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चंद्रकांता संतति-भाग-2 (बयान-1 से 5)

दूसरा भाग

बयान-1

घंटा भर दिन बाकी है। किशोरी अपने उसी बाग में जिसका कुछ हाल पीछे लिख चुके हैं कमरे की छत पर सात-आठ सखियों के बीच में उदास तकिए के सहारे बैठी आसमान की तरफ देख रही है। सुगंधित हवा के झोंके उसे खुश किया चाहते हैं मगर वह अपनी धुन में ऐसी उलझी हुई है कि दीन-दुनिया की खबर नहीं है। आसमान पर पश्चिम की तरफ लालिमा छाई है। श्याम रंग के बादल ऊपर की तरफ उठ रहे हैं, जिनमें तरह-तरह की सूरतें बात की बात में पैदा होती और देखते-देखते बदलकर मिट जाती हैं। अभी यह बादल का टुकड़ा खंड पर्वत की तरह दिखाई देता था, अभी उसके ऊपर शेर की मूरत नजर आने लगी, लीजिए, शेर की गर्दन इतनी बढ़ी की साफ ऊंट की शक्ल बन गई और लमहे-भर में हाथी का रूप धर सूंड दिखाने लगी, उसी के पीछे हाथ में बंदूक लिए एक सिपाही की शक्ल नजर आई लेकिन वह बंदूक छोड़ने के पहले खुद ही धुआं होकर फैल गया।

बादलों की यह ऐयारी इस समय न मालूम कितने आदमी देख-देखकर खुश होते होंगे। मगर किशोरी के दिल की धड़कन इसे देख-देखकर बढ़ती ही जाती है। कभी तो उसका सिर पहाड़-सा भारी हो जाता है, कभी माधवी बाघिन की सूरत ध्यान में आती है, कभी बाकरअली शुतुरमुहार की बदमाशी याद आती है, कभी हाथ में बंदूक लिए हरदम जान लेने को तैयार बाप की याद तड़पा देती है।

कमला को गए कई दिन हुए, आज तक वह लौटकर नहीं आई। इस सोच ने किशोरी को और भी दुखी कर रखा है। धीरे-धीरे शाम हो गई, सखियां सब पास बैठी ही रहीं मगर सिवाय ठंडी-ठंडी सांस लेने के किशोरी ने किसी से बातचीत न की और वे सब भी दम न मार सकीं।

कुछ रात जाते-जाते बादल अच्छी तरह से घिर आये, आंधी भी चलने लगी। किशोरी छत पर से नीचे उतर आई और कमरे के अंदर मसहरी पर जा लेटी। थोड़ी ही देर बाद कमरे के सदर दरवाजे का पर्दा हटा और कमला अपनी असली सूरत में आती दिखाई पड़ी।

कमला के न आने से किशोरी उदास हो रही थी, उसे देखते ही पलंग पर से उठी, आगे बढ़कर कमला को गले लगा लिया और गद्दी पर अपने पास ला बैठाया, कुशल-मंगल पूछने के बाद बातचीत होने लगी –

किशोरी – कहो बहिन, तुमने इतने दिनों में क्या-क्या काम किया उनसे मुलाकात भी हुई या नहीं

कमला – मुलाकात क्यों न होती आखिर मैं गई थी किसलिए।

किशोरी – कुछ मेरा हालचाल भी पूछते थे।

कमला – तुम्हारे लिए तो जान देने को तैयार हैं क्या हाल-चाल भी न पूछेंगे बस दो ही एक दिन में तुमसे मुलाकात हुआ चाहती है।

किशोरी – (खुश होकर) हां! तुम्हें मेरी ही कसम, मुझसे झूठ न बोलना!

कमला – क्या तुम्हें विश्वास है कि मैं तुमसे झूठ बोलूंगी

किशोरी – नहीं-नहीं, मैं ऐसा नहीं समझती हूं, लेकिन इस खयाल से कहती हूं कि कहीं दिल्लगी न सूझी हो।

कमला – ऐसा कभी मत सोचना।

किशोरी – खैर यह कहो, माधवी की कैद से उन्हें छुट्टी मिली या नहीं और अगर मिली तो क्योंकर!

कमला – इंद्रजीतसिंह को माधवी ने उसी पहाड़ी के बीच वाले मकान में रखा था जिसमें पारसाल मुझे और तुम्हें दोनों की आंखों में पट्टी बांधकर ले गई थी।

किशोरी – बड़े बेढब ठिकाने छिपा रखा था।

कमला – मगर वहां भी उनके ऐयार लोग पहुंच गये!

किशोरी – भला वे लोग क्यों न पहुंचेंगे, हां तब क्या हुआ

कमला – (किशोरी की सखियों और लौंडियों की तरफ देख के) तुम लोग जाओ, अपना काम करो।

किशोरी – हां, अभी काम नहीं है, फिर बुलावेंगे तो आना।

सखियों और लौंडियों के चले जाने पर कमला ने देर तक बातचीत करने के बाद कहा –

‘‘माधवी का और अग्निदत्त दीवान का हाल भी चालाकी से इंद्रजीतसिंह ने जान लिया, आजकल उनके कई ऐयार वहां पहुंचे हुए हैं, ताज्जुब नहीं कि दस-पांच दिन में वे लोग उस राज्य ही को गारत कर डालें।’’

किशोरी – मगर तुम तो कहती हो कि इंद्रजीतसिंह वहां से छूट गये!

कमला – हां, इंद्रजीतसिंह तो वहां से छूट गये मगर उनके ऐयारों ने अभी तक माधवी का पीछा नहीं छोड़ा, इंद्रजीतसिंह के छुड़ाने का बंदोबस्त तो उनके ऐयारों ही ने किया था मगर आखिर में मेरे ही हाथ से उन्हें छुट्टी मिली। मैं उन्हें चुनार पहुंचाकर तब यहां आई हूं और जो कुछ मेरी जुबानी उन्होंने तुम्हें कहला भेजा है उसे कहना तथा उनकी बात मानना ही मुनासिब समझती हूं।

किशोरी – उन्होंने क्या कहा है

कमला – यों तो वे मेरे सामने बहुत कुछ बक गये मगर असल मतलब उनका यही है कि तुम चुपचाप चुनार उनके पास बहुत जल्द पहुंच जाओ।

किशोरी – (देर तक सोचकर) मैं तो अभी चुनार जाने को तैयार हूं मगर इसमें बड़ी हंसाई होगी।

कमला – अगर तुम हंसाई का खयाल करोगी तो बस हो चुका, क्योंकि तुम्हारे मां-बाप इंद्रजीतसिंह के पूरे दुश्मन हो रहे हैं, जो तुम चाहती हो उसे वे खुशी से कभी मंजूर न करेंगे। आखिर जब तुम अपने मन की करोगी तभी लोग हंसेंगे, ऐसा ही है तो इंद्रजीतसिंह का ध्यान दिल से दूर करो या फिर बदनामी कबूल करो।

किशोरी – तुम सच कहती हो, एक-न-एक दिन बदनामी होनी ही है क्योंकि इंद्रजीतसिंह को मैं किसी तरह भूल नहीं सकती। आखिर तुम्हारी क्या राय है

कमला – सखी, मैं तो यही कहूंगी कि अगर तुम इंद्रजीतसिंह को नहीं भूल सकतीं तो उनसे मिलने के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा मौका तुम्हें न मिलेगा। चुनार में जाकर बैठ रहोगी तो कोई भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सकेगा, आज कौन ऐसा है जो महाराज वीरेंद्रसिंह से मुकाबला करने का साहस रखता हो तुम्हारे पिता अगर ऐसा करते हैं तो यह उनकी भूल है। आज सुरेंद्रसिंह के खानदान का सितारा बड़ी तेजी से आसमान पर चमक रहा है और उनसे दुश्मनी का दावा करना अपने को मिट्टी में मिला देना है।

किशोरी – ठीक है, मगर इस तरह वहां चले जाने से इंद्रजीतसिंह के बड़े लोग कब खुश होंगे

कमला – नहीं, नहीं, ऐसा मत सोचो, क्योंकि तुम्हारी और इंद्रजीतसिंह की मुहब्बत का हाल वहां किसी से छिपा नहीं है। सभी लोग जानते हैं कि इंद्रजीतसिंह तुम्हारे बिना जी नहीं सकते, फिर उन लोगों को इंद्रजीतसिंह से कितनी मुहब्बत है यह तुम खुद जानती हो, अस्तु ऐसी दशा में वे लोग तुम्हारे जाने से कब नाखुश हो सकते हैं दूसरे, दुश्मन की लड़की अपने घर में आ जाने से वे लोग अपनी जीत समझेंगे। मुझे महारानी चंद्रकांता ने खुद कहा था कि जिस तरह बने तुम समझा-बुझाकर किशोरी को ले आओ, बल्कि उन्होंने अपनी खास सवारी का रथ और कई लौंडी गुलाम भी मेरे साथ भेजे हैं!

किशोरी – (चौंककर) क्या उन लोगों को अपने साथ लाई हो!

कमला – हां, जब महारानी चंद्रकांता की इतनी मुहब्बत तुम पर देखी तभी तो मैं भी वहां चलने के लिए राय देती हूं।

किशोरी – अगर ऐसा है तो मैं किसी तरह रुक नहीं सकती, अभी तुम्हारे साथ चली चलूंगी, मगर देखो सखी, तुम्हें बराबर मेरे साथ रहना पड़ेगा।

कमला – भला मैं कभी तुम्हारा साथ छोड़ सकती हूं!

किशोरी – अच्छा तो यहां किसी से कुछ कहना-सुनना तो है नहीं?

कमला – किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं। बल्कि तुम्हारी इन सखियों और लौंडियों को भी कुछ पता न लगना चाहिए जिनको मैंने इस समय यहां से हटा दिया है।

किशोरी – वह रथ कहां खड़ा है?

कमला – इसी बगल वाली आम की बारी में रथ और चुनार से आये हुए लौंडी-गुलाम सब मौजूद हैं।

किशोरी – खैर चलो, देखा जायगा, राम मालिक है।

किशोरी को साथ ले कमला चुपके से कमरे के बाहर निकली और पेड़ों में छिपती हुई बाग से निकलकर बहुत जल्द उस आम की बारी में जा पहुंची जिसमें रथ और लौंडी-गुलामों के मौजूद रहने का पता दिया था। वहां किशोरी ने कई लौंडी-गुलामों और उस रथ को भी मौजूद पाया जिसमें बहुत तेज चलने वाले ऊंचे काले रंग के नागौरी बैलों की जोड़ी जुती हुई थी। किशोरी और कमला दोनों सवार हुर्ईं और रथ तेजी के साथ रवाना हुआ।

इधर घण्टा भर बीत जाने पर भी जब किशोरी ने अपनी सखियों और लौंडियों को आवाज न दी तब वे लाचार होकर बिना बुलाये उस कमरे में पहुंचीं जिसमें कमला और किशोरी को छोड़ गयी थीं मगर वहां दोनों में से किसी को भी मौजूद न पाया। घबराकर इधर-उधर ढूंढ़ने लगीं, कहीं पता न चला। तमाम बाग छान डाला पर किसी की सूरत दिखाई न पड़ी। सभों में खलबली मच गई मगर क्या हो सकता था!

आधी रात तक कोलाहल मचा रहा। उस समय कमला भी वहां आ मौजूद हुई। सभों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और पूछा, ‘‘हमारी किशोरी कहां है?’

कमला – यह क्या मामला है जो तुम लोग इस तरह घबड़ा रही हो क्या किशोरी कहीं चली गईं?

एक – चली नहीं गई तो कहां हैं! तुम उन्हें कहां छोड़ आयीं?

कमला – क्या किशोरी को मैं अपने साथ ले गई थी जो मुझसे पूछती हो वह कब से गायब हैं?

एक – पहर भर से तो हम लोग ढूंढ़ रही हैं! तुम दोनों इसी कमरे में बातें कर रही थीं। हम लोगों को हट जाने के लिए कहा, फिर न मालूम क्या हुआ, कहां चली गयीं।

कमला – बस-बस, अब मैं समझ गयी, तुम लोगों ने धोखा खाया, मैं तो अभी चली ही आती हूं। हाय, यह क्या हुआ! बेशक दुश्मन अपना काम कर गए और हम लोगों को आफत में डाल गए। हाय, अब मैं क्या करूं, कहां जाऊं, किससे पूछूं कि मेरी प्यारी किशोरी को कौन ले गया।

बयान – 2

किशोरी खुशी-खुशी रथ पर सवार हुई और रथ तेजी से जाने लगा। वह कमला भी उसके साथ थी, इंद्रजीतसिंह के विषय में तरह-तरह की बातें कहकर उसका दिल बहलाती जाती थी। किशोरी भी बड़े प्रेम से उन बातों को सुनने में लीन हो रही थी। कभी सोचती कि जब इंद्रजीतसिंह के सामने जाऊंगी तो किस तरह खड़ी होऊंगी, क्या कहूंगी अगर वे पूछ बैठेंगे कि तुम्हें किसने बुलाया तो क्या जवाब दूंगी? नहीं-नहीं, वे ऐसा कभी न पूछेंगे क्योंकि मुझ पर प्रेम रखते हैं। मगर उनके घर की औरतें मुझे देखकर अपने दिल में क्या कहेंगी। वे जरूर समझेंगी कि किशोरी बड़ी बेहया औरत है। इसे अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा का कुछ भी ध्यान नहीं है। हाय, उस समय तो मेरी बड़ी ही दुर्गति होगी, जिंदगी जंजाल हो जायगी, किसी को मुंह न दिखा सकूंगी!

ऐसी ही बातों को सोचती, कभी खुशी होती कभी इस तरह बेसमझे-बूझे चल पड़ने पर अफसोस करती थी। कृष्ण पक्ष की सप्तमी थी, अंधेरे ही में रथ के बैल बराबर दौड़े जा रहे थे। चारों तरफ से घेरकर चलने वाले सवारों के घोड़ों की टापों की बढ़ती हुई आवाज दूर-दूर तक फेल रही थी। किशोरी ने पूछा, ‘‘क्या कमला, क्या लौंडियां भी घोड़ों ही पर सवार होकर साथ-साथ चल रही हैं’ जिसके जवाब में कमला सिर्फ ‘‘जी हां,’’ कहकर चुप हो रही।

अब रास्ता खराब और पथरीला आने लगा, पहियों के नीचे पत्थर के छोटे-छोटे ढोकों के पड़ने से रथ उछलने लगा, जिसकी धमक से किशोरी के नाजुक बदन में दर्द पैदा हुआ।

किशोरी – ओफओह, अब तो बड़ी तकलीफ होने लगी।

कमला – थोड़ी दूर तक रास्ता खराब है, आगे हम अच्छी सड़क पर जा पहुंचेंगे।

किशोरी – मालूम होता है हम लोग सीधी और साफ सड़क छोड़ किसी दूसरी ही तरफ से जा रहे हैं।

कमला – जी नहीं।

किशोरी – नहीं क्या जरूर ऐसा ही है।

कमला – अगर ऐसा भी हो तो क्या बुरा हुआ हम लोगों की खोज में जो निकलें वे पा तो न सकेंगे।

किशोरी – (कुछ सोचकर) खैर जो किया अच्छा किया, मगर रथ का पर्दा तो उठा जरा हवा लगे और इधर-उधर की कैफियत देखने में आवे, रात का तो समय है।

लाचार होकर कमला ने रथ का पर्दा उठा दिया और किशोरी ताज्जुब भरी निगाहों से दोनों तरफ देखने लगी।

अब तक तो रात अंधेरी थी, मगर अब विधाता ने किशोरी को यह बताने के लिए कि देख तू किस बला में फंसी हुई है, तेरे रथ को चारों तरफ से घेरकर चलने वाले सवार कौन हैं, तू किस राह से जा रही है, यह पहाड़ी जंगल कैसा भयानक है-आसमान पर माहताबी जलाई। चंद्रमा निकल आया और धीरे-धीरे ऊंचा होने लगा जिसकी रोशनी में किशोरी ने कुल सामान देख लिए और एकदम चौंक उठी। चारों तरफ की भयानक पहाड़ी और जंगल ने उसका कलेजा दहला दिया। उसने उन सवारों की तरफ अच्छी तरह देखा जो रथ घेरे हुए साथ-साथ जा रहे थे। वह बखूबी समझ गई कि इन सवारों में, जैसा कि कहा गया था, कोई भी औरत नहीं सब मर्द हैं। उसे निश्चय हो गया कि वह आफत में फंस गई है और घबराहट में नीचे लिखे कई शब्द उसकी जुबान से निकल पड़े –

‘‘चुनार तो पूरब है, मैं दक्खिन तरफ क्यों जा रही हूं इन सवारों में तो एक भी लौंडी नजर नहीं आती। बेशक मुझे धोखा दिया गया। मैं निश्चय कह सकती हूं कि मेरी प्यारी कमला कोई दूसरी ही है, अफसोस!’’

रथ में बैठी हुई कमला किशोरी के मुंह से इन बातों को सुनकर होशियार हो गयी और झट रथ से नीचे कूद पड़ी, साथ ही रथवान ने भी बैलों को रोका और सवारों ने बहुत पास आकर रथ को घेर लिया।

कमला ने चिल्लाकर कुछ कहा जिसे किशोरी बिल्कुल न समझ सकी, हां एक सवार घोड़े से नीचे उतर पड़ा और कमला उसी घोड़े पर सवार हो तेजी के साथ पीछे की तरफ लौट गई।

अब किशोरी को अपने धोखा खाने और आफत में फंस जाने का पूरा विश्वास हो गया और वह एकदम चिल्लाकर बेहोश हो गई।

बयान – 3

सुबह का सुहावना समय भी बड़ा ही मजेदार होता है। जबर्दस्त भी परले सिरे का है। क्या मजाल कि इसकी अमलदारी में कोई धूम तो मचावे, इसके आने की खबर दो घंटे पहले ही से हो जाती है। वह देखिए आसमान के जगमगाते हुए तारे कितनी बेचैनी और उदासी के साथ हसरत भरी निगाहों से जमीन की तरफ देख रहे हैं जिनकी सूरत और चलाचली की बेचैनी देख बागों की सुंदर कलियों ने भी मुस्कराना शुरू कर दिया, अगर यही हालत रही तो सुबह होते तक जरूर खिलखिलाकर हंस पड़ेंगी।

लीजिए अब दूसरा ही रंग बदला। प्रकृति की न मालूम किस ताकत ने आसमान की स्याही को धो डाला और इसकी हुकूमत की रात बीतते देख उदास तारों को भी विदा होने का हुक्म सुना दिया। इधर बेचैन तारों की घबराहट देख अपने हुस्न और जमाल पर भूली हुई खिलखिलाकर हंसने वाली कलियों को सुबह की ठंडी-ठंडी हवा ने खूब ही आड़े हाथों लिया और मारे थपेड़ों के उनके उस बनाव को बिगाड़ना शुरू कर दिया जो दो ही घंटे पहले प्रकृति की किसी लौंडी ने दुरुस्त कर दिया था।

मोतियों से ज्यादे आबदार ओस की बूंदों को बिगड़ते और हंसती हुई कलियों का शृंगार मिटते देख उनकी तरफदार खुशबू से न रहा गया, झट फूलों से अलग हो सुबह की ठंडी हवा से उलझ पड़ी और इधर-उधर फैल धूम मचाना शुरू कर दिया। अपनी फरियाद सुनाने के लिए उन नौजवानों के दिमागों में घुस-घुसकर उन्हें उठाने की फिक्र करने लगी जो रातभर जाग-जागकर इस समय खूबसूरत पलंगड़ियों पर सुस्त पड़ रहे थे। जब उन्होंने कुछ न सुना और करवट बदलकर रह गए तो मालियों को जा घेरा। ये झट उठ बैठे और कमर कसकर उस जगह पहुंचे जहां फूलों और उमंग भरे हवा के झपेटों से कहा-सुनी हो रही थी। कम्बख्त छोटे लोगों का यह दिमाग कहां कि ऐसों का फैसला करें, बस फूलों को तोड़-तोड़कर चगेर भरने लगे। चलो छुट्टी हुई, न रहे बांस न बजे बांसुरी। क्या अच्छा झगड़ा मिटाया है! इसके बदले में वे बड़े-बड़े दरख्त खुश हो हवा की मदद से झुक-झुककर मालियों को सलाम करने लगे जिनकी टहनियों में एक भी फूल दिखाई नहीं देता था। ऐसा क्यों न करें उनमें था ही क्या जो दूसरों को महक देते, अपनी सूरत सभों को भाती है और अपना-सा होते देख सभी खुश होते हैं।

लीजिए उन परीजमालों ने भी पलंग का पीछा छोड़ा और उठते ही आईने के मुकाबिल हो बैठीं जिनके बनाव को चाहने वालों ने रात भर में बिथोरकर रख दिया था। झटपट अपनी सम्बुली जुल्फों को सुलझा, माहताबी चेहरों को गुलाबजल से साफ कर, अलबेली चाल से अठखेलियां करती, चम्पई दुपट्टा संभालती, रविशों पर घूमने और फूलों के मुकाबिले में रुक-रुककर पूछने लगीं कि ‘कहिये आप अच्छे या हम’ जब जवाब न पाया हाथ बढ़ा तोड़ लिया और बालियों में झुमकी की जगह रख आगे बढ़ीं। गुलाब की पटरी तक पहुंची थीं, कांटों ने आंचल पकड़ा और इशारे से कहा, ‘‘जरा ठहर जाइए, आपके इस तरह लापरवाह जाने से उलझन होती है, और नहीं तो चार आंखें ही करते और आंसू पोंछते जाइए!’’

जाने दीजिए ये सब घमंडी हैं। हमें तो कुछ उन लोगों की कुलबुलाहट भली मालूम होती है जो सुबह होने के दो घंटे पहले ही उठ, हाथ-मुंह धो, जरूरी कामों से छुट्टी पा बगल में धोती दबा गंगाजी की तरफ लपके जाते हैं और वहां पहुंच स्नान कर, भस्म या चंदन लगा, पटरों पर बैठ संध्या करते-करते सुबह के सुहावने समय का आनंद पतित-पावनी श्रीगंगाजी की पापनाशिनी तरंगों से ले रहे हैं। इधर गुप्ती में घुसी उंगलियों ने प्रेमानंद में मग्न मनराज की आज्ञा से गिरिजापति का नाम ले एक दाना पीछे हटाया और उधर तरनतारिनी भगवती जाह्नवी की लहरें तख्तों ही से छू-छूकर दस-बीस जन्म का पाप बहा ले गयीं। सुगंधित हवा के झपेटे कहते फिरते हैं – ‘‘जरा ठहर जाइए, अर्घा न उठाइये, अभी भगवान सूर्यदेव के दर्शन देर में होंगे, तब तक आप कमल के फूलों को खोलकर इस तरह पर श्रीगंगाजी को चढ़ाइये कि लड़ी टूटने न पावे, फिर देखिये देवता उसे खुद-ब-खुद मालाकार बना देते हैं या नहीं!!’’

ये सब तो सत्पुरुषों के काम हैं जो यहां भी आनंद ले रहे हैं और वहां भी मजा लूटेंगे। आप जरा मेरे साथ चलकर उन दो दिलजलों की सूरत देखिये जो रात भर जागते और इधर-उधर दौड़ते रहे हैं और सुबह के सुहावने समय में एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ चारों तरफ देखते हुए सोच रहे हैं कि किधर जायं, क्या करें चाहे वे कितने ही बेचैन क्यों न हों मगर पहाड़ों से टक्कर खाते हुए सुबह की ठंडी-ठंडी हवा के झोंकों के डपटने और हिलाकर जताने से उन छोटे-छोटे जंगली फूलों के पौधों की तरफ नजर डाल ही देते हैं जो दूर तक कतार बांधे मस्ती से झूम रहे हैं, उन क्यारियों की तरफ ताक ही देते हैं जिनके फूल ओस के बोझ से तंग हो टहनियां छोड़ पत्थर के ढोकों का सहारा ले रहे हैं, उन साखू और शीशम के पत्तों की घनघनाहट सुन ही लेते हैं जो दक्खिन से आती हुई सुगंधित हवा को रोके, रहे-सहे जहर को चूस, गुणकारी बना उन तक आने का हुक्म देते हैं।

इन दो आदमियों में से एक तो लगभग बीस वर्ष की उम्र का बहादुर सिपाही है जो ढाल-तलवार के इलावे हाथ में तीर-कमान लिए बड़ी मुस्तैदी से खड़ा हे, मगर दूसरे के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते कि वह कौन या किस दर्जे और इज्जत का आदमी है। उसकी उम्र चाहे पचास से ज्यादे क्यों न हो मगर अभी तक उसके चेहरे पर बल का नाम-निशान नहीं है, जवानों की तरह खूबसूरत चेहरा दमक रहा है, बेशकीमत पोशाक और हरबों की तरफ खयाल करने से तो यही कहने को जी चाहता है कि किसी फौज का सेनापति है, मगर नहीं, इसका रोआबदार और गंभीर चेहरा इशारा करता है कि यह कोई बहुत ही ऊंचे दर्जे का है जो कुछ देर से खड़ा एकटक वायुकोण की तरफ देख रहा है।

सूर्य की किरणों के साथ ही साथ लाल वर्दी के बेशुमार फौजी आदमी उत्तर से दक्खिन की तरफ जाते दिखाई पड़े जिससे इस बहादुर का चेहरा जोश में आकर और भी दमक उठा और यह धीरे से बोला, ‘‘लो हमारी फौज भी आ पहुंची!’’

थोड़ी ही देर में वह फौज इस पहाड़ी के नीचे आकर रुक गई जिस पर ये दोनों खड़े थे और एक आदमी पहाड़ के ऊपर चढ़ता हुआ दिखाई दिया जो बहुत जल्द इन दोनों के पास पहुंचकर खड़ा हो गया।

इस नये आये हुए आदमी की उम्र भी पचास से कम न होगी। इसके सिर और मूंछों के बाल चौथाई सफेद हो चुके थे। कद के साथ-साथ खूबसूरत चेहरा भी कुछ लंबा था। इसका रंग सिर्फ गोरा ही न था बल्कि अभी तक रगों में दौड़ती हुई सुर्खी इसके गालों पर अच्छी तरह उभड़ रही थी, बड़ी-बड़ी स्याह और जोश भरी आंखों में गुलाबी डोरियां बहुत भली मालूम होती थीं। इसकी पोशाक ज्यादे कीमत की या कामदार न थी, मगर कम दाम की भी न थी। उम्दे और मोटे स्याह मखमल की इतनी चुस्त थी कि उसके अंगों की सुडौल कपड़े के ऊपर से जाहिर हो रही थी। कमर में सिर्फ एक खंजर और लपेटा हुआ कमंद दिखाई देता था, बगल में सुर्ख मखमल का एक बटुआ भी लटक रहा था।

पाठकों को ज्यादे देर तक हेरानी में न डालकर साफ-साफ कह देना ही पसंद करते हैं कि यह तेजसिंह हैं और इनके पहले पहुंचे हुए दोनों आदमियों में एक राजा वीरेंद्रसिंह और दूसरे उनके लड़के कुंअर आनंदसिंह हैं, जिनके लिए हमें ऊपर बहुत कुछ फजूल बक जाना पड़ा।

राजा वीरेंद्रसिंह और तेजसिंह कुछ देर तक सलाह करते रहे, इसके बाद तीनों बहादुर पहाड़ी के नीचे उतर अपनी फौज में मिल गये और दिल खुश करने के सिवाय बहादुरों को जोश में भर देने वाले बाजे की आवाज के तालों पर एक साथ कदम रखती हुई वह फौज दक्खिन की तरफ रवाना हुई।

बयान – 4

हम ऊपर लिख आये हैं कि माधवी के यहां तीन आदमी अर्थात दीवान अग्निदत्त, कुबेरसिंह सेनापति और धर्मसिंह कोतवाल मुखिया थे और तीनों मिलकर माधवी के राज्य का आनंद लेते थे।

इन तीनों में अग्निदत्त का दिन बहुत मजे से कटता था क्योंकि एक तो वह दीवान के मर्तबे पर था, दूसरे माधवी जैसी खूबसूरत औरत उसे मिली थी। कुबेरसिंह और धर्मसिंह इसके दिली दोस्त थे, मगर कभी जब उन दोनों को माधवी का ध्यान आ जाता तो चित्त की वृत्ति बदल जाती और जी में कहते कि ‘अफसोस, माधवी मुझे न मिली!’

पहले इन दोनों को यह खबर न थी कि माधवी कैसी है। बहुत कहने-सुनने से एक दिन दीवान साहब ने इन दोनों को माधवी को देखने का मौका दिया था। उसी दिन से इन दोनों ही के जी में माधवी की सूरत चुभ गई थी और उसके बारे में बहुत कुछ सोचा करते थे।

आज हम आधी रात के समय दीवान अग्निदत्त को अपने सुनसान कमरे में अकेले चारपाई पर लेटे किसी सोच में डूबे हुए देखते हैं। न मालूम वह क्या सोच रहा है या फिक्र में पड़ा है, हां एक दफे उसके मुंह से यह आवाज जरूर निकली – ‘‘कुछ समझ में नहीं आता! इसमें तो कोई संदेह नहीं कि उसने अपना दिल खुश करने का कोई सामान वहां पैदा कर लिया है। तो मैं बेफिक्र क्यों बैठा हूं खैर पहले अपने दोस्तों से तो सलाह ले लूं।’’ यह कहने के साथ ही वह चारपाई से उठ बैठा और कमरे में धीरे-धीरे टहलने लगा, आखिर उसने खूंटी से लटकती हुई अपनी तलवार उतार ली और मकान के नीचे उतर आया।

दरवाजे पर बहुत से सिपाही पहरा दे रहे थे। दीवान साहब को कहीं जाने के लिए तैयार देख ये लोग भी साथ चलने को तैयार हुए, मगर दीवान साहब के मना करने से उन लोगों को लाचार हो उसी जगह अपने काम पर मुस्तैद रहना पड़ा।

अकेले दीवान साहब वहां से रवाना हुए और बहुत जल्दी कुबेरसिंह सेनापति के मकान पर जा पहुंचे जो इनके यहां से थोड़ी ही दूर पर एक सुंदर सजे हुए मकान में बड़े ठाठ के साथ रहता था।

दीवान साहब को विश्वास था कि इस समय सेनापति अपने ऐशमहल में आनंद से सोता होगा, वहां से बुलवाना पड़ेगा, मगर नहीं दरवाजे पर पहुंचते ही पहरे वालों से पूछने पर मालूम हुआ कि सेनापति साहब अभी तक अपने कमरे में बैठे हैं, बल्कि कोतवाल साहब भी इस समय उन्हीं के पास हैं।

अग्निदत्त यह सोचता हुआ ऊपर चढ़ गया कि आधी रात के समय कोतवाल यहां क्यों आया है और ये दोनों इस समय क्या सलाह-विचार कर रहे हैं। कमरे में पहुंचते ही देखा कि सिर्फ वे ही दोनों एक गद्दी पर तकिये के सहारे लेटे हुए कुछ बात कर रहे हैं जो यकायक दीवान साहब को अंदर पैर रखते देख उठ खड़े हुए और सलाम करने के बाद सेनापति साहब ने ताज्जुब में आकर पूछा –

‘‘यह आधी रात के समय आप घर से क्यों निकले?’

दीवान – ऐसा ही मौका आ पड़ा, लाचार सलाह करने के लिए आप दोनों से मिलने की जरूरत हुई।

कोत – आइए बैठिए, कुशल तो है

दीवान – हां कुशल ही कुशल है, मगर कई खुटकों ने जी बेचैन कर रखा है।

सेनापति – सो क्या कुछ कहिए भी तो।

दीवान – हां कहता हूं, इसीलिए तो आया हूं, मगर पहले (कोतवाल की तरफ देखकर) आप तो कहिए इस समय यहां कैसे पहुंचे?

कोत – मैं तो यहां बहुत देर से हूं, सेनापति साहब की विचित्र कहानी ने ऐसा उलझा रखा था कि बस क्या कहूं, हां आप अपना हाल कहिए, जी बेचैन हो रहा है।

दीवान – मेरा कोई नया हाल नहीं है, केवल माधवी के विषय में कुछ सोचने-विचारने आया हूं।

सेनापति – माधवी के विषय में किस नये सोच ने आपको आ घेरा कुछ तकरार की नौबत तो नहीं आई!

दीवान – तकरार की नौबत आई तो नहीं मगर आना चाहती है।

सेनापति – सो क्यों?

दीवान – उसके रंग-ढंग आजकल बेढब नजर आते हैं, तभी तो देखिए इस समय मैं यहां हूं, नहीं तो पहर रात के बाद क्या कोई मेरी सूरत देख सकता था।

कोत – इधर तो कई दिन आप अपने मकान ही पर रहे हैं।

दीवान – हां, इन दिनों वह अपने महल में कम आती है, उसी गुप्त पहाड़ी में रहती है, कभी-कभी आधी रात के बाद आती है और मुझे उसकी राह देखनी पड़ती है।

कोत – वहां उसका जी कैसे लगता है?

दीवान – यही तो ताज्जुब है, मैं सोचता हूं कि कोई मर्द वहां जरूर है क्योंकि वह कभी अकेले रहने वाली नहीं।

कोत – पता लगाना चाहिए।

दीवान – पता लगाने के उद्योग में मैं कई दिन से लगा हूं मगर कुछ हो न सका। जिस दरवाजे को खोलकर वह आती-जाती है उसकी ताली भी इसलिए बनवाई कि धोखे में वहां तक जा पहुंचूं, मगर काम न चला, क्योंकि जाती समय अंदर से वह न मालूम ताले में क्या कर जाती है कि चाबी नहीं लगती है।

कोत – तो दरवाजा तोड़ के वहां पहुंचना चाहिए।

दीवान – ऐसा करने से बड़ा फसाद मचेगा।

कोत – फसाद करके कोई क्या कर लेगा! राज्य तो हम तीनों की मुट्ठी में है।

इतने ही में बाहर किसी आदमी के पैर की चाप मालूम हुई। तीनों देर तक उसी तरफ देखते रहे मगर कोई न आया। कोतवाल यह कहता हुआ कि ‘कहीं कोई छिप के बातें सुनता न हो’ उठा और कमरे के बाहर जाकर इधर-उधर देखने लगा, मगर किसी का पता न चला, लाचार फिर कमरे में चला आया और बोला, ‘‘कोई नहीं है, खाली धोखा हुआ।’’

इस जगह विस्तार से यह लिखने की कोई जरूरत नहीं कि इन तीनों में क्या-क्या बातचीत होती रही या इन लोगों ने कौन-सी सलाह पक्की की, हां इतना कहना जरूरी है कि बातों ही बातों में इन तीनों ने रात बिता दी और सबेरा होते ही अपने-अपने घर का रास्ता लिया।

दूसरे दिन पहर रात जाते-जाते कोतवाल साहब के घर में एक विचित्र बात हुई। वे अपने कमरे में बैठे कचहरी के कुछ जरूरी कागजों को देख रहे थे कि इतने ही में शोरगुल की आवाज उनके कानों में आई। गौर करने से मालूम हुआ कि बाहर दरवाजे पर लड़ाई हो रही है। कोतवाल साहब के सामने जो मोमी शमादान जल रहा था उसी के पास एक घंटी पड़ी हुई थी, उठाकर बजाते ही एक खिदमतगार दौड़ा-दौड़ा सामने आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। कोतवाल साहब ने कहा, ‘‘दरियाफ्त करो, बाहर कैसा कोलाहल मचा हुआ है’

खिदमतगार दौड़ा बाहर गया और तुरंत लौटकर बोला, ‘‘न मालूम कहां से दो आदमी आपस में लड़ते हुए आये हैं, फरियाद करने के लिए बेधड़क भीतर घुसे आते थे। पहरे वालों ने रोका तो उन्हीं से झगड़ा करने लगे।’’

कोत – उन दोनों की सूरत-शक्त कैसी है?

खिद – दोनों भले आदमी मालूम पड़ते हैं, अभी मूंछें नहीं निकली हैं, बड़े ही खूबसूरत हैं, मगर खून से तर-बतर हो रहे हैं।

कोत – अच्छा कहो, उन दोनों को हमारे सामने हाजिर करें।

हुक्म पाते ही खिदमतगार फिर बाहर गया और थोड़ी देर में कई सिपाही उन दोनों को लिए हुए कोतवाल के सामने हाजिर हुए। नौकर की बात बिल्कुल सच निकली। वे दोनों कम उम्र और बहुत खूबसूरत थे, बदन पर लिबास भी बेशकीमती था, कोई हरबा उनके पास न था मगर खून से उन दोनों का कपड़ा तर हो रहा था।

कोत – तुम लोग आपस में क्यों लड़ते हो और हमारे आदमियों से फसाद करने पर उतारू क्यों हुए?

एक – (सलाम करके) हम दोनों भले आदमी हैं, सरकारी सिपाहियों ने बदजुबानी की, लाचार गुस्सा तो चढ़ा ही हुआ था, बिगड़ गई।

कोत – अच्छा इसका फैसला पीछे होता रहेगा, पहले तुम यह कहो कि आपस में क्यों खूनखराबी कर बैठे और तुम दोनों का मकान कहां है?

दूसरा – हम दोनों आपकी रैयत हैं और गयाजी में रहते हैं, दोनों सगे भाई हैं, एक औरत के पीछे लड़ाई हो रही है जिसका फैसला आपसे चाहते हैं, बाकी हाल इतने आदमियों के सामने कहना हम लोग पसंद नहीं करते।

कोतवाल साहब ने सिर्फ उन दोनों को वहां रहने दिया बाकी सभों को वहां से हटा दिया, निराला होने पर फिर उन दोनों से लड़ाई का सबब पूछा।

एक – हम दोनों भाई सरकार से कोई मौजा ठीका लेने के लिए यहां आ रहे थे। यहां से तीन कोस पर पहाड़ी है, कुछ दिन रहते ही हम दोनों वहां पहुंचे और थोड़ा सुस्ताने की नीयत से उतर पड़े, घोड़ों को चरने के लिए छोड़ दिया और एक पेड़ के नीचे पत्थर की चट्टान पर बैठ बातचीत करने लगे…

दूसरा – (सिर हिलाकर) नहीं, कभी नहीं।

पहला – सरकार, इसे हुक्म दीजिये कि चुप रहे, मैं कह लूं तो जो कुछ इसके जी में आये कहे।

कोत – (दूसरे को डांटकर) बेशक ऐसा ही करना होगा!

दूसरा – बहुत अच्छा।

पहला – थोड़ी ही देर बैठे थे कि पास ही किसी औरत के रोने की बारीक आवाज आई जिसके सुनने से कलेजा पानी हो गया।

दूसरा – ठीक, बहुत ठीक।

कोत – (लाल आंखें करके) क्यों जी, तुम फिर बोलते हो

दूसरा – अच्छा अब न बोलूंगा!

पहला – हम दोनों उठकर उसके पास गए। आह, ऐसी खूबसूरत औरत जो आज तक किसी ने न देखी होगी, बल्कि मैं जोर देकर कहता हूं कि दुनिया में ऐसी खूबसूरत कोई दूसरी न होगी। वह अपने सामने एक तस्वीर को जो चौखटे में जड़ी हुई थी, रखे बैठी थी और उसे देख फूट-फूटकर रो रही थी।

कोत – वह तस्वीर किसकी थी, तुम पहचानते हो

पहला – जी हां पहचानता हूं, मेरी तस्वीर थी।

दूसरा – झूठ, झूठ, कभी नहीं, बेशक वह तस्वीर आपकी थी! मैं इस समय बैठा उस तस्वीर से आपकी सूरत मिलान कर गया, बिल्कुल आपसे मिलती है, इसमें कोई शक नहीं! आप इसके हाथ में गंगाजल देकर पूछिये किसकी तस्वीर थी?

कोत – (ताज्जुब में आकर) क्या मेरी तस्वीर थी?

दूसरा – बेशक आपकी तस्वीर थी, आप इससे कसम देकर पूछिये तो सही।

कोत – (पहले से) क्यों जी, तुम्हारा भाई क्या कहता है

पहला – जी ई ई…

कोत – (जोर से) कहो साफ-साफ, सोचते क्या हो?

पहला – जी बात तो यही ठीक है, आप ही की तस्वीर थी।

कोत – फिर झूठ क्यों बोले?

पहला – बस यही एक बात झूठ मुंह से निकल गई, अब कोई बात झूठ न कहूंगा, माफ कीजिये।

कोतवाल बेचारा ताज्जुब में आकर सोचने लगा कि उस औरत को मुझसे क्योंकर मुहब्बत हो गई जिसकी खूबसूरती की ये लोग इतनी तारीफ कर रहे हैं थोड़ी देर बाद फिर पूछा –

कोत – हां तो आगे क्या हुआ

पहला – (अपने भाई की तरफ इशारा करके) बस यह उस पर आशिक हो गया और उसे तंग करने लगा।

दूसरा – यह तो उस पर आशिक होकर उसे छेड़ने लगा।

पहला – जी नहीं, उसने मुझे कबूल कर लिया और मुझसे शादी करने पर राजी हो गई बल्कि उसने यह भी कहा कि मैं दो दिन तक यहां रहकर तुम्हारा आसरा देखूंगी, अगर तुम पालकी लेकर आओगे तो तुम्हारे साथ चली चलूंगी।

दूसरा – जी नहीं, यह बड़ा भारी झूठा है, जब यह उसकी खुशामद करने लगा तब उसने कहा कि मैं उसी के लिए जान देने को तैयार हूं जिसकी तस्वीर मेरे सामने है। जब इसने उसकी बात न सुनी तो उसने अपनी तलवार से इसे जख्मी किया और मुझसे बोली कि तुम जाकर मेरे दोस्त को जहां हो ढूंढ़ निकालो और कह दो कि मैं तुम्हारे लिए बर्बाद हो गई अब भी तो सुध लो, जब मैंने इसे मना किया तो यह मुझसे झगड़ पड़ा। असल में यही लड़ाई का सबब हुआ।

पहला – जी नहीं, यह संदेसा उसने मुझे दिया क्योंकि यही उसे दुःख दे रहा था।

दूसरा – नहीं, यह झूठ बोलता है।

पहला – नहीं, यह झूठा है, मैं ठीक-ठीक कहता हूं।

कोत – अच्छा, मुझे उस औरत के पास ले चलो, मैं खुद उससे पूछ लूंगा कि कौन झूठा और कौन सच्चा है।

पहला – क्या अभी तक वह उसी जगह होगी?

दूसरा – जरूर वहां होगी, यह बहाना करता है क्योंकि वहां जाने से यह झूठा साबित हो जाएगा।

पहला – (अपने भाई की तरफ देखकर) झूठा तू साबित होगा। अफसोस तो इतना ही है कि अब मुझे वहां का रास्ता भी याद नहीं।

दूसरा – (पहले की तरफ देखकर) आप रास्ता भूल गये तो क्या हुआ मुझे तो याद है, मैं जरूर आपको वहां ले चलकर झूठा साबित करूंगा! (कोतवाल साहब की तरफ देखकर) चलिए मैं आपको वहां ले चलता हूं।

कोत – चलो।

कोतवाल साहब तो खुद बेचैन हो रहे थे और चाहते थे कि जहां तक हो वहां जल्द पहुंचकर देखना चाहिए कि वह औरत कैसी है जो मुझ पर आशिक हो तस्वीर सामने रख याद किया करती है। एक पिस्तौल भरी-भराई कमर में रख उन दोनों भाइयों को साथ ले मकान के नीचे उतरे। उनको बाहर जाने के लिए मुस्तैद देख कई सिपाही साथ चलने को तैयार हुए। उन्होंने अपनी सवारी का घोड़ा मंगवाया और उस पर सवार हो सिर्फ अर्दली के दो सिपाही साथ ले उन दोनों भाइयों के पीछे-पीछे रवाना हुए। दो घंटे बराबर चलते जाने के बाद एक छोटी-सी पहाड़ी के नीचे पहुंच वे दोनों भाई रुके और कोतवाल साहब को घोड़े से उतरने के लिए कहा।

कोत – क्या घोड़ा आगे नहीं जा सकता?

पहला – घोड़ा आगे जा सकता है मगर मैं दूसरी ही बात सोचकर आपको उतरने के लिए कहता हूं।

कोत – वह क्या?

पहला – जिस औरत के पास आप आये हैं वह इसी जगह है, दो ही कदम आगे बढ़ने से आप उसे बखूबी देख सकते हैं, मगर मैं चाहता हूं कि सिवाय आपके ये दोनों प्यादे उसे देखने न पाएं। इसके लिए मैं किसी तरह जोर नहीं दे सकता मगर इतना जरूर कहूंगा कि आप आगे बढ़ झांककर उसे देख लें फिर अगर जी चाहे तो इन दोनों को भी साथ ले जाएं, क्योंकि वह अपने को गया की रानी बताती है।

कोत – (ताज्जुब से) अपने को गया की रानी बताती है।

दूसरा – जी हां।

अब तो कोतवाल साहब के दिल में कोई दूसरा ही शक पैदा हुआ। वह तरह-तरह की बातें सोचने लगे। ‘‘गया की रानी तो हमारी माधवी है, यह दूसरी कहां से पैदा हुई क्या वह माधवी तो नहीं है नहीं, नहीं, वह भला यहां क्यों आने लगी! उससे मुझसे क्या संबंध वह तो दीवान साहब की हो रही है। मगर वह आई भी हो तो कोई ताज्जुब नहीं, क्योंकि एक दिन हम तीनों दोस्त एक साथ महल में बैठे थे और रानी माधवी वहां पहुंच गई थी, मुझे खूब याद है कि उस दिन उसने मेरी तरफ बेढब तरह से देखा था और दीवान साहब की आंखें बचा घड़ी-घड़ी देखती थी, शायद उसी दिन से मुझ पर आशिक हो गई हो! हाय वह अनोखी चितवन कभी न भूलेगी। अहा, अगर यहां वही हो, और मुझे विश्वास हो कि मुझसे प्रेम रखती है तो क्या बात है! मैं ही राजा हो जाऊं और दीवान साहब को तो बात की बात में खपा डालूंगा! मगर ऐसी किस्मत कहां खैर जो हो इनकी बात मान जरा झांककर देखना तो जरूर चाहिए, शायद ईश्वर ने दिन फेरा ही हो!’’ ऐसी-ऐसी बहुत-सी बातें सोचते-विचारते कोतवाल साहब घोड़े से उतर पड़े और उन दोनों भाइयों के कहे मुताबिक आगे बढ़े।

यहां से पहाड़ियों का सिलसिला बहुत दूर तक चला गया था। जिस जगह कोतवाल साहब खड़े थे वहां दो पहाड़ियां इस तरह आपस में मिली हुई थीं कि बीच में कोसों तक लंबी दरार मालूम पड़ती थी जिसके बीच में बहता हुअ पानी का चश्मा और दोनों तरफ छोटे-छोटे दरख्त बहुत भले मालूम पड़ते थे। इधर-उधर बहुत-सी कंदराओं पर निगाह पड़ने से यही विश्वास होता था कि ऋषियों और तपस्वियों के प्रेमी अगर यहां आवें तो अवश्य उनके दर्शन से अपना जन्म कृतार्थ कर सकेंगे।

दरार के कोने पर पहुंचकर दोनों भाइयों ने कोतवाल साहब को बाईं तरफ झांकने के लिए कहा। कोतवाल साहब ने झांककर देखा, साथ ही एकदम चौंक पड़े और मारे खुशी के भरे हुए गले से चिल्लाकर बोले, ‘‘अहा, मेरी किस्मत जागी! बेशक यह रानी माधवी ही तो है!’’

बयान – 5

कमला को विश्वास हो गया कि किशोरी को कोई धोखा देकर ले भागा। वह उस बाग में बहुत देर तक न ठहरी, ऐयारी के सामान से दुरुस्त थी ही, एक लालटेन हाथ में लेकर वहां से चल पड़ी और बाग से बाहर हो चारों तरफ घूम-घूमकर किसी ऐसे निशान को ढूंढ़ने लगी जिससे यह मालूम हो कि किशोरी किस सवारी पर यहां से गई है, मगर जब तक वह उस आम की बारी में न पहुंची तब तक सिवाय पैरों के चिह्न के और किसी तरह का कोई निशान जमीन पर दिखाई न पड़ा।

बरसात का दिन था और जमीन अच्छी तरह नम हो गई थी इसलिए आम की बारी में घूम-घूमकर कमला ने मालूम कर लिया कि किशोरी यहां से रथ पर सवार होकर गई है और उसके साथ में कई सवार भी हैं क्योंकि रथ के पहियों का दोहरा निशान और बैलों के खुर जमीन पर साफ मालूम पड़ते थे, इसी तरह घोड़ों के टापों के निशान भी अच्छी तरह दिखाई देते थे।

कमला कई कदम उस निशान की तरफ चली गई जिधर रथ गया था और बहुत जल्द मालूम कर लिया कि किशोरी को ले जाने वाले किस तरफ गये हैं। इसके बाद वह पीछे लौटी और सीधे अस्तबल में पहुंच एक तेज घोड़े पर बहुत जल्द चारजामा कसने का हुक्म दिया।

कमला का हुक्म ऐसा न था कि कोई उससे इंकार करता। घोड़ा बहुत जल्द कसकर तैयार किया गया और कमला उस पर सवार हो तेजी के साथ उस तरफ रवाना हुई जिधर रथ पर सवार होकर किशोरी के जाने का विश्वास हो गया था।

पांच कोस बराबर चले जाने के बाद कमला एक चौराहे पर पहुंची जहां से बाएं तरफ का रास्ता चुनार को गया था, दाहिने तरफ की सड़क रीवां होते हुए गयाजी तक पहुंची थी, तथा सामने का रास्ता एक भयानक जंगल में होता हुआ कई तरफ को फूट गया था।

इस चौमुहानी पर पहुंचकर कमला रुकी और सोचने लगी कि किधर जाऊं अगर चुनार वाले किशोरी को ले गये होंगे तो इसी बाईं तरफ से गये होंगे, और किशोरी की दुश्मन माधवी ने उसे फंसाया होगा तो रथ दाहिनी तरफ से गयाजी को गया होगा, सामने की सड़क से रथ ले जाने वाला तो कोई खयाल में नहीं आता क्योंकि यह जंगल का रास्ता बहुत ही खराब और पथरीला है।

चंद्रमा निकल आया था और रोशनी अच्छी तरह फैल चुकी थी। कमला घोड़े से नीचे उतर गयी और दाहिनी तरफ जमीन पर रथ के पहिये का दाग ढूंढ़ने लगी मगर कुछ मालूम न हुआ, लाचार घोड़े पर सवार हो सोचने लगी कि किधर जाऊं, क्या करूं।

हम पहले लिख आये हैं कि रथ पर जाते-जाते जब किशोरी ने जान लिया कि वह धोखे में डाली गई है तब उसके मुंह से कई शब्द ऐसे निकले जिन्हें सुन नकली कमला होशियार हो गई और रथ के नीचे कूद एक घोड़े पर सवार हो पीछे की तरफ लौट गई।

लौटी हुई नकली कमला ठीक उसी समय घोड़ा दौड़ाती हुई उस चौराहे पर पहुंची जिस समय असली कमला वहां पहुंचकर सोच रही थी कि किधर जाऊं, क्या करूं असली कमला ने सामने से तेजी के साथ आते हुए सवार को देख घोड़ा रोकने के लिए ललकारा मगर वह क्यों रुकने लगी थी, हां उसे असली कमला के दाहिनी तरफ वाली राह पर जाने के लिए घूमना था इसलिए अपने घोड़े की तेजी उसे कम करनी ही पड़ी।

जब असली कमला ने देखा कि सामने से आया हुआ सवार उसके ललकारने से भी किसी तरह नहीं रुकता और दाहिनी सड़क से निकल जाना चाहता है तो झट कमर से दुनाली पिस्तौल निकालकर उसने घोड़े पर वार किया। गोली लगते ही घोड़ा नकली कमला को लिए जमीन पर गिरा, मगर घोड़े के गिरते ही वह बहुत ही जल्द सम्हलकर उठ खड़ी हुई और उसने भी कमर से दुनाली पिस्तौल निकाल असली कमला पर गोली चलाई।

असली कमला तो पहले ही सम्हली हुई थी, गोली की मार से बच गई, फिर दूसरी गोली आई पर वह भी न लगी। लाचार नकली कमला ने अपनी पिस्तौल फिर भरने का इरादा किया मगर असली कमला ने उसे वह मौका न दिया। दोनों गोली बेकार जाते देख वह समझ गयी कि उसकी पिस्तौल खाली हो गयी है, हाथ में पिस्तौल लिए वह झट उसके कल्ले पर पहुंच गई और ललकारकर बोली, ‘‘खबरदार जो पिस्तौल भरने का इरादा किया है, देख मेरी पिस्तौल में दूसरी गोली अभी मौजूद है!’’ नकली कमला भी यह सोचकर चुपचाप खड़ी रह गई कि अब वह अपने दुश्मन का कुछ नहीं बिगाड़ सकती क्योंकि पिस्तौल की दोनों गोलियां बर्बाद हो चुकी थीं और घोड़ा उसका मर चुका था।

पिस्तौल के अलावा दोनों की कमर में खंजर भी था मगर उसकी जरूरत न पड़ी। असली कमला ने ललकारकर पूछा, ‘‘सच बता तू कौन है?’

नकली कमला को जान दे देना कबूल था मगर अपने मुंह से यह बताना मंजूर न था कि वह कौन है। असली कमला ने यह देख अपने घोड़े का ऐसा चपेटा दिया कि वह किसी तरह सम्हल न सकी और जमीन पर गिर पड़ी। जब तक वह होशियार होकर उठना चाहे तब तक असली कमला झट घोड़े से कूद उसकी छाती पर सवार दिखाई देने लगी।

असली कमला ने जबर्दस्ती उसकी नाक में बेहोशी की दवा ठूंस दी और जब वह बेहोश हो गयी तो उसकी छाती पर से उतरकर अलग खड़ी हो गई।

असली कमला जब उसकी छाती पर सवार हुई तो उसे अपनी ही सूरत का पाया, इसलिए समझ गई कि यह कोई ऐयार या ऐयारा है, सिवाय इसके किशोरी की सखियों की जुबानी उसने मालूम कर ही लिया था कि कोई उसी की सूरत बना किशोरी को ले गया है, अब उसे विश्वास हो गया कि किशोरी को इसी ने धोखा दिया है।

थोड़ी देर बाद कमला ने बटुए में से पानी भरी छोटी-सी बोतल निकाली और नकली कमला का मुंह धोकर साफ किया, इसके बाद चकमक से आग निकाल बत्ती जलाकर पहचानना चाहा कि वह कौन है मगर बिना ऐसा किए वह केवल चंद्रमा की मदद से पहचान ली गयी कि माधवी की सखी ललिता है, क्योंकि कमला उसे अच्छी तरह जानती थी और वर्षों से साथ रहने के सिवाय बराबर मिला-जुला भी करती थी।

कमला को विश्वास तो हो ही गया कि किशोरी को धोखा देकर ले जाने वाली यही ललिता है मगर इस बात का ताज्जुब बना ही रहा कि वह सामने से लौटकर आती हुई क्यों दिखाई पड़ी! कमला यह भी जानती थी कि चाहे जान चली जाय मगर ललिता असल भेद कभी न बतावेगी, इसलिए उसकी जुबानी पता लगाने का उद्योग करना उसने व्यर्थ समझा और अपने साथ ललिता को घोड़े पर लादकर घर की तरफ पलट पड़ी।

रात बिल्कुल बीत चुकी थी बल्कि कुछ दिन निकल आया था जब ललिता को लादे हुए कमला घर पहुंची। यहां किशोरी के गायब होने से बड़ा ही हाहाकार मचा हुआ था। उसकी खोज में कई आदमी चारों तरफ जा चुके थे। किशोरी का नाना रणधीरसिंह भारी जमींदार होने के सिवाय बड़ा ही दिमागदार और जबर्दस्त आदमी था। उसने यही समझ रखा था कि शिवदत्त के दुश्मन वीरेंद्रसिंह की तरफ से यह कार्रवाई की गई है। मगर जब ललिता को लिए हुए कमला पहुंची और उसकी जुबानी सब हाल मालूम हुआ तब माधवी की बदमाशी पर बहुत बिगड़ा। वह माधवी की चाल-चलन पर पहले ही से रंज था मगर कुछ जोर न चलने से लाचार था। आज गुस्से के मारे इस बात का बिल्कुल ध्यान न रहा कि माधवी एक भारी राज्य की मालिक है और जबर्दस्त फौज रखती है उसने कमला के मुंह से सब हाल सुनते ही तलवार हाथ में ले कसम खा ली कि ‘जिस तरह हो सकेगा अपने हाथ से माधवी का सिर काट कलेजा ठंडा करूंगा।’

ललिता एक अंधेरी कोठरी में कैद की गई और रणधीरसिंह की आज्ञा पा कमला अपने बड़े भाई हरनामसिंह को साथ ले किशोरी की मदद को पैदल ही रवाना हुई।

कमला आज भी उसी कल वाले रास्ते पर रवाना हुई और दोपहर होते – होते उसी चौराहे पर पहुंची जहां कल ललिता मिली थी। वे दोनों बेधड़क सामने वाली सड़क पर चले।

चौराहे के आगे लगभग तीन कोस चले जाने के बाद खराब और पथरीली राह मिली जिसे देख हरनामसिंह ने कहा, ‘‘इस राह से रथ ले जाने में जरूर तकलीफ हुई होगी।’’

कमला – बेशक ऐसा ही हुआ होगा, और मुझे तो अभी तक निश्चय ही नहीं हुआ कि किशोरी इसी राह से गई है।

हरनाम – मगर मैं तो यही समझता हूं कि रथ इसी राह से गया और किशोरी का साथ छोड़ कोई दूसरी कार्रवाई करने के लिए ललिता लौटी थी।

कमला – शायद ऐसा ही हो।

और थोड़ी दूर जाने के बाद पैर की एक पाजेब जमीन पर पड़ी हुई दिखाई दी। हरनामसिंह ने उसे देखते ही उठा लिया और कहा, ‘‘बेशक किशोरी इसी राह से गई है, इस पाजेब को मैं खूब पहचानता हूं।’’

कमला – अब तो मुझे भी निश्चय हो गया कि किशोरी इधर ही से गयी है।

हरनाम – हां, जब उसे मालूम हो गया कि उसने धोखा खाया और दुश्मनों के फंदे में पड़ गई तब उसने यह पाजेब चुपके से जमीन पर फेंक दी।

कमला – इसलिए कि वह जानती थी कि उसकी खोज में बहुत से आदमी निकलेंगे और इधर आकर इस पाजेब को देखेंगे तो जान जायेंगे कि किशोरी इधर ही गयी है।

हरनाम – मैं खयाल करता हूं कि आगे चलकर किशोरी की फेंकी हुई और भी कोई चीज हम लोग जरूर देखेंगे।

कमला – बेशक ऐसा ही होगा।

कुछ आगे जाकर दूसरी पाजेब और उससे थोड़ी दूर पर किशोरी के और कई गहने इन लोगों ने पाये। अब कमला को किशोरी के इसी राह से जाने का पूरा विश्वास हो गया और वे दोनों बेधड़क कदम बढ़ाते हुए राजगृह की तरफ रवाना हुए।

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