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दुविधा

दुविधा

प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा की कहानी दुविधा पर हिन्दी में दो फ़िल्में बनी हैं. 1973 में मणि कौल ने दुविधा के नाम से ही पहली फिल्म बनाई ,जिसे वर्ष 1974 का Filmfare Critics Award for Best Movie भी प्राप्त हुआ. मणि कौल को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. मलयालम फिल्मों के अभिनेता रवि मेनन और रईसा पद्मसी (प्रख्यात चित्रकार अकबर पद्मसी की पुत्री ) ने इस फिल्म में केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाई थीं. 2005 में अमोल पालेकर ने दुविधा का रीमेक पहेली के नाम से बनाया, जिसमें शाहरुख़ खान और रानी मुखर्जी ने केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाईं. एक धनी सेठ था. उसके इकलौते बेटे की बरात धूमधाम से शादी सम्पन्न कर वापस लौटते हुए जंगल में विश्राम करने के लिए रुकी. घनी खेजड़ी की ठण्डी छाया. सामने हिलोरें भरता तालाब. कमल के फूलों से आच्छादित निर्मल पानी. सूरज सर पर चढ़ने लगा था. जेठ की तेज चलती

बस की यात्रा -हरिशंकर परसाई

हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें।पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घण्टे भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है।सुबह घर पहुँच जाएँगे।हम में से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना जरूरी था।लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते।क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं?नहीं,बस डाकिन है। बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी।खूब वयोवृद्ध थी।सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी।लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा।यह बस पूजा के योग्य थी।उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!   बस-कंपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे।हमने उनसे पूछा-"यह बस चलती भी है?" वह बोले-"चलती क्यों नहीं है जी!अभी चलेगी।"  हमने कहा-"वही तो हम देखना चाहते हैं।अपने आप चलती है यह? हाँ

वापसी -उषा प्रियंवदा

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई - दो बक्स, डोलची, बाल्टी। ''यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?'' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ''घरवाली ने साथ में कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।'' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।''कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।'' गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधता हुआ बोला।''कभी कुछ ज़रूरत हो तो लिखना गनेशी, इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।''गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखे पोछी, ''अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा। आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।''गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्वार्टर का

सयानी बुआ -मन्नू भंडारी

सब पर मानो बुआजी का व्यक्तित्व हावी है। सारा काम वहाँ इतनी व्यवस्था से होता जैसे सब मशीनें हों, जो कायदे में बँधीं, बिना रुकावट अपना काम किए चली जा रही हैं। ठीक पाँच बजे सब लोग उठ जाते, फिर एक घंटा बाहर मैदान में टहलना होता, उसके बाद चाय-दूध होता।उसके बाद अन्नू को पढने के लिए बैठना होता। भाई साहब भी तब अखबार और ऑफिस की फाइलें आदि देखा करते। नौ बजते ही नहाना शुरू होता। जो कपडे बुआजी निकाल दें, वही पहनने होते। फिर कायदे से आकर मेज पर बैठ जाओ और खाकर काम पर जाओ।सयानी बुआ का नाम वास्तव में ही सयानी था या उनके सयानेपन को देखकर लोग उन्हें सयानी कहने लगे थे, सो तो मैं आज भी नहीं जानती, पर इतना अवश्य कँगी कि जिसने भी उनका यह नाम रखा, वह नामकरण विद्या का अवश्य पारखी रहा होगा।बचपन में ही वे समय की जितनी पाबंद

दोस्त कहूं या दुश्मन? – भीष्म साहनी

हरभगवान मेरा पुराना दोस्त है. अब तो बड़ी उम्र का है, बड़ी-बड़ी मूंछें हैं, तोंद हैं. जब सोता है तो लंबी तानकर और जब खाता है, तो आगा-पीछा नहीं देखता. बड़ी बेपरवाह तबियत का आदमी है, हालांकि उसकी कुछ आदतें मुझे कतई पसंद नहीं. पान का बीड़ा हर वक्त मुँह में रखता है और कभी छुट्टी पर कहीं जा, तो सारा वक्त ताश खेलता रहता है. न सैर को जाता है, न व्यायाम करता है, यों बड़ा हंसमुख है, किसी बात का बुरा नहीं मानता. हमेशा दोस्तों की मदद करता है.    पर एक दिन उसने मेरे साथ बड़ी अजीब हरकत की.     शिमला में एक सम्मेलन होने वाला था. हम लोग उसमें भाग लेने के लिए गए. हरभगवान भी अपनी मूंछों समेत, तोंद सहलाता वहां पहुँच गया. और भी कुछ लोग वहां पहुंचे. ये सब लोग एक दिन पहले पहुँच गए, मैं किसी कारणवश दूसरे दिन पहुँच पाया. जब मैं

मुसीबत है बड़ा भाई होना- शांति मेहरोत्रा

बड़ा भाई होना कितनी बड़ी मुसीबत है, इसे वे ही समझ सकते हैं, जो सीधे दिखाई पड़ने वाले चालाक छोटे भाई-बहनों के जाल में फंसकर आये दिन उनकी शरारतों के लिए मेरी तरह खुद ही डांट खाते नजर आते हैं. घर में जिसे देखो वही दो-चार उपदेश दे जाता है और दो-चार काम सौंप जाता है. चाचाजी को फ़ौरन पानी चाहिए, चाचीजी को ऊपर के कमरे से ब्रुश मंगवाना है. पिताजी के मेहमानों के लिए भाग कर चौराहे से पान लाने हैं. छोटे भाई ने सुबह से जलेबी के लिए रट लगा रखी है. फिर मुझे भी अपने कपड़ों पर इस्तिरी करनी है, बस्ता लगाना है, जूते पॉलिश करने हैं और पौने नौ बजे स्कूल के लिए रवाना हो जाना है. यों हूँ तो मैं भी अभी छठी क्लास में ही, लेकिन तीन भाइयों में सबसे बड़ा होने के नाते सुबह से शाम तक चकरघिन्नी की तरह नाचता रहता हूँ.          

पहलवान की ढोलक – फणीश्वरनाथ रेणु

जाड़े का दिन . अमावस्या की रात – ठंढी और काली . मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव भयार्त शिशु की तरह थर-थर कांप रहा था. पुरानी और उजड़ी बांस-फूस की झोंपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य ! अँधेरा और निस्तब्धता !अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी. निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने ह्रदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी. आकाश में तारे चमक रहे थे. पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं . आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी. अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे.       सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी . गाँव की झोंपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज़ , ‘हे राम! हे भगवान!’ की टेर

जहाँ लक्ष्मी कैद है – राजेन्द्र यादव

ज़रा ठहरिए, यह कहानी विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के बारे में नहीं, लक्ष्मी नाम की एक ऐसी लड़की के बारे में है जो अपनी कैद से छूटना चाहती है. इन दो नामों में ऐसा भ्रम होना स्वाभाविक है जैसाकि कुछ क्षण के लिए गोविन्द को हो गया था.एकदम घबराकर जब गोविन्द की आँखें खुलीं तो वह पसीने से तर था और उसका दिल इतने ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा, कहीं अचानक उसका धड़कना बन्द न हो जाये. अँधेरे में उसने पाँच-छ: बार पलकें झपकाई, पहली बार तो उसकी समझ में ही न आया कि वह कहाँ है, कैसा है—एकदम दिशा और स्थान का ज्ञान उसे भूल गया. पास के हॉल की घड़ी ने एक का घंटा बजाया तो उसकी समझ में ही न आया कि वह घड़ी कहाँ है,वह स्वयं कहाँ है और घंटा कहाँ बज रहा है. फिर धीरे-धीरे उसे ध्यान आया, उसने ज़ार से अपने

एक प्लेट सैलाब -मन्नू भंडारी

मई की साँझ!साढ़े छह बजे हैं। कुछ देर पहले जो धूप चारों ओर फैली पड़ी थी, अब फीकी पड़कर इमारतों की छतों पर सिमटकर आयी है, मानो निरन्तर समाप्त होते अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उसने कसकर कगारों को पकड़ लिया हो।आग बरसाती हुई हवा धूप और पसीने की बदबू से बहुत बोझिल हो आयी है। पाँच बजे तक जितने भी लोग ऑफि़स की बड़ी-बड़ी इमारतों में बन्द थे, इस समय बरसाती नदी की तरह सड़कों पर फैल गये हैं। रीगल के सामनेवाले फुटपाथ पर चलनेवालों और हॉकर्स का मिला-जुला शोर चारों और गूँज रहा हैं गजरे बेचनेवालों के पास से गुज़रने पर सुगन्ध भरी तरावट का अहसास होता है, इसीलिए न ख़रीदने पर भी लोगों को उनके पास खड़ा होना या उनके पास से गुज़रना अच्छा लगता है।टी-हाउस भरा हुआ है। उसका अपना ही शोर काफ़ी है, फिर बाहर का सारा शोर-शराबा बिना किसी रुकावट के खुले

परमात्मा का कुत्ता – मोहन राकेश

बहुत-से लोग यहाँ-वहाँ सिर लटकाए बैठे थे जैसे किसी का मातम करने आए हों। कुछ लोग अपनी पोटलियाँ खोलकर खाना खा रहे थे। दो-एक व्यक्ति पगडिय़ाँ सिर के नीचे रखकर कम्पाउंड के बाहर सडक़ के किनारे बिखर गये थे। छोले-कुलचे वाले का रोज़गार गरम था, और कमेटी के नल के पास एक छोटा-मोटा क्यू लगा था। नल के पास कुर्सी डालकर बैठा अर्ज़ीनवीस धड़ाधड़ अर्ज़ियाँ टाइप कर रहा था। उसके माथे से बहकर पसीना उसके होंठों पर आ रहा था, लेकिन उसे पोंछने की फुरसत नहीं थी। सफ़ेद दाढिय़ों वाले दो-तीन लम्बे-ऊँचे जाट, अपनी लाठियों पर झुके हुए, उसके खाली होने का इन्तज़ार कर रहे थे। धूप से बचने के लिए अर्ज़ीनवीस ने जो टाट का परदा लगा रखा था, वह हवा से उड़ा जा रहा था। थोड़ी दूर मोढ़े पर बैठा उसका लडक़ा अँग्रेज़ी प्राइमर को रट्‌टा लगा रहा था—सी ए टी कैट—कैट माने बिल्ली; बी ए टी बैट—बैट

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