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कविता क्या है – रामचंद्र शुक्ल

कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है। राग से यहां अभिप्राय प्रवृत्ति और निवृत्ति के मूल में रहनेवाली अंत:करणवृत्ति से है। जिस प्रकार निश्चय के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार प्रवृत्ति या निवृत्ति के लिए भी कुछ विषयों का वाह्य या मानस प्रत्यक्ष अपेक्षित होता है। यही हमारे रागों या मनोवेगों के-जिन्हें साहित्य में भाव कहते हैं-विषय हैं। कविता उन मूल और आदिम मनोवृत्तियों का व्यवसाय है जो सजीव सृष्टि के बीच सुखदुख की अनुभूति से विरूप परिणाम द्वारा अत्यंत प्राचीन कल्प में प्रकट हुईं और जिनके सूत्र से शेष सृष्टि के साथ तादात्म्य का अनुभव मनुष्य जाति आदि काल से करती चली आई है। वन, पर्वत, नदी, नाले, निर्झर, कद्दार, पटपर, चट्टान, वृक्ष, लता, झाड़, पशु, पक्षी, अनंत आकाश, नक्षत्रा इत्यादि तो मनुष्य के आदिम सहचर हैं ही; पर खेत, ढुर्री, हल, झोंपड़ें,

मजदूरी और प्रेम -सरदार पूर्ण सिंह

हल चलाने वाले का जीवन हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुंड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सुफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस अग्नि की चिनगारियों की डालियों-सी हैं। मैं जब कभी अनार के फूल और फल देखता हूँ तब मुझे बाग के माली का रुधिर याद आ जाता है। उसकी मेहनत के कण जमीन में गिरकर उगे हैं और हवा तथा प्रकाश की सहायता से मीठे फलों के रूप में नजर आ रहे हैं। किसान मुझे अन्न में, फूल में, फल में आहुति हुआ सा दिखाई पड़ता है। कहते हैं, ब्रह्माहुति से जगत् पैदा हुआ है। अन्न पैदा करने में किसान भी ब्रह्मा के समान है। खेती उसके ईश्वरी प्रेम का केंद्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते में,

अहिंसा

(स्वामी रामकृष्ण परमहंस द्वारा अपने शिष्यों को सुनाई गई एक कथा पर आधारित।) एक समय की बात है।एक गाँव के चरवाहे प्रतिदिन अपने पशुओं को जंगल में चराने के लिए ले जाते थे।उनके मार्ग में एक विशाल वृक्ष पड़ता था।वृक्ष के नीचे बिल में एक विषैला नाग रहता था।यदि कोई व्यक्ति उस वृक्ष के पास जाता तो नाग फुँफकारता हुआ बिल से बाहर निकलता और व्यक्ति को डँस लेता था।इस प्रकार कई व्यक्ति प्राण गँवा बैठे थे।गाँव के लोग उस नाग से बहुत भयभीत रहते थे और कभी उस वृक्ष के निकट नहीं जाते थे।चरवाहे भी बहुत सावधानी से वहाँ से निकलते,विशेष रूप से शाम के समय उन्हें अधिक डर रहता था कि कहीं नाग बिल से बाहर न बैठा हो।वे जल्दी-जल्दी,जैसे-तैसे दौड़ते हुए उस वृक्ष के पास से गुज़र जाते थे। एक दिन एक भिक्षु उस गाँव में आये।वे रात को गाँव के मंदिर में ठहरे।प्रातः जब चरवाहे अपने पशुओं को

लोभ और प्रीति

जिस प्रकार सुख या आनंद देनेवाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं। दूसरे की वस्तु का लोभ करके उसे लोग लेना चाहते हैं, अपनी वस्तु का लोभ करके उसे लोग देना या नष्ट होने देना नहीं चाहते। प्राप्य या प्राप्त सुख के अभाव या अभाव कल्पना के बिना लोभ की अभिव्यक्ति नहीं होती। अत: इसके सुखात्मक और दु:खात्मक दोनों पक्ष हैं। जब लोभ अप्राप्य के लिए होता है तब तो दु:ख स्पष्ट ही रहता है। प्राप्य के संबंध में दु:ख का अंग निहित रहता है और अभाव के निश्चय या आशंका मात्र पर व्यक्त हो जाता है। कोई सुखद वस्तु पास में रहने पर भी मन में इस इच्छा का बीज रहता है कि उसका अभाव न हो। पर अभाव का जब तक ध्या न नहीं

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-छठा पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

पुनि चलि देखा राज-दुआरा । मानुष फिरहिं पाइ नहिं बारा ॥ हस्ति सिंघली बाँधे बारा । जनु सजीव सब ठाढ पहारा ॥ कौनौ सेत, पीत रतनारे । कौनौं हरे, धूम औ कारे ॥ बरनहिं बरन गगन जस मेघा । औ तिन्ह गगन पीठी जनु ठेघा ॥ सिंघल के बरनौं सिंघली । एक एक चाहि एक एक बली ॥ गिरि पहार वै पैगहि पेलहिं । बिरिछ उचारि डारि मुख मेलहिं ॥ माते तेइ सब गरजहिं बाँधे । निसि दिन रहहिं महाउत काँधे ॥ धरती भार न अगवै, पाँव धरत उठ हालि । कुरुम टुटै, भुइँ फाटै तिन हस्तिन के चालि ॥21॥ अर्थ: इसके बाद चलकर राजद्वार को देखें. मनुष्य कहीं भी घूम ले, ऐसा द्वार नहीं पा सकता. राजद्वार पर सिंहली हाथी बंधे हुए हैं, जो साक्षात् पहाड़ की तरह लगते हैं. इन हाथियों में कोई सफ़ेद है, कोई पीला तो कोई लाल. कोई हरा है, कोई धुएँ के रंग का तो कोई काला. उनका रंग आकाश के बादलों जैसा

अशोक के फूल -हजारी प्रसाद द्विवेदी

अशोक के फिर फूल आ गए हैं। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! बहुत सोच-समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिर्फ़ पाँच को ही अपने तूणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है।लेकिन पुष्पित अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है। इसलिए नहीं कि सुंदर वस्तुओं को हतभाग्य समझने में मुझे कोई विशेष रस मिलता है। कुछ लोगों को मिलता है। वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अंतिम मुहूर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृष्टि इतनी दूर तक नहीं जाती। फिर भी मेरा मन इस फूल को देखकर उदास हो जाता है। असली कारण तो मेरे अंतर्यामी ही जानते होंगे, कुछ थोड़ा-सा मैं भी अनुमान कर सका हूँ। बताता हूँ।भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही

दोपहर का भोजन – अमरकांत

सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रख कर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चीटें-चीटियों को देखने लगी।अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास नहीं लगी हैं। वह मतवाले की तरह उठी ओर गगरे से लोटा-भर पानी ले कर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कह कर वहीं जमीन पर लेट गई।आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मल कर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई।लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ-पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंडिया की तरह फूला हुआ था। उसका

गदल – रांगेय राघव

बाहर शोरगुल मचा। डोडी ने पुकारा - ''कौन है?''कोई उत्तर नहीं मिला। आवाज आई - ''हत्यारिन! तुझे कतल कर दूँगा!''स्त्री का स्वर आया - ''करके तो देख! तेरे कुनबे को डायन बनके न खा गई, निपूते!''डोडी बैठा न रह सका। बाहर आया।''क्या करता है, क्या करता है, निहाल?'' - डोडी बढक़र चिल्लाया - ''आखिर तेरी मैया है।''''मैया है!'' - कहकर निहाल हट गया।''और तू हाथ उठाके तो देख!'' स्त्री ने फुफकारा - ''कढीख़ाए! तेरी सींक पर बिल्लियाँ चलवा दूँ! समझ रखियो! मत जान रखियो! हाँ! तेरी आसरतू नहीं हूँ।''''भाभी!'' - डोडी ने कहा - ''क्या बकती है? होश में आ!''वह आगे बढा। उसने मुडक़र कहा - ''जाओ सब। तुम सब लोग जाओ!''निहाल हट गया। उसके साथ ही सब लोग इधर-उधर हो गए।डोडी निस्तब्ध, छप्पर के नीचे लगा बरैंडा पकडे खड़ा रहा। स्त्री वहीं बिफरी हुई-सी बैठी रही। उसकी आँखों में आग-सी जल रही थी।उसने कहा - ''मैं जानती हूँ, निहाल

गेहूँ बनाम गुलाब – रामवृक्ष बेनीपुरी

गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे ! गेहूँ - उसकी भूख का काफला आज गेहूँ पर टूट पड़ा है? गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ, गेहूँ उपजाओ ! मैदान जोते जा रहे हैं, बाग उजाड़े जा रहे हैं - गेहूँ के लिए। बेचारा गुलाब - भरी जवानी में सि‍सकियाँ ले रहा है। शरीर की आवश्‍यकता ने मानसिक वृत्तियों को कहीं कोने में डाल रक्‍खा है, दबा रक्‍खा है। किंतु, चाहे कच्‍चा चरे या पकाकर खाए - गेहूँ तक पशु और मानव में क्‍या अंतर? मानव को मानव बनाया गुलाब ने! मानव मानव तब बना जब उसने शरीर की आवश्‍यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी। यही नहीं, जब उसकी

घुमक्कड़ शास्त्र- अध्याय -10- प्रेम

घुमक्कड़ को दुनिया में विचरना है, उसे अपने जीवन को नदी के प्रवाह की तरह सतत प्रवाहित रखना है, इसीलिए उसे प्रवाह में बाधा डालने वाली बातों से सावधान रहना है। ऐसी बाधक बातों में कुछ के बारे में कहा जा चुका है, लेकिन जो सबसे बड़ी बाधा तरुण के मार्ग में आती है, वह है प्रेम। प्रेम का अर्थ है स्‍त्री और पुरुष का पारस्‍परिक स्‍नेह, या शारीरिक और मानसिक लगाव। कहने को तो प्रेम को एक निराकार मानसिक लगाव कह दिया जाता है, लेकिन वह इतना निर्बल नहीं है। वह नदी जैसे प्रचंड प्रवाह को रोकने की भी सामर्थ्‍य रखता है। स्वच्‍छंद मनुष्‍य की सबसे भारी निर्बलता इसी प्रेम में निहित है। घुमक्कड़ के सारे जीवन में मनुष्‍यमात्र के साथ मित्रता और प्रेम व्‍याप्‍त है। इस जीवन-नियम का वह कहीं भी अपवाद नहीं मानता। स्‍नेह जहाँ पुरुष-पुरुष का है, वहाँ वह उसी निराकार सीमा में सीमित रह सकता

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