आप यहाँ हैं
होम > कथा साहित्य > चंद्रकांता संतति-भाग-1 (बयान-11 से 15)

चंद्रकांता संतति-भाग-1 (बयान-11 से 15)

बयान – 11

सूर्य भगवान अस्त होने के लिए जल्दी कर रहे हैं, शाम की ठंडी हवा अपनी चाल दिखा रही है। आसमान साफ है क्योंकि अभी-अभी पानी बरस चुका है और पछुआ हवा ने रुई के पहल की तरह जमे हुए बादलों को तूम-तूमकर उड़ा दिया है। अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा ने आसमान पर अपना दखल जमा लिया है और निकले हुए इंद्रधनुष पर की शोभा और उसके रंगदार जौहर को अच्छी तरह उभाड़ रखा है। बाग की रविशों पर जिन पर कुदरती भिश्ती अभी घंटा भर हुआ छिड़काव कर गया है, घूम-घूमकर देखने से धुले-धुलाये रंग-बिरंगे पत्तों की कैफियत और उन सफेद कलियों की बहार दिल और जिगर को क्या ही ताकत दे रही है जिनके एक तरफ का रंग तो असली मगर दूसरा हिस्सा अस्त होते हुए सूर्य की लालिमा पड़ने से ठीक सुनहला हो रहा है। उस तरफ से आये हुए खुशबू के झपेटे कहे देते हैं कि अभी तक तो आप दृष्टांत ही में अनहोनी समझकर कहा-सुना करते थे मगर आज ‘सोने और सुगंध’ वाली कहावत देखिए अपनी आंखों के सामने मौजूद ये अधखिली कलियां सच किए देती हैं। चमेली की टट्टियों में नाजुक-नाजुक सफेद फूल तो खिले हुए हई हैं मगर कहीं-कहीं पत्तियों में से छनकर आई हुई सूर्य की आखिरी किरणें धोखे में डालती हैं। यह समझकर कि आज इन्हीं सफेद चमेलियों में जर्द चमेली भी खिली हुई है शौक भरा हाथ बिना बढ़े नहीं रहता। सामने की बनाई हुई सब्जी जिसकी दूब सावधानी से काटकर मालियों ने सब्ज मखमली फर्श का नमूना दिखला दिया है, आंखों को क्या ही तरावट दे रही है! देखिये उसी के चारों तरफ सजे हुए गमलों में खुशरंग पत्तों वाले छोटे-छोटे जंगली पौधे अपने हुस्न और जमाल के घमंड में कैसे ऐंठे जाते हैं। हर एक रविशों और क्यारियों के किनारे गुलमेंहदी के पेड़ ठीक पल्टनों की कतार की तरह खड़े दिखाई देते हैं, क्योंकि छुटपने ही से उनकी फैली हुई डालियां काटकर मालियों ने मनमानी सूरतें बना डाली हैं। कहने ही को सूरजमुखी का फूल सूर्य की तरफ घूमा रहता है मगर नहीं यहां तो देखिये सामने सूरजमुखी के कितने ही पेड़ लगे हैं जिनके बड़े-बड़े फूल अस्त होते हुए दिवाकर की तरफ पीठ किए हसरत भरी निगाहों से देखती हुई उस हसीन नाजनीन को अलौकिक रूप की छटा दे रहे हैं जो उस बाग में बीचोंबीच बने हुए कमरे की छत पर खड़ी उसी तरफ देख रही है जिधर सूर्य भगवान अस्त होते दिख रहे हैं। उधर ही से बाग में आने का रास्ता है, मालूम होता है वह किसी आने वाले की राह देख रही है, तभी तो सूर्य की किरणों को सहकर भी एकटक उधर ही ध्यान लगाये है।

इस कमसिन परीजमाल का चेहरा पसीने से भर गया मगर किसी आने वाले की सूरत न दीख पड़ी। घबराकर बायें हाथ अर्थात दक्खिन तरफ मुड़ी और उस बनावटी छोटे-से पहाड़ को देखकर दिल बहलाना चाहा जिसमें रंग-बिरंगे खुशनुमा पत्तों वाले करोटन, कौलियस, बरबीना, बिगूनिया, मौस इत्यादि पहाड़ों पर के छोटे-छोटे पौधे बहुत ही कारीगरी से लगाये हुए थे, और बीच में मौके-मौके से घुमा-फिराकर पेड़ों को तरी पहुंचाने और पहाड़ी की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए नहर काटी हुई थी। ऊपर ढांचा खड़ा करके निहायत खूबसूरत रेशमी जाल इसलिए डाला हुआ था कि हर तरह की बोलियों से दिल खुश करने वाली उन रंग-बिरंगी नाजुक चिड़ियों के उड़ जाने का खौफ न रहे जो उनके अंदर छोड़ी हुई हैं और इस समय शाम होते देख अपने घोंसलों में जो पत्तों के गुच्छों में बनाए हैं जा बैठने के लिए उतावली हो रही हैं।

हाय इस पहाड़ी की खूबसूरती से भी उसका परेशान और किसी की जुदाई में व्याकुल दिल न बहला, लाचार छत के ऊपर की तरफ खड़ी हो उन तरह-तरह के नक्शों वाली क्यारियों को देख अपने घबड़ाये हुए दिल को फुसलाना चाहा, जिनमें नीले, पीले, हरे, लाल, चौरंगे नाजुक मौसमी फूलों के छोटे-छोटे तख्ते सजाये हुए थे जिनके देखने से बेशकीमती गलीचे का गुमान हो रहा था और उसी के बीच में एक चक्करदार फव्वारा छूट रहा था जिसके बारीक धारों का जाल दूर-दूर तक फैल रहा था। रंग-बिरंगी तितलियां उड़-उड़कर उन रंगीन फूलों पर इस तरह बैठती थीं कि फूलों में और उनमें बिल्कुल फर्क नहीं मालूम पड़ता था जब तक कि वे फिर से उड़कर किसी दूसरे फूलों के गुच्छों पर न जा बैठतीं।

इन फूलों और फव्वारों के छींटों ने भी उसके मन की कली न खिलाई, लाचार वह पूरब तरफ आई और अपनी उन सखियों की कार्रवाई देखने लगी जो चुन-चुनकर खुशबूदार फूलों के गजरों और गुच्छों को बनाने में अपने नाजुक हाथों को तकलीफ दे रही थीं। कोई अंगूर की टट्टियों में घुसकर लाल पके हुए अंगूरों की ताक में थी, कोई पके हुए आम तोड़ने की धुन में उन पेड़ों की डालियों तक लग्घे पहुंचा रही थी जिनके नीचे चारों तरफ गड्ढे खुदवा कर इसलिए जल से भरवा दिये गये थे कि पेड़ से गिरे हुए आम टुटीले न होने पावें।

अब सूर्य की लालिमा बिल्कुल जाती रही और धीरे-धीरे अंधेरा होने लगा। वह बेचारी किसी तरह अपने दिल को न बहला सकी बल्कि अंधेरे में बाग के चारों तरफ के बड़े-बड़े पेड़ों की सूरत डरावनी मालूम होने लगी, दिल की धड़कन बढ़ती ही गई, लाचार वह छत से नीचे उतर आई और एक सजे-सजाये कमरे में चली गई।

इस कमरे की सजावट मुख्तसर ही थी, एक झाड़ और दस-बारह हांडियां छत से लटक रही थीं, चारों तरफ दुशाखी दीवारगीरों में मोमबत्तियां जल रही थीं, जमीन पर फर्श बिछा हुआ था और एक तरफ गद्दी लगी हुई थी जिसके आगे दो फर्शी झाड़ अपनी चमक-दमक दिखा रहे थे। उनके बगल ही में एक मसहरी थी जिस पर थोड़े-से खुशबूदार फूल और दो-तीन गजरे दिखाई दे रहे थे। अच्छे-अच्छे कपड़ों और गहनों से दिमागदार बनी हुई दस-बारह कमसिन छोकरियां भी इधर-उधर घूम-घूमकर ताखों (आलों) पर रखे हुए गुलदस्तों में फूलों के गुच्छे सजा रही थीं।

वह नाजनीन जिसका नाम किशोरी था कमरे में आई मगर गद्दी पर न बैठकर मसहरी पर जा लेटी और आंचल से मुंह ढांप न मालूम क्या सोचने लगी। उन्हीं छोकरियों में से एक पंखा झलने लगी, बाकी अपने मालिक को उदास देखकर सुस्त खड़ी हो गयीं मगर निगाहें सभी की मसहरी की तरफ ही थीं।

थोड़ी देर तक इस कमरे में सन्नाटा रहा, इसके बाद किसी आने वाले की आहट मालूम हुई। सभी की निगाहें सदर दरवाजे की तरफ घूम गयी। किशोरी ने भी मुंह फेरा और उसी तरफ देखने लगी। एक नौजवान लड़का सिपाहियाना ठाठ से कमरे में पहुंचा जिसे देखते ही किशोरी घबड़ाकर उठ बैठी और बोली –

”कमला, मैं कब से राह देख रही हूं! तैंने इतने दिन क्यों लगाये’

पाठक समझ गये होंगे कि यह सिपाहियाना ठाठ से आने वाला नौजवान लड़का असल में मर्द नहीं है बल्कि कमला के नाम से पुकारी जाने वाली कोई ऐयारा है।

कमला – यही सोच के मैं चली आई कि तुम घबड़ा रही होंगी नहीं तो दो दिन का काम और था।

किशोरी – क्या अभी पूरा हाल मालूम नहीं हुआ

कमला – नहीं।

किशोरी – चुनार में तो हलचल खूब मची होगी!

कमला – इसका क्या पूछना है! मुझे भी जो कुछ थोड़ा-बहुत हाल मिला वह चुनार ही में।

किशोरी – अच्छा क्या मालूम हुआ

कमला – बूढ़े सौदागर की सूरत बना जब मैं तुम्हारी तस्वीर जड़ी अंगूठी दे आई उसी समय से उनकी सूरत-शक्ल, बातचीत और चाल-ढाल में फर्क पड़ गया, दूसरे दिन मेरी (सौदागर की) बहुत खोज की गई।

किशोरी – इसमें कोई शक नहीं कि मेरी आह ने अपना असर किया! हां फिर क्या हुआ

कमला – उसके दूसरे या तीसरे दिन उन्हें उदास देख आनंदसिंह किश्ती पर हवा खिलाने ले गये, साथ में एक बूढ़ा नौकर भी था। बहाव की तरफ कोस-डेढ़ कोस जाने के बाद किनारे के जंगल से गाने-बजाने की आवाज आई, उन्होंने किश्ती किनारे लगाई और उतरकर देखने लगे। वहां तुम्हारी सूरत बना माधवी ने पहले ही जाल फैला रखा था, यहां तक कि उसने अपना मतलब साध लिया और न मालूम किस ढंग से उन्हें लेकर गायब हो गई। उस बूढ़े नौकर की जुबानी जो उनके साथ गया था मालूम हुआ कि माधवी के साथ कई औरतें भी थीं जो इन दोनों भाइयों को देखते ही भागीं। आनंदसिंह उन औरतों के पीछे लपके लेकिन वे भुलावा देकर निकल गयीं और आनंदसिंह ने लौटकर आने पर अपने भाई को भी न पाया, तब गंगा किनारे पहुंच डोंगी पर बैठे हुए खिदमतगार से सब हाल कहा।

किशोरी – यह कैसे मालूम हुआ कि माधवी ने मेरी सूरत बनाकर धोखा दिया

कमला – लौटते समय जब मैं उस जंगल के कुछ इधर निकल आई जो अब बिल्कुल साफ हो गया है, तो जमीन पर पड़ी हुई एक जड़ाऊ ‘कंकनी’ नजर आई। उठाकर देखा मैं उस कंकनी को खूब पहचानती थी, कई दफे माधवी के हाथ में देख चुकी थी, बस मुझे पूरा यकीन हो गया कि यह काम इसी का है। आखिर उसके घर पहुंची और उसकी हमजोलियों की बातचीत से निश्चय कर लिया।

किशोरी – देखो रांड़ ने मेरे ही साथ दगाबाजी की।

कमला – कैसी कुछ!

किशोरी – तो इंद्रजीतसिंह अब उसी के घर में होंगे!

कमला – नहीं, अगर वहां होते तो क्या मैं इस तरह खाली लौट आती

किशोरी – फिर उन्हें कहां रखा है?

कमला – इसका पता नहीं लगा, मैंने चाहा था कि खोज लगाऊं मगर तुम्हारी तरफ खयाल करके दौड़ी आई।

किशोरी – (ऊंची सांस लेकर) हाय, उस शैतान की बच्ची ने मेरा ध्यान उनके दिल से निकाल दिया होगा!!

इतना कह किशोरी रोने लगी, यहां तक कि हिचकी बंध गई। कमला ने उसे बहुत समझाया और कसम खाकर कहा कि मैं अन्न उसी दिन खाऊंगी जिस दिन इंद्रजीतसिंह को तुम्हारे पास ला बैठाऊंगी।

पाठक इस बात को जानने की इच्छा रखते होंगे कि यह किशोरी कौन है इसका नाम हम पहले लिख आये हैं और अब फिर कहे देते हैं कि यह महाराज शिवदत्त की लड़की है, मगर यह किसी दूसरे मौके से मालूम होगा कि किशोरी शिवदत्तगढ़ के बाहर क्यों कर दी गई या बाप का घर छोड़ अपने ननिहाल में क्यों दिखाई देती है।

थोड़ी देर सन्नाटा रहने के बाद फिर किशोरी और कमला में बातचीत होने लगी।

किशोरी – कमला, तू अकेली क्या कर सकेगी

कमला – मैं तो वह कर सकूंगी जो चपला और चंपा के किये भी न हो सकेगा।

किशोरी – तो क्या आज तू फिर जायगी

कमला – हां जरूर जाऊंगी, मगर दो-एक बातों का फैसला आज ही तुमसे कर लूंगी, नहीं तो पीछे बदनामी देने को तैयार होओगी।

किशोरी – बहिन, ऐसी क्या बात है, जो मैं तुझी पर बदनामी देने पर उतारू हो जाऊंगी एक तू ही तो मेरी दुख-सुख की साथी है।

कमला – यह सब सच है, मगर आपस का मामला बहुत टेढ़ा होता है।

किशोरी – खैर कुछ कह तो सही

कमला – कुंअर इंद्रजीतसिंह को तुम चाहती हो, इसी सबब से उनके कुटुंब भर की भलाई तुम अपना धर्म समझती हो, मगर तुम्हारे पिता से और उस घराने से पूरा वैर बंध रहा है, ताज्जुब नहीं कि तुम्हारी और इंद्रजीतसिंह की भलाई करते-करते मेरे सबब से तुम्हारे पिता को तकलीफ पहुंचे, अगर ऐसा हुआ तो बेशक तुम्हें रंज होगा

किशोरी – इन बातों को न सोच, मैंने तो उसी दिन अपने घर को इस्तीफा दे दिया जिस दिन पिता ने मुझे निकाल बाहर किया, अगर ननिहाल में मेरा ठिकाना न होता या मेरे नाना का उनको खौफ न होता तो शायद वे उसी दिन मुझे बैकुंठ पहुंचा देते। अब मुझे उस घर से रत्ती भर मुहब्बत नहीं है। पर बहिन, तूने यह बड़ा काम किया कि उस दुष्टा को वहां से निकाल लाई और मेरे हवाले किया। जब मैं गम की मारी घबड़ा जाती हूं तभी उस पर दिल का बुखार निकालती हूं जिससे कुछ ढाढ़स हो जाता है।

कमला – मुझे तो अभी तक उसके ऊपर गुस्सा निकालने का मौका ही न मिला, कहो तो आज चलते-चलते मैं भी कुछ बुखार निकाल लूं

किशोरी – क्या हर्ज है, जा ले आ।

कमला कमरे के बाहर चली गई। उसके पीछे आधे घंटे तक किशोरी को चुपचाप कुछ सोचने का मौका मिला। उसकी सहेलियां वहां मौजूद थीं मगर किसी को बोलने का हौसला नहीं पड़ा।

आधे घंटे बाद कमला एक कैदी औरत को लिए हुए फिर उस कमरे में दाखिल हुई।

इस औरत की उम्र तीस वर्ष से कम न होगी, चेहरे-मोहरे और रंगत से दुरुस्त थी, कह सकते हैं कि अगर इसे अच्छे कपड़े और गहने पहिराये जायें तो बेशक हसीनों की पंक्ति में बैठाने लायक हो, पर न मालूम इसकी ऐसी दुर्दशा क्यों कर रखी है और किस कसूर पर कैदी बना डाला है!

इस औरत को देखते ही किशोरी का चेहरा लाल हो गया और मारे गुस्से के तमाम बदन थर-थर कांपने लगा। कमला ने उसकी यह दशा देख अपने काम में जल्दी की और उन सहेलियों में से जो उस कमरे में मौजूद सब-कुछ देख रही थीं एक की तरफ कुछ इशारा करके हाथ बढ़ाया। वह दूसरे कमरे में चली गई और एक बेंत लाकर उसने कमला के हाथ में दे दिया।

कई औरतों ने मिलकर उस कैदी औरत के हाथ-पैर एक साथ ही मजबूत बांधे और उसे गेंद की तरह लुढ़का दिया।

यहां तक तो किशोरी चुपचाप देखती रही मगर जब कमला कमर कसकर खड़ी हो गई तो किशोरी का कोमल कलेजा दहल गया और इसके आगे जो कुछ होने वाला था देखने की ताब न लाकर वह दो सहेलियों को साथ ले कमरे के बाहर निकल बाग की रविशों पर टहलने लगी।

किशोरी चाहे बाहर चली गई मगर कमरे के अंदर से आती हुई चिल्लाने की आवाज बराबर उसके कानों में पड़ती रही। थोड़ी देर बाद कमला किशोरी के पास पहुंची जो अभी तक बाग में टहल रही थी।

किशोरी – कहो, उसने कुछ बताया या नहीं?

कमला – कुछ नहीं, खैर कहां जाती है, आज नहीं कल, कल नहीं परसों, आखिर बतावेगी ही। अब मुझे रुखसत करो क्योंकि बहुत कुछ काम करना है!

किशोरी – अच्छा जा, मैं भी अब घर जाती हूं नहीं तो नानी इसी जगह पहुंचकर रंज होने लगेंगी। (कमला के गले मिलकर) देख अब मैं तेरे ही भरोसे पर जी रही हूं।

कमला – जब तक दम में दम है तब तक तेरे काम से बाहर नहीं हूं।

कमला वहां से रवाना हुई। उसके जाने के बाद किशोरी भी अपनी सखियों को साथ ले वहां से चली और थोड़ी ही दूर पर एक बड़ी हवेली के अंदर जा पहुंची।

बयान – 12

अब हम आपको एक दूसरी सरजमीन में ले चलकर एक दूसरे ही रमणीक स्थान की सैर करा तथा इसके साथ-ही-साथ बड़े-बड़े ताज्जुब के खेल और अद्भुत बातों को दिखाकर अपने किस्से का सिलसिला दुरुस्त किया चाहते हैं। मगर यहां एक जरूरी बात लिख देने की इच्छा होती है जिसके जानने से आगे चलकर आपको कुछ ज्यादे आनंद मिलेगा।

इस जगह बहुत-सी अद्भुत बातों को पढ़कर आप ऐसा न समझ लें कि यह तिलिस्म है और इसमें ऐसी बातें हुआ ही करती हैं, बल्कि उसे दुरुस्त और होने वाली समझकर खूब गौर करें क्योंकि अभी यह पहला ही भाग है। इस संतति के चार भागों में तो हम तिलिस्म का नाम भी न लेंगे, आगे चलकर देखा जायगा।

आप ध्यान कर लें कि एक अच्छे रमणीक स्थान में पहुंचकर सैर कर रहे हैं। यह जमीन भी लगभग हजार गज के चौड़ी और इतनी ही लंबी होगी, चारों तरफ की चार खूबसूरत पहाड़ियों से घिरी हुई है। बीच की सब्जी और गुलबूटों की बहार देखने ही लायक है। इस कुदरती बगीचे में जंगली फूलों के पेड़ ज्यादे दिखाई देते हैं, उन्हीं में मिले-जुले गुलाबों के पौधे भी बेशुमार हैं और कोई भी ऐसा नहीं जिसमें सुंदर कलियां और फूल न दिखाई देते हों। बीच में बड़े-बड़े तीन झरने भी खूबसूरती से बह रहे हैं। बरसात का मौसम है, चारों तरफ से पहाड़ों पर से गिरता हुआ जल इन झरनों में जोश मार रहा है। पूरब तरफ पहाड़ी के नीचे पहुंचकर ये तीनों झरने एक हो गए हैं और अंदाज से ज्यादे आया हुआ जल गड्ढे में गिरकर न मालूम कहां निकल जाता है। यहां की आबोहवा ऐसी उत्तम है कि अगर वर्षों का बीमार भी आवे तो दो दिन में तंदुरुस्त हो जाय और यहां की सैर से कभी जी न घबड़ाए।

बीचोंबीच में एक आलीशान इमारत बनी हुई है, मगर चाहे उसमें हर तरह की सफाई क्यों न हो फिर भी किसी पुराने जमाने की मालूम होती है। उसी इमारत के सामने एक छोटी-सी खूबसूरत बावली बनी हुई है जिसके चारों तरफ की जमीन कुछ ज्यादा खूबसूरत मालूम पड़ती है और फूल-पत्ते भी मौके से लगाए हुए हैं।

यह इमारत सुनसान और उदास नहीं है, इसमें पंद्रह-बीस नौजवान खूबसूरत औरतों का डेरा है। देखिए इस शाम के सुहावने समय में वे सब घर से निकलकर चारों तरफ मैदान में घूम-घूमकर जिंदगी का मजा ले रही हैं। सभी खुश, सभी की मस्तानी चाल, सभी फूलों को तोड़-तोड़कर आपस में गेंदबाजी कर रही हैं। हमारे नौजवान नायक कुंअर इंद्रजीतसिंह भी एक हसीन नाजनीन के हाथ में हाथ दिये बावली के पूरब की तरफ टहल रहे हैं, बात-बात में हंसी-दिल्लगी हो रही है, दीन-दुनिया की सुध भूले हुए हें।

लीजिए वे दोनों थककर बावली के किनारे एक खूबसूरत संगमर्मर की चट्टान पर बैठ गये और बातचीत होने लगी –

इंद्र – माधवी, मेरा शक किसी तरह नहीं जाता। क्या सचमुच तुम वही हो जो उस दिन गंगा किनारे जंगल में झूला झूल रही थीं

माधवी – आप रोज मुझसे यही सवाल करते हैं और मैं कसम खाकर इसका जवाब दे चुकी हूं, मगर अफसोस कि मेरी बात पर विश्वास नहीं करते।

इंद्र – (अंगूठी की तरफ देखकर) इस तस्वीर से कुछ फर्क मालूम होता है।

माधवी – यह दोष मुसव्वर1 का है।

इंद्र – खैर जो हो फिर भी तुमने मुझे अपने वश में कर रखा है।

माधवी – जी हां ठीक है, मुझसे मिलने का उद्योग तो आप ही ने किया था।

इंद्र – अगर मैं उद्योग न करता तो क्या तुम मुझे जबर्दस्ती ले आतीं

माधवी – खैर जाने दीजिए, मैं कबूल करती हूं कि आपने मेरे ऊपर अहसान किया, बस!

इंद्र – (हंसकर) बेशक तुम्हारे ऊपर अहसान किया कि दिल और जान तुम्हारे हवाले किये।

माधवी – (शर्माकर और सिर नीचा करके) बस रहने दीजिए, ज्यादा सफाई न दीजिए!

इंद्र – अच्छा इन बातों को छोड़ो और अपने वादे को याद करो आज कौन दिन है बस आज तुम्हारा पूरा हाल सुने बिना न मानूंगा चाहे जो हो, मगर देखो फिर उन भारी कसमों की याद दिलाता हूं जो मैं कई दफे तुम्हें दे चुका, मुझसे झूठ कभी न बोलना नहीं तो अफसोस करोगी।

माधवी – (कुछ देर तक सोचकर) अच्छा आज भर मुझे और माफ कीजिए, आपसे बढ़कर मैं दुनिया में किसी को नहीं समझती, आप ही की शपथ खाकर कहती हूं कि कल जो पूछेंगे सब ठीक-ठीक कह दूंगी, कुछ न छिपाऊंगी। (आसमान की तरफ देखकर) अब समय हो गया, मुझे दो घंटे की फुरसत दीजिए।

इंद्र – (लंबी सांस लेकर) खैर कल ही सही, जाओ मगर दो घंटे से ज्यादा न लगाना।

  1. चित्रकार।

माधवी उठी और मकान के अंदर चली गई। उसके जाने के बाद इंद्रजीतसिंह अकेले रह गये और सोचने लगे कि यह माधवी कौन है इसका कोई बड़ा बुजुर्ग भी है या नहीं! यह अपना हाल क्यों छिपाती है! सुबह-शाम दो-दो तीन-तीन घंटे के लिए कहां और किससे मिलने जाती है इसमें तो कोई शक नहीं कि यह मुझसे मुहब्बत करती है मगर ताज्जुब है कि मुझे यहां क्यों कैद कर रखा है1 चाहे यह सरजमीन कैसी ही सुंदर और दिल लुभाने वाली क्यों न हो, फिर भी मेरी तबीयत यहां से उचाट हो रही है। क्या करें, कोई तरकीब नहीं सूझती, बाहर का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता, यह तो मुमकिन ही नहीं कि पहाड़ चढ़कर कोई पार हो जाये, और यह भी दिल नहीं कबूल करता कि इसे किसी तरह रंज करूं और अपना मतलब निकालूं, क्योंकि मैं अपनी जान इस पर न्यौछावर कर चुका हूं।

ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातों को सोचते इनका जी बेचैन हो गया, घबड़ाकर उठ खड़े हुए और इधर-उधर टहलकर दिल बहलाने लगे। चश्मे का जल निहायत साफ था, बीच की छोटी-छोटी खुशरंग कंकरियां और तेजी के साथ दौड़ती हुई मछलियां साफ दिखाई पड़ती थीं, इसी की कैफियत देखते किनारे-किनारे जाकर दूर निकल गए और वहां पहुंचे जहां तीनों चश्मों का संगम हो गया था और अंदाज से ज्यादा आया हुआ जल पहाड़ी के नीचे एक गड्ढे में गिर रहा था।

एक बारीक आवाज इनके कान में आई। सिर उठाकर पहाड़ की तरफ देखने लगे। ऊपर पंद्रह-बीस गज की दूरी पर एक औरत दिखाई पड़ी जिसे अब तक इन्होंने इस हाते के अंदर कभी नहीं देखा था। उस औरत ने हाथ के इशारे से ठहरने के लिए कहा तथा ढोकों की आड़ में जहां तक बन पड़ा अपने को छिपाती हुई नीचे उतर आयी और आड़ देकर इंद्रजीतसिंह के पास इस तरह खड़ी हो गयी जिससे उन नौजवान छोकरियों में से कोई इसे देखने न पावे जो यहां की रहने वालियां चारों तरफ घूमकर चुहलबाजी में दिल बहला रही हैं और जिनका कुछ हाल हम ऊपर लिख आये हैं।

उस औरत ने एक लपेटा हुआ कागज इंद्रजीतसिंह के हाथ में दिया। इन्होंने कुछ पूछना चाहा मगर उसने यह कहकर कुमार का मुंह बंद कर दिया कि ”बस जो कुछ है इसी चीठी से आपको मालूम हो जायगा, मैं जुबानी कुछ कहा नहीं चाहती और न यहां ठहरने का मौका है, क्योंकि कोई देख लेगा तो हम-आप दोनों ऐसी आफत में फंस जायेंगे कि जिससे छुटकारा मुश्किल होगा। मैं उसी की लौंडी हूं जिसने यह चीठी आपके पास भेजी है।”

उसकी बात का इंद्रजीतसिंह क्या जवाब देंगे इसका इंतजार न करके वह औरत पहाड़ी पर चढ़ गई और चालीस-पचास हाथ जा एक गड्ढे में घुसकर न मालूम कहां लोप हो गई। इंद्रजीतसिंह ताज्जुब में आकर खड़े आधी घड़ी तक उस तरफ देखते रहे मगर फिर वह नजर न आई। लाचार इन्होंने कागज खोला और बड़े गौर से पढ़ने लगे, यह लिखा था :

”हाय, मैंने तस्वीर बनकर अपने को आपके हाथ में सौंपा, मगर आपने मेरी कुछ भी खबर न ली, बल्कि एक दूसरी ही औरत के फंदे में फंस गये जिसने मेरी सूरत बना आपको पूरा धोखा दिया। सच है, वह परीजमाल जब आपके बगल में बैठी है तो फिर मेरी सुध क्यों आने लगी!

आपको मेरी ही कसम है, पढ़ने के बाद इस चीठी के इतने टुकड़े कर डालिये कि एक अक्षर भी दुरुस्त न बचने पावे।

आपकी दासी – किशोरी।”

इस चीठी के पढ़ते ही कुमार के कलेजे में एक धड़कन-सी पैदा हुई। घबराकर एक चट्टान पर बैठ गये और सोचने लगे – ”मैंने पहले ही कहा था कि इस तस्वीर से उसकी सूरत नहीं मिलती। चाहे यह कितनी ही हसीन और खूबसूरत क्यों न हो मगर मैंने तो अपने को उसी के हाथ बेच डाला है जिसकी तस्वीर खुशकिस्मती से अब तक मेरे हाथ में मौजूद है। तब क्या करना चाहिए यकायक इससे तमाशा करना भी मुनासिब नहीं। अगर यह इसी जगह मुझे छोड़कर चली जाय और अपनी सहेलियों को भी लेती जाय तो मैं क्या करूंगा घबड़ाकर सिवाय प्राण दे देने के और क्या कर सकता हूं, क्योंकि यहां से निकलने का रास्ता मालूम नहीं। यह भी नहीं हो सकता कि इन दोनों पहाड़ियों पर चढ़कर पार हो जाऊं, क्योंकि सिवाय ऊंची सीधी चट्टान के चढ़ने लायक रास्ता कहीं भी नहीं मालूम पड़ता। खैर जो हो, आज मैं जरूर उसके दिल में कुछ खुटका पैदा करूंगा। नहीं-नहीं, आज भर और चुप रहना चाहिए, कल उसने अपना हाल कहने का वादा किया ही है, आखिर कुछ-न-कुछ झूठ जरूर कहेगी, बस उसी समय टोकूंगा। एक बात और है। (कुछ रुककर) अच्छा देखा जायेगा। यह औरत जो मुझे चीठी दे गई है यहां किस तरह पहुंची (पहाड़ी की तरफ देखकर) जितनी दूर ऊंचे उसे मैंने देखा था वहां तक तो चढ़ जाने का रास्ता मालूम होता है, शायद इतनी दूर तक लोगों की आमदरफ्त होती होगी। खैर ऊपर चलकर देखूं तो सही कि बाहर निकल जाने के लिए कोई सुरंग तो नहीं है।”

इंद्रजीतसिंह उस पहाड़ी पर वहां तक चढ़ गये जहां वह औरत नजर पड़ी थी। ढूंढ़ने से एक सुरंग ऐसी नजर आई जिसमें आदमी बखूबी घुस सकता था। उन्हें विश्वास हो गया कि इसी राह से वह आई थी और बेशक हम भी इसी राह से बाहर हो जायेंगे। खुशी-खुशी उस सुरंग में घुसे। दस-बारह कदम अंधेरे में गये होंगे कि पैर के नीचे जल मालूम पड़ा। ज्यों-ज्यों आगे जाते थे जल ज्यादे जान पड़ता था, मगर यह भी हौसला किये बराबर चले ही गये। जब गले बराबर जल में जा पहुंचे और मालूम हुआ कि आगे ऊपर चट्टान जल के साथ मिली हुई है, तैरकर भी कोई नहीं जा सकता और रास्ता बिल्कुल नीचे की तरफ झुकता अर्थात ढलवां ही मिलता जाता है तो लाचार होकर लौट आए मगर इन्हें विश्वास हो गया कि वह औरत जरूर इसी राह से आई थी क्योंकि उसे गीले कपड़े पहिरे इन्होंने देखा भी था।

वे औरतें जो पहाड़ी के बीच वाले दिलचस्प मैदान में घूम रही थीं इंद्रजीतसिंह को कहीं न देख घबरा गईं और दौड़ती हुई उस हवेली के अंदर पहुंचीं जिसका जिक्र हम ऊपर कर आये हैं। तमाम मकान छान डाला, जब पता न लगा तो उन्हीं में से एक बोली, ”बस अब सुरंग के पास चलना चाहिए जरूर उसी जगह होंगे।” आखिर वे सब औरतें वहां जा पहुंची जहां सुरंग के बाहर निकलकर गीले कपड़े पहिरे इंद्रजीतसिंह खड़े कुछ सोच रहे थे।

इंद्रजीतसिंह को सोच – विचार करते और सुरंग में आते – जाते दो घंटे लग गये। रात हो गई थी, चंद्रमा पहले ही से निकले हुए थे जिसकी चांदनी ने दिलचस्प जमीन में फैलकर अजीब समां जमा रखा था। दो घंटे बीत जाने पर माधवी भी लौट आयी थी मगर उस मकान में या उसके चारों तरफ अपनी किसी लौंडी या सहेली को न देख घबरा गई और उस समय तो उसका कलेजा और भी दहलने लगा जब उसने देखा कि अभी तक घर में चिराग तक नहीं जला। उसने भी इधर-उधर ढूंढ़ना नापसंद किया और सीधे उसी सुरंग के पास पहुंची। अपनी सब सखियों और लौंडियों को भी वहां पाया और यह भी देखा कि इंद्रजीतसिंह गीले कपड़े पहिरे सुरंग के मुहाने से नीचे की तरफ आ रहे हैं।

क्रोध से भरी माधवी ने अपनी सखियों की तरफ देखकर धीरे से कहा, ”लानत है तुम लोगों की गफलत पर! इसलिए तुम हरामखोरिनों को मैंने यहां रखा था!” गुस्सा ज्यादा चढ़ आया था और होंठ कांप रहे थे इससे कुछ और ज्यादे न कह सकी, फिर भी इंद्रजीतसिंह के नीचे आने तक बड़ी कोशिश से माधवी ने अपने गुस्से को पचाया और बनावटी तौर पर हंसकर इंद्रजीतसिंह से पूछा, ”क्या आप उस नहर के अंदर गये थे’

इंद्र – हां।

माधवी – भला यह कौन-सी नादानी थी! न मालूम इसके अंदर कितने कीड़े-मकोड़े और बिच्छू होंगे। हम लोगों को तो डर के मारे कभी यहां खड़े होने का भी हौसला नहीं पड़ता।

इंद्र – घूमते-फिरते चश्मे का तमाशा देखते यहां तक आ पहुंचे, जी में आया कि देखें यह गुफा कितनी दूर तक चली गई है। जब अंदर गया तो पानी में भीगकर लौटना पड़ा।

माधवी – खैर चलिए कपड़े बदलिए।

कुंअर इंद्रजीतसिंह का खयाल और भी मजबूत हो गया। वह सोचने लगे कि इस सुरंग में जरूर कोई भेद है, तभी तो ये सब घबड़ाई हुई यहां आ जमा हुईं।

इंद्रजीतसिंह आज तमाम रात सोच-विचार में पड़े रहे। इनके रंग-ढंग से माधवी का भी माथा ठनका और वह भी रात-भर चारों तरफ दौड़ती रही।

बयान – 13

दूसरे दिन खा-पीकर निश्चिंत होने के बाद दोपहर को जब दोनों एकांत में बैठे तो इंद्रजीतसिंह ने माधवी से कहा –

”अब मुझसे सब्र नहीं हो सकता, आज तुम्हारा ठीक-ठीक हाल सुने बिना कभी न मानूंगा और इससे बढ़कर निश्चिंती का समय भी दूसरा न मिलेगा।”

माधवी – जी हां, आज मैं जरूर अपना हाल कहूंगी।

इंद्र – तो बस कह चलो, अब देर काहे की है पहले यह बताओ कि तुम्हारे मां-बाप कहां हैं और यह सरजमीन किस इलाके में है जिसके अंदर मैं बेहोश करके लाया गया

माधवी – यह इलाका गयाजी का है, यहां के राजा की मैं लड़की हूं, इस समय मैं खुद मालिक हूं, मां-बाप को मरे पांच वर्ष हो गये।

इंद्र – ओह-ओह, तो मैं गयाजी के इलाके में आ पहुंचा! (कुछ सोचकर) तो तुम मेरे लिए चुनार गई थीं

माधवी – जी हां, मैं चुनार गई थी और यह अंगूठी जो आपके हाथ में है सौदागर की मार्फत मैंने ही आपके पास भेजी थी।

इंद्र – हां ठीक है, तो मालूम पड़ता है, किशोरी भी तुम्हारा ही नाम है।

किशोरी के नाम ने माधवी को चौंका दिया और घबराहट में डाल दिया, मालूम हुआ जैसे उसकी छाती में किसी ने बड़ी जोर से मुक्का मारा हो। फौरन उसका खयाल उस सुरंग पर गया जिसके अंदर से गीले कपड़े पहिरे हुए इंद्रजीतसिंह निकले थे। वह सोचने लगी, ”इनका उस सुरंग के अंदर जाना बेसबब नहीं था, या तो कोई मेरा दुश्मन आ पहुंचा था या मेरी सखियों में से किसी ने भांडा फोड़ा।” इसी वक्त से इंद्रजीतसिंह का खौफ भी उसके कलेजे में बैठ गया और वह इतना घबराई कि किसी तरह अपने को सम्हाल न सकी, बहाना करके उनके पास से उठ खड़ी हुई और बाहर दालान में जाकर टहलने लगी।

इंद्रजीतसिंह भी चेहरे के चढ़ाव-उतार से उसके चित्त का भाव समझ गये और बहाना करके बाहर जाती समय उसे रोकना मुनासिब न समझकर चुप रहे।

आधे घंटे तक माधवी उस दालान में टहलती रही, जब उसका जी कुछ ठिकाने हुआ तब उसने टहलना बंद किया और एक दूसरे कमरे में चली गई जिसमें उसकी दो सखियों का डेरा था जिन्हें वह जान से ज्यादा मानती थी और जिनका बहुत कुछ भरोसा भी रखती थी। ये दोनों सखियां भी जिनका नाम ललिता और तिलोत्तमा था उसे बहुत चाहती थीं और ऐयारी विद्या को भी अच्छी तरह जानती थीं।

माधवी को कुसमय आते देख उसकी दोनों सखियां जो इस वक्त पलंग पर लेटी हुई कुछ बातें कर रही थीं, घबराकर उठ बैठीं और तिलोत्तमा ने आगे बढ़कर पूछा, ”बहिन, क्या है जो इस वक्त यहां आई हो तुम्हारे चेहरे पर तरद्दुद की निशानी पायी जाती है।”

माधवी – क्या कहूं बहिन, इस समय वह बात हुई जिसकी कभी उम्मीद न थी!

ललिता – सो क्या, कुछ कहो तो!

माधवी – चलो बैठो कहती हूं, इसीलिए तो आई हूं।

बैठने के बाद कुछ देर तक तो माधवी चुप रही, इसके बाद इंद्रजीतसिंह से जो कुछ बातचीत हुई थी कहकर बोली, ”इसमें कोई शक नहीं कि किशोरी का कोई दूत यहां आ पहुंचा और उसी ने यह सब भेद खोला है। मैं तो उसी समय खटकी थी जब उनको गीले कपड़े पहिरे सुरंग के मुंह पर देखा था। बड़ी ही मुश्किल हुई, मैं इनको यहां से बाहर अपने महल में भी नहीं ले जा सकती, क्योंकि वह चाण्डाल सुनेगा तो पूरी दुर्गत कर डालेगा, और मैं उस पर किसी तरह का दबाव भी नहीं डाल सकती क्योंकि राज्य का काम बिल्कुल उसी के हाथ में है, जब चाहे चौपट कर डाले! जब राज्य ही नष्ट हुआ तो फिर यह सुख कहां अभी तक तो इंद्रजीतसिंह का हाल उसे बिल्कुल नहीं मालूम है मगर अब क्या होगा सो नहीं कह सकती!”

माधवी घंटे भर तक अपनी चालाक सखियों से राय मिलाती रही, आखिर जो कुछ करना था उसे निश्चय कर वहां से उठी और उस कमरे में पहुंची जिसमें इंद्रजीतसिंह को छोड़ आई थी।

जब तक माधवी अपनी सखियों के साथ बैठी बातचीत करती रही तब तक हमारे इंद्रजीतसिंह भी अपने ध्यान में डूबे रहे। अब माधवी के साथ उन्हें कैसा बर्ताव करना चाहिए और किस चालाकी से अपना पल्ला छुड़ाना चाहिए सो सब उन्होंने सोच लिया और उसी ढंग पर चलने लगे।

जब माधवी इंद्रजीतसिंह के पास आई तो उन्होंने पूछा, ”क्यों एकदम घबराकर कहां चली गई थीं’

माधवी – न मालूम क्यों जी मिचला गया था, इसीलिए दौड़ी चली गई। कुछ गरमी भी मालूम होने लगी, जाकर एक कै की तब होश ठिकाने हुए।

इंद्र – अब तबीयत कैसी है

माधवी – अब तो अच्छी है।

इसके बाद इंद्रजीतसिंह ने कुछ छेड़-छाड़ न की और हंसी-खुशी में दिन बिता दिया, क्योंकि जो कुछ करना था वह तो दिल में था जाहिर में तकरार कर माधवी के दिल में शक पैदा करना मुनासिब न समझा।

माधवी का तो मालूम ही था कि वह शाम को चिराग जले बाद इंद्रजीतसिंह से पूछकर दो घंटे के लिए न मालूम किस राह से कहीं जाया करती थी, आज भी अपने वक्त पर उसने जाने का इरादा किया और इंद्रजीतसिंह से छुट्टी मांगी।

इंद्र – न मालूम क्यों तुमसे कुछ ऐसी मोहब्बत हो गई है कि एक पल को भी आंखों के सामने से दूर जाने देने को जी नहीं चाहता, मुझे उम्मीद है कि तुम मेरी बात मान लोगी और कहीं जाने का इरादा न करोगी।

माधवी – (खुश होकर) शुक्र है कि आपको मेरा इतना ध्यान है, अगर ऐसी मर्जी है तो मैं बहुत जल्द लौट आऊंगी।

इंद्र – आज तो नहीं जाने देंगे। अहा, देखो कैसी घटा उठी आ रही है, वाह इस समय भी तुम्हारे जी में कुछ रस नहीं पैदा होता!

इस समय इंद्रजीतसिंह ने दो-एक बातें जिस ढंग से माधवी से कीं इसके पहले नहीं की थीं इसलिए उसके जी की कली खिली जाती थी, मगर वह ऐसे फेर में पड़ी हुई थी कि जी ही जानता होगा, न तो इंद्रजीतसिंह को नाखुश करना चाहती थी और न अपने नित के काम में ही बाधा डालने की ताकत रखती थी। आखिर कुछ सोच-विचारकर इस समय इंद्रजीतसिंह का हुक्म मानना ही उसने मुनासिब समझा और हंसी-खुशी में दिल बहलाया। आज चारपाई पर लेटे हुए इंद्रजीतसिंह के पास रहकर उनको अपने जाल में फंसाने के लिए उसने क्या-क्या काम किए इसे हम अपनी सीधी-सादी लेखनी से लिखना पसंद नहीं करते, हमारे मनचले पाठक बिना समझे भी न रहेंगे। माधवी को इस बात का बिल्कुल खयाल न था कि शादी होने पर ही किसी से हंसना-बोलना मुनासिब है। वह जी का आ जाना ही शादी समझती थी। चाहे वह अभी तक कुंआरी ही क्यों न हो मगर मेरा जी नहीं चाहता कि मैं उसे कुंआरी लिखूं, क्योंकि उसकी चाल-चलन ठीक न थी। यह सभी कोई जानते हैं कि खराब चाल-चलन रहने का नतीजा बहुत बुरा होता है मगर माधवी के दिल में इसका गुमान भी न था।

इंद्रजीतसिंह के रोकने से माधवी अपने नियम तौर पर जहां वह रोज जाती थी आज न गई मगर इस सबब से आज उसका जी बेचैन था। आधी रात के बाद जब इंद्रजीतसिंह गहरी नींद में सो रहे थे वह अपनी चारपाई से उठी और जहां रोज जाती थी चली गई, हां आने में उसे आज बहुत देर लगी। इसी बीच में इंद्रजीतसिंह की आंख खुली और माधवी का पलंग खाली देख उन्हें निश्चय हो गया कि आज भी वह अपने रोज के ठिकाने पर जरूर गई।

वह कौन-सी ऐसी जगह है जहां बिना गये माधवी का जी नहीं मानता और ऐसा करने से वह एक दिन भी अपने को क्यों नहीं रोक सकती इसी सोच-विचार में इंद्रजीतसिंह को फिर नींद न आई और वह बराबर जागते ही रह गये। जब माधवी आई तब वह जाग रहे थे मगर इस तरह खुर्राटे लेने लगे कि माधवी को उनके जागते रहने का जरा भी गुमान न हुआ।

इसी सोच-विचार और दाव-घात में कई दिन बीत गये और इंद्रजीतसिंह ने उसका शाम का जाना बिलकुल रोक दिया। वह अब भी आधी रात को बराबर जाया करती और सुबह होने के पहले ही लौट आती।

एक दिन रात को इंद्रजीतसिंह खूब होशियार रहे और किसी तरह अपनी आंखों में नींद को न आने दिया, एक बारीक कपड़े से मुंह ढंके चारपाई पर लेटे धीरे-धीरे खुर्राटे लेते रहे।

आधी रात के बाद माधवी अपने पलंग पर से उठी और धीरे-धीरे इंद्रजीतसिंह के पास आकर कुछ देर तक देखती रही। जब उसे निश्चय हो गया कि वह सो रहे हैं तब उसने अपने आंचल के साथ बंधी ताली से एक अलमारी खोली और उसमें से एक लंबी चाभी निकाल फिर इंद्रजीतसिंह के पास आई तथा कुछ देर तक खड़ी रहकर, वह सो रहे हैं इस बात का निश्चय कर लिया। इसके बाद उसने वह शमादान गुल कर दिया जो एक तरफ खूबसूरत चौकी के ऊपर जल रहा था।

माधवी की यह सब कार्रवाई इंद्रजीतसिंह देख रहे थे। जब उसने शमादान गुल किया और कमरे के बाहर जाने लगी वह अपनी चारपाई से उठ खड़े हुए और दबे कदम तथा अपने को हर तरह से छिपाये हुए उसके पीछे रवाना हुए।

सोने वाले कमरे से बाहर निकल माधवी एक दूसरी कोठरी के पास पहुंची और उसी चाभी से जो उसने अलमारी में से निकाली थी उस कोठरी का ताला खोला मगर अंदर जाकर फिर बंद कर लिया। कुंअर इंद्रजीतसिंह इससे ज्यादे कुछ न देख सके और अफसोस करते हुए उसी कमरे की तरफ लौटे जिसमें उनका पलंग था।

अभी कमरे के दरवाजे तक पहुंचे भी न थे कि पीछे से किसी ने उनके मोढ़े पर हाथ रखा। वे चौंके और पीछे फिरकर देखने लगे। एक औरत नजर पड़ी मगर उसे किसी तरह पहचान न सके। उस औरत ने हाथ के इशारे से उन्हें मैदान की तरफ चलने के लिए कहा और इंद्रजीतसिंह भी बेखटके उसके पीछे मैदान में दूर तक चले गये। वह औरत एक जगह खड़ी हो गई और बोली, ”क्या तुम मुझे पहचान सकते हो’ इसके जवाब में इंद्रजीतसिंह ने कहा, ”नहीं, तुम्हारी-सी काली औरत तो आज तक मैंने देखी ही नहीं!”

समय अच्छा था, आसमान पर बादल के टुकड़े इधर-उधर घूम रहे थे, चंद्रमा निकला हुआ था जो कभी-कभी बादलों में छिप जाता और थोड़ी ही देर में फिर साफ दिखाई देता था। वह औरत बहुत ही काली थी और उसके कपड़े भी गीले थे। इंद्रजीतसिंह उसे पहचान न सके, तब उसने अपना बाजू खोला और एक जख्म का दाग उन्हें दिखाकर फिर पूछा, ”क्या अब भी तुम मुझे नहीं पहचान सकते’

इंद्र – (खुश होकर) क्या मैं तुम्हें चाची कहकर पुकार सकता हूं

औरत – हां, बेशक पुकार सकते हो।

इंद्र – अब मेरी जान बची, अब मैं समझा कि यहां से निकल भागूंगा।

औरत – अब तो तुम यहां से बखूबी निकल जा सकते हो क्योंकि जिस राह से माधवी जाती है वह तुमने देख ही लिया है और उस जगह को भी बखूबी जान गये होगे जहां वह ताली रखती है, मगर खाली निकल भागने में मजा नहीं है। मैं चाहती हूं कि इसके साथ ही कुछ फायदा भी हो। आखिर मेरा यहां आना ही किस काम का होगा और उस मेहनत का नतीजा भी क्या निकलेगा जो तुम्हारा पता लगाने के लिए हम लोगों ने की है सिवाय इसके तुम यह भी क्योंकर जान सकते हो कि माधवी कहां जाती है या क्या करती है

इंद्र – हां बेशक, इस तरह तो सिवाय भागने के और कोई फायदा नहीं हो सकता फिर जो हुक्म करो मैं तैयार हूं।

औरत – जब माधवी उस राह से बाहर जाय तो उसके पीछे हो जाने से उसका सब हाल मालूम होगा और हमारा काम भी निकलेगा।

इंद्र – मगर यह कैसे हो सकेगा वह तो कोठरी के अंदर जाते ही ताला बंद कर लेती है।

औरत – हां सो ठीक है, मगर तुमने देखा होगा कि उस दरवाजे के बीचोंबीच में ताला जड़ा है जिसे खोलकर वह अंदर गई और फिर उसी ताले को भीतर से बंद कर दिया।

इंद्र – मैंने अच्छी तरह खयाल नहीं किया।

औरत – मैं बखूबी देख चुकी हूं, उस ताले में बाहर-भीतर दोनों तरफ से ताली लगती है।

इंद्र – खैर इससे मतलब

औरत – मतलब यही है कि अगर इसी तरह की एक ताली हमारे पास भी हो तो उसके पीछे जाने का अच्छा मौका मिले।

इंद्र – अगर ऐसा हो तो क्या बात!

औरत – यह कोई बड़ी बात नहीं, जहां वह ताली रखती है वह जगह तो तुम्हें मालूम ही होगी

इंद्र – हां मालूम है।

औरत – बस तो मुझे वह जगह बता दो और तुम आराम करो, मैं कल आकर उस ताली का सांचा ले जाऊंगी और परसों उसी तरह की दूसरी ताली बना लाऊंगी।

जहां ताली रहती थी उस जगह का पता पूछकर वह काली औरत चली गई और इंद्रजीतसिंह अपने पलंग पर जाकर सो रहे।

बयान – 14

इंद्रजीतसिंह ने दूसरे दिन पुनः नियत समय पर माधवी को जाने न दिया, आधी रात तक हंसी-दिल्लगी ही में काटी, इसके बाद दोनों अपने-अपने पलंग पर सो रहे। कुमार को तो खुटका लगा ही हुआ था कि आज वह काली औरत आवेगी इसलिए उन्हें नींद न आई, बारीक चादर में मुंह ढांके पड़े रहे, मगर माधवी थोड़ी ही देर में सो गई।

वह काली औरत भी अपने मौके पर आ पहुंची। पहले तो उसने दरवाजे पर खड़े होकर झांका, जब सन्नाटा मालूम हुआ अंदर चली आई और दरवाजा धीरे से बंद कर लिया। इंद्रजीतसिंह उठ बैठे। उससे अपने मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया और माधवी के पास पहुंचकर उसे देखा, मालूम हुआ कि वह अच्छी तरह सो रही है।

काली औरत ने अपने बटुए में से बेहोशी की बुकनी निकाली और धीरे से माधवी को सुंघा दिया। थोड़ी देर तक खड़ी रहने के बाद माधवी की नब्ज देखी, जब विश्वास हो गया कि वह बेहोश हो गई तब उसके आंचल से ताली खोल ली और अलमारी में से सुरंग (जिस राह से माधवी आती-जाती थी) की ताली निकाल मोम पर उसका सांचा लिया और फिर उसी तरह ताली अलमारी में रख ताला बंद कर अलमारी की ताली पुनः माधवी के आंचल में बांध इंद्रजीतसिंह के पास आकर बोली, ”मैं सांचा ले चुकी, अब जाती हूं, कल दूसरी ताली बनाकर लाऊंगी, तुम माधवी को रातभर इसी तरह बेहोश पड़ी रहने दो। आज वह अपने ठिकाने न जा सकी इसीलिए सबेरे देखना कैसा घबड़ाती है।”

सुबह को कुछ दिन चढ़े माधवी की आंख खुली, घबराकर उठ बैठी। उसने अपने दिल का भाव बहुत कुछ छिपाया मगर उसके चेहरे पर बदहवासी बनी रही जिससे इंद्रजीतसिंह समझ गये कि रात इसकी आंख न खुली और रोज की जगह पर न जा सकी इसका इसे बहुत रंज है। दूसरे दिन आधी रात बीतने पर इंद्रजीतसिंह को सोता समझ माधवी अपने पलंग पर से उठी, शमादान बुझाकर अलमारी में से ताली निकाली और कमरे के बाहर हो उसी कोठरी के पास पहुंची, ताला खोल अंदर गई और भीतर से ताला बंद कर लिया। इंद्रजीतसिंह भी छिपे हुए माधवी के साथ-ही-साथ कमरे के बाहर निकले थे, जब वह कोठरी के अंदर चली गई तो यह इधर-उधर देखने लगे, उस काली औरत को भी पास ही मौजूद पाया।

माधवी के जाने के आधी घड़ी बाद काली औरत ने उसी नई ताली से कोठरी का दरवाजा खोला जो बमूजिब सांचे के आज वह बनाकर लाई थी। इंद्रजीतसिंह को साथ ले अंदर जाकर फिर वह ताला बंद कर दिया। भीतर बिल्कुल अंधेरा था इसलिए काली औरत को अपने बटुए से सामान निकाल मोमबत्ती जलानी पड़ी जिससे मालूम हुआ कि इस छोटी-सी कोठरी में केवल बीस-पचीस सीढ़ियां नीचे उतरने के लिए बनी हैं, अगर बिना रोशनी किये ये दोनों आगे बढ़ते तो बेशक नीचे गिरकर अपने सिर, मुंह या पैर से हाथ धोते।

दोनों नीचे उतरे, वहां एक बंद दरवाजा और मिला, वह भी उसी ताली से खुल गया। अब एक बहुत लंबी सुरंग में दूर तक जाने की नौबत पहुंची। गौर करने से साफ मालूम होता था कि यह सुरंग पहाड़ी के नीचे – नीचे तैयार की गई है, क्योंकि चारों तरफ सिवाय पत्थर के ईंट-चूना-लकड़ी दिखाई नहीं पड़ती थी। यह सुरंग अंदाज में दो सौ गज लंबी होगी। इसे तै करने के बाद फिर बंद दरवाजा मिला। उसे खोलने पर यहां भी ऊपर चढ़ने के लिए वैसी ही सीढ़ियां मिलीं जैसी शुरू में पहली कोठरी खोलने पर मिली थीं। काली औरत समझ गई कि अब यह सुरंग खतम हो गई और इस कोठरी का दरवाजा खुलने से हम लोग जरूर किसी मकान या कमरे में पहुंचेंगे, इसलिए उसने कोठरी को अच्छी तरह देख-भालकर मोमबत्ती गुल कर दी।

हम ऊपर लिख आये हैं और फिर याद दिलाते हैं कि सुरंग में जितने दरवाजे हैं सभी में इसी किस्म के ताले लगे हैं जिनमें बाहर-भीतर दोनों तरफ से चाभी लगती है, इस हिसाब से ताला लगाने का सूराख इस पार से उस पार तक ठहरा, अगर दरवाजे के उस तरफ अंधेरा न हो तो उस सूराख में आंख लगाकर उधर की चीज बखूबी देखने में आ सकती है।

जब काली औरत मोमबत्ती गुल कर चुकी तो उसी ताली के सुराख से आती हुई एक बारीक रोशनी कोठरी के अंदर मालूम पड़ी। उस ऐयारा ने सूराख में आंख लगाकर देखा। एक बहुत बड़ा आलीशान कमरा बड़े तकल्लुफ से सजा हुआ नजर पड़ा, उसी कमरे में बेशकीमती मसहरी पर एक अधेड़ आदमी के पास बैठी कुछ बातचीत और हंसी-दिल्लगी करती हुई माधवी भी दिखाई पड़ी। अब विश्वास हो गया कि इसी से मिलने के लिए माधवी रोज आया करती है। इस मर्द में किसी तरह की खूबसूरती न थी तिस पर भी माधवी न मालूम इसकी किस खूबी पर जी जान से मर रही थी और यहां आने में अगर इंद्रजीतसिंह विघ्न डालते थे तो क्यों इतना परेशान हो जाती थी।

उस काली औरत ने इंद्रजीतसिंह को भी उधर का हाल देखने के लिए कहा। कुमार बहुत देर तक देखते रहे। उन दोनों में क्या बातचीत हो रही थी सो तो मालूम न हुआ मगर उनके हाव-भाव में मुहब्बत की निशानी पाई जाती थी। थोड़ी देर के बाद दोनों पलंग पर सो रहे। उसी समय कुंअर इंद्रजीतसिंह ने चाहा कि ताला खोलकर उस कमरे में पहुंचें और दोनों नालायकों को कुछ सजा दें मगर काली औरत ने ऐसा करने से उन्हें रोका और कहा, ”खबरदार, ऐसा इरादा भी न करना, नहीं तो हमारा बना-बनाया खेल बिगड़ जायगा और बड़े-बड़े हौसलों के पहाड़ मिट्टी में मिल जायेंगे, बस इस समय सिवाय वापस चलने के और कुछ मुनासिब नहीं है।”

काली औरत ने जो कुछ कहा लाचार इंद्रजीतसिंह को मानना और वहां से लौटना ही पड़ा। उसी तरह ताला खोलते और बंद करते बराबर चले आये और उस कमरे के दरवाजे पर पहुंचे जिसमें इंद्रजीतसिंह सोया करते थे। कमरे में अंदर न जाकर काली औरत इंद्रजीतसिंह को मैदान में ले गई और नहर के किनारे एक पत्थर की चट्टान पर बैठने के बाद दोनों में यों बातचीत होने लगी –

इंद्र – तुमने उस कमरे में जाने से व्यर्थ ही मुझे रोक दिया।

औरत – ऐसा करने से क्या फायदा होता! यह कोई गरीब कंगाल का घर नहीं है बल्कि ऐसे की अमलदारी है जिसके यहां हजारों बहादुर और एक से एक लड़ाके मौजूद हैं, क्या बिना गिरफ्तार हुए तुम निकल जाते! कभी नहीं। तुम्हारा यह सोचना भी ठीक नहीं है कि जिस राह से मैं आती-जाती हूं उसी राह से तुम भी इस सरजमीन के बाहर हो जाओगे क्योंकि वह राह सिर्फ हमीं लोगों के आने-जाने लायक है, तुम उससे किसी तरह नहीं जा सकते, फिर जान-बूझकर अपने को आफत में फंसाना कौन बुद्धिमानी थी।

इंद्र – क्या जिस राह से तुम आती-जाती हो उससे मैं नहीं जा सकता?

औरत – कभी नहीं, इसका खयाल भी न करना।

इंद्र – सो क्यों

औरत – इसका सबब भी जल्दी ही मालूम हो जाएगा।

इंद्र – खैर तो अब क्या करना चाहिए

औरत – अब तुम्हें सब्र करके दस-पंद्रह दिन और इसी जगह रहना मुनासिब है।

इंद्र – अब मैं किस तरह उस बदकारा के साथ रह सकूंगा।

औरत – जिस तरह भी हो सके!

इंद्र – खैर फिर इसके बाद क्या होगा

औरत – इसके बाद यह होगा कि तुम सहज ही में न सिर्फ इस खोह के बाहर ही हो जाओगे बल्कि एकदम से यहां का राज्य भी तुम्हारे कब्जे में आ जाएगा।

इंद्र – क्या यह कोई राजा था जिसके पास माधवी बैठी थी।

औरत – नहीं, यह राज्य माधवी का है, और वह उसका दीवान था।

इंद्र – माधवी तो अपने राज्य का कुछ भी नहीं देखती।

औरत – अगर वह इस लायक होती तो दीवान की खुशामद क्यों करती।

इंद्र – इस हिसाब से तो दीवान ही को राजा कहना चाहिए।

औरत – बेशक!

इंद्र – खैर, अब तुम क्या करोगी

औरत – इसके बताने की अभी कोई जरूरत नहीं, दस-बारह दिन बाद मैं तुमसे मिलूंगी और जो कुछ इतने दिनों में कर सकूंगी उसका हाल कहूंगी, बस अब मैं जाती हूं, दिल को जिस तरह हो सके सम्हालो और माधवी पर किसी तरह यह मत जाहिर होने दो कि उसका भेद तुम पर खुल गया या तुम उससे कुछ रंज हो, इसके बाद देखना कि इतना बड़ा राज्य कैसे सहज ही में हाथ लगता है जिसका मिलना हजारों सिर कटने पर भी मुश्किल है।

इंद्र – खैर यह तमाशा भी जरूर ही देखने लायक होगा।

औरत – अगर बन पड़ा तो इस वादे के बीच में एक-दो दफे आकर तुम्हारी सुध ले जाऊंगी।

इंद्र – जहां तक हो सके जरूर आना।

इसके बाद वह काली औरत चली गई और इंद्रजीतसिंह अपने कमरे में आकर सो रहे।

पाठक समझते होंगे कि इस काली औरत या इंद्रजीतसिंह ने जो कुछ किया या कहा-सुना किसी को मालूम नहीं हुआ, मगर नहीं, वह भेद उसी वक्त खुल गया और काली औरत के काम में बाधा डालने वाला भी कोई पैदा हो गया बल्कि उसने उसी वक्त से छिपे-छिपे अपनी कार्रवाई भी शुरू कर दी जिसका हाल माधवी को मालूम न हो सका।

बयान – 15

अब इस जगह थोड़ा-सा हाल इस राज्य का और साथ ही इस माधवी का भी लिख देना जरूरी है।

किशोरी की मां अर्थात शिवदत्त की रानी दो बहिनें थीं। एक जिसका नाम कलावती था शिवदत्त के साथ ब्याही थी और दूसरी मायावती गया के राजा चंद्रदत्त से ब्याही थी। इसी मायावती की लड़की यह माधवी थी जिसका हाल हम ऊपर लिख आये हैं।

माधवी को दो वर्ष की छोड़कर उसकी मां मर गई थी, मगर माधवी का बाप चंद्रदत्त होशियार होने पर माधवी को गद्दी देकर मरा था। अब आप समझ गये होंगे कि माधवी और किशोरी दोनों आपस में मौसेरी बहिनें थीं।

माधवी का बाप चंद्रदत्त बहुत ही शौकीन और ऐयाश आदमी था। अपनी रानी को जान से ज्यादा मानता था, खास राजधानी गयाजी छोड़कर प्रायः राजगृह में रहा करता था जो गया से दो मंजिल पर एक बड़ा भारी मशहूर तीर्थ है। यह दिलचस्प और खुशनुमा पहाड़ी उसे कुछ ऐसी भायी कि साल में दस महीने इसी जगह रहा करता। एक आलीशान मकान भी बनवा लिया। यह खुशनुमा और दिलचस्प जमीन जिसमें कुमार इंद्रजीतसिंह बेबस पड़े हैं कुदरती तौर पर पहले ही की बनी हुई थी मगर इसमें आने-जाने का रास्ता और यह मकान चंद्रदत्त ही ने बनवाया था।

माधवी के मां-बाप दोनों ही शौकीन थे। माधवी को अच्छी शिक्षा देने का उन लोगों को जरा भी ध्यान न था। वह दिन-रात लाड़-प्यार ही में पला करती थी और एक खूबसूरत और चंचल दाई की गोद में रहकर अच्छी बातों के बदले हाव-भाव ही सीखने में खुश रहती थी, इसी सबब से इसका मिजाज लड़कपन ही से खराब हो रहा था। बच्चों की तालीम पर यदि उनके मां-बाप ध्यान न दे सकें तो मुनासिब है कि उन्हें किसी ज्यादे उम्र वाली और नेकचलन दाई की गोद में दे दें, मगर माधवी के मां-बाप को इसका कुछ भी खयाल न था और आखिर इसका नतीजा बहुत ही बुरा निकला।

माधवी के समय में इस राज्य में तीन आदमी मुखिया थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि इस राज्य का आनंद ये ही तीनों ले रहे थे और तीनों दोस्त एकदिल हो रहे थे। इनमें से एक तो दीवान अग्निदत्त था, दूसरा कुबेरसिंह सेनापति, और तीसरा धर्मसिंह जो शहर की कोतवाली करता था।

अब हम अपने किस्से की तरफ झुकते हैं और उस तालाब पर पहुंचते हैं जिसमें एक नौजवान औरत को पकड़ने के लिए योगिनी और वनचरी कूदी थीं। आज इस तालाब पर हम अपने कई ऐयारों को देखते हैं जो आपस में बातचीत और सलाह करके कोई भारी आफत मचाने की तरकीब जमा रहे हैं।

पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह और तारासिंह तालाब के ऊपर पत्थर के चबूतरे पर बैठे यों बातचीत कर रहे हैं –

भैरो – कुमार को वहां से निकाल ले आना तो कोई बड़ी बात नहीं है।

तारा – मगर उन्हें भी तो कुछ सजा देनी चाहिए जिनकी बदौलत कुमार इतने दिनों से तकलीफ उठा रहे हैं।

भैरो – जरूर, बिना सजा दिए जी कब मानेगा!

बद्री – जहां तक हम समझते हैं कल वाली राय बहुत अच्छी है।

भैरो – उससे बढ़कर कोई राय नहीं हो सकती, ये लोग भी क्या कहेंगे कि किसी से काम पड़ा था!

बद्री – यहां तो बस ललिता और तिलोत्तमा ही शैतानी की जड़ हैं, सुनते हैं उनकी ऐयारी भी बहुत बढ़ी-चढ़ी है।

तारा – पहले उन्हीं दोनों की खबर ली जाएगी।

भैरो – नहीं-नहीं इसकी कोई जरूरत नहीं। उन्हें गिरफ्तार किये बिना ही हमारा काम चल जायगा, व्यर्थ कई दिन बर्बाद करने का मौका नहीं है।

तारा – हां यह ठीक है, हमें उनकी इतनी जरूरत भी नहीं है, और क्या ठिकाना जब तक हम लोग अपना काम करें तब तक वे चाची के फंदे में आ फंसें।

भैरो – बेशक ऐसा ही होगा, क्योंकि उन्होंने कहा भी था कि तुम लोग इस काम को करो तब तक बन पड़ेगा तो मैं ललिता और तिलोत्तमा को भी फांस लूंगी।

बद्री – खैर जो होगा देखा जाएगा, अब हम लोग अपने काम में क्यों देर कर रहे हैं।

भैरो – देर की जरूरत क्या है, उठिए, हां, पहले अपना-अपना शिकार बांट लीजिए।

बद्री – दीवान साहब को मेरे लिए छोड़िये।

भैरो – हां, आपका वजन बराबर है, अच्छा मैं सेनापति की खबर लूंगा।

तारा – तो वह चाण्डाल कोतवाल मेरे बांटे पड़ा! खैर यही सही।

भैरो – अच्छा अब यहां से चलो।

ये तीनों ऐयार वहां से उठे ही थे कि दाहिनी तरफ से छींक की आवाज आर्ई।

बद्री – धत्तेरे की, क्या तेरे छींकने का कोई दूसरा समय न था

तारा – क्या आप छींक से डर गये

बद्री – मैं छींक से नहीं डरा मगर छींकने वाले से जी खटकता है।

भैरो – हमारे काम में विघ्न पड़ता दिखाई देता है।

बद्री – इस दुष्ट को पकड़ना चाहिए, बेशक यह चुपके-चुपके हमारी बातें सुनता रहा।

तारा – छींक नहीं बदमाशी है!

बद्रीनाथ ने इधर-उधर बहुत ढूंढ़ा मगर छींकने वाले का पता न लगा।

लाचार तरद्दुद ही में तीनों वहां से रवाना हुए।

(Visited 10 times, 1 visits today)

Leave a Reply

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top
%d bloggers like this: