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अंतरिक्ष में भस्मासुर – जयंत नार्लीकर

सवेरे का नाश्ता समाप्त करके दिलीप ने घड़ी की ओर देखा- सात बजकर अड़तालीस मिनट हो चुके थे. यानी सुबह की डाक आने में बारह मिनट बचे थे.   आज डाक की प्रतीक्षा दिलीप कुछ अधिक उत्सुकता के साथ कर रहा था, क्योंकि उसमें 'पराग' का वह अंक आने वाला था, जिसमें उसका सनसनीखेज लेख छपा था. लेख का शीर्षक था ‘अंतरिक्ष निवास के संभावित खतरे’. इस लेख के प्रकाशन के बारे में दिलीप के, पराग के संपादक के साथ, बहुत वाद-विवाद हो चुके थे. दिलीप के लेख का पहला मसविदा इतना भड़काने वाला था कि संपादक महोदय उसे उस रूप में छापने को तैयार नहीं थे और दिलीप लेख की काट-छांट करने में राजी नहीं था. आखिर दोनों ओर से कुछ रियायतें दी गयीं और लेख का अंतिम स्वरूप निश्चित हो सका. ऐसी सनसनीखेज बातें क्या थीं, जिन्हें प्रकाशित करने के बारे में ‘पराग’ के सम्पादक सतर्कता का रवैया अपनाना

अंतरिक्ष के पार भी –डॉ. हरिकृष्ण देवसरे

डॉ. लोबो ने आज खासतौर पर छुट्टी ली थी क्योंकि उनका चौदह वर्षीय बेटा पीटरोविच अंतर्ग्रहीय यात्राओं का कोर्स पूरा करके वापस चंद्रलोक पर आ रहा था. पीटरोविच ने ‘अंतर्ग्रहीय समझौते’ के अंतर्गत पृथ्वी के अलावा बृहस्पति और मंगल गृह पर भी प्रशिक्षण प्राप्त किया था.“कैसी रही तुम्हारी ट्रेनिंग?” डॉ. लोबो ने पीटरोविच से मिलते ही पहला सवाल यही किया था.“अच्छी रही...बहुत अच्छी.” पीटरोविच ने कहा था “लेकिन डैड! आज आप काम पर नहीं गए ?”“आज तुमसे जो मिलना था ! वैसे कल ही तो लौटा हूँ --- मंगल ग्रह से, और कल ही शनिग्रह जाना होगा. शायद तुम्हे मालूम नहीं कि मंगल ग्रह और शनि ग्रह में फिर तनाव बढ़ गया है!” “आपके साथ मैं भी चलूँगा ...”“तुम तो अभी बच्चे हो....” डॉ. लोबो ने कहा.यह सुनते ही पीटरोविच ने जोर का ठहाका लगाया , “ क्या डैडी ! आपने भी बीसवीं शताब्दी वाली घिसीपिटी बात कह दी! मैं चौदह

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