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चंद्रकांता -देवकीनंदन खत्री-अध्याय -3-भाग-1 ( वनकन्या का रहस्य )

बयान – 1

वह नाजुक औरत जिसके हाथ में किताब है और जो सब औरतों के आगे-आगे आ रही है, कौन और कहाँ की रहने वाली है, जब तक यह न मालूम हो जाए तब तक हम उसको वनकन्या के नाम से लिखेंगे।

धीरे-धीरे चल कर वनकन्या जब उन पेड़ों के पास पहुँची जिधर आड़ में कुँवर वीरेंद्रसिंह और फतहसिंह छिपे खड़े थे, तो ठहर गई और पीछे फिर के देखा। इसके साथ एक और जवान, नाजुक तथा चंचल औरत अपने हाथ में एक तस्वीर लिए हुए चल रही थी जो वनकन्या को अपनी तरफ देखते देख आगे बढ़ आई। वनकन्या ने अपनी किताब उसके हाथ में दे दी और तस्वीर उससे ले ली।

तस्वीर की तरफ देख लंबी साँस ली, साथ ही आँखें डबडबा आईं, बल्कि कई बूँद आँसुओं की भी गिर पड़ीं। इस बीच में कुमार की निगाह भी उसी तस्वीर पर जा पड़ी, एकटक देखते रहे और जब वनकन्या बहुत दूर निकल गई तब फतहसिंह से बातचीत करने लगे।

कुमार – ‘क्यों फतहसिंह, यह कौन है कुछ जानते हो?’

फतहसिंह – ‘मैं कुछ भी नहीं जानता मगर इतना कह सकता हूँ कि किसी राजा की लड़की है।’

कुमार – ‘यह किताब जो इसके हाथ में है जरूर वही है जो मुझको तिलिस्म से मिली थी, जिसको शिवदत्त के ऐयारों ने चुराया था, जिसके लिए तेजसिंह और बद्रीनाथ में बदाबदी हुई और जिसकी खोज में हमारे ऐयार लगे हुए हैं।’

फतहसिंह – ‘मगर फिर वह किताब इसके हाथ कैसे लगी?’

कुमार – ‘इसका तो ताज्जुब हुआ है मगर इससे भी ज्यादा ताज्जुब की एक बात और है, शायद तुमने ख्याल नहीं किया।’

फतहसिंह – ‘नहीं, वह क्या?’

कुमार – ‘वह तस्वीर भी मेरी ही है जिसको बगल वाली औरत के हाथ से उसने लिया था।’

फतहसिंह – ‘यह तो आपने और भी आश्चर्य की बात सुनाई।’

कुमार – ‘मैं तो अजब हैरानी में पड़ा हूँ, कुछ समझ ही नहीं आता कि क्या मामला है। अच्छा चलो पीछे-पीछे देखें ये सब जाती कहाँ हैं।’

फतहसिंह – ‘चलिए।’

कुमार और फतहसिंह उसी तरफ चले जिधर वे औरतें गई थीं। थोड़ी ही दूर गए होंगे कि पीछे से किसी ने आवाज दी। फिर के देखा तो तेजसिंह पर नजर पड़ी। ठहर गए, जब पास पहुँचे उन्हें घबराए हुए और बदहोशो-हवास देख कर पूछा – ‘क्यों क्या है जो ऐसी सूरत बनाए हो?’

तेजसिंह ने कहा – ‘है क्या, बस हम आपसे जिंदगी भर के लिए जुदा होते हैं।’

इससे ज्यादा न बोल सके, गला भर आया, आँखों से आँसुओं की बूँदे टपाटप गिरने लगीं। तेजसिंह की अधूरी बात सुन और उनकी ऐसी हालत देख कुमार भी बेचैन हो गए, मगर यह कुछ भी न जान पड़ा कि तेजसिंह के इस तरह बेदिल होने का क्या सबब है।

फतहसिंह से इनकी यह दशा देखी न गई। अपने रूमाल से दोनों की आँखें पोंछीं, इसके बाद तेजसिंह से पूछा – ‘आपकी ऐसी हालत क्यों हो रही है, कुछ मुँह से तो कहिए। क्या सबब है जो जन्म भर के लिए आप कुमार से जुदा होंगे?’

तेजसिंह ने अपने को सँभाल कर कहा – ‘तिलिस्मी किताब हम लोगों के हाथ न लगी और न मिलने की कोई उम्मीद है इसलिए अपने कौल पर सिर मुंड़ा के निकल जाना पड़ेगा।’

इसका जवाब कुँवर वीरेंद्रसिंह और फतहसिंह कुछ दिया ही चाहते थे कि देवीसिंह और पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी भी घूमते हुए आ पहुँचे। ज्योतिषी जी ने पुकार कर कहा – ‘तेजसिंह, घबराइए मत, अगर आपको किताब न मिली तो उन लोगों के पास भी न रही, जो मैंने पहले कहा था वही हुआ, उस किताब को कोई तीसरा ही ले गया।’

अब तेजसिंह का जी कुछ ठिकाने हुआ। कुमार ने कहा – ‘वाह खूब, आप भी रोए और मुझको भी रुलाया। जिसके हाथ में किताब पहुँची उसे मैंने देखा मगर उसका हाल कहने का कुछ मौका तो मिला नहीं, तुम पहले से ही रोने लगे।’ इतना कह के कुमार ने उस तरफ देखा जिधर वे औरतें गई थीं मगर कुछ दिखाई न पड़ा।

तेजसिंह ने घबरा कर कहा – ‘आपने किसके हाथ में किताब देखी? वह आदमी कहाँ है?’

कुमार ने जवाब दिया – ‘मैं क्या बताऊँ कहाँ है, चलो उस तरफ शायद दिखाई दे जाए, हाय विपत-पर-विपत बढ़ती ही जाती है।’

आगे-आगे कुमार तथा पीछे-पीछे तीनों ऐयार और फतहसिंह उस तरफ चले जिधर वे औरतें गई थीं, मगर तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी हैरान थे कि कुमार किसको खोज रहे हैं, वह किताब किसके हाथ लगी है, या जब देखा ही था तो छीन क्यो न लिया। कई दफा चाहा कि कुमार से इन बातों को पूछें मगर उनको घबराए हुए इधर-उधर देखते और लंबी-लंबी साँसें लेते देख तेजसिंह ने कुछ न पूछा। पहर भर तक कुमार ने चारों तरफ खोजा मगर फिर उन औरतों पर निगाह न पड़ी। आखिर आँखें डबडबा आईं और एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए।

तेजसिंह ने पूछा – ‘आप कुछ खुलासा कहिए भी तो कि क्या मामला है?’

कुमार ने कहा – ‘अब इस जगह कुछ न कहेंगे। लश्कर में चलो, फिर जो कुछ है सुन लेना।’

सब कोई लश्कर में पहुँचे। कुमार ने कहा – ‘पहले तिलिस्मी खँडहर में चलो। देखें बद्रीनाथ की क्या कैफियत है।’ यह कह कर खँडहर की तरफ चले, ऐयार सब पीछे-पीछे रवाना हुए। खँडहर के दरवाजे के अंदर पैर रखा ही था कि सामने से पंडित बद्रीनाथ, पन्नालाल वगैरह आते दिखाई पड़े।

कुमार – ‘यह देखो वह लोग इधर ही चले आ रहे हैं। मगर हैं, यह बद्रीनाथ छूट कैसे गए?’

तेजसिंह – ‘बड़े ताज्जुब की बात है।’

देवीसिंह – ‘कहीं किताब उन लोगों के हाथ तो नहीं लग गई। अगर ऐसा हुआ तो बड़ी मुश्किल होगी।’

फतहसिंह – ‘इससे निश्चिंत रहो, वह किताब इनके हाथ अब तक नहीं लगी। हाँ, आगे मिल जाए तो मैं नहीं कह सकता, क्योंकि अभी थोड़ी ही देर हुई है वह दूसरे के हाथ में देखी जा चुकी है।

इतने में बद्रीनाथ वगैरह पास आ गए। पन्नालाल ने पुकार के कहा – ‘क्यों तेजसिंह, अब तो हार गए न।’

तेजसिंह – ‘हम क्यों हारे।’

बद्रीनाथ – ‘क्यों नहीं हारे, हम छूट भी गए और किताब भी न दी।’

तेजसिंह – ‘किताब तो हम पा गए, तुम चाहे अपने आप छूटो या मेरे छुड़ाने से छूटो। किताब पाना ही हमारा जीतना हो गया, अब तुमको चाहिए कि महाराज शिवदत्त को छोड़ कर कुमार के साथ रहो।’

बद्रीनाथ – ‘हमको वह किताब दिखा दो, हम अभी ताबेदारी कबूल करते हैं।’

तेजसिंह – ‘तो तुम ही क्यों नहीं दिखा देते, जब तुम्हारे पास नहीं तो साबित हो गया कि हम पा गए।’

बद्रीनाथ – ‘बस-बस, हम बेफिक्र हो गए, तुम्हारी बातचीत से मालूम हो गया कि तुमने किताब नहीं पाई और उसे कोई तीसरा ही उड़ा ले गया, अभी तक हम डरे हुए थे।’

देवीसिंह – ‘फिर आखिर हारा कौन यह भी तो कहो?’

बद्रीनाथ – ‘कोई भी नहीं हारा।’

कुमार – ‘अच्छा यह तो कहो तुम छूटे कैसे।’

बद्रीनाथ – ‘बस ईश्वर ने छुड़ा दिया, जानबूझ के कोई तरकीब नहीं की गई। पन्नालाल ने उसके सिर पर एक लकड़ी रखी, उस पत्थर के आदमी ने मुझको छोड़ लकड़ी पकड़ी, बस मैं छूट गया। उसके हाथ में वह लकड़ी अभी तक मौजूद है।’

कुमार – ‘अच्छा हुआ, दोनों की ही बात रह गई।’

बद्रीनाथ – ‘कुमार, मेरा जी तो चाहता है कि आपके साथ रहूँ मगर क्या करूँ, नमकहरामी नहीं कर सकता, कोई तो सबब होना चाहिए। अब मुझे आज्ञा हो तो विदा होऊँ।’

कुमार – ‘अच्छा जाओ।’

ज्योतिषी – ‘अच्छा हमारी तरफ नहीं होते तो न सही मगर ऐयारी तो बंद करो।’

तेजसिंह – ‘वाह ज्योतिषी जी, आखिर वेदपाठी ही रहे। ऐयारी से क्या डरना? ये लोग जितना जी चाहें जोर लगा लें।’

पन्नालाल – ‘खैर, देखा जाएगा, अभी तो जाते है, जय माया की।’

तेजसिंह – ‘जय माया की।’

बद्रीनाथ वगैरह वहाँ से चले गए। फिर कुमार भी तिलिस्म में न गए और अपने डेरे में चले आए। रात को कुमार के डेरे में सब ऐयार और फतहसिंह इकट्ठे हुए। दरबानों को हुक्म दिया कि कोई अंदर न आने पाए।

तेजसिंह ने कुमार से पूछा – ‘अब बताइए किताब किसके हाथ में देखी थी, वह कौन है, और आपने किताब लेने की कोशिश क्यों नहीं की?’

कुमार ने जवाब दिया – ‘यह तो मैं नहीं जानता कि वह कौन है लेकिन जो भी हो, अगर कुमारी चंद्रकांता से बढ़ के नहीं है तो किसी तरह कम भी नहीं है। उसके हुस्न ने मुझे उससे किताब छिनने न दी।’

तेजसिंह – (ताज्जुब से) ‘कुमारी चंद्रकांता से और उस किताब से क्या संबंध? खुलासा कहिए तो कुछ मालूम हो।’

कुमार – ‘क्या कहें हमारी तो अजब हालत है।’ (ऊँची साँस ले कर चुप ही रहे)

तेजसिंह – ‘आपकी विचित्र ही दशा हो रही है, कुछ समझ में नहीं आता। (फतहसिंह की तरफ देख के) आप तो इनके साथ थे, आप ही खुलासा हाल कहिए, यह तो बारह दफा लंबी साँस लेगे तो डेढ़ बात कहेंगे। जगह-जगह तो इनको इश्क पैदा होता है, एक बला से छूटे नहीं दूसरी खरीदने को तैयार हो गए।’

फतहसिंह ने सब हाल खुलासा कह सुनाया। तेजसिंह बहुत हैरान हुए कि वह कौन थी और उसने कुमार को पहले कब देखा, कब आशिक हुई और तस्वीर कैसे उतरवा मँगाई?

ज्योतिषी जी ने कई दफा रमल फेंका मगर खुलासा हाल मालूम न हो सका। हाँ, इतना कहा कि किसी राजा की लड़की है। आधी रात तक सब कोई बैठे रहे, मगर कोई काम न हुआ, आखिर यह बात ठहरी कि जिस तरह बने उन औरतों को ढूँढ़ना चाहिए।

सब कोई अपने डेरे में आराम करने चले गए। रात-भर कुमार को वनकन्या की याद ने सोने न दिया। कभी उसकी भोली-भाली सूरत याद करते, कभी उसकी आँखों से गिरे हुए आँसुओं के ध्यान में डूबे रहते। इसी तरह करवटें बदलते और लंबी साँस लेते रात बीत गई बल्कि घंटा भर दिन चढ़ आया। पर कुमार अपने पलँग पर से न उठे।

तेजसिंह ने आ कर देखा तो कुमार चादर से मुँह लपेटे पड़े हैं, मुँह की तरफ का बिल्कुल कपड़ा गीला हो रहा है। दिल में समझ गए कि वनकन्या का इश्क पूरे तौर पर असर कर गया है, इस वक्त नसीहत करना भी उचित नहीं। आवाज दी – ‘आप सोते हैं या जागते हैं?’

कुमार – (मुँह खोल कर) ‘नहीं, जागते तो हैं।’

तेजसिंह – ‘फिर उठे क्यों नहीं? आप तो रोज सवेरे ही स्नान-पूजा से छुट्टी कर लेते हैं, आज क्या हुआ?’

‘नहीं कुछ नहीं’ कहते हुए कुमार उठ बैठे। जल्दी-जल्दी स्नान से छुट्टी पा कर भोजन किया। तेजसिंह वगैरह इनके पहले ही सब कामों से निश्चित हो चुके थे, उन लोगों ने भी कुछ भोजन कर लिया और उन औरतों को ढूँढ़ने के लिए जंगल में जाने को तैयार हुए। कुमार ने कहा – ‘हम भी चलेंगे।’ सभी ने समझाया कि आप चल कर क्या करेंगे हम लोग पता लगाते हैं, आपके चलने से हमारे काम में हर्ज होगा। मगर कुमार ने कहा – ‘कोई हर्ज न होगा, हम फतहसिंह को अपने साथ लेते चलते हैं, तुम्हारा जहाँ जी चाहे घूमना, हम उसके साथ इधर-उधर फिरेंगे।’

तेजसिंह ने फिर समझाया कि कहीं शिवदत्त के ऐयार लोग आपको धोखे में न फँसा लें, मगर कुमार ने एक मानी, आखिर लाचार हो कर कुमार और फतहसिंह को साथ ले जंगल की तरफ रवाना हुए।

थोड़ी दूर घने जंगल में जा कर उन लोगों को एक जगह बैठा कर तीनों ऐयार अलग-अलग उन औरतों की खोज में रवाना हुए, ऐयारों के चले जाने पर कुँवर वीरेंद्रसिंह फतहसिंह से बातें करने लगे मगर सिवाय वनकन्या के कोई दूसरा जिक्र कुमार की जुबान पर न था।

 

बयान – 2

कुँवर वीरेंद्रसिंह बैठे फतहसिंह से बातें कर रहे थे कि एक मालिन जो जवान और कुछ खूबसूरत भी थी हाथ में जंगली फूलों की डाली लिए कुमार के बगल से इस तरह निकली जैसे उसको यह मालूम नहीं कि यहाँ कोई है। मुँह से कहती जाती थी – ‘आज जंगली फूलों का गहना बनाने में देर हो गई, जरूर कुमारी खफा होंगी, देखें क्या दुर्दशा होती है।’

इस बात को दोनों ने सुना। कुमार ने फतहसिंह से कहा – ‘मालूम होता है यह उन्हीं की मालिन है, इसको बुला के पूछो तो सही।’

फतहसिंह ने आवाज दी, उसने चौंक कर पीछे देखा, फतहसिंह ने हाथ के इशारे से फिर बुलाया, वह डरती-काँपती उनके पास आ गई। फतहसिंह ने पूछा – ‘तू कौन है और फूलों के गहने किसके वास्ते लिए जा रही है?’

उसने जवाब दिया – ‘मैं मालिन हूँ, यह नहीं कह सकती कि किसके यहाँ रहती हूँ, और ये फूल के गहने किसके वास्ते लिए जाती हूँ। आप मुझको छोड़ दें, मैं बड़ी गरीब हूँ, मेरे मारने से कुछ हाथ न लगेगा, हाथ जोड़ती हूँ, मेरी जान मत लीजिए।’

ऐसी-ऐसी बातें कह मालिन रोने और गिड़गिड़ाने लगी। फूलों की डलियाँ आगे रखी हुई थी जिनकी तेज खुशबू फैल रही थी। इतने में एक नकाबपोश वहाँ आ पहुँचा और कुमार की तरफ मुँह करके बोला – ‘आप इसके फेर में न पड़ें, यह ऐयार है, अगर थोड़ी देर और फूलों की खुशबू दिमाग में चढ़ेगी तो आप बेहोश हो जाएँगे।’

उस नकाबपोश ने इतना कहा ही था कि वह मालिन उठ कर भागने लगी, मगर फतहसिंह ने झट हाथ पकड़ लिया। सवार उसी वक्त चला गया। कुमार ने फतहसिंह से कहा – ‘मालूम नहीं सवार कौन है, और मेरे साथ यह नेकी करने की उसको क्या जरूरत थी?’

फतहसिंह ने जवाब दिया – ‘इसका हाल मालूम होना मुश्किल है क्योंकि वह खुद अपने को छिपा रहा है, खैर, जो हो यहाँ ठहरना मुनासिब नहीं, देखिए अगर यह सवार न आता तो हम लोग फँस ही चुके थे।’

कुमार ने कहा – ‘तुम्हारा यह कहना बहुत ठीक है, खैर, अब चलो और इसको अपने साथ लेते चलो, वहाँ चल कर पूछ लेंगे कि यह कौन है।’

जब कुमार अपने खेमे में फतहसिंह और उस ऐयार को लिए हुए पहुँचे तो बोले – ‘अब इससे पूछो इसका नाम क्या है?’ फतहसिंह ने जवाब दिया – ‘भला यह ठीक-ठीक अपना नाम क्यों बताएगा, देखिए मैं अभी मालूम किए लेता हूँ।’

फतहसिंह ने गरम पानी मँगवा कर उस ऐयार का मुँह धुलाया, अब साफ पहचाने गए कि यह पंडित बद्रीनाथ हैं। कुमार ने पूछा – ‘क्यों अब तुम्हारे साथ क्या किया जाए?’

बद्रीनाथ ने जवाब दिया – ‘जो मुनासिब हो कीजिए।’

कुमार ने फतहसिंह से कहा – ‘इनकी तुम हिफाजत करो, जब तेजसिंह आएँगे तो वही इनका फैसला करेंगे।’ यह सुन फतहसिंह बद्रीनाथ को ले अपने खेमे में चले गए। शाम को बल्कि कुछ रात बीते तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी लौट कर आए और कुमार के खेमे में गए।

उन्होंने पूछा – ‘कहो कुछ पता लगा?’

तेजसिंह – ‘कुछ पता न लगा, दिन भर परेशान हुए मगर कोई काम न चला।’

कुमार – ‘(ऊँची साँस ले कर) ‘फिर अब क्या किया जाएगा?’

तेजसिंह – ‘किया क्या जाएगा, आज-कल में पता लगेगा ही।’

कुमार – ‘हमने भी एक ऐयार को गिरफ्तार किया है।’

तेजसिंह – ‘हैं, किसको? वह कहाँ है।’

कुमार – ‘फतहसिंह के पहरे में है, उसको बुला के देखो कौन है।’

देवीसिंह को भेज कर फतहसिंह को मय ऐयार के बुलवाया। जब बद्रीनाथ की सूरत देखी तो खुश हो गए और बोले – ‘क्यों, अब क्या इरादा है?’

बद्रीनाथ – ‘जो पहले था वही अब भी है?’

तेजसिंह – ‘अब भी शिवदत्त का साथ छोड़ोगे या नहीं?’

बद्रीनाथ – ‘महाराज शिवदत्त का साथ क्यों छोड़ने लगे?’

तेजसिंह –‘तो फिर कैद हो जाओगे।’

बद्रीनाथ – ‘चाहे जो हो।’

तेजसिंह – ‘यह न समझना कि तुम्हारे साथी लोग छुड़ा ले जाएँगे, हमारा कैद-खाना ऐसा नहीं है।’

बद्रीनाथ – ‘उस कैदखाने का हाल भी मालूम है, वहाँ भेजो भी तो सही।’

देवीसिंह – ‘वाह रे निडर।’

तेजसिंह ने फतहसिंह से कहा – ‘इनके ऊपर सख्त पहरा मुकर्रर कीजिए। अब रात हो गई है, कल इनको बड़े घर पहुँचाया जाएगा।’

फतहसिंह ने अपने मातहत सिपाहियों को बुला कर बद्रीनाथ को उनके सुपुर्द किया, इतने ही में चोबदार ने आ कर एक खत उनके हाथ में दिया और कहा कि एक नकाबपोश सवार बाहर हाजिर है जिसने यह खत राजकुमार को देने के लिए दिया है। तेजसिंह ने लिफाफे को देखा, यह लिखा हुआ था –

‘कुँवर वीरेंद्रसिंह जी के चरण कमलों में – ‘तेजसिंह ने कुमार के हाथ में दिया, उन्होंने खोल कर पढ़ा –

बरवा

‘सुख सम्पत्ति सब त्याग्यो जिनके हेत।

वे निरमोही ऐसे, सुधिहु न लेत॥

राज छोड़ बन जोगी भसम रमाय।

विरह अनल की धूनी तापत हाय॥’

– कोई वियोगिनी

पढ़ते ही आँखें डबडबा आईं, बँधे गले से अटक कर बोले – ‘उसको अंदर बुलाओ जो खत लाया है।’ हुक्म पाते ही चोबदार उस नकाबपोश सवार को लेने बाहर गया मगर तुरंत वापस आ कर बोला – ‘वह सवार तो मालूम नहीं कहाँ चला गया।’

इस बात को सुनते ही कुमार के जी को कितना दुख हुआ वे ही जानते होंगे। वह खत तेजसिंह के हाथ में दिया, उन्होंने भी पढ़ा – ‘इसके पढ़ने से मालूम होता है यह खत उसी ने भेजा है जिसकी खोज में दिन भर हम लोग हैरान हुए और यह तो साफ ही है कि वह भी आपकी मुहब्बत में डूबी हुई है, फिर आपको इतना रंज न करना चाहिए।’

कुमार ने कहा – ‘इस खत ने तो इश्क की आग में घी का काम किया। उसका ख्याल और भी बढ़ गया घट कैसे सकता है। खैर, अब जाओ तुम लोग भी आराम करो, कल जो कुछ होगा देखा जाएगा।’

 

बयान – 3

कल रात से आज की रात कुमार को और भी भारी गुजरी। बार-बार उस बरवे को पढ़ते रहे। सवेरा होते ही उठे, स्नान-पूजा कर जंगल में जाने के लिए तेजसिंह को बुलाया, वे भी आए। आज फिर तेजसिंह ने मना किया मगर कुमार ने न माना, तब तेजसिंह ने उन तिलिस्मी फूलों में से गुलाब का फूल पानी में घिस कर कुमार और फतहसिंह को पिलाया और कहा कि अब जहाँ जी चाहे घूमिए, कोई बेहोश करके आपको नहीं ले जा सकता, हाँ जबर्दस्ती पकड़ ले तो मैं नहीं कह सकता।’

कुमार ने कहा – ‘ऐसा कौन है जो मुझको जबर्दस्ती पकड़ ले।’

पाँचों आदमी जंगल में गए, कुछ दूर कुमार और फतहसिंह को छोड़ तीनों ऐयार अलग-अलग हो गए। कुँवर वीरेंद्रसिंह फतहसिंह के साथ इधर-उधर घूमने लगे। घूमते-घूमते कुमार बहुत दूर निकल गए, देखा कि दो नकाबपोश सवार सामने से आ रहे हैं। जब कुमार से थोड़ी दूर रह गए तो एक सवार घोड़े पर से उतर पड़ा और जमीन पर कुछ रख के फिर सवार हो गया। कुमार उसकी तरफ बढ़े, जब पास पहुँचे तो वे दोनों सवार यह कह के चले गए कि इस किताब और खत को ले लीजिए।

कुमार ने पास जा कर देखा तो वही तिलिस्मी किताब नजर पड़ी, उसके ऊपर एक खत और बगल में कलम दवात और कागज भी मौजूद पाया। कुमार ने खुशी-खुशी उस किताब को उठा लिया और फतहसिंह की तरफ देख के बोले – ‘यह किताब दे कर दोनों सवार चले क्यों गए सो कुछ समझ में नहीं आता, मगर बोली से मालूम होता है कि वह सवार औरत है जिसने मुझे किताब उठा लेने के लिए कहा। देखें खत में क्या लिखा है?’ यह कह खत खोल पढ़ने लगे, यह लिखा था-

‘मेरा जी तुमसे अटका है और जिसको तुम चाहते हो वह बेचारी तिलिस्म में फँसी है। अगर उसको किसी तरह की तकलीफ होगी तो तुम्हारा जी दुखी होगा। तुम्हारी खुशी से मुझको भी खुशी है यह समझ कर किताब तुम्हारे हवाले करती हूँ। खुशी से तिलिस्म तोड़ो और चंद्रकांता को छुड़ाओ, मगर मुझको भूल न जाना, तुम्हें उसी की कसम जिसको ज्यादा चाहते हो। इस खत का जवाब लिख कर उसी जगह रख देना जहाँ से किताब उठाओगे।’

खत पढ़ कर कुमार ने तुरंत जवाब लिखा –

‘इस तिलिस्मी किताब को हाथ में लिए मैंने जिस वक्त तुमको देखा उसी वक्त से तुम्हारे मिलने को जी तरस रहा है। मैं उस दिन अपने को बड़ा भाग्यवान जनूँगा जिस दिन मेरी आँखें दोनों प्रेमियों को देख ठंडी होगी, मगर तुमको तो मेरी सूरत से नफरत है।

– तुम्हारा वीरेंद्र।’

जवाब लिख कर कुमार ने उसी जगह पर रख दिया। वे दोनों सवार दूर खड़े दिखाई दिए, कुमार देर तक खड़े राह देखते रहे मगर वे नजदीक न आए, जब कुमार कुछ दूर हट गए तब उनमें से एक ने आ कर खत का जवाब उठा लिया और देखते-देखते नजरों की ओट हो गया। कुमार भी फतहसिंह के साथ लश्कर में आए।

कुछ रात गए तेजसिंह वगैरह भी वापस आ कर कुमार के खेमे में इकट्ठे हुए। तेजसिंह ने कहा – ‘आज भी किसी का पता न लगा, हाँ कई नकाबपोश सवारों को इधर-उधर घूमते देखा। मैंने चाहा कि उनका पता लगाऊँ मगर न हो सका क्योंकि वे लोग भी चालाकी से घूमते थे, मगर कल जरूर हम उन लोगों का पता लगा लेंगे।’

कुमार ने कहा – ‘देखो तुम्हारे किए कुछ न हुआ मगर मैंने कैसी ऐयारी की कि खोई हुई चीज को ढूँढ़ निकाला, देखो यह तिलिस्मी किताब।’ यह कह कुमार ने किताब तेजसिंह के आगे रख दी।

तेजसिंह ने कहा – ‘आप जो कुछ ऐयारी करेंगे, वह तो मालूम ही है मगर यह बताइए कि किताब कैसे हाथ लगी? जो बात होती है ताज्जुब की।’

कुमार ने बिल्कुल हाल किताब पाने का कह सुनाया, तब वह खत दिखाई और जो कुछ जवाब लिखा था वह भी कहा।

ज्योतिषी जी ने कहा – ‘क्यों न हो, फिर तो बड़े घर की लड़की है, किसी तरह से कुमार को दु:ख देना पसंद न किया। सिवाय इसके खत पढ़ने से यह भी मालूम होता है कि वह कुमार के पूरे-पूरे हाल से वाकिफ है, मगर हम लोग बिल्कुल नहीं जान सकते कि वह है कौन।’

कुमार ने कहा – ‘इसकी शर्म तो तेजसिंह को होनी चाहिए कि इतने बड़े ऐयार होकर दो-चार औरतों का पता नहीं लगा सकते।’

तेजसिंह पता तो ऐसा लगाएँगे कि आप भी खुश हो जाएँगे, मगर अब किताब मिल गई है तो पहले तिलिस्म के काम से छुट्टी पा लेनी चाहिए।

कुमार – ‘तब तक क्या वे सब बैठी रहेंगी?’

तेजसिंह – ‘क्या अब आपको कुमारी चंद्रकांता की फिक्र न रही?’

कुमार – ‘क्यों नहीं, कुमारी की मुहब्बत भी मेरे नस-नस में बसी हुई है, मगर तुम भी तो इंसाफ करो कि इसकी मुहब्बत मेरे साथ कैसी सच्ची है, यहाँ तक कि मेरे ही सबब से कुमारी चंद्रकांता को मुझसे भी बढ़ कर समझ रखा है।’

तेजसिंह-‘हम यह तो नहीं कहते कि उसकी मुहब्बत की तरफ ख्याल न करें, मगर तिलिस्म का भी तो ख्याल होना चाहिए।‘

कुमार – ‘तो ऐसा करो जिसमें दोनों का काम चले।’

तेजसिंह – ‘ऐसा ही होगा, दिन को तिलिस्म तोड़ने का काम करेंगे, रात को उन लोगों का पता लगाएँगे।’

आज की रात फिर उसी तरह काटी, सवेरे मामूली कामों से छुट्टी पा कर कुँवर वीरेंद्रसिंह, तेजसिंह और ज्योतिषी जी तिलिस्म में घुसे, तिलिस्मी किताब साथ थी। जैसे-जैसे उसमें लिखा हुआ था उसी तरह ये लोग तिलिस्म तोड़ने लगे।

तिलिस्मी किताब में पहले ही यह लिखा हुआ था कि तिलिस्म तोड़ने वाले को चाहिए कि जब पहर दिन बाकी रहे तिलिस्म से बाहर हो जाए और उसके बाद कोई काम लितिस्म तोड़ने का न करे।

बयान – 4

तिलिस्मी खँडहर में घुस कर पहले वे उस दालान में गए जहाँ पत्थर के चबूतरे पर पत्थर ही का आदमी सोया हुआ था। कुमार ने इसी जगह से तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाया।

जिस चबूतरे पर पत्थर का आदमी सोया था उसके सिरहाने की तरफ पाँच हाथ हट कर कुमार ने अपने हाथ से जमीन खोदी। गज भर खोदने के बाद एक सफेद पत्थर की चट्टान देखी जिसमें उठाने के लिए लोहे की मजबूत कड़ी लगी हुई भी दिखाई पड़ी। कड़ी में हाथ डाल के पत्थर उठा कर बाहर किया। तहखाना मालूम पड़ा, जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी थीं।

तेजसिंह ने मशाल जला ली, उसी की रोशनी में सब कोई नीचे उतरे। खूब खुलासी कोठरी देखी, कहीं गर्द या कूड़े का नमो-निशान नहीं, बीच में संगमरमर पत्थर की खूबसूरत पुतली एक हाथ में काँटी दूसरे हाथ में हथौड़ी लिए खड़ी थी।

कुमार ने उसके हाथ से हथौड़ी-काँटी ले कर उसी के बाएँ कान में काँटी डाल हथौड़ी से ठोक दी, साथ ही उस पुतली के होंठ हिलने लगे और उसमें से बाजे की-सी आवाज आने लगी, मालूम होता था मानो वह पुतली गा रही है।

थोड़ी देर तक यही कैफियत रही, यकायक पुतली के बाएँ-दाहिने दोनों अंगो के दो टुकड़े हो गए और उसके पेट में से आठ अंगुल का छोटा-सा गुलाब का पौधा जिसमें कई फूल भी लगे हुए थे और डाल में एक ताली लटक रही थी निकला, साथ ही इसके एक छोटा-सा तांबे का पत्र भी मिला जिस पर कुछ लिखा हुआ था। कुमार ने उसे पढ़ा –

‘इस पेड़ को हमारे यहाँ के वैद्य अजायबदत ने मसाले से बनाया है। इन फूलों से बराबर गुलाब की खुशबू निकल कर दूर-दूर तक फैला करेगी। दरबार में रखने के लिए यह एक नायाब पौधा सौगात के तौर पर वैद्य जी ने तुम्हारे वास्ते रखा है।’

इसको पढ़ कर कुमार बहुत खुश हुए और ज्योतिषी जी की तरफ देख कर बोले – ‘यह बहुत अच्छी चीज मुझको मिली, देखिए इस वक्त भी इन फूलों में से कैसी अच्छी खुशबू निकल कर फैल रही है।’

तेजसिंह – ‘इसमें तो कोई शक नहीं।’

देवीसिंह – ‘एक-से-एक बढ़ कर कारीगरी दिखाई पड़ती है।’

अभी कुमार बात कर रहे थे कि कोठरी के एक तरफ का दरवाजा खुल गया। अँधेरी कोठरी में अभी तक इन लोगों ने कोई दरवाजा या उसका निशान नहीं देखा था पर इस दरवाजे के खुलने से कोठरी में बखूबी रोशनी पहुँची। मशाल बुझा दी गई और ये लोग उस दरवाजे की राह से बाहर हुए। एक छोटा-सा खूबसूरत बाग देखा। यह बाग वही था जिसमें चपला आई थी और जिसका हाल हम दूसरे भाग में लिख चुके हैं।

बमूजिब लिखे तिलिस्मी किताब के कुमार ने उस ताली में एक रस्सी बाँधी जो पुतली के पेट से निकली थी। रस्सी हाथ में थाम ताली को जमीन में घसीटते हुए कुमार बाग में घूमने लगे। हर एक रविशों और क्वारियों में घूमते हुए एक फव्वारे के पास ताली जमीन से चिपक गई। उसी जगह ये लोग भी ठहर गए। कुमार के कहे मुताबिक सभी ने उस जमीन को खोदना शुरू किया, दो-तीन हाथ खोदा था कि ज्योतिषी जी ने कहा – ‘अब पहर भर दिन बाकी रह गया, तिलिस्म से बाहर होना चाहिए।’

कुमार ने ताली उठा ली और चारों आदमी कोठरी की राह से होते हुए ऊपर चढ़ के उस दालान में पहुँचे जहाँ चबूतरे पर पत्थर का आदमी सोया था, उसके सिरहाने की तरफ जमीन खोद कर जो पत्थर की चट्टान निकली थी, उसी को उलट कर तहखाने के मुँह पर ढाँप दिया। उसके दोनों तरफ उठाने के लिए कड़ी लगी हुई थी, और उलटी तरफ एक ताला भी बना हुआ था। उसी ताली से जो पुतली के पेट से निकली थी यह ताला बंद भी कर दिया।

चारों आदमी खँडहर से निकल कुमार के खेमे में आए। थोड़ी देर आराम कर लेने के बाद तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी कुमार से कह के वनकन्या की टोह में जंगल की तरफ रवाना हुए। इस समय दिन अनुमानत, दो घंटे बाकी होगा।

ये तीनों ऐयार थोड़ी ही दूर गए होंगे कि एक नकाबपोश जाता हुआ दिखा। देवीसिंह वगैरह पेड़ों की आड़ दिए उसी के पीछे-पीछे रवाना हुए। वह सवार कुछ पश्चिम हटता हुआ सीधे चुनारगढ़ की तरफ जा रहा था। कई दफा रास्ते में रुका, पीछे फिर कर देखा और बढ़ा।

सूरज अस्त हो गया। अँधेरी रात ने अपना दखल कर लिया, घना जंगल अँधेरी रात में डरावना मालूम होने लगा। अब ये तीनों ऐयार सूखे पत्तो की आवाज पर जो टापों के पड़ने से होती थी जाने लगे। घंटे भर रात जाते-जाते उस जंगल के किनारे पहुँचे।

नकाबपोश सवार घोड़े पर से उतर पड़ा। उस जगह बहुत से घोड़े बँधे थे। वहीं पर अपना घोड़ा भी बाँध दिया, एक तरफ घास का ढेर लगा हुआ था, उसमें से घास उठा कर घोड़े के आगे रख दी और वहाँ से पैदल रवाना हुआ।

उस नकाबपोश के पीछे-पीछे चलते हुए ये तीनों ऐयार पहर रात बीते गंगा किनारे पहुँचे। दूर से जल में दो रोशनियाँ दिखाई पड़ीं, मालूम होता था जैसे दो चंद्रमा गंगाजी में उतर आए हैं। सफेद रोशनी जल पर फैल रही थी। जब पास पहुँचे देखा कि एक सजी हुई नाव पर कई खूबसूरत औरतें बैठी हैं, बीच में ऊँची गद्दी पर एक कमसिन नाजुक औरत जिसका रोआब देखने वालों पर छा रहा है बैठी है, चाँद-सा चेहरा दूर से चमक रहा है। दोनों तरफ माहताब जल रहे हैं।

नकाबपोश ने किनारे पहुँच कर जोर से सीटी बजाई, साथ ही उस नाव में से इस तरह सीटी की आवाज आई जैसे किसी ने जवाब दिया हो। उन औरतों में से जो उस नाव पर बैठी थीं दो औरतें उठ खड़ी हुईं तथा नीचे उतर एक डोंगी जो उस नाव के साथ बँधी थी, खोल कर किनारे ला नकाबपोश को उस पर चढ़ा ले गई।

अब ये तीनों ऐयार आपस में बातें करने लगे –

तेजसिंह – ‘वाह, इस नाव पर छूटते हुए दो माहताबों के बीच ये औरतें कैसी भली मालूम होती हैं।’

ज्योतिषी – ‘परियों का अखाड़ा मालूम होता है, चलो तैर कर के उनके पास चलें।’

देवीसिंह – ‘ज्योतिषी जी, कहीं ऐसा न हो कि परियाँ आपको उड़ा ले जाएँ, फिर हमारी मंडली में एक दोस्त कम हो जाएगा।’

तेजसिंह – ‘मैं जहाँ तक ख्याल करता हूँ यह उन्हीं लोगों की मंडली है जिन्हें कुमार ने देखा था।’

देवीसिंह – ‘इसमें तो कोई शक नहीं।’

ज्योतिषी – ‘तो तैर कर के चलते क्यों नहीं? तुम तो जल से ऐसा डरते हो जैसे कोई बूढ़ा आफियूनी डरता हो।’

देवीसिंह – ‘फिर तुम्हारे साथ आने से क्या फायदा हुआ? तुम्हारी तो बड़ी तारीफ सुनते थे कि ज्योतिषी जी ऐसे हैं, वैसे हैं, पहिया हैं, चर्खे हैं, मगर कुछ नहीं, एक अदनी-सी मंडली का पता नहीं लगा सकते।’

ज्योतिषी – ‘मैं क्या खाक बताऊँ? वे लोग तो मुझसे भी ज्यादा उस्ताद मालूम होती हैं। सभी ने अपने-अपने नाम ही बदल दिए हैं, असल नाम का पता लगाना चाहते हैं तो अजीबो-गरीब नामों का पता लगता है। किसी का नाम वियोगिनी, किसी का नाम योगिनी, किसी का भूतनी, किसी का डाकिनी, भला बताइए क्या मैं मान लूँ कि इन लोगों के यही नाम हैं?

तेजसिंह – ‘तो इन लोगों ने अपना नाम क्यों बदल लिया?’

ज्योतिषी – ‘हम लोगों को उल्लू बनाने के लिए।’

देवीसिंह – ‘अच्छा नाम जाने दीजिए, इनके मकाम का पता लगाइए।’

ज्योतिषी – ‘मकाम के बारे में जब रमल से दरियाफ्त करते हैं तो मालूम होता है कि इन लोगों का मकाम जल में है, तो क्या हम समझ लें कि ये लोग जलवासी अर्थात मछली हैं।’

तेजसिंह – ‘यह तो ठीक ही है, देखिए जलवासी हैं कि नहीं?’

ज्योतिषी – ‘भाई सुनो, रमल के काम में ये चारों पदार्थ – हवा, पानी, मिट्टी और आग हमेशा विघ्न डालते हैं। अगर कोई आदमी ज्योतिषी या रम्माल को छकाना चाहे तो इन चारों के हेर-फेर से खूब छकाया जा सकता है। ज्योतिषी बेचारा खाक न कर सके, पोथी-पत्र बेकार का बोझ हो जाए।

तेजसिंह – ‘यह कैसे? खुलासा बताओ तो कुछ हम लोग भी समझें, वक्त पर काम ही आएगा।’

ज्योतिषी – ‘बता देंगे, इस वक्त जिस काम को आए हो वह करो। चलो तैर कर चलें।’

तेजसिंह – ‘चलो।’

ये तीनों ऐयार तैर कर कर नाव के पास गए। बटुआ ऐयारी का कमर में बाँधा कपड़ा-लत्ता किनारे रख कर जल में उतर गए। मगर दो-चार हाथ गए होंगे कि पीछे से सीटी की आवाज आई, साथ ही नाव पर जो माहताब जल रहे थे बुझ गए, जैसे किसी ने उन्हें जल्दी से जल में फेंक दिया हो। अब बिल्कुल अँधेरा हो गया, नाव नजरों से छिप गई।

देवीसिंह ने कहा – ‘लीजिए, चलिए तैर कर के।’

तेजसिंह – ‘ये सब बड़ी शैतान मालूम होती हैं?’

ज्योतिषी – ‘मैंने तो पहले ही कहा कि ये सब-की-सब आफत हैं, अब आपको मालूम हुआ न कि मैं सच कहता था, इन लोगों ने हमारे नजूम को मिट्टी कर दिया है।’

देवीसिंह – ‘चलिए किनारे, इन्होंने तो बेढब छकाया, मालूम होता है कि किनारे पर कोई पहरे वाला खड़ा देखता था। जब हम लोग तैर कर के जाने लगे उसने सीटी बजाई, बस अँधेरा हो गया, पहले ही से इशारा बँधा हुआ था।’

ज्योतिषी – ‘इस नालायक को यह क्या सूझी कि जब हम लोग पानी में उतर चुके, तब सीटी बजाई, पहले ही बजाता तो हम लोग क्यों भीगते?’

ये तीनो ऐयार लौट कर किनारे आए, पहनने के वास्ते अपना कपड़ा खोजते हैं तो मिलते ही नहीं।

देवीसिंह – ‘ज्योतिषी जी पांलागी, लीजिए कपड़े भी गायब हो गए। हाय इस वक्त अगर इन लोगों में से किसी को पाऊँ तो कच्चा ही चबा जाऊँ!’

तेजसिंह – ‘हम तो उन लोगों की तारीफ करेंगे, खूब ऐयारी की।’

देवीसिंह – ‘हाँ-हाँ खूब तारीफ कीजिए जिससे उन लोगों में से अगर कोई सुनता हो तो अब भी आप पर रहम करे और आगे न सतावे।’

ज्योतिषी – ‘अब क्या सताना बाकी रह गया। कपड़े तक तो उतरवा लिए।’

तेजसिंह – ‘चलिए अब लश्कर में चलें, इस वक्त और कुछ करते बन न पड़ेगा।’

आधी रात जा चुकी होगी, जब ये लोग ऐयारी के सताए बदन से नंग-धड़ंग काँपते-कलपते लश्कर की तरफ रवाना हुए।

 

बयान – 5

तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी के जाने के बाद कुँवर वीरेंद्रसिंह इन लोगों के वापस आने के इंतजार में रात-भर जागते रह गए। ज्यों-ज्यों रात गुजरती थी कुमार की तबीयत घबराती थी। सवेरा होने ही वाला था जब ये तीनों ऐयार लश्कर में पहुँचे। तेजसिंह की राय हुई कि इसी तरह नंग-धड़ंग कुमार के पास चलना चाहिए, आखिर तीनों उसी तरह उनके खेमे में गए।

कुँवर वीरेंद्रसिंह जाग रहे थे, शमादान जल रहा था, इन तीनों ऐयारों की विचित्र सूरत देख हैरान हो गए। पूछा – ‘यह क्या हाल है?’ तेजसिंह ने कहा – ‘बस अभी तो सूरत देख लीजिए बाकी हाल जरा दम ले के कहेंगे।’

तीनों ऐयारों ने अपने-अपने कपड़े मँगवा कर पहरे, इतने में साफ सवेरा हो गया। कुमार ने तेजसिंह से पूछा – ‘अब बताओ तुम लोग किस बला में फँस गए?’

तेजसिंह – ‘ऐसा धोखा खाया कि जन्म भर याद करेंगे।’

कुमार – ‘वह क्या?’

तेजसिंह – ‘जिनके ऊपर आप जान दिए बैठे हैं, जिनकी खोज में हम लोग मारे-मारे फिरते हैं, इसमें तो कोई शक नहीं कि उनका भी प्रेम आपके ऊपर बहुत है, मगर न मालूम इतनी छिपी क्यों फिरती हैं और इसमें उन्होंने क्या फायदा सोचा है?’

कुमार – ‘क्या कुछ पता लगा?’

तेजसिंह – ‘पता क्या, आँख से देख आए हैं तभी तो इतनी सजा मिली। उनके साथ भी एक-से-एक बढ़ कर ऐयार हैं, अगर ऐसा जानते तो होशियारी से जाते।’

कुमार – ‘भला खुलासा कहो तो कुछ मालूम भी हो।’

तेजसिंह ने सब हाल कहा, कुमार सुन कर हँसने लगे और ज्योतिषी जी से बोले – ‘आपके रमल को भी उन लोगों ने धोखा दिया।’

ज्योतिषी – ‘कुछ न पूछिए, सब आफत हैं।’

कुमार – ‘उन लोगों का खुलासा हाल नहीं मालूम हुआ तो भला इतना ही विचार लेते कि शिवदत्त के ऐयारों की कुछ ऐयारी तो नहीं है?’

ज्योतिषी – ‘नहीं, शिवदत्त के ऐयारों से और उन लोगों से कोई वास्ता नहीं, बल्कि उन लोगों को इनकी खबर भी न होगी, इस बात को मैं खूब विचार चुका हूँ।

तेजसिंह – ‘इतनी ही खैरियत है।’

देवीसिंह – ‘आज दिन ही को चल कर पता लगाएँगे।’

तेजसिंह – ‘तिलिस्म तोड़ने का काम कैसे चलेगा?’

कुमार – ‘एक रोज काम बंद रहेगा तो क्या होगा?’

तेजसिंह – ‘इसी से तो मैं कहता हूँ कि चंद्रकांता की मुहब्बत आपके दिल से कम हो गई है।’

कुमार – ‘कभी नहीं, चंद्रकांता से बढ़ कर मैं दुनिया में किसी को नहीं चाहता मगर न मालूम क्या सबब है कि वनकन्या का हाल मालूम करने के लिए भी जी बेचैन रहता है।

तेजसिंह – (हँस कर) ‘खैर, पहले तो पंडित बद्रीनाथ ऐयार को ले जा कर उस खोह में कैद करना है फिर दूसरा काम देखेंगे, कहीं ऐसा न हो कि वे छूट के चल दें।’

कुमार – ‘आज ही ले जा कर छोड़ आओ।’

तेजसिंह – ‘हाँ, अभी उनको ले जाता हूँ, वहाँ रख कर रातों-रात लौट आऊँगा, पंद्रह कोस का मामला ही क्या है, तब तक देवीसिंह और ज्योतिषी जी वनकन्या की खोज में जाए।

तेजसिंह की राय पक्की ठहरी, वे स्नान-पूजा से छुट्टी पा कर तैयार हुए, खाने की चीजों में बेहोशी की दवा मिला कर बद्रीनाथ को खिलाई गईं और जब वे बेहोश हो गए तब तेजसिंह गट्ठर बाँध कर पीठ पर लाद खोह की तरफ रवाना हुए। कुमार ने देवीसिंह और ज्योतिषी जी को वनकन्या की टोह में भेजा।

तेजसिंह पंडित बद्रीनाथ की गठरी लिए शाम होते-होते तहखाने में पहुँचे। शेर के मुँह में हाथ डाल जुबान खींची और तब दूसरा ताला खोला, मगर दरवाजा न खुला। अब तो तेजसिंह के होश उड़ गए, फिर कोशिश की, लेकिन किवाड़ न खुला। बैठ के सोचने लगे, मगर कुछ समझ में न आया। आखिर लाचार हो बद्रीनाथ की गठरी लादे वापस हुए।

बयान – 6

देवीसिंह और ज्योतिषी जी वनकन्या की टोह में निकल कर थोड़ी ही दूर गए होंगे कि एक नकाबपोश सवार मिला। जिसने पुकार कर कहा – ‘देवीसिंह कहाँ जाते हो? तुम्हारी चालाकी हम लोगों से न चलेगी, अभी कल आप लोगों की खातिर की गई है और जल में गोते दे कर कपड़े सब छीन लिए गए, अब क्या गिरफ्तार ही होना चाहते हो? थोड़े दिन सब्र करो, हम लोग तुम लोगों को ऐयारी सिखला कर पक्का करेंगे तब काम चलेगा।’

नकाबपोश सवार की बातें सुन देवीसिंह मन में हैरान हो गए पर ज्योतिषी जी की तरफ देख कर बोले – ‘सुन लीजिए। यह सवार साहब हम लोगों को ऐयारी सिखानेवाला है’ नकाबपोश – ‘ज्योतिषी जी क्या सुनेंगे, यह भी तो शर्माते होंगे क्योंकि इनके रमल को हम लोगों ने बेकार कर दिया, हजार दफा फेंकें मगर पता खाक न लगेगा।’

देवीसिंह – ‘अगर इस इलाके में रहोगे तो बिना पता लगाए न छोड़ेंगे।’

नकाबपोश – ‘रहेंगे नहीं तो जाएँगे कहाँ? रोज मिलेंगे मगर पता न लगने देंगे।’

बात करते-करते देवीसिंह ने चालाकी से कूद कर सवार के मुँह पर से नकाब खींच ली। देखा कि तमाम चेहरे पर रोली मली हुई है, कुछ पहचान न सके।

सवार ने फुर्ती के साथ देवीसिंह की पगड़ी उतार ली और एक खत उनके सामने फेंक घोड़ा दौड़ा कर निकल गया। देवीसिंह ने शर्मिंदगी के साथ खत उठा कर देखा, लिफाफे पर लिखा हुआ था – ‘कुँवर वीरेंद्रसिंह’

ज्योतिषी जी ने देवीसिंह से कहा – ‘न मालूम ये लोग कहाँ के रहने वाले हैं। मुझे तो मालूम होता है कि इस मंडली में जितने हैं, सब ऐयार ही हैं।’

देवीसिंह – (खत जेब में रख कर) ‘इसमें तो शक नहीं, देखिए हर दफा हम ही लोग नीचा देखते हैं, समझा था कि नकाब उतार लेने से सूरत मालूम होगी, मगर उसकी चालाकी तो देखिए चेहरा रंग कर तब नकाब डाले हुए था।’

ज्योतिषी – ‘खैर, देखा जाएगा, इस वक्त तो फिर से लश्कर में चलना पड़ा क्योंकि खत कुमार को देना चाहिए, देखें इससे क्या हाल मालूम होता है? अगर इस पर कुमार का नाम न लिखा होता तो पढ़ लेते।’

देवीसिंह – ‘हाँ चलो, पहले खत का हाल सुन लें तब कोई कार्रवाई सोचें।’

दोनों आदमी लौट कर लश्कर में आए और कुँवर वीरेंद्रसिंह के डेरे में पहुँच कर सब हाल कह खत हाथ में दे दिया। कुमार ने पढ़ा, यह लिखा हुआ था –

‘चाहे जो हो, पर मैं आपके सामने तब तक नहीं आ सकती जब तक आप नीचे लिखी बातों का लिख कर इकरार न कर लें –

  1. चंद्रकांता से और मुझसे एक ही दिन एक ही सायत में शादी हो।
  1. चंद्रकांता से रुतबे में मैं किसी तरह कम न समझी जाऊँ क्योंकि मैं हर तरह हर दर्जे में उसके बराबर हूँ।

अगर इन दोनों बातों का इकरार आप न करेंगे तो कल ही मैं अपने घर का रास्ता लूँगी। सिवाय इसके यह भी कहे देती हूँ कि बिना मेरी मदद के चाहे आप हजार बरस भी कोशिश करें मगर चंद्रकांता को नहीं पा सकते।’

कुमार का इश्क वनकन्या पर पूरे दर्जे का था। चंद्रकांता से किसी तरह वनकन्या की चाह कम न थी, मगर इस खत को पढ़ने से उनको कई तरह की फिक्रों ने आ घेरा। सोचने लगे कि यह कैसे हो सकता है कि कुमारी से और इससे एक ही सायत में शादी हो, वह कब मंजूर करेगी और महाराज जयसिंह ही कब इस बात को मानेंगे। सिवाय इसके यहाँ यह भी लिखा है कि बिना मेरी मदद के आप चंद्रकांता से नहीं मिल सकते, यह क्या बात है? खैर, सो सब जो भी हो वनकन्या के बिना मेरी जिंदगी मुश्किल है, मैं जरूर उसके लिखे मुताबिक इकरारनामा लिख दूँगा, पीछे समझा जाएगा। कुमारी चंद्रकांता मेरी बात जरूर मान लेगी।

देवीसिंह और ज्योतिषी जी को भी कुमार ने वह खत दिखाया। वे लोग भी हैरान थे कि वनकन्या ने यह क्या लिखा और इसका जवाब क्या देना चाहिए।

दिन और रात-भर कुमार इसी सोच में रहे कि इस खत का क्या जवाब दिया जाए। दूसरे दिन सुबह होते-होते तेजसिंह भी पंडित बद्रीनाथ ऐयार की गठरी पीठ पर लादे हुए आ पहुँचे।

कुमार ने पूछा – ‘वापस क्यों आ गए?’

तेजसिंह – ‘क्या बताएँ मामला ही बिगड़ गया।’

कुमार – ‘सो क्या?’

तेजसिंह – ‘तहखाने का दरवाजा नहीं खुलता।’

कुमार – ‘किसी ने भीतर से तो बंद नहीं कर लिया।’

तेजसिंह – ‘नहीं भीतर तो कोई ताला ही नहीं है।’

ज्योतिषी – ‘दो बातों में से एक बात जरूर है, या तो कोई नया आदमी पहुँचा जिसने दरवाजा खोलने की कोशिश में बिगाड़ दिया, या फिर महाराज शिवदत्त ने भीतर से कोई चालाकी की।’

तेजसिंह – ‘भला शिवदत्त अंदर से बंद करके अपने को और बला में क्यों फँसाएँगे? इसमें तो उनका हर्ज ही है कुछ फायदा नहीं।’

कुमार – ‘कहीं वनकन्या ने तो कोई तरकीब नहीं की।’

तेजसिंह – ‘आप भी गजब करते हैं, कहाँ बेचारी वनकन्या कहाँ वह तिलिस्मी तहखाना।’

कुमार – ‘तुमको मालूम ही नहीं। उसने मुझे खत लिखा है कि – बिना मेरी मदद के तुम चंद्रकांता से नहीं मिल सकते। और भी दो बातें लिखी हैं। मैं इसी सोच में था कि क्या जवाब दूँ और वह कौन-सी बात है जिसमें मुझको वनकन्या की मदद की जरूरत पड़ेगी, मगर अब तुम्हारे लौट आने से शक पैदा होता है।’

देवीसिंह – ‘मुझे भी कुछ उन्हीं का बखेड़ा मालूम होता है।’

तेजसिंह – ‘अगर वनकन्या को हमारे साथ कुछ फसाद करना होता तो तिलिस्मी किताब क्यों वापस देती? देखिए उस खत में क्या लिखा है जो किताब के साथ आया था।’

ज्योतिषी – ‘यह भी तुम्हारा कहना ठीक है।’

तेजसिंह – (कुमार से) ‘भला वह खत तो दीजिए जिसमें वनकन्या ने यह लिखा है कि बिना हमारी मदद के चंद्रकांता से मुलाकात नहीं हो सकती।’

कुमार ने वह खत तेजसिंह के हाथ में दे दी, पढ़ कर तेजसिंह बड़े सोच में पड़ गए कि यह क्या बात है, कुछ अक्ल काम नहीं करती।

कुमार ने कहा – ‘तुम लोग यह जानते ही हो कि वनकन्या की मुहब्बत मेरे दिल में कैसा असर कर गई है, बिना देखे एक घड़ी चैन नहीं पड़ता, तो फिर उसके लिखे बमूजिब इकरारनामा लिख देने में क्या हर्ज है, जब वह खुश होगी तो उससे जरूर ही कुछ न कुछ भेद मिलेगा।’

तेजसिंह – ‘जो मुनासिब समझो कीजिए, चंद्रकांता बेचारी तो कुछ न बोलेगी मगर महाराज जयसिंह यह कब मंजूर करेंगे कि एक ही मड़वे में दोनों के साथ शादी हो। क्या जाने वह कौन, कहाँ की रहने वाली और किसकी लड़की है?’

कुमार – ‘उसकी खत में तो यह भी लिखा है कि मैं किसी तरह रुतबे में कुमारी से कम नहीं हूँ।’

ये बातें हो ही रही थीं कि चोबदार ने आ कर अर्ज किया – ‘एक सिपाही बाहर आया है और जो हाजिर होकर कुछ कहना चाहता है।’

कुमार ने कहा – ‘उसे ले आओ।’ चोबदार उस सिपाही को अंदर ले आया, सभी ने देखा कि अजीब रंग-ढंग का आदमी है। नाटा-सा कद, काला रंग, टाट का चपकन पायजामा जिसके ऊपर से लैस टंकी हुई, सिर पर दौरी की तरह बाँस की टोपी, ढाल-तलवार लगाए था। उसने झुक कर कुमार को सलाम किया।

सभी को उसकी सूरत देख कर हँसी आई मगर हँसी को रोका। तेजसिंह ने पूछा – ‘तुम कौन हो और कहाँ से आए हो?’ उस बाँके जवान ने कहा – ‘मैं देवता हूँ, दैत्यों की मंडली से आ रहा हूँ, कुमार से उस खत का जवाब चाहता हूँ जो कल एक सवार ने देवीसिंह और जगन्नाथ ज्योतिषी को दी थी।’

तेजसिंह – ‘भला तुमने ज्योतिषी जी और देवीसिंह का नाम कैसे जाना?’

बाँका – ‘ज्योतिषी जी को तो मैं तब से जानता हूँ जब से वे इस दुनिया में नहीं आए थे, और देवीसिंह तो हमारे चेले ही हैं।’

देवीसिंह – ‘क्यों बे शैतान, हम कब से तेरे चेले हुए? बेअदबी करता है?’

बाँका – ‘बेअदबी तो आप करते हैं कि उस्ताद को बे-बे करके बुलाते हैं, कुछ इज्जत नहीं करते।’

देवीसिंह – ‘मालूम होता है तेरी मौत तुझको यहाँ ले आई है।’

बाँका – ‘मैं तो स्वयं मौत हूँ।’

देवीसिंह – ‘इस बेअदबी का मजा चखाऊँ तुझको?’

बाँका – ‘मैं कुछ ऐसे-वैसे का भेजा नहीं आया हूँ, मुझको उसने भेजा है जिसको तुम दिन में साढ़े सत्रह दफा झुक कर सलाम करोगे।’

देवीसिंह और कुछ कहा ही चाहते थे कि तेजसिंह ने रोक दिया और कहा – ‘चुप रहो, मालूम होता है यह कोई ऐयार या मसखरा है, तुम खुद ऐयार होकर जरा दिल्लगी में रंज हो जाते हो।’

बाँका – ‘अगर अब भी न समझोगे तो समझाने के लिए मैं चंपा को बुला लाऊँगा।’

उस बाँके-टेढ़े जवान की बात पर सब लोग एकदम हँस पड़े, मगर हैरान थे कि वह कौन है? अजब तमाशा तो यह कि वनकन्या के कुल आदमी हम लोगों का रत्ती-रत्ती हाल जानते हैं और हम लोग कुछ नहीं समझ सकते कि वे कौन हैं।

तेजसिंह उस शैतान की सूरत को गौर से देखने लगे।

वह बोला – ‘आप मेरी सूरत क्या देखते हैं। मैं ऐयार नहीं हूँ, अपनी सूरत मैंने रंगी नहीं है, पानी मंगाइए धो कर दिखा दूँ, मैं आज से काला नहीं हूँ, लगभग चार सौ वर्षों से मेरा यही रंग रहा है।’

तेजसिंह हँस पड़े और बोले – ‘जो हो अच्छे हो, मुझे और जाँचने की कोई जरूरत नहीं, अगर दुश्मन का आदमी होता तो ऐसा करते भी मगर तुमसे क्या? ऐयार हो तो, मसखरे हो तो, इसमें कोई शक नहीं कि दोस्त के आदमी हो।’

यह सुन उसने झुक कर सलाम किया और कुमार की तरफ देख कर कहा – ‘मुझको जवाब मिल जाए क्योंकि बड़ी दूर जाना है।’

कुमार ने उसी खत की पीठ पर यह लिख दिया – ‘मुझको सब-कुछ दिलोजान से मंजूर है।’ बाद इसके अपनी अँगूठी से मोहर कर उस बाँके जवान के हवाले किया, वह खत ले कर खेमे के बाहर हो गया।

बयान – 7

आज तेजसिंह के वापस आने और बाँके-तिरछे जवान के पहुँच कर बातचीत करने और खत लिखने में देर हो गई, दो पहर दिन चढ़ आया। तेजसिंह ने बद्रीनाथ को होश में ला कर पहरे में किया और कुमार से कहा – ‘अब स्नान-पूजा करें फिर जो कुछ होगा सोचा जाएगा, दो रोज से तिलिस्म का भी कोई काम नहीं होता।’

कुमार ने दरबार बर्खास्त किया, स्नान-पूजा से छुट्टी पा कर खेमे में बैठे, ऐयार लोग और फतहसिंह भी हाजिर हुए। अभी किसी किस्म की बातचीत नहीं हुई थी कि चोबदार ने आ कर अर्ज किया – ‘एक बूढ़ी औरत बाहर हाजिर हुई है, कुछ कहना चाहती है, हम लोग पूछते हैं तो कुछ नहीं बताती, कहती है जो कुछ है कुमार से कहूँगी क्योंकि उन्हीं के मतलब की बात है।’

कुमार ने कहा – ‘उसे जल्दी अंदर लाओ।’ चोबदार ने उस बुढ़िया को हाजिर किया, देखते ही तेजसिंह के मुँह से निकला – ‘क्या पिशाचों और डाकिनियों का दरबा खुल पड़ा है?’

उस बुढ़िया ने भी यह बात सुन ली, लाल-लाल आँखें कर तेजसिंह की तरफ देखने लगी और बोली – ‘बस कुछ न कहूँगी जाती हूँ, मेरा क्या बिगड़ेगा, जो कुछ नुकसान होगा कुमार का होगा।’

यह कह कर खेमे के बाहर चली गई। कुमार का इशारा पा चोबदार समझा-बुझा कर उसे पुनः ले आया।

यह औरत भी अजीब सूरत की थी। उम्र लगभग सत्तर वर्ष के होगी, बाल कुछ-कुछ सफेद, आधे से ज्यादा दाँत गायब, लेकिन दो बड़े-बड़े और टेढ़े आगे वाले दाँत दो-दो अंगुल बाहर निकले हुए थे जिनमें जर्दी और कीट जमी हुई थी। मोटे कपड़े की साड़ी बदन पर थी जो बहुत ही मैली और सिर की तरफ से चिक्कट हो रही थी। बड़ी-सी पीतल की नथ नाक में और पीतल ही के घूँघरू पैर में पहने हुए थे।

तेजसिंह ने कहा – ‘क्यों क्या चाहती हो?’

बुढ़िया – ‘जरा दम ले लूँ तो कहूँ, फिर तुमसे क्यों कहने लगी जो कुछ है खास कुमार ही से कहूँगी।’

कुमार – ‘अच्छा मुझ ही से कह, क्या कहती है?’

बुढ़िया – ‘तुमसे तो कहूँगी ही, तुम्हारे बड़े मतलब की बात है।’ (खाँसने लगती है)

देवीसिंह – ‘अब डेढ़ घंटे तक खाँसेगी तब कहेगी?’

बुढ़िया – ‘फिर दूसरे ने दखल दिया।’

कुमार – ‘नहीं-नहीं, कोई न बोलेगा।’

बुढ़िया – ‘एक बात है, मैं जो कुछ कहूँगी तुम्हारे मतलब की कहूँगी, जिसको सुनते ही खुश हो जाओगे, मगर उसके बदले में मैं भी कुछ चाहती हूँ।’

कुमार – ‘हाँ-हाँ तुझे भी खुश कर देंगे।’

बुढ़िया – ‘पहले तुम इस बात की कसम खाओ कि तुम या तुम्हारा कोई आदमी मुझको कुछ न कहेगा, और मारने-पीटने या कैद करने का तो नाम भी न लेगा।’

कुमार – ‘जब हमारे भले की बात है तो कोई तुमको क्यों मारने या कैद करने लगा।’

बुढ़िया – ‘हाँ यह तो ठीक है, मगर मुझे डर मालूम होता है क्योंकि मैंने आपके लिए वह काम किया है कि अगर हजार बरस भी आपके ऐयार लोग कोशिश करते तो वह न होता, इस सबब से मुझे डर मालूम होता है कि कहीं आपके ऐयार लोग खार-खा कर मुझे तंग न करें।’

उस बूढ़ी की बात सुन कर सब दंग हो गए और सोचने लगे कि यह कौन-सा ऐसा काम कर आई है कि आसमान पर चढ़ी जाती है। आखिर कुमार ने कसम खाई कि चाहे तू कुछ कहे मगर हम या हमारा कोई आदमी तुझे कुछ न कहेगा।

तब वह फिर बोली – ‘मैं उस वनकन्या का पूरा पता आपको दे सकती हूँ और एक तरकीब ऐसी बता सकती हूँ कि आप घड़ी भर में बिल्कुल तिलिस्म तोड़ कर कुमारी चंद्रकांता से जा मिलें।’

बुढ़िया की बात सुन कर सब खुश हो गए। कुमार ने कहा – ‘अगर ऐसा ही है तो जल्द बता कि वह वनकन्या कौन है और घड़ी भर में तिलिस्म कैसे टूटेगा?’

बुढ़िया – ‘पहले मेरे इनाम की बात तो कर लीजिए।’

कुमार – ‘अगर तेरी बात सच हुई तो जो कहेगी वही इनाम मिलेगा।’

बुढ़िया – ‘तो इसके लिए कसम खाइए।’

कुमार – ‘अच्छा क्या इनाम लेगी, पहले यह तो सुन लूँ।’

बुढ़िया – ‘बस और कुछ नहीं केवल इतना ही कि आप मुझसे शादी कर लें, वनकन्या और चंद्रकांता से तो चाहे जब शादी हो मगर मुझसे आज ही हो जाए क्योंकि मैं बहुत दिनों से तुम्हारे इश्क में फँसी हुई हूँ, बल्कि तुम्हारे मिलने की तरकीब सोचते-सोचते बूढ़ी हो चली। आज मौका मिला कि तुम मेरे हाथ फँस गए, बस अब देर मत करो नहीं तो मेरी जवानी निकल जाएगी, फिर पछताओगे।’

बुढ़िया की बातें सुन मारे गुस्से के कुमार का चेहरा लाल हो गया और उनके ऐयार लोग भी दाँत पीसने लगे मगर क्या करें लाचार थे, अगर कुमार कसम न खा चुके होते तो ये लोग उस बूढ़ी की पूरी दुर्गति कर देते।

तेजसिंह ने ज्योतिषी जी से पूछा – ‘आप बताइए यह कोई ऐयार है या सचमुच जैसी दिखाई देती है वैसी ही है? अगर कुमार कसम न खाए होते तो हम लोग किसी तरकीब से मालूम कर ही लेते।’

ज्योतिषी जी ने अपनी नाक पर हाथ रख कर श्वांस का विचार करके कहा – ‘यह ऐयार नहीं है, जो देखते हो वही है।’ अब तो तेजसिंह और भी बिगड़े, बूढ़ी से कहा – ‘बस तू यहाँ से चली जा, हम लोग कुमार के कसम खाने को पूरा कर चुके कि तुझे कुछ न कहा, अगर अब जाने में देर करेगी तो कुतों से नुचवा डालूँगा। क्या तमाशा है। ऐसी-ऐसी चुड़ैलें भी कुमार पर आशिक होने लगीं।’

बुढ़िया ने कहा – ‘अगर मेरी बात न मानोगे तो पछताओगे, तुम्हारा सब काम बिगाड़ दूँगी, देखो उस तहखाने में मैंने कैसा ताला लगा दिया कि तुमसे खुल न सका, आखिर बद्रीनाथ की गठरी ले कर वापस आए, अब जा कर महाराज शिवदत्त को छुड़ा देती हूँ, फिर और फसाद करूँगी।’ यह कहती हुई गुस्से के मारे लाल-लाल आँखें किए खेमे के बाहर निकल गई, तेजसिंह के इशारे से देवीसिंह भी उसके पीछे चले गए।

कुमार – ‘क्यों तेजसिंह, यह चुड़ैल तो अजब आफत मालूम पड़ती है, कहती है कि तहखाने में मैंने ही ताला लगा दिया था।’

तेजसिंह – ‘क्या मामला है कुछ समझ में नहीं आता।’

ज्योतिषी – ‘अगर इसका कहना सच है तो हम लोगों के लिए यह एक बड़ी भारी बला पैदा हुई।’

तेजसिंह – ‘इसकी सच्चाई-झुठाई तो शिवदत्त के छूटने ही से मालूम हो जाएगी, अगर सच्ची निकली तो बिना जान से मारे न छोडूँगा।’

ज्योतिषी – ‘ऐसी को मारना ही जरूरी है।’

तेजसिंह – ‘कुमार ने कुछ यह कसम तो खाई नहीं है कि जन्म भर कोई उसको कुछ न कहेगा।’

कुमार – (लंबी साँस ले कर) ‘हाय, आज मुझको यह दिन भी देखना पड़ा।’

तेजसिंह – ‘आप चिंता न कीजिए, देखिए तो हम लोग क्या करते हैं, देवीसिंह उसके पीछे गए ही हैं कुछ पता लिए बिना नहीं आते।’

कुमार – ‘आजकल तुम लोगों की ऐयारी में उल्ली लग गई है। कुछ वनकन्या का पता लगाया, कुछ अब डाकिनी की खबर लगाओगे।’

कुमार की यह बात तेजसिंह और ज्योतिषी जी को तीर के समान लगी मगर कुछ बोले नहीं, सिर्फ उठ के खेमे के बाहर चले गए।

इन लोगों के चले जाने के बाद कुमार खेमे में अकेले रह गए, तरह-तरह की बातें सोचने लगे, कभी चंद्रकांता की बेबसी और तिलिस्म में फँस जाने पर, कभी तिलिस्म टूटने में देर और वनकन्या की खबर या ठीक-ठीक हाल न पाने पर, कभी इस बूढ़ी चुड़ैल की बातों पर जो अभी शादी करने आई थी अफसोस और गम करते रहे। तबीयत बिल्कुल उदास थी। आखिर दिन बीत गया और शाम हुई।

कुमार ने फतहसिंह को बुलाया, जब वे आए तो पूछा – ‘तेजसिंह कहाँ हैं?’

उन्होंने जवाब दिया – ‘कुछ मालूम नहीं, ज्योतिषी जी को साथ ले कर कहीं गए हैं?’

बयान – 8

देवीसिंह उस बुढ़िया के पीछे रवाना हुए। जब तक दिन बाकी रहा बुढ़िया चलती गई। उन्होंने भी पीछा न छोड़ा। कुछ रात गए तक वह चुड़ैल एक छोटे से पहाड़ के दर्रे में पहुँची जिसके दोनों तरफ ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ थीं। थोड़ी दूर इस दर्रे के अंदर जा वह एक खोह में घुस गई, जिसका मुँह बहुत छोटा, सिर्फ एक आदमी के जाने लायक था।

देवीसिंह ने समझा शायद यही इसका घर होगा, यह सोच पेड़ के नीचे बैठ गए। रात-भर उसी तरह बैठे रह गए मगर फिर वह बुढ़िया उस खोह में से बाहर न निकली। सवेरा होते ही देवीसिंह भी उसी खोह में घुसे।

उस खोह के अंदर बिल्कुल अंधकार था, देवीसिंह टटोलते हुए चले जा रहे थे। अगल-बगल जब हाथ फैलाते तो दीवार मालूम पड़ती जिससे जाना जाता कि यह खोह एक सुरंग के तौर पर है, इसमें कोई कोठरी या रहने की जगह नहीं है, लगभग दो मील गए होंगे कि सामने की तरफ चमकती हुई रोशनी नजर आई। जैसे-जैसे आगे जाते थे रोशनी बढ़ी मालूम होती थी, जब पास पहुँचे तो सुरंग के बाहर निकलने का दरवाजा देखा।

देवीसिंह बाहर हुए, अपने को एक छोटी-सी पहाड़ी नदी के किनारे पाया, इधर-उधर निगाह दौड़ा कर देखा तो चारों तरफ घना जंगल। कुछ मालूम न पड़ा कि कहाँ चले आए और लश्कर में जाने की कौन-सी राह है। दिन भी पहर-भर से ज्यादा जा चुका था। सोचने लगे कि उस बुढ़िया ने खूब छकाया, न मालूम वह किस राह से निकल कर कहाँ चली गई, अब उसका पता लगाना मुश्किल है। फिर इसी सुरंग की राह से फिरना पड़ा क्योंकि ऊपर से जंगल-जंगल लश्कर में जाने की राह मालूम नहीं, कहीं ऐसा न हो कि भूल जाएँ तो और भी खराबी हो, बड़ी भूल हुई कि रात को बूढ़ी के पीछे-पीछे हम भी इस सुरंग में न घुसे, मगर यह क्या मालूम था कि इस सुरंग में दूसरी तरफ निकल जाने के लिए रास्ता है।

देवीसिंह मारे गुस्से के दाँत पीसने लगे मगर कर ही क्या सकते थे? बुढ़िया तो मिली नहीं कि कसर निकालते, आखिर लाचार हो उसी सुरंग की राह से वापस हुए और शाम होते-होते लश्कर में पहुँचे।

कुमार के खेमे में गए, देखा कि कई आदमी बैठे हैं और वीरेंद्रसिंह फतहसिंह से बातें कर रहे हैं। देवीसिंह को देख सब कोई खेमे के बाहर चले गए सिर्फ फतहसिंह रह गए। कुमार ने पूछा – ‘क्यो उस बुढ़िया की क्या खबर लाए?’

देवीसिंह – ‘बूढ़ी ने तो बेहिसाब धोखा दिया।’

कुमार – ‘(हँस कर) ‘क्या धोखा दिया?’

देवीसिंह ने बुढ़िया के पीछे जा कर परेशान होने का सब हाल कहा जिसे सुन कर कुमार और भी उदास हुए।

देवीसिंह ने फतहसिंह से पूछा – ‘हमारे उस्ताद और ज्योतिषी जी कहाँ हैं?’

उन्होंने जवाब दिया – ‘बूढ़ी चुड़ैल के आने से कुमार बहुत रंज में थे, उसी हालत में तेजसिंह से कह बैठे कि तुम लोगों की ऐयारी में इन दिनों उल्ली लग गई। इतना सुन गुस्से में आ कर ज्योतिषी जी को साथ ले कहीं चले गए, अभी तक नहीं आए।’

देवीसिंह – ‘कब गए?’

फतहसिंह – ‘तुम्हारे जाने के थोड़ी देर बाद।’

देवीसिंह – ‘इतने गुस्से में उस्ताद का जाना खाली न होगा, जरूर कोई अच्छा काम करके आएँगे।’

कुमार – ‘देखना चाहिए।’

इतने में तेजसिंह और ज्योतिषी जी वहाँ आ पहुँचे। इस वक्त उनके चेहरे पर खुशी और मुस्कराहट झलक रही थी, जिससे सब समझे कि जरूर कोई काम कर आए हैं। कुमार ने पूछा – ‘क्यों क्या खबर है?’

तेजसिंह – ‘अच्छी खबर है।’

कुमार – ‘कुछ कहोगे भी कि इसी तरह?’

तेजसिंह – ‘आप सुन के क्या कीजिएगा?’

कुमार – ‘क्या मेरे सुनने लायक नहीं है?’

तेजसिंह – ‘आपके सुनने लायक क्यों नहीं है मगर अभी न कहेंगे।’

कुमार – ‘भला कुछ तो कहो?’

तेजसिंह – ‘कुछ भी नहीं।’

देवीसिंह – ‘भला उस्ताद हमें भी बताओगे या नहीं?’

तेजसिंह – ‘क्या! तुमने उस्ताद कह कर पुकारा इससे तुमको बता दें?’

देवीसिंह – ‘झख मारोगे और बताओगे।’

तेजसिंह – (हँस कर) ‘तुम कौन-सा जस लगा आए पहले यह तो कहो?’

देवीसिंह – ‘मैं तो आपकी शागिर्दी में बट्टा लगा आया।’

तेजसिंह – ‘तो बस हो चुका।’

ये बातें हो ही रही थीं कि चोबदार ने आ कर हाथ जोड़ अर्ज किया – ‘महाराज शिवदत्त के दीवान आए हैं।’

सुन कर कुमार ने तेजसिंह की तरफ देखा फिर कहा – ‘अच्छा आने दो, उनके साथ वाले बाहर ही रहें।’

महाराज शिवदत्त के दीवान खेमे में हाजिर हुए और सलाम करके बहुत-से जवाहरात नजर किया। कुमार ने हाथ से छू दिया।

दीवान ने अर्ज किया – ‘यह नजर महाराज शिवदत्त की तरफ से ले आया हूँ। ईश्वर की दया और आपकी कृपा से महाराज कैद से छूट गए हैं। आते ही दरबार करके हुक्म दे दिया कि आज से हमने कुँवर वीरेंद्रसिंह की ताबेदारी कबूल की, हमारे जितने मुलाजिम या ऐयार हैं वे भी आज से कुमार को अपना मालिक समझें, बाद इसके मुझको यह नजर और अपने हाथ का लिखा खत दे कर हुजूर में भेजा है, इस नजर को कबूल किया जाए।’

कुमार ने नजर कबूल कर तेजसिंह के हवाले की और दीवान साहब को बैठने का इशारा किया, वे खत दे कर बैठ गए।

कुछ रात जा चुकी थी, कुमार ने उसी वक्त दरबार आम किया, जब अच्छी तरह दरबार भर गया तब तेजसिंह को हुक्म दिया कि खत जोर से पढ़ो। तेजसिंह ने पढ़ना शुरू किया, लंबे-चौड़े सिरनामे के बाद यह लिखा था –

‘मैं किसी ऐसे सबब से उस तहखाने की कैद से छूटा जो आप ही की कृपा से छूटना कहला सकता है। आप जरूर इस बात को सोचेंगे कि मैं आपकी दया से कैसे छूटा, आपने तो कैद ही किया था, तो ऐसा सोचना न चाहिए। किसी सबब से मैं अपने छूटने का खुलासा हाल नहीं कह सकता और न हाजिर ही हो सकता हूँ। मगर जब मौका होगा और आपको मेरे छूटने का हाल मालूम होगा, यकीन हो जाएगा कि मैंने झूठ नहीं कहा था। अब मैं उम्मीद करता हूँ कि आप मेरे बिल्कुल कसूरों को माफ करके यह नजर कबूल करेंगे। आज से हमारा कोई ऐयार या मुलाजिम आपसे ऐयारी या दगा न करेगा और आप भी इस बात का ख्याल रखें।

– आपका शिवदत्त।’

इस खत को सुन कर सब खुश हो गए। कुमार ने हुक्म दिया कि पंडित बद्रीनाथ जी, जो हमारे यहाँ कैद हैं, लाए जाएँ। जब वे आए कुमार के इशारे से उनके हाथ-पैर खोल दिए गए। उन्हें भारी खिलअत पहना कर दीवान साहब के हवाले किया और हुक्म दिया कि आप दो रोज यहाँ रह कर चुनारगढ़ जाएँ।

फतहसिंह को उनकी मेहमानदारी के लिए हुक्म दे कर दरबार बर्खास्त किया।

बयान – 9

जब दरबार बर्खास्त हुआ आधी रात जा चुकी थी। फतहसिंह दीवान साहब को ले कर अपने खेमे में गए। थोड़ी देर बाद कुमार के खेमे में तेजसिंह, देवीसिंह, और ज्योतिषी जी फिर इकट्ठे हुए। उस वक्त सिवाय इन चारों आदमियों के और कोई वहाँ न था।

कुमार – ‘क्यों तेजसिंह, बुढ़िया की बात तो ठीक निकली।’

तेजसिंह – ‘जी हाँ, मगर महाराज शिवदत्त के खत से तो कुछ और ही बात पाई जाती है।’

देवीसिंह – ‘उसके लिखने का कौन ठिकाना, कहीं वह धोखा न देता हो।’

ज्योतिषी – ‘इस वक्त बहुत सोच-विचार कर काम करने का मौका है। चाहे शिवदत्त कैसी ही सफाई दिखाए मगर दुश्मन का विश्वास कभी न करना चाहिए।’

तेजसिंह – ‘आप ज्योतिषी हैं, विचारिए तो यह खत शिवदत्त ने सच्चे दिल से लिखी है या खुटाई रख कर।’

ज्योतिषी – (कुछ विचार कर) ‘यह खत तो उसने सच्चे दिल से लिखा है, मगर यह विश्वास नहीं होता कि आगे भी उसका दिल साफ बना रहेगा।’

तेजसिंह – ‘आजकल तो ऐसे-ऐसे मामले हो रहे हैं कि किसी के सिर-पैर का कुछ पता ही नहीं लगता। अगर यह खत उसने सच्चे दिल से ही लिखा है तो अपने छूटने का खुलासा हाल क्यों नहीं लिखा?’

ज्योतिषी – ‘इसका भी जरूर कोई सबब होगा।’

कुमार – ‘क्या आप रमल से नहीं बता सकते कि वह कैसे छूटा।’

ज्योतिषी – ‘जी नहीं, तिलिस्म में रमल काम नहीं करता और वह तहखाना तिलिस्मी है जिसमें महाराज शिवदत्त कैद किए गए थे।’

तेजसिंह – ‘कुछ समझ में नहीं आता।’

देवीसिंह – ‘वह चुड़ैल भी कोई पूरी ऐयार मालूम होती है।’

ज्योतिषी – ‘कभी नहीं, मैं सोच चुका हूँ, ऐयारी का तो वह नाम भी नहीं जानती।’

कुमार – ‘खैर, जो कुछ होगा देखा जाएगा, अब कल से तिलिस्म तोड़ने में जरूर हाथ लगाना चाहिए।’

तेजसिंह – ‘हाँ, कल जरूर तिलिस्म की कार्रवाई शुरू हो।’

कुमार – ‘अच्छा अब तुम लोग भी जाओ।’

तीनों ऐयार कुमार से विदा हो अपने-अपने डेरे में गए। दूसरे दिन कुँवर वीरेंद्रसिंह तीनों ऐयारों को साथ ले तिलिस्म में गए, तिलिस्मी किताब और ताली भी साथ ले ली। दालान में पहुँच कर तहखाने का ताला खोल पत्थर की चट्टान को निकाल कर अलग किया और नीचे उतर कर कोठरी में होते हुए बाग में पहुँचे जहाँ थोड़ी-सी जमीन खोद कर छोड़ आए थे।

उसी जमीन को ये लोग मिल कर फिर खोदने लगे। आठ-नौ हाथ जमीन खोदने के बाद एक संदूक मालूम पड़ा, जिसके ऊपर का पल्ला बंद था और ताले का मुँह एक छोटे से तांबे के पत्तर से ढ़का हुआ था, जिससे अंदर मिट्टी न जाने।

कुमार ने चाहा कि संदूक को बाहर निकाल लें मगर न हो सका, ज्यों-ज्यों चारों तरफ से मिट्टी हटाते थे, नीचे से संदूक चौड़ा निकल आता था। कोशिश करने पर भी इसका पता न लग सका कि वह जमीन में कितने नीचे तक गड़ा हुआ है। आखिर लाचार हो कर कुमार ने तिलिस्मी किताब खोली और पढ़ने लगे। यह लिखा हुआ था –

‘ताली में रस्सी बाँध कर जब बाग में उसे घसीटते फिरोगे तो एक जगह वह ताली जमीन से चिपक जाएगी। वहाँ की मिट्टी ताली उठा लेना, बाद इसके उस जमीन को खोदना, जब तक कि एक संदूक का मुँह न दिखाई पड़े। जब संदूक के ऊपर का हिस्सा निकल आए, खोदना बंद कर देना क्योंकि असल में यह संदूक नहीं दरवाजा है। बाग के बीचोंबीच जो फव्वारा है, उसके पूरब तरफ ठीक सात हाथ हट कर जमीन खोदना, एक हाँडी निकलेगी, उसी में उसकी ताली है, उसे ला कर उस तहखाने का ताला खोलना, सीढ़ियाँ दिखलाई पड़ेंगी, उसी रास्ते से नीचे उतरना।

भीतर से वह तहखाना बहुत अँधेरा और धुएँ से भरा हुआ होगा, खबरदार कोई रोशनी मत करना क्योंकि आग या मशाल के लगने ही से वह धुआँ जल उठेगा जिससे बड़ा उपद्रव होगा और तुम लोगों की जान न बचेगी। मुँह पर कपड़ा लपेट कर उस तहखाने में उतरना, टटोलते हुए जिधर रास्ता मिले जल्दी-जल्दी चले जाना जिससे नाक के रास्ते धुआँ दिमाग में न चढ़ने पाए। थोड़ी ही दूर जा कर एक चमकती कोठरी मिलेगी, जिसमें की कुल चीजें दिखाई पड़ती होंगी। तमाम कोठरी में नीचे से ऊपर तक तार लगे होंगे। बहुत खोज करने की कोई जरूरत नहीं, तलवार से जल्दी-जल्दी इन तारों को काट कर बाहर निकल आना।’

इतना पढ़ कर कुमार ने छोड़ दिया। लिखे बमूजिब बाग के बीचोंबीच वाले फव्वारे से सात हाथ पूरब हट कर जमीन खोदी, हाँडी निकली, उसमें से ताली निकाल कर तहखाने का मुँह खोला।

देवीसिंह ने कहा – ‘अब अपने-अपने मुँह पर कपड़ा लपेटते जाओ। तिलिस्म क्या है जान जोखम है, रोशनी मत करो, अँधेरा में टटोलते चलो, आँख रहते अंधे बनो और जल्दी-जल्दी चलो, दिमाग में धुआँ भी न चढ़ने पाए।’

देवीसिंह की बात सुन कर कुमार हँस पड़े। सभी ने मुँह पर कपड़े लपेटे और घुस कर चमकती हुई कोठरी में पहुँचे। जहाँ तक हो सका जल्दी-जल्दी उन तारों को काट कर तहखाने से बाहर निकल आए।

मुँह पर कपड़ा तो लपेटे हुए थे फिर पर भी थोड़ा-बहुत धुआँ दिमाग में चढ़ ही गया जिससे सभी की तबीयत घबरा गई। तहखाने के बाहर निकल कर दो घंटे तक चारों आदमी बेसुध पड़े रहे, जब होश-हवाश ठिकाने हुए तब तेजसिंह ने ज्योतिषी जी से पूछा – ‘अब दिन कितना बाकी है?’

उन्होंने जवाब दिया – ‘अभी चार घंटा बाकी है।’

कुमार ने कहा – ‘अब कोई काम करने का वक्त नहीं रहा। एक घंटे में क्या हो सकता है?’ ज्येतिषी जी की भी यही राय ठहरी। आखिर चारों आदमी बाग से बाहर रवाना हुए और कोठरी तथा तहखाने के रास्ते होकर खँडहर के दालान में आए। पहले की तरह चट्टान को तहखाने के मुँह पर रख, ताला बंद कर दिया और खँडहर के बाहर होकर अपने खेमे में चले आए।

थोड़ी देर आराम करने के बाद कुमार के जी में आया कि जरा जंगल में इधर-उधर घूम कर हवा खानी चाहिए। तेजसिंह से कहा, वह भी इस बात पर मुस्तैद हो गए, आखिर तीनों ऐयारों को साथ ले कर लश्कर के बाहर हुए। कुमार घोड़े पर और तीनों ऐयार पैदल थे।

कुमार धीरे-धीरे जा रहे थे। कोस भर के करीब गए होंगे कि एक मोटे से साखू के पेड़ में कुछ लिखा हुआ एक कागज चिपका नजर पड़ा।

तेजसिंह ने कहा – ‘देखो यह कैसा कागज चिपका है और क्या लिखा है?’ यह सुन कर देवीसिंह ने उस पेड़ के पास जा कर कागज पढ़ा, यह लिखा हुआ था-

‘क्यों, अब तुमको मालूम हुआ कि मैं कैसी आफत हूँ। कहती थी कि मुझसे शादी कर लो तो एक घंटे में तिलिस्म तोड़ कर चंद्रकांता से मिलने की तरकीब बता दूँ। लेकिन तुमने न माना, आखिर मैंने भी गुस्से में आ कर महाराज शिवदत्त को छुड़ा दिया। अब क्या इरादा है? शादी करोगे या नहीं? अगर मंजूर हो तो जवाब लिख कर इसी पेड़ से चिपका दो, मैं तुरंत तुम्हारे पास चली आऊँगी, और अगर नामंजूर हो तो साफ जवाब दे दो। अब की दफा मैं चंद्रकांता और चपला को जान से मार कलेजा ठंडा करूँगी। मुझे तिलिस्म में जाते कितनी देर लगती है। दिन में तेरह दफा जाऊँ और आऊँ। अपनी भलाई और मेरी जवानी की तरफ ख्याल करो। मेरे सामने तुम्हारे ऐयारों की ऐयारी कुछ न चलेगी। उस दिन देवीसिंह ने मेरा पीछा किया था मगर क्या कर सके? मेरी, मानो, जिद्द मत करो, मेरे ही कहने से शिवदत्त तुम्हारा दोस्त बना है, अब भी समझ जाओ।

– तुम्हारी सूरजमुखी।’

इसे पढ़ देवीसिंह ने हाथ के इशारे से सभी को अपने पास बुलाया और कहा – ‘आप लोग भी इसे पढ़ लीजिए।’

आखिर में ‘सूरजमुखी’ पढ़ कर सभी को हँसी आ गई। कुमार ने कहा – ‘देखो इस चुड़ैल ने अपना नाम कैसे मजे का लिखा है।’

तेजसिंह ने ज्योतिषी जी से कहा – ‘देखिए यह सब क्या लिखा है।’

ज्योतिषी जी ने जवाब दिया – ‘चाहे जो भी हो, मगर मैं भी ठीक कहे देता हूँ कि वह चुड़ैल कुमार का कुछ बिगाड़ नहीं सकती। इस लिखावट की तरफ ख्याल न कीजिए।’

कुमार ने कहा – ‘आपका कहना ठीक है मगर वह जो कहती है उसे कर दिखाती है।’

इतना कह कुमार आगे बढ़े। घूमते समय कई पेड़ों पर इसी तरह के लिखे हुए कागज चिपके हुए दिखाई पड़े। ज्योतिषी जी के कहने से कुमार की तबीयत न भरी, उदास हो कर अपने लश्कर में लौट आए और तीनों ऐयारों के साथ अपने खेमे में चले गए।

थोड़ी देर उसी सूरजमुखी की बातचीत होती रही। पहर रात गई होगी जब तेजसिंह ने कुमार से कहा – ‘हम लोग इस वक्त बालादवी को जाते हैं, शायद कोई नई बात नजर पड़ जाए।’ यह कह कर तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी कुमार से विदा हो गश्त लगाने चले गए। कुमार भी कुछ भोजन करके पलँग पर जा लेटे। नींद काहे को आनी थी, पड़े-पड़े कुमारी चंद्रकांता की बेबसी, वनकन्या की चाह, और बूढ़ी चुड़ैल की शैतानी को सोचते-सोचते आधी रात से भी ज्यादा गुजर गई। इतने में खेमे के अंदर किसी के आने की आहट मिली, दरवाजे की तरफ देखा तो तेजसिंह नजर पड़े। बोले – ‘कहो तेजसिंह, कोई नई खबर लाए क्या।’

तेजसिंह – ‘हाँ एक बढ़िया चीज हाथ लगी है?’

कुमार – ‘क्या है? कहाँ है? देखूँ।’

तेजसिंह – ‘खेमे के बाहर चलिए तो दिखाऊँ।’

कुमार – ‘चलो।’

कुँवर वीरेंद्रसिंह तेजसिंह के पीछे-पीछे खेमे के बाहर हुए। देखा कि कुछ दूर पर रोशनी हो रही है और बहुत से आदमी इकट्ठे हैं। पूछा – ‘यह भीड़ कैसी है?’

तेजसिंह ने कहा – ‘चलिए देखिए, बड़ी खुशी की बात है।’

कुमार के पास पहुँचते ही भीड़ हटा दी गई। कई मशाल जल रहे थे जिनकी रोशनी में कुमार ने देखा कि क्रूरसिंह की खून से भरी हुई लाश पड़ी है। कलेजे में एक खंजर घुसा हुआ, अभी तक मौजूद है।

कुमार ने तेजसिंह से कहा – ‘क्यों तेजसिंह, आखिर तुमने इसको मार ही डाला।’

तेजसिंह – ‘भला हम लोग एकाएक इस तरह किसी को मारते हैं?’

कुमार – ‘तो फिर किसने मारा?’

तेजसिंह – ‘मैं क्या जानूँ।’

कुमार – ‘फिर लाश को कहाँ से लाए?’

तेजसिंह – ‘बालादवी करते (गश्त लगाते) हम लोग इस तिलिस्मी खँडहर के पिछवाड़े चले गए। दूर से देखा कि तीन-चार आदमी खड़े हैं। जब तक हम लोग पास जाएँ, वे सब भाग गए। देखा तो क्रूर की लाश पड़ी थी। तब देवीसिंह को भेज यहाँ से डोली और कहार मँगवाए और इस लाश को ज्यों का त्यों उठवा लाए, अभी मरा नहीं है, बदन गर्म है मगर बचेगा नहीं।’

कुमार – ‘बड़े ताज्जुब की बात है। इसे किसने मारा? अच्छा वह खंजर तो निकालो जो इसके कलेजे में घुसा हुआ है।’

तेजसिंह ने खंजर निकाला और पानी से धो कर कुमार के पास लाए। मशाल की रोशनी में उसके कब्जे पर निगाह की तो कुछ खुदा हुआ मालूम पड़ा। खूब गौर करके देखा तो बारीक हरफों में ‘चपला’ का नाम खुदा हुआ था।

तेजसिंह ने ताज्जुब से कहा – ‘देखिए इस पर तो चपला का नाम खुदा है और इस खंजर को मैं बखूबी पहचानता हूँ, यह बराबर चपला के कमर में बँधा रहता था, मगर फिर यहाँ कैसे आया? क्या चपला ही ने इसे मारा है?’

देवीसिंह – ‘चपला बेचारी तो खोह में कुमारी चंद्रकांता के पास बैठी होगी जहाँ चिराग भी न जलता होगा।’

कुमार – ‘तो वहाँ से इस खंजर को कौन लाया?’

तेजसिंह – ‘इसके सिवाय यह भी सोचना चाहिए कि क्रूरसिंह यहाँ क्यों आया? वह तो महाराज शिवदत्त के साथ था और उनका दीवान खुद ही आया हुआ है जो कहता है कि महाराज अब आपसे दुश्मनी नहीं करेंगे।

कुमार – ‘किसी को भेज कर महाराज शिवदत्त के दीवान को बुलाओ।’

तेजसिंह ने देवीसिंह को कहा कि तुम ही जा कर बुला लाओ। देवीसिंह गए, उन्हें नींद से उठा कर कुमार का संदेशा दिया, वे बेचारे भी घबराए हुए जल्दी-जल्दी कुमार के पास आए। फतहसिंह भी उसी जगह पहुँचे। दीवान साहब क्रूरसिंह की लाश देखते ही बोले – ‘बस यह बदमाश तो अपनी सजा को पहुँच चुका मगर इसके साथी अहमद और नाजिम बाकी हैं, उनकी भी यही गति होती तो कलेजा ठंडा होता।’

कुमार ने पूछा – ‘क्या यह आपके यहाँ अब नहीं है।’

दीवान साहब ने जवाब दिया – ‘नहीं, जिस रोज महाराज तहखाने से छूट कर आए और हुक्म दिया कि हमारे यहाँ का कोई भी आदमी कुमार के साथ दुश्मनी का ख्याल न रखे उसी वक्त क्रूरसिंह अपने बाल-बच्चों तथा नाजिम और अहमद को साथ ले कर चुनारगढ़ से भाग गया, पीछे महाराज ने खोज भी कराई मगर कुछ पता न लगा।’

देखते-देखते क्रूरसिंह ने तीन-चार दफा हिचकी ली और दम तोड़ दिया।

कुमार ने तेजसिंह से कहा – ‘अब यह मर गया, इसको ठिकाने पहुँचाओ और खंजर को तुम अपने पास रखो, सुबह देखा जाएगा।’ तेजसिंह ने क्रूरसिंह की लाश को उठवा दिया और सब अपने-अपने खेमे में गए।

बयान – 10

सुबह को कुमार ने स्नान-पूजा से छुट्टी पा कर तिलिस्म तोड़ने का इरादा किया और तीनों ऐयारों को साथ ले तिलिस्म में घुसे। कल की तरह तहखाने और कोठरियों में से होते हुए उसी बाग में पहुँचे। स्याह पत्थर के दालान में बैठ गए और तिलिस्मी किताब खोल कर पढ़ने लगे, यह लिखा हुआ था –

‘जब तुम तहखाने में उतर धुएँ से जो उसके अंदर भरा होगा दिमाग को बचा कर तारों को काट डालोगे, तब उसके थोड़ी ही देर बाद कुल धुआँ जाता रहेगा। स्याह पत्थर की बारहदरी में संगमरमर के सिंहासन पर चौखूटे सुर्ख पत्थर पर कुछ लिखा हुआ तुमने देखा होगा, उसके छूने से आदमी के बदन में सनसनाहट पैदा होती है, बल्कि उसे छूने वाला थोड़ी देर में बेहोश हो कर गिर पड़ता है, मगर ये कुल बातें उन तारों के कटने से जाती रहेंगी क्योंकि अंदर-ही-अंदर यह तहखाना उस बारहदरी के नीचे तक चला गया है और उसी सिंहासन से उन तारों का लगाव है जो नीचे मसालों और दवाइयों में घुसे हुए हैं। दूसरे दिन फिर धुएँ वाले तहखाने में जाना, धुआँ बिल्कुल न पाओगे। मशाल जला लेना और बेखौफ जा कर देखना कि कितनी दौलत तुम्हारे वास्ते वहाँ रखी हुई है। सब बाहर निकाल लो और जहाँ मुनासिब समझो रखो। जब तक बिल्कुल दौलत तहखाने में से निकल न जाए, तब तक दूसरा काम तिलिस्म का मत करो। स्याह बारहदरी में संगमरमर के सिंहासन पर जो चौखूँटा सुर्ख पत्थर रखा है उसको भी ले जाओ। असल में वह एक छोटा-सा संदूक है, जिसके भीतर बहुत-सी नायाब चीजें हैं। उसकी ताली इसी तिलिस्म में तुमको मिलेगी।’

कुमार ने इन सब बातों को फिर दोहरा के पढ़ा, बाद उसके उस धुएँ वाले तहखाने में जाने को तैयार हुए। तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी तीनों ने मशाल बाल ली और कुमार के साथ उस तहखाने में उतरे। अंदर उसी कोठरी में गए जिसमें बहुत-सी तारें काटी थीं। इस वक्त रोशनी में मालूम हुआ कि तारें कटी हुई इधर-उधर फैल रही हैं, कोठरी खूब लंबी-चौड़ी है। सैकड़ों लोहे और चाँदी के बड़े-बड़े संदूक चारों तरफ पड़े हैं, एक तरफ दीवार में खूँटी के साथ तालियों का गुच्छा भी लटक रहा है।

कुमार ने उस ताली के गुच्छे को उतार लिया। मालूम हुआ कि इन्हीं संदूकों की ये तालियाँ हैं। एक संदूक को खोल कर देखा तो हीरे के जड़ाऊ जनाने जेवरों से भरा पाया, तुरंत बंद कर दिया और दूसरे संदूक को खोला, कीमती हीरों से जड़ी नायाब कब्जों की तलवारें और खंजर नजर आए। कुमार ने उसे भी बंद कर दिया और बहुत खुश हो कर तेजसिंह से कहा – ‘बेशक इस कोठरी में बड़ा भारी खजाना है। अब इसको यहाँ खोल कर देखने की कोई जरूरत नहीं, इन संदूकों को बाहर निकलवाओ, एक-एक करके देखते और नौगढ़ भिजवाते जाएँगे। जहाँ तक हो जल्दी इन सभी को उठवाना चाहिए।’

तेजसिंह ने जवाब दिया – ‘चाहे कितनी ही जल्दी की जाए मगर दस रोज से कम में इन संदूकों का यहाँ से निकलना मुश्किल है। अगर आप एक-एक को देख कर नौगढ़ भेजने लगेगे तो बहुत दिन लग जाएँगे और तिलिस्म तोड़ने का काम अटका रहेगा, इससे मेरी समझ में यह बेहतर है कि इन संदूकों को बिना देखे ज्यों-का-त्यों नौगढ़ भेजवा दिया जाए। जब सब कामों से छुट्टी मिलेगी तब खोल कर देख लिया जाएगा। ऐसा करने से किसी को मालूम भी न होगा कि इसमें क्या निकला और दुश्मनों की आँख भी न पड़ेगी। न मालूम कितनी दौलत इसमें भरी हुई है जिसकी हिफाजत के लिए इतना बड़ा तिलिस्म बनाया गया।’

इस राय को कुमार ने पसंद किया और देवीसिंह और ज्योतिषी जी ने भी कहा कि ऐसा ही होना चाहिए। चारों आदमी उस तहखाने के बाहर हुए और उसी मालूमी रास्ते से खँडहर के दालान में आ कर पत्थर की चट्टान से ऊपर वाले तहखाने का मुँह ढाँप, तिलिस्मी ताली से बंद कर, खँडहर से बाहर हो अपने खेमे में चले आए।

आज ये लोग बहुत जल्दी तिलिस्म के बाहर हुए। अभी कुल दो पहर दिन चढ़ा था। कुमार ने तिलिस्म की और खजाने की तालियों का गुच्छा तेजसिंह के हवाले किया और कहा कि अब तुम उन संदूकों को निकलवा कर नौगढ़ भेजवाने का इंतजाम करो।’

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