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बंदरलाल की ससुराल – प्रकाश मनु

एक दिन सूट पहनकर बढ़ियाभोलू बंदरलाल,शोर मचाते धूमधाम सेपहुँच गए ससुराल।गाना गाया खूब मजे सेऔर उड़ाए भल्ले,लार टपक ही पड़ी, प्लेट मेंदेखे जब रसगुल्ले।खूब दनादन खाना खायानही रहा कुछ होश,आखिर थोड़ी देर बाद हीगिरे, हुए बेहोश।फौरन डॉक्टर बुलवायाबस, तभी होश में आए,नहीं कभी इतना खाऊँगा-कहकर वे शरमाए!

अक्कड़ मक्कड़ -भवानीप्रसाद मिश्र

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,एक साथ एक बाट से लौटे।बात-बात में बात ठन गयी,बांह उठीं और मूछें तन गयीं।इसने उसकी गर्दन भींची,उसने इसकी दाढी खींची।अब वह जीता, अब यह जीता;दोनों का बढ चला फ़जीता;लोग तमाशाई जो ठहरे सबके खिले हुए थे चेहरे!मगर एक कोई था फक्कड़,मन का राजा कर्रा - कक्कड़;बढा भीड़ को चीर-चार करबोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर।अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,सही बात पर झुकना पड़ा!उसने कहा सधी वाणी में,डूबो चुल्लू भर पानी में;ताकत लड़ने में मत खोओचलो भाई चारे को बोओ!खाली सब मैदान पड़ा है,आफ़त का शैतान खड़ा है,ताकत ऐसे ही मत खोओ,चलो भाई चारे को बोओ।सुनी मूर्खों ने जब यह वाणीदोनों जैसे पानी-पानीलड़ना छोड़ा अलग हट गएलोग शर्म से गले छट गए।सबकों नाहक लड़ना अखराताकत भूल गई तब नखरागले मिले तब अक्कड़-बक्कड़खत्म हो गया तब धूल में धक्कड़अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़दोनों मूरख, दोनों

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