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पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड पंचम पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

निति गढ बाँचि चलै ससि सूरू । नाहिं त होइ बाजि रथ चूरू ॥ पौरी नवौ बज्र कै साजी । सहस सहस तहँ बैठे पाजी ॥ फिरहिं पाँच कोतवार सुभौंरी । काँपै पावैं चपत वह पौरी ॥ पौरहि पौरि सिंह गढि काढे । डरपहिं लोग देखि तहँ ठाढे ॥ बहुबिधान वै नाहर गढे । जनु गाजहिं, चाहहिं सिर चढे ॥ टारहिं पूँछ, पसारहिं जीहा । कुंजर डरहिं कि गुंजरि लीहा ॥ कनक सिला गढि सीढी लाई । जगमगाहि गढ ऊपर ताइ ॥ नवौं खंड नव पौरी , औ तहँ बज्र-केवार । चारि बसेरे सौं चढै, सत सौं उतरे पार ॥17॥  अर्थ: किला  इतना ऊँचा है कि सूर्य और चन्द्रमा रोज इससे बचके निकलते हैं, अन्यथा उनके रथ इससे टकराकर चूर हो जायेंगे. इसके नौ द्वार वज्र के समान कठोर हैं. इन दरवाजों पर हजारों सैनिक रक्षा के लिए तैनात हैं. पांच कोतवाल इन द्वारों के चक्कर लगाते हैं. इसी कारण इन द्वारों को पार करते समय भय से पैर

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-चतुर्थ पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

पुनि देखी सिंघल फै हाटा । नवो निद्धि लछिमी सब बाटा ॥ कनक हाट सब कुहकुहँ लीपी । बैठ महाजन सिंघलदीपी ॥ रचहिं हथौडा रूपन ढारी । चित्र कटाव अनेक सवारी ॥ सोन रूप भल भयऊ पसारा । धवल सिरीं पोतहिं घर बारा ॥ रतन पदारथ मानिक मोती । हीरा लाल सो अनबन जोती ॥ औ कपूर बेना कस्तूरी । चंदन अगर रहा भरपूरी ॥ जिन्ह एहि हाट न लीन्ह बेसाहा । ता कहँ आन हाट कित लाहा ?॥ कोई करै बेसाहिनी, काहू केर बिकाइ । कोई चलै लाभ सन, कोई मूर गवाइ ॥13॥ अर्थ: इसके पश्चात सिंहलद्वीप के बाजार दिखते हैं, जहाँ हर रास्ते पर नव निधियाँ* और लक्ष्मी (धन) बिखरी पड़ी हैं. सर्राफा बाजार की दुकानें कुमकुम से लिपी हुई हैं,जहाँ सिंहलद्वीप के महाजन बैठे हुए हैं. ये चांदी को ढालकर कड़े बनाते हैं जो नाना प्रकार के चित्रों से सुसज्जित हैं. सोने-चांदी हर ओर बिखरे पड़े हैं. घर द्वार सफ़ेद रोली से पुते हुए हैं. हर ओर

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-तृतीय पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

ताल तलाव बरनि नहिं जाहीं । सूझै वार पार किछु नाहीं ॥ फूले कुमुद सेत उजियारे । मानहुँ उए गगन महँ तारे ॥ उतरहिं मेघ चढहि लेइ पानी चमकहिं मच्छ बीजु कै बानी ॥ पौंरहि पंख सुसंगहिं संगा । सेत पीत राते बहु रंगा ॥ चकई चकवा केलि कराहीं । निसि के बिछोह, दिनहिं मिलि जाहीं ॥ कुररहिं सारस करहिं हुलासा । जीवन मरन सो एकहिं पासा ॥ बोलहिं सोन ढेक बगलेदी । रही अबोल मीन जल-भेदी ॥ नग अमोल तेहि तालहिं दिनहिं बरहिं जस दीप । जो मरजिया होइ तहँ सो पावै वह सीप ॥9॥ अर्थ: सिंहलद्वीप के ताल-तलैयों का वर्णन नहीं किया जा सकता ,क्योंकि उनकी संख्या का ही कोई ओर-छोर नहीं है. कमल के सफ़ेद फूलों के खिलने से चारों ओर उजाला छा गया है. तालाब में खिले कमल के फूल  ऐसे लग रहे हैं जैसे आकाश में तारे उग आये हैं. बादल आकाश से नीचे उतरते हैं और जल भरकर ऊपर चले जाते हैं. तालाब

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-द्वितीय पृष्ठ (मानसरोवर)-मलिक मुहम्मद जायसी

बसहिं पंखि बोलहिं बहु भाखा । करहिं हुलास देखि कै साखा ॥ भोर होत बोलहिं चुहुचूही । बोलहिं पाँडुक "एकै तूही"" ॥ सारौं सुआ जो रहचह करही । गिरहिं परेवा औ करबरहीं ॥ "पीव पीव"कर लाग पपीहा । "तुही तुही" कर गडुरी जीहा ॥ `कुहू कुहू' करि कोइल राखा । औ भिंगराज बोल बहु भाखा ॥ `दही दही' करि महरि पुकारा । हारिल बिनवै आपन हारा ॥ कुहुकहिं मोर सोहावन लागा । होइ कुराहर बोलहि कागा ॥ जावत पंखी जगत के भरि बैठे अमराउँ । आपनि आपनि भाषा लेहिं दई कर नाउँ ॥5॥ अर्थ: सिंहल द्वीप के बागों में विविध भाषा बोलने वाले पक्षी बसे हुए हैं, जो फलों से लदी डालियों को देख कर अपनी ख़ुशी व्यक्त करते हैं. प्रभात होते ही चुहचुही बोलने लगती है. पंडुक पक्षी भी उनके मुकाबले में बोलना प्रारंभ कर देते हैं. तोता और मैना चहचहाते हैं. लोटन कबूतर जमीन तक गिरते हुए आते हैं और गुटरगूं करते हैं. पपीहा पक्षी पिउ-पिउ की

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-प्रथम पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

सिंघलदीप कथा अब गावौं । औ सो पदुमिनी बरनि सुनावौं ॥ बरन क दरपन भाँति बिसेखा । जौ जेहि रूप सो तैसई देखा ॥ धनि सो दीप जहँ दीपक-बारी । औ पदमिनि जो दई सँवारी ॥ सात दीप बरनै सब लोगू । एकौ दीप न ओहि सरि जोगू ॥ दियादीप नहिं तस उँजियारा । सरनदीप सर होइ न पारा ॥ जंबूदीप कहौं तस नाहीं । लंकदीप सरि पूज न छाहीं ॥ दीप कुसस्थल आरन परा । दीप महुस्थल मानुस-हरा ॥ सब संसार परथमैं आए सातौं दीप । एक दीप नहिं उत्तिम सिंघलदीप समीप ॥1॥ अर्थ: अब मैं सिंहलद्वीप की कथा सुनाता हूँ और पद्मिनी का वर्णन करता हूँ. यह वर्णन दर्पण की तरह जिसमें हर व्यक्ति वैसा ही देखेगा ,जैसा उसका रूप है. अर्थात् हर व्यक्ति अपने स्वभावानुसार इसका आस्वादन करेगा. वह द्वीप धन्य है, जहाँ ईश्वर ने सौन्दर्य के दीपक के समान प्रकाश बिखेरने वाली पद्मिनी को जन्म दिया है. सभी लोग सात द्वीपों का वर्णन करते हैं,लेकिन

राम की शक्तिपूजा -निराला

रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमररह गया राम-रावण का अपराजेय समरआज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,प्रतिपल - परिवर्तित - व्यूह - भेद कौशल समूहराक्षस - विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध - कपि विषम हूह,विच्छुरित वह्नि - राजीवनयन - हतलक्ष्य - बाण,लोहितलोचन - रावण मदमोचन - महीयान,राघव-लाघव - रावण - वारण - गत - युग्म - प्रहर,उद्धत - लंकापति मर्दित - कपि - दल-बल - विस्तर,अनिमेष - राम-विश्वजिद्दिव्य - शर - भंग - भाव,विद्धांग-बद्ध - कोदण्ड - मुष्टि - खर - रुधिर - स्राव,रावण - प्रहार - दुर्वार - विकल वानर - दल - बल,मुर्छित - सुग्रीवांगद - भीषण - गवाक्ष - गय - नल,वारित - सौमित्र - भल्लपति - अगणित - मल्ल - रोध,गर्ज्जित - प्रलयाब्धि - क्षुब्ध हनुमत् - केवल प्रबोध,उद्गीरित - वह्नि - भीम - पर्वत - कपि चतुःप्रहर,जानकी - भीरू - उर - आशा भर - रावण सम्वर।लौटे युग - दल - राक्षस - पदतल पृथ्वी

बसंती हवा – केदारनाथ अग्रवाल

हवा हूँ, हवा मैंबसंती हवा हूँ।        सुनो बात मेरी -        अनोखी हवा हूँ।        बड़ी बावली हूँ,        बड़ी मस्तमौला।        नहीं कुछ फिकर है,        बड़ी ही निडर हूँ।        जिधर चाहती हूँ,        उधर घूमती हूँ,        मुसाफिर अजब हूँ।न घर-बार मेरा,न उद्देश्य मेरा,न इच्छा किसी की,न आशा किसी की,न प्रेमी न दुश्मन,जिधर चाहती हूँउधर घूमती हूँ।हवा हूँ, हवा मैंबसंती हवा हूँ!        जहाँ से चली मैं        जहाँ को गई मैं -        शहर, गाँव, बस्ती,        नदी, रेत, निर्जन,        हरे खेत, पोखर,        झुलाती चली मैं।        झुमाती चली मैं!        हवा हूँ, हवा मै        बसंती हवा हूँ।चढ़ी पेड़ महुआ,थपाथप मचाया;गिरी धम्म से फिर,चढ़ी आम ऊपर,उसे भी झकोरा,किया कान में 'कू',उतरकर भगी मैं,हरे खेत पहुँची -वहाँ, गेंहुँओं मेंलहर खूब मारी।        पहर दो पहर क्या,        अनेकों पहर तक        इसी में रही मैं!        खड़ी देख अलसी        लिए शीश कलसी,        मुझे खूब सूझी -        हिलाया-झुलाया        गिरी पर न कलसी!        इसी हार को पा,        हिलाई न सरसों,        झुलाई न सरसों,        हवा हूँ, हवा मैं       

सतपुड़ा के घने जंगल – भवानी प्रसाद मिश्र

सतपुड़ा के घने जंगल।        नींद मे डूबे हुए से        ऊँघते अनमने जंगल।झाड ऊँचे और नीचे,चुप खड़े हैं आँख मीचे,घास चुप है, कास चुप हैमूक शाल, पलाश चुप है।बन सके तो धँसो इनमें,धँस न पाती हवा जिनमें,सतपुड़ा के घने जंगलऊँघते अनमने जंगल।                सड़े पत्ते, गले पत्ते,                हरे पत्ते, जले पत्ते,                वन्य पथ को ढँक रहे-से                पंक-दल मे पले पत्ते।                चलो इन पर चल सको तो,                दलो इनको दल सको तो,                ये घिनोने, घने जंगल                नींद मे डूबे हुए से                ऊँघते अनमने जंगल।अटपटी-उलझी लताऐं,डालियों को खींच खाऐं,पैर को पकड़ें अचानक,प्राण को कस लें कपाऐं।सांप सी काली लताऐंबला की पाली लताऐंलताओं के बने जंगलनींद मे डूबे हुए सेऊँघते अनमने जंगल।                मकड़ियों के जाल मुँह पर,                और सर के बाल मुँह पर                मच्छरों के दंश वाले,                दाग काले-लाल मुँह पर,                वात- झन्झा वहन करते,                चलो इतना सहन करते,                कष्ट से ये सने जंगल,                नींद मे डूबे हुए से                ऊँघते अनमने जंगल|अजगरों से भरे जंगल।अगम, गति से परे जंगलसात-सात पहाड़ वाले,बड़े छोटे झाड़ वाले,शेर वाले बाघ वाले,गरज और दहाड़ वाले,कम्प से कनकने जंगल,नींद मे डूबे

परिचय की गाँठ – त्रिलोचन

आज कवि त्रिलोचन का जन्मदिन है. हिंदी प्रगतिशील काव्यधारा को स्थापित करने वाले कवियों में त्रिलोचन का नाम महत्वपूर्ण है .यूं ही कुछ मुस्काकर तुमनेपरिचय की वो गांठ लगा दी!था पथ पर मैं भूला भूला फूल उपेक्षित कोई फूला जाने कौन लहर ती उस दिन तुमने अपनी याद जगा दी। कभी कभी यूं हो जाता है गीत कहीं कोई गाता है गूंज किसी उर में उठती है तुमने वही धार उमगा दी। जड़ता है जीवन की पीड़ा निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ातुमने अन्जाने वह पीड़ा छवि के शर से दूर भगा दी।

कुकुरमुत्ता- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

एक थे नव्वाब,फ़ारस से मंगाए थे गुलाब।बड़ी बाड़ी में लगाएदेशी पौधे भी उगाएरखे माली, कई नौकरगजनवी का बाग मनहरलग रहा था।एक सपना जग रहा थासांस पर तहजबी की,गोद पर तरतीब की।क्यारियां सुन्दर बनीचमन में फैली घनी।फूलों के पौधे वहाँलग रहे थे खुशनुमा।बेला, गुलशब्बो, चमेली, कामिनी,जूही, नरगिस, रातरानी, कमलिनी,चम्पा, गुलमेंहदी, गुलखैरू, गुलअब्बास,गेंदा, गुलदाऊदी, निवाड़, गन्धराज,और किरने फ़ूल, फ़व्वारे कई,रंग अनेकों-सुर्ख, धनी, चम्पई,आसमानी, सब्ज, फ़िरोज सफ़ेद,जर्द, बादामी, बसन्त, सभी भेद।फ़लों के भी पेड़ थे,आम, लीची, सन्तरे और फ़ालसे।चटकती कलियां, निकलती मृदुल गन्ध,लगे लगकर हवा चलती मन्द-मन्द,चहकती बुलबुल, मचलती टहनियां,बाग चिड़ियों का बना था आशियाँ।साफ़ राह, सरा दानों ओर,दूर तक फैले हुए कुल छोर,बीच में आरामगाहदे रही थी बड़प्पन की थाह।कहीं झरने, कहीं छोटी-सी पहाड़ी,कही सुथरा चमन, नकली कहीं झाड़ी।आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्तापहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-“अब, सुन बे, गुलाब,भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब,खून चूसा खाद का तूने

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