीकार जैसी कई कवितायें सर्जना प्रक्रिया के रहस्य को उद्घाटित करने की कोशिश करती हैं. अनुभूति की अनिर्वचनीयता एक रचनाकार की सबसे बड़ी समस्या और सीमा है. अज्ञेय जीवन भर इस समस्या से जूझते रहे-

                कवि ने गीत लिखे ये बार-बार
                उसी एक विषय को देता रहा विस्तार
                जिसे कभी पूरा पकड़ पाया नहीं.
      यदि किसी गीत में वह अट दिखाता तो वह दूसरा गीत ही क्यों लिखता.

असाध्य वीणा को भी अज्ञेय के सर्जना प्रक्रिया सम्बन्धी चिन्तन से जोड़ा जा सकता है. सर्जना भी वस्तुतः जीवन सत्य की ही अभिव्यक्ति है. सर्जना के लिए अहम् का परितत्याग उसी तरह जरूरी है, जिस तरह ब्रह्म की प्राप्ति के लिए. वस्तुतः सर्जना आत्मविस्मृति के क्षणों में होती है. कवि अपने अहम् को उद्दीप्त करके कविता नहीं रच सकता. प्लेटो ने एक दूसरे सन्दर्भ मे कहा है कि काव्य रचना के समय कवि एक दैवीय आवेग मे होता है. कहने का मतलब यह है कि रचना के समय कवि अपने आप में नहीं होता. यह बात प्लेटो ने कविता को हेय बताने के लिए नकारात्मक सन्दर्भ में कही थी, परन्तु इस तथ्य की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता. सर्जक होने का दम्भ श्रेष्ठ सर्जना नहीं करवा सकता-

                कौन प्रियवंद है कि दम्भ कर इस अभिमंत्रित कारूवादय के सम्मुख आवे.

रचना निसंदेह सर्जक की सर्जना होती है लेकिन साथ-साथ यह रचना ही सर्जक का निर्माण भी करती है-

                लोग तो लागी हैं कवित बनावत
                मोहि तो मेरे कवि बनावत. (घनानन्द) 

वीणा भले ही प्रियवंद के गोद में रखी है पर वह स्वयं को तरूतात की गोद का बालक मानता है किन्तु जैसे वीणा से संगीत उत्पन्न होता है, वीणा संगीतकार के सामने शिशु के रूप में सामने आती है- 

वीणा को धीरे से नीचे रख, ढँक- मानो गोदी में सोये शिशु को डाल कर मुग्धा माँ हट जाय, दीठ से दुलराती



इस प्रकार रचना एक साथ सर्जक की सर्जना भी है और उसका सर्जन भी करती है.

                कविता में जीवन के विभिन्न सुन्दर और असुन्दर पक्षों के चित्रों की एक बिम्बमाला सी आती है. अज्ञेय अनुभूति को अत्यधिक महत्व देते है. उनकी दृष्टि में जीवनानुभूति और बौद्धिकता के संश्लेष से ही कविता होती है. जीवन के ये विभिन्न चित्र विविध अनुभूतियों को ही प्रतिबिम्बित करते है. ये अनुभूतियां ही अंततः काव्य में ढलती हैं.

मौन भी अभिव्यंजना है
जितना तुम्हारा सच है, उतना कहो,
 तुम व्याप नहीं सकते,
 तुममें जो व्यापा है उसे ही निबाहो.

                इस प्रकार अज्ञेय की दृष्टि में अहम् का विगलन और अनुभूति की प्रामाणिकता- सर्जना के दो अहम् तत्व हैं. उनकी नजर में सर्जना अपने सर्जक से स्वतंत्र होती है-

श्रेय नहीं कुछ मेरा मैं तो डूब गया स्वयं शून्य में

                स्वातंत्र्य से उत्पन्न यह सर्जना प्रभाव में भी स्वतंत्रतादायी होती है. राजसभा में संगीत सुनने वालों ने अपनी अपनी रुचि के अनुसार अर्थ ग्रहण किया. यह प्रभाव की स्वतंत्रता का ही परिचायक है.

                इस प्रकार असाध्यवीणा एक साथ न सिर्फ जीवन के परम् सत्य की खोज करती है, बल्कि रचना प्रक्रिया के विभिन्न चरणों को भी उद्घाटित करती है. 
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One thought on “असाध्य वीणा – जीवन के परम सत्य का उद्घाटन

  1. हिंदी साहितय के इतिहास में बहुत बडा योगदान है |

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