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चंद्रकांता संतति-भाग-2 (बयान-6 से 10)

बयान – 6

कुंअर इंद्रजीतसिंह अभी तक उस रमणीक स्थान में विराज रहे हैं। जी कितना ही बेचैन क्यों न हो मगर उन्हें लाचार माधवी के साथ दिन काटना ही पड़ता है। खैर जो होगा देखा जायगा मगर इस समय दो पहर दिन बाकी रहने पर भी कुंअर इंद्रजीतसिंह कमरे के अंदर सुनहले पावों की चारपाई पर आराम कर रहे हैं और एक लौंडी धीरे-धीरे पंखा झल रही है। हम ठीक नहीं कह सकते कि उन्हें नींद दबाये हुए है या जान-बूझकर हठियाये पड़े हैं और अपनी बदकिस्मती के जाल को सुलझाने की तरकीब सोच रहे हैं। खैर इन्हें इसी तरह पड़े रहने दीजिए और आप जरा तिलोत्तमा के कमरे में चलकर देखिए कि वह माधवी के साथ किस तरह की बातचीत कर रही है। माधवी का हंसता हुआ चेहरा कहे देता है कि बनिस्बत और दिनों के आज वह खुश है, मगर तिलोत्तमा के चेहरे से किसी तरह की खुशी नहीं मालूम होती।

माधवी ने तिलोत्तमा का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘सखी, आज तुझे उतना खुश नहीं पाती हूं जितना मैं खुद हूं।’’

तिलो – तुम्हारा खुश होना बहुत ठीक है।

माधवी – तो क्या तुम्हें इस बात की खुशी नहीं है कि किशोरी मेरे फंदे में फंस गई और एक कैदी की तरह मेरे यहां तहखाने में बंद है!

तिलो – इस बात की तो मुझे भी खुशी है।

माधवी – तो रंज किस बात का है हां समझ गई, अभी तक ललिता के लौटकर न आने का बेशक तुम्हें दुख होगा।

तिलो – ठीक है, मैं ललिता के बारे में भी बहुत कुछ सोच रही हूं। मुझे तो विश्वास हो गया है कि उसे कमला ने पकड़ लिया।

माधवी – तो उसे छुड़ाने की फिक्र करनी चाहिए।

तिलो – मुझे इतनी फुरसत नहीं है कि उसे छुड़ाने के लिए जाऊं क्योंकि मेरे हाथ-पैर किसी दूसरे ही तरद्दुद ने बेकार कर दिए हैं जिसकी तुम्हें जरा भी खबर नहीं, अगर खबर होती तो आज तुम्हें भी अपनी ही तरह उदास पाती।

तिलोत्तमा की इस बात ने माधवी को चौंका दिया और वह घबड़ाकर तिलोत्तमा का मुंह देखने लगी।

तिलो – मुंह क्या देखती है, मैं झूठ नहीं कहती। तू तो अपने ऐश-आराम में ऐसी मस्त हो रही है कि दीन दुनिया की खबर नहीं। तू जानती ही नहीं कि दो ही चार दिन में तुझ पर कैसी आफत आने वाली है। क्या तुझे विश्वास हो गया कि किशोरी तेरी कैद में रह जायगी, कुछ बाहर की भी खबर है कि क्या हो रहा है क्या बदनामी ही उठाने के लिए तू गया का राज्य कर रही है मैं पचास दफे तुझे समझा चुकी कि अपनी चाल-चलन को दुरुस्त कर मगर तूने एक न सुनी, लाचार तुझे तेरी मर्जी पर छोड़ दिया और प्रेम के सबब तेरा हुक्म मानती आई मगर अब मेरे सम्हाले नहीं सम्हलता।

माधवी – तिलोत्तमा, आज तुझे क्या हो गया है जो इतना कूद रही है! ऐसी कौन-सी आफत आ गई है जिसने तुझे बदहवास कर दिया है क्या तू नहीं जानती कि दीवान साहब इस राज्य का इंतजाम कैसी अच्छी तरह कर रहे हैं और सेनापति तथा कोतवाल अपने काम में कितने होशियार हैं क्या इन लोगों के रहते हमारे राज्य में कोई विघ्न डाल सकता है?

तिलो – यह जरूर ठीक है कि इन तीनों के रहते कोई इस राज्य में विघ्न नहीं डाल सकता, लेकिन तुझे तो इन्हीं तीनों की खबर नहीं! कोतवाल साहब जहन्नुम में चले ही गये, दीवान साहब और सेनापति साहब भी आजकल में जाया चाहते हैं बल्कि चले भी गए हों तो ताज्जुब नहीं।

माधवी – यह तू क्या कह रही है!

तिलो – जी हां, में बहुत ठीक कहती हूं। बिना परिश्रम ही यह राज्य वीरेन्द्रेसिंह का हुआ चाहता है। इसीलिए कहती थी कि इंद्रजीतसिंह को अपने यहां मत फंसा, उनके एक-एक ऐयार आफत के परकाले हैं। मैं कई दिनों से उन लोगों की कार्रवाई देख रही हूं। उन लोगों को छेड़ना ऐसा है जैसा आतिशबाजी की चरखी में आग लगा देना।

माधवी – क्या वीरेंद्रसिंह को पता लग गया कि उनका लड़का यहां कैद है?

तिलो – पता नहीं लगा तो इसी तरह उनके ऐयार सब यहां पहुंचकर ऊधम मचा रहे हैं?

माधवी – तो तूने मुझे खबर क्यों न की?

तिलो – क्या खबर करती, तुझे इस खबर को सुनने की छुट्टी भी है!

माधवी – तिलोत्तमा, ऐसी जली-कटी बातों का कहना छोड़ दे और मुझे ठीक-ठीक बता कि क्या हुआ और क्या हो रहा है सच पूछ तो मैं तेरे ही भरोसे कूद रही हूं। मैं खूब जानती हूं कि सिवाय तेरे मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं। मुझे विश्वास था कि इन चार पहाड़ियों के बीच में जब तक मैं हूं मुझ पर किसी तरह की आफत न आवेगी, मगर अब तेरी बातों से यह उम्मीद बिल्कुल जाती रही।

तिलो – ठीक है, तुझे अब ऐसा भरोसा न रखना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि मैं तेरे लिए जान देने को तैयार हूं, मगर तू ही बता कि वीरेंद्रसिंह के ऐयारों के सामने मैं क्या कर सकती हूं, एक बेचारी ललिता मेरी मददगार थी, सो वह भी किशोरी को फंसाने में आप पकड़ी गई, अब अकेली मैं क्या – क्या करूं।

माधवी – तू सब-कुछ कर सकती है हिम्मत मत हार, हां यह तो बता कि वीरेंद्रसिंह के ऐयार यहां क्योंकर आये और अब क्या कर रहे हैं।

तिलो – अच्छा सुन, मैं सब-कुछ कहती हूं, यह तो मैं नहीं जानती कि पहले-पहल यहां कौन आया, हां जब से चपला आई है तब से मैं थोड़ा-बहुत हाल जानती हूं।

माधवी – (चौंककर) क्या चपला यहां पहुंच गयी?

तिलो – हां पहुंच गयी, उसने यहां पहुंचकर उस सुरंग की दूसरी ताली भी तैयार कर ली जिस राह से तू आती-जाती है और जिसमें मैंने किशोरी को कैद कर रखा है। एक दिन रात को जब तू इंद्रजीतसिंह को सोता छोड़ दीवान साहब से मिलने के लिए गयी तो वह चपला भी इंद्रजीतसिंह को साथ ले, अपनी ताली से सुरंग का ताला खोल तेरे पीछे-पीछे चली गयी और छिपकर तेरी और दीवान साहब की कैफियत इन दोनों ने देख ली, यह न समझ कि इंद्रजीतसिंह बेचारे सीधे-सादे हैं और तेरा हाल नहीं जानते, वे सब-कुछ जान गये।

माधवी – (कुछ देर तक सोच में डूबी रहने के बाद) तूने चपला को कैसे देखा?

तिलो – मेरा बल्कि ललिता का भी कायदा है कि रात को तीन-चार दफे उठकर इधर-उधर घूमा करती हैं। उस समय मैं अपने दालान में खंभे की आड़ में खड़ी इधर-उधर देख रही थी जब चपला ओैर इंद्रजीतसिंह तेरा हाल देखकर सुरंग से लौटे थे। इसके बाद वे दोनों बहुत देर तक नहर के किनारे खड़े बातचीत करते रहे, बस उसी समय से मैं होशियार हो गई और अपनी कार्रवाई करने लगी।

माधवी – इसके बाद भी कुछ हुआ?

तिलो – हां बहुत कुछ हुआ, सुनो मैं कहती हूं। दूसरे दिन मैं ललिता को साथ ले उस तालाब पर पहुंची, देखा कि वीरेंद्रसिंह के कई ऐयार वहां बैठे बातचीत कर रहे हैं। मैंने छिपकर उनकी बातचीत सुनी। मालूम हुआ कि वे लोग दीवान साहब, सेनापति और कोतवाल साहब को गिरफ्तार किया चाहते हैं। मुझे उस समय एक दिल्लगी सूझी। जब वे लोग राय पक्की करके वहां से जाने लगे, मैंने वहां से कुछ दूर हटकर एक छींक मारी और दूर भाग गई।

माधवी – (मुस्कराकर) वे लोग घबड़ा गये होंगे!

तिलो – बेशक घबड़ाये होंगे, उसी समय गाली-गुफ्तार करने लगे, मगर हम दोनों ने वहां ठहरना पसंद नहीं किया।

माधवी – फिर क्या हुआ?

तिलो – मैंने तो सोचा था कि वे लोग मेरी छींक से डरकर अपनी कार्रवाई रोकेंगे मगर ऐसा न हुआ। दो ही दिन की मेहनत में उन लोगों ने कोतवाल को गिरफ्तार कर लिया, भैरोसिंह और तारासिंह ने उन्हें बुरा धोखा दिया।

इसके बाद तिलोत्तमा ने कोतवाल साहब के गिरफ्तार होने का पूरा हाल जैसा हम ऊपर लिख आये हैं माधवी से कहा, साथ ही उसने यह भी कह दिया कि दीवान साहब को भी गुमान हो गया कि तूने किसी मर्द को यहां लाकर रखा है और उसके साथ आनंद कर रही है।

तिलोत्तमा की जुबानी सब हाल सुनकर माधवी सोच-सागर में गोते लगाने लगी और आधे घंटे तक उसे तनोबदन की सुध न रही, इसके बाद उसने अपने को सम्हाला और फिर तिलोत्तमा से बातचीत करना आरंभ किया।

माधवी – खैर जो हुआ सो हुआ, यह बता कि अब क्या करना चाहिए।

तिलो – मुनासिब तो यही है कि इंद्रजीतसिंह और किशोरी को छोड़ दो, तब फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ेगा।

माधवी – (तिलोत्तमा के पैरों पर गिरकर और रोकर) ऐसा न कहो, अगर मुझ पर तुम्हारा सच्चा प्रेम है तो ऐसा करने के लिए जिद न करो, अगर मेरा सिर चाहो तो काट लो मगर इंद्रजीतसिंह को छोड़ने के लिए मत कहो।

तिलो – अफसोस कि इन बातों की खबर दीवान साहब को भी नहीं कर सकती, बड़ी मुश्किल है, अच्छा मैं उद्योग करती हूं मगर निश्चय नहीं कह सकती कि क्या होगा।

माधवी – तुम चाहोगी तो सब काम हो जायेगा।

तिलो – पहले तो मुझे ललिता को छुड़ाना मुनासिब है।

माधवी – अवश्य।

तिलो – हां, एक काम इसके भी पहले करना चाहिए, नहीं तो किशोरी दो ही दिन में यहां से गायब हो जायेगी और ताज्जुब नहीं कि धड़धड़ाते हुए वीरेंद्रसिंह के कई ऐयार यहां पहुंच जाएं और मनमानी धूम मचावें।

माधवी – शायद तुम्हारा मतलब उस पानी वाली सुरंग को बंद कर देने से हो

तिलो – हां।

माधवी – मैं भी यही मुनासिब समझती हूं। मैं सोचती हूं कि जरूर कोई ऐयार उस रोज उस पानी वाली सुरंग की राह से यहां आया था जिसकी देखा-देखी इंद्रजीतसिंह उस सुरंग में घुसे थे, मगर बेचारे पानी में आगे न जा सके और लौट आये। तुम जरूर उस सुरंग को अच्छी तरह बंद करा दो जिससे कोई ऐयार उस राह से आने-जाने न पावे। तुम लोगों के लिए वह रास्ता है ही जिधर से मैं आती हूं। हां एक बात और है तुम अपने पिता को मेरी मदद के लिए क्यों नहीं ले आतीं, उनसे और मेरे पिता से बड़ी दोस्ती थी मगर अफसोस आजकल वे मुझसे बहुत रंज हैं।

तिलो – मैं कल उनके पास गई थी पर वे किसी तरह नहीं मानते, तुमसे बहुत ज्यादे रंज हैं, मुझ पर बहुत बिगड़ते थे, अगर मैं तुरंत न चली आती तो बेइज्जती के साथ निकलवा देते, मैं उनके पास कभी न जाऊंगी।

माधवी – खैर जो कुछ किस्मत में है भोगूंगी। अच्छा अब तो सभों की आमदरफ्त इसी सुरंग से होगी, तो किशोरी को वहां से निकाल किसी दूसरी जगह रखना चाहिए।

तिलो – उस सुरंग से बढ़कर कौन-सी ऐसी जगह है जहां उसे रखोगी, दीवान साहब का भी तो डर है!

थोड़ी देर तक इन दोनों में बातचीत होती रही इसके बाद इंद्रजीतसिंह के सोकर उठने की खबर आई। शाम भी हो चुकी थी, माधवी उठकर उनके पास गई और तिलोत्तमा पानी वाली सुरंग को बंद करने की फिक्र में लगी।

पाठक, इस जगह मामला बड़ा गोलमाल हो गया। तिलोत्तमा ने चालाकी से वीरेंद्रसिंह के ऐयारों की कार्रवाई देख ली। माधवी और तिलोत्तमा की बातचीत से आप यह भी जान गये होंगे कि बेचारी किशोरी उसी सुरंग में कैद की गई जिसकी ताली चपला ने बनाई थी या जिस सुरंग की राह चपला और कुंअर इंद्रजीतसिंह ने माधवी के पीछे जाकर यह मालूम कर लिया था कि वह कहां जाती है। उस सुरंग की दूसरी ताली तो मौजूद ही थी, किशोरी को छुड़ाना चपला के लिए कोई बड़ी बात न थी, अगर तिलोत्तमा होशियार होकर उस आने-जाने वाली राह अर्थात पानी वाली सुरंग को जिसमें इंद्रजीतसिंह गये थे और आगे जलमय देखकर लौट आये थे पत्थर के ढोकों से मजबूती के साथ बंद न कर देती। कुंअर इंद्रजीतसिंह को मालूम हो ही गया था कि हमारे ऐयार लोग इसी राह से आया-जाया करते हैं, अब उन्होंने अपनी आंखों से यह भी देख लिया कि यह सुरंग बखूबी बंद कर दी गई। उनकी नाउम्मीदी हर तरह से बढ़ने लगी, उन्होंने समझ लिया कि अब चपला से मुलाकात न होगी और बाहर हमारे छुड़ाने के लिए क्या – क्या तरकीब हो रही है इसका पता भी बिल्कुल न लगेगा। सुरंग की नई ताली जो चपला ने बनाई थी वह उसी के पास थी, तो भी इंद्रजीतसिंह ने हिम्मत न हारी। उन्होंने जी में ठान लिया कि अब जबर्दस्ती से काम लिया जायेगा, जितनी औरतें यहां मौजूद हैं सभों की मुश्कें बांध नहर के किनारे डाल देंगे और सुरंग की असली ताली माधवी के पास से लेकर सुरंग की राह माधवी के महल में पहुंचकर खून खराबी मचावेंगे। आखिर क्षत्रियों को इससे बढ़कर लड़ने-भिड़ने और जान देने का कौन-सा समय हाथ लगेगा। मगर ऐसा करने के लिए सबसे पहले सुरंग की ताली अपने कब्जे में कर लेना मुनासिब है, नहीं तो मुझे बिगड़ा हुआ देख जब तक मैं दो-चार औरतों की मुश्कें बांधूंगा सब सुरंग की राह भाग जायेंगी, फिर मेरा मतलब जैसा मैं चाहता हूं सिद्ध न होगा।

इंद्रजीतसिंह ने सुरंग की ताली लेने की बहुत कोशिश की मगर न ले सके क्योंकि अब वह ताली उस जगह से, जहां पहले रहती थी, हटाकर किसी दूसरी जगह रख दी गई थी।

बयान – 7

आपस में लड़ने वाले दोनों भाइयों के साथ जाकर सुबह की सफेदी निकलने के साथ ही कोतवाल ने माधवी की सूरत देखी और यह समझकर कि दीवान साहब को छोड़ महारानी अब मुझसे प्रेम रखा चाहती है बहुत खुश हुआ। कोतवाल साहब के गुमान में भी न था कि ऐयारों के फेर में पड़े हैं। उनको इंद्रजीतसिंह के कैद होने और वीरेंद्रसिंह के ऐयारों के यहां पहुंचने की खबर ही न थी। वह तो जिस तरह हमेशा रियाया लोगों के घर अकेले पहुंचकर तहकीकात किया करते थे उसी तरह आज भी सिर्फ दो अर्दली के सिपाहियों को साथ ले इन दोनों ऐयारों के फेर में पड़ घर से निकल पड़े थे।

कोतवाल साहब ने जब माधवी को पहचाना तो अपने सिपाहियों को उसके सामने ले जाना मुनासिब न समझा और अकेले ही माधवी के पास पहुंचे। देखा कि हकीकत में उन्हीं की तस्वीर सामने रखे माधवी उदास बैठी है।

कोतवाल साहब के देखते ही माधवी उठ खड़ी हुई और मुहब्बत भरी निगाहों से उनकी तरफ देखकर बोली –

‘‘देखो मैं तुम्हारे लिए कितनी बेचैन हो रही हूं पर तुम्हें जरा भी खबर नहीं!’’

कोत – अगर मुझे यकायक इस तरह अपनी किस्मत के जागने की खबर होती तो क्या मैं लापरवाह बैठा रहता कभी नहीं, मैं तो आप ही दिन – रात आपसे मिलने की उम्मीद में अपना खून सुखा रहा था।

माधवी – (हाथ का इशारा करके) देखो ये दोनों आदमी बड़े ही बदमाश हैं, इनको यहां से चले जाने के लिए कहो तो फिर हमसे – तुमसे बातें होंगी।

इतना सुनते ही कोतवाल साहब ने उन दोनों भाइयों की तरफ जो हकीकत में भैरोसिंह और तारासिंह थे कड़ी निगाह से देखा और कहा, ‘‘तुम दोनों अभी-अभी यहां से भाग जाओ नहीं तो बोटी-बोटी काटकर रख दूंगा।’’

भैरोसिंह और तारासिंह वहां से चलते बने। इधर चपला जो माधवी की सूरत बनी हुई थी कोतवाल को बातों में फंसाये हुए वहां से दूर एक गुफा के मुहाने पर ले गई और बैठकर बातचीत करने लगी।

चपला माधवी की सूरत तो बनी मगर उसकी और माधवी की उम्र में बहुत कुछ फर्क था। कोतवाल भी बड़ा धूर्त और चालाक था। सूर्य की चमक में जब उसने माधवी की सूरत अच्छी तरह देखी और बातों में भी कुछ फर्क पाया फौरन उसे खुटका पैदा हुआ और वह बड़े गौर से उसे सिर से पैर तक देख अपनी निगाह के तराजू में तोलने और जांचने लगा। चपला समझ गई कि अब कोतवाल को शक पैदा हो गया, देर करना मुनासिब न जान उसने जफील (सीटी) बजाई। उसी समय गुफा के अंदर से देवीसिंह निकल आये और कोतवाल साहब से तलवार रख देने के लिए कहा।

कोतवाल ने भी जो सिपाही और शेरदिल आदमी था बिना लड़े-भिड़े अपने को कैदी बना देना पसंद न किया और म्यान से तलवार निकाल देवीसिंह पर हमला किया। थोड़ी ही देर में देवीसिंह ने उसे अपने खंजर से जख्मी किया और जमीन पर पटक उसकी मुश्कें बांध डालीं।

कोतवाल साहब का हुक्म पा भैरोसिंह और तारासिंह जब उनके सामने से चले गये तो वहां पहुंचे जहां कोतवाल के साथी दोनों सिपाही खड़े अपने मालिक के लौट आने की राह देख रहे थे। इन दोनों ऐयारों ने उन सिपाहियों को अपनी मुश्कें बंधवाने के लिए कहा मगर उन्होंने इन दोनों को साधारण समझ मंजूर न किया और लड़ने-भिड़ने को तैयार हो गये। उन दोनों की मौत आ चुकी थी, आखिर भैरोसिंह और तारासिंह के हाथ से मारे गये, मगर उसी समय बारीक आवाज में किसी ने इन दोनों ऐयारों को पुकारकर कहा, ‘‘भैरोसिंह और तारासिंह, अगर मेरी जिंदगी है तो बिना इसका बदला लिए न छोड़ूंगी!’’

भैरोसिंह ने उस तरफ देखा जिधर से आवाज आई थी। एक लड़का भागता हुआ दिखाई पड़ा। ये दोनों उसके पीछे दौड़े मगर पा न सके क्योंकि उस पहाड़ी की छोटी-छोटी कंदराओं और खोहों में न मालूम कहां छिप उसने इन दोनों के हाथ से अपने को बचा लिया।

पाठक समझ गये होंगे कि इन दोनों ऐयारों को पुकारकर चिताने वाली वही तिलोत्तमा है जिसने बात करते-करते माधवी से इन दोनों ऐयारों के हाथ कोतवाल के फंस जाने का समाचार कहा था।

बयान – 8

इस जगह उस तालाब का हाल लिखते हैं, जिसका जिक्र कई दफे ऊपर-पीछे आ चुका है, जिसमें एक औरत को गिरफ्तार करने के लिए योगिनी और वनचरी कूदी थीं, या जिसके किनारे बैठ हमारे ऐयारों ने माधवी के दीवान, कोतवाल और सेनापति को पकड़ने के लिए राय पक्की की थी।

यही तालाब उस रमणीक स्थान में पहुंचाने का रास्ता था जिसमें कुंअर इंद्रजीतसिंह कैद हैं। इसका दूसरा मुहाना वही पानी वाली सुरंग थी जिसमें कुंअर इंद्रजीतसिंह घुसे थे और कुछ दूर जाकर जलमयी देख लौट आये थे या जिसको तिलोत्तमा ने अब पत्थर के ढोकों से बंद कर दिया है।

जिस पहाड़ी के नीचे यह तालाब था उसी पहाड़ी की दूसरी तरफ वह गुप्त स्थान था जिसमें इंद्रजीतसिंह कैद थे। इस राह से हर एक का आना मुश्किल था, हां ऐयार लोग अलबत्ता आ सकते थे, जिसका दम खूब सधा हुआ था, और तैरना बखूबी जानते थे, पर इस तालाब की राह से वहां तक पहुंचने के लिए कारीगरों ने एक सुबीता भी किया था। उसी सुरंग से इस तालाब की जाट (लाट) तक भीतर-भीतर एक मजबूत जंजीर लगी हुई थी जिसे थामकर यहां तक पहुंचने में बड़ा ही सुबीता होता था।

कोतवाल साहब को गिरफ्तार करने के बाद कई दफे चपला ने चाहा कि इस तालाब की राह इंद्रजीतसिंह के पास पहुंचकर इधर के हाल-चाल की खबर करे मगर ऐसा न कर सकी क्योंकि तिलोत्तमा ने सुरंग का मुंह बंद कर दिया था। अब हमारे ऐयारों को निश्चय हो गया कि दुश्मन संभल बैठा और उसको हम लोगों की खबर हो गई। इधर कोतवाल साहब के गिरफ्तार होने से और उनके सिपाहियों की लाश मिलने पर शहर में हलचल मच रही थी। दीवान साहब वगैरह इस खोज से परेशान हो रहे थे कि हम लोगों का दुश्मन ऐसा कौन आ पहुंचा जिसने कोतवाल साहब को गायब कर दिया।

कई रोज के बाद एक दिन आधी रात के समय भैरोसिंह, तारासिंह, पंडित बद्रीनाथ, देवीसिंह और चपला इस तालाब पर बैठे आपस में सलाह कर रहे थे और सोच रहे थे कि अब कुंअर इंद्रजीतसिंह के पास किस तरह पहुंचना चाहिए और उनके छुड़ाने की क्या तरकीब करनी चाहिए।

चपला – अफसोस, मैंने जो ताली तैयार की थी वह अपने साथ लेती आई, नहीं तो इंद्रजीतसिंह उस ताली से जरूर कुछ-न-कुछ काम निकालते। अब हम लोगों का वहां तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो गया।

बद्री – इस पहाड़ी के उस पार ही तो इंद्रजीतसिंह हैं! चाहे वह पहाड़ी कैसी ही बेढब क्यों न हो मगर हम लोग उस पार पहुंचने के लिए चढ़ने-उतरने की जगह बना ही सकते हैं।

भैरो – मगर यह काम कई दिनों का है।

तारा – सबसे पहले इस बात की निगरानी करनी चाहिए कि माधवी ने जहां इंद्रजीतसिंह को कैद कर रखा है वहां कोई ऐसा मर्द न पहुंचने पावे जो उन्हें सता सके, औरतें यदि पांच सौ भी होंगी तो कुछ कर न सकेंगी।

देवी – कुंअर इंद्रजीतसिंह ऐसे बोदे नहीं हैं कि यकायक किसी के फंदे में आ जावें, मगर फिर भी हम लोगों को होशियार रहना चाहिए, आजकल में उन तक पहुंचने का मौका न मिलेगा तो हम इस घर को उजाड़ कर डालेंगे और दीवान साहब वगैरह को जहन्नुम में मिला देंगे।

भैरोसिंह – अगर कुमार को यह मालूम हो गया कि हम लोगों के आने-जाने का रास्ता बंद कर दिया गया तो वे चुप बैठे न रहेंगे, कुछ-न-कुछ फसाद जरूर मचावेंगे।

तारा – बेशक।

इसी तरह की बहुत – सी बातें वे लोग कर रहे थे कि तालाब के उस पार जल में उतरता हुआ एक आदमी दिखाई पड़ा। ये लोग टकटकी बांध उसी तरफ देखने लगे। वह आदमी जल में कूदा और जाट के पास पहुंचकर गोता मार गया, जिसे देख भैरोसिंह ने कहा, ‘‘बेशक यह ऐसार है जो माधवी के पास जाना चाहता है।’’

चपला – मगर यह माधवी का ऐयार नहीं है, अगर माधवी की तरफ का होता तो रास्ता बंद होने का हाल इसे मालूम होता।

भैरो – ठीक है।

तारा – अगर माधवी की तरफ का नहीं तो हमारे कुमार का पक्षपाती होगा।

देवी – वह लौटे तो अपने पास बुलाना चाहिए।

थोड़ी ही देर बाद वह आदमी जाट के पास आकर निकला और जाट थाम जरा सुस्ताने लगा, कुछ देर बाद किनारे पर चला आया और तालाब के ऊपर वाले चौंतरे पर बैठ सोचने लगा।

भैरोसिंह अपने ठिकाने से उठे और धीरे-धीरे उस आदमी की तरफ चले। जब उसने अपने पास किसी को आते देखा तो उठ खड़ा हुआ, साथ ही भैरोसिंह ने आवाज दी, ‘‘डरो मत, जहां तक मैं समझता हूं तुम भी उसी की मदद किया चाहते हो जिसके छुड़ाने की फिक्र में हम लोग हैं।’’

भैरोसिंह के इतना कहते ही उस आदमी ने खुशी भरी आवाज से कहा, ‘‘वाह-वाह-वाह, आप भी यहां पहुंच गये! सच पूछो तो यह सब फसाद तुम्हारा ही खड़ा किया हुआ है!

भैरो – जिस तरह मेरी आवाज तूने पहचान ली उसी तरह तेरी मुहब्बत ने मुझे भी कह दिया कि तू कमला है।

कमला – बस-बस, रहने दीजिये, आप लोग बड़े मुहब्बती हैं, इसे मैं खूब जानती हूं।

भैरो – जानती ही हो तो ज्यादे क्या कहूं

कमला – कहने का मुंह भी तो हो

भैरो – कमला, मैं तो यही चाहता हूं कि तुम्हारे पास बैठा बातें ही करता रहूं मगर इस समय मौका नहीं है क्योंकि (हाथ का इशारा करके) पंडित बद्रीनाथ, देवीसिंह, तारासिंह और मेरी मां वहीं बैठी हुई हैं। तुमको तालाब में जाते और नाकाम लौटते हम लोगों ने देख लिया और इसी से हम लोगों ने मालूम कर लिया कि तुम माधवी की तरफदार नहीं हो, अगर होतीं तो सुरंग के बंद किए जाने का हाल तुम्हें जरूर मालूम होता।

कमला – क्या तुम्हें सुरंग बंद करने का मालूम है

भैरो – हां, हम जानते हैं।

कमला – फिर अब क्या करना चाहिए

भैरो – तुम वहां चली चलो जहां हम लोगों के संगी-साथी हैं, उसी जगह मिल-जुल के सलाह करेंगे।

भैरोसिंह कमला को लिए हुए अपनी मां चपला के पास पहुंचे और पुकारकर कहा, ‘‘मां, यह कमला है, इसका नाम तो तुमने सुना ही होगा।’’

‘‘हां-हां, मैं इसे बखूबी जानती हूं।’’ यह कह चपला ने उठाकर कमला को गले लगा लिया और कहा, ‘‘बेटी, अच्छी तरह तो है मैं तेरी बड़ाई बहुत दिनों से सुन रही हूं, भैरो ने तेरी बड़ी तारीफ की थी, मेरे पास बैठ और कह किशोरी कैसी है’

कमला – (बैठकर) किशोरी का हाल क्या पूछती हैं वह तो माधवी की कैद में पड़ी है, ललिता कुंअर इंद्रजीतसिंह के नाम का धोखा देकर उसे ले आई।

भैरो – (चौंककर) हैं, क्या यहां तक नौबत पहुंच गई

कमला – जी हां, मैं वहां मौजूद न थी नहीं तो ऐसा न होने पाता!

भैरो – खुलासा हाल कहो क्या हुआ

कमला ने सब हाल किशोरी के धोखा खाने और ललिता को पकड़ लेने का सुनाकर कहा, ‘‘यह बखेड़ा (भैरोसिंह की तरफ इशारा करके) इन्हीं का मचाया हुआ है, न ये इंद्रजीतसिंह बनकर शिवदत्तगढ़ जाते न बेचारी किशोरी की यह दशा होती।’’

चपला – हां मैं सुन चुकी हूं। इसी कसूर पर बेचारी को शिवदत्त ने अपने यहां से निकाल दिया। खैर तूने यह बड़ा काम किया कि ललिता को पकड़ लिया, अब हम लोग अपना काम सिद्ध कर लेंगे।

कमला – आप लोगों ने क्या किया और अब यहां क्या करने का इरादा है।

चपला ने भी अपना और इंद्रजीतसिंह का सब हाल कह सुनाया। थोड़ी देर तक बातचीत होती रही। सुबह की सफेदी निकलना ही चाहती थी कि ये लोग यहां से उठ खड़े हुए और एक पहाड़ी की तरफ चले गये।

बयान – 9

कुंअर इंद्रजीतसिंह अब जबर्दस्ती करने पर उतारू हुए और इस ताक में लगे कि माधवी सुरंग का ताला खोले और दीवान से मिलने के लिए महल में जाय तो मैं अपना रंग दिखाऊं। तिलोत्तमा के होशियार कर देने से माधवी भी चेत गई थी और दीवान साहब के पास आना-जाना उसने बिल्कुल बंद कर दिया था, मगर जब से पानी वाली सुरंग बंद की गई तब से तिलोत्तमा इसी दूसरी सुरंग की राह आने-जाने लगी और इस सुरंग की ताली जो माधवी के पास रहती थी अपने पास रखने लगी। पानी वाली सुरंग के बंद होते ही इंद्रजीतसिंह जान गये कि अब इन औरतों की आमदरफ्त इसी सुरंग से होगी, मगर माधवी ही की ताक में लगे रहने से कई दिनों तक उनका मतलब सिद्ध न हुआ।

अब कुंअर इंद्रजीतसिंह उस दालान में ज्यादे टहलने लगे जिसमें सुरंग के दरवाजे वाली कोठरी थी। एक दिन आधी रात के समय माधवी का पलंग खाली देख इंद्रजीतसिंह ने जाना कि वह बेशक दीवान से मिलने गई है। वह भी पलंग से उठ खड़े हुए और खूंटी से लटकती हुई एक तलवार उतारने के बाद जलते शमादान को बुझा उसी दालान में पहुंचे जहां उस समय बिल्कुल अंधेरा था और उसी सुरंग वाले दरवाजे के बगल में छिपकर बैठ रहे। जब पहर भर रात बाकी रही उस सुरंग का दरवाजा भीतर से खुला और एक औरत ने इस तरफ निकलकर फिर ताला बंद करना चाहा मगर इंद्रजीतसिंह ने फुर्ती से उसकी कलाई पकड़ ताली छीन ली और कोठरी के अंदर जा भीतर से ताला बंद कर लिया।

वह औरत माधवी थी जिसके हाथ से इंद्रजीतसिंह ने ताली छीनी थी। वह अंधेरे में इंद्रजीतसिंह को पहचान न सकी, हां उसके चिल्लाने से कुमार जान गए कि वह माधवी है।

इंद्रजीतसिंह एक दफे उस सुरंग में जा ही चुके थे, उसके रास्ते और सीढ़ियों को वे बखूबी जानते थे, इसलिए अंधेरे में उनको बहुत तकलीफ न हुई और वे अंदाज से टटोलते हुए तहखाने की सीढ़ियां उतर गये। नीचे पहुंच के जब उन्होंने दूसरा दरवाजा खोला तो उन्हें सुरंग के अंदर कुछ दूर पर रोशनी मालूम हुई जिसे देख उन्हें ताज्जुब हुआ और बहुत धीरे-धीरे बढ़ने लगे। जब उस रोशनी के पास पहुंचे, एक औरत पर नजर पड़ी जो हथकड़ी और बेड़ी के सबब उठने-बैठने से बिल्कुल लाचार थी। चिराग की रोशनी में इंद्रजीतसिंह ने उसको और उसने इनको अच्छी तरह देखा और दोनों ही चौंक पड़े।

ऊपर जिक्र आ जाने से पाठक समझ ही गये होंगे कि यह किशोरी ही है जो तकलीफ के सबब बहुत ही कमजोर और सुस्त हो रही थी। इंद्रजीतसिंह के दिल में उसकी तस्वीर मौजूद थी और इंद्रजीतसिंह उसकी आंखों में पुतली की तरह डेरा जमाये हुए थे। एक ने दूसरे को बखूबी पहचान लिया और ताज्जुब मिली हुई खुशी के सबब देर तक एक-दूसरे की सूरत देखते रहे। इसके बाद इंद्रजीतसिंह ने उसकी हथकड़ी और बेड़ी खोल डाली और बड़े प्रेम से हाथ पकड़कर कहा, ‘‘किशोरी! तू यहां कैसे आ गई!’’

किशोरी – (इंद्रजीतसिंह के पैरों पर गिरकर) अभी तक तो मैं यही सोचती थी कि मेरी बदकिस्मती मुझे यहां ले आई मगर नहीं अब मुझे कहना पड़ा कि मेरी खुशकिस्मती ने मुझे यहां पहुंचाया और ललिता ने मेरे साथ बड़ी नेकी की जो मुझे लेकर आई, नहीं तो न मालूम कब तक तुम्हारी सूरत…

इससे ज्यादे बेचारी किशोरी कुछ कह न सकी और जोर-जोर से रोने लगी। इंद्रजीतसिंह भी बराबर रो रहे थे। आखिर उन्होंने किशोरी को उठाया और दोनों हाथों से उसकी कलाई पकड़े हुए बोले –

‘‘हाय, मुझे कब उम्मीद थी कि मैं तुम्हें यहां देखूंगा। मेरी जिंदगी में आज की खुशी याद रखने लायक होगी। अफसोस, दुश्मन ने तुम्हें बड़ा ही कष्ट दिया!’’

किशोरी – बस अब मुझे किसी तरह की आरजू नहीं है। मैं ईश्वर से यही मांगती थी कि एक दिन तुम्हें अपने पास देख लूं सो मुराद आज पूरी हो गई, अब चाहे माधवी मुझे मार भी डाले तो मैं खुशी से मरने को तैयार हूं।

इंद्र – जब तक मेरे दम में दम है किसकी मजाल है जो तुम्हें दुख दे! अब तो किसी तरह इस सुरंग की ताली मेरे हाथ में लग गई जिससे हम दोनों को निश्चय समझना चाहिए कि इस कैद से छुट्टी मिल गई। अगर जिंदगी है तो मैं माधवी से समझ लूंगा, वह जाती कहां है!

इन दोनों को यकायक इस तरह के मिलाप से कितनी खुशी हुई यह ये ही जानते होंगे। दीन-दुनिया की सुध भूल गये। यह याद ही नहीं रहा कि हम कहां जाने वाले थे, कहां हैं, क्या कर रहे हैं और क्या करना चाहिए, मगर यह खुशी बहुत ही थोड़ी देर के लिए थी, क्योंकि इसी समय हाथ में मोमबत्ती लिए एक औरत उसी तरफ से आती हुई दिखाई दी जिधर इंद्रजीतसिंह जाने वाले थे और जिसको देख ये दोनों ही चौंक पड़े।

वह औरत इंद्रजीतसिंह के पास पहुंची और बदन का दाग दिखला बहुत जल्द सिद्ध कर दिया कि वह चपला है।

चपला – इंद्रजीत! हैं, तुम यहां कैसे आये!! (चारों तरफ देखकर) मालूम होता है बेचारी किशोरी को तुमने इसी जगह पाया।

इंद्र – हां इसी जगह कैद थी मगर मैं नहीं जानता था। मैं तो माधवी के हाथ से जबर्दस्ती ताली छीन इस सुरंग में चला आया और उसे चिल्लाता ही छोड़ आया।

चपला – माधवी तो अभी इसी सुरंग की राह से वहां गई थी।

इंद्र – हां और मैं दरवाजे के पास छिपा खड़ा था। जैसे ही वह ताला खोल अंदर पहुंची वैसे ही मैंने पकड़ लिया और ताली छीन इधर आ भीतर से ताला बंद कर दिया।

चपला – तुमने बहुत बुरा किया, इतनी जल्दी कर जाना मुनासिब न था। अब तुम दो रोज भी माधवी के पास नहीं गुजार सकते, क्योंकि वह बड़ी ही बदकार और चाण्डालिन की तरह बेदर्द है, अब वह तुम्हें पावे तो किसी-न-किसी तरह धोखा दे बिना जान लिए कभी न छोड़े।

इंद्र – आखिर मैं ऐसा न करता तो क्या करता उधर जिस राह से तुम आयी थीं अर्थात पानी वाली सुरंग का मुहाना मेरे देखते-देखते बिल्कुल बंद कर दिया गया जिससे मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारे आने-जाने की खबर उस शैतान की बच्ची को लग गई और तुम्हारे मिलने या किसी तरह की मदद पहुंचने की उम्मीद बिल्कुल जाती रही पर नामर्दों की तरह मैं अपने को कब तक बनाये रहता, और अब मुझे माधवी के पास लौट जाने की जरूरत ही क्या है

चपला – बेशक हम लोगों की खबर माधवी को लग गई, मगर तुम बिल्कुल नहीं जानते कि तिलोत्तमा ने कितना फसाद मचा रखा है और इस महल की तरफ कितनी मजबूती कर रखी है। तुम किसी तरह इधर से नहीं निकल सकते। अफसोस, अब हम लोग भारी खतरे में पड़ गये!

इंद्र – रात का तो समय है, लड़-भिड़कर निकल जायेंगे।

चपला – तुम दिलावर हो, तुम्हारा ऐसा खयाल करना बहुत मुनासिब है मगर (किशोरी की तरफ इशारा करके) इस बेचारी की क्या दशा होगी इसके सिवाय अब सबेरा हुआ ही चाहता है।

इंद्र – फिर क्या किया जाय

चपला – (कुछ सोचकर) क्या तुम जानते हो इस समय तिलोत्तमा कहां है

इंद्र – जहां तक मैं खयाल करता हूं इस खोह के बाहर है।

चपला – यह और मुश्किल है, वह बड़ी चालाक है, इस समय भी जरूर किसी धुन में लगी होगी, वह हम लोगों का ध्यान दम-भर के लिये भी नहीं भुलाती।

इंद्र – इस समय हमारी मदद के लिए इस महल में और भी कोई मौजूद है या अकेली तुम ही हो

चपला – देवीसिंह, भैरोसिंह और पंडित बद्रीनाथ तो महल के बाहर इधर-उधर लुके-छिपे मौजूद हैं, मगर सूरत बदले हुए कमला इस सुरंग के मुहाने पर अर्थात बाहर वाले कमरे में खड़ी है, मैं उसे अपनी हिफाजत के लिए वहां छोड़ आई हूं।

किशोरी – (चौंककर) कमला कौन

चपला – तुम्हारी सखी!

किशोरी – वह यहां कैसे आई

चपला – इसका हाल तो बहुत लंबा-चौड़ा है इस समय कहने का मौका नहीं, मुख्तसर यह है कि तुमको धोखा देने वाली ललिता को उसने पकड़ लिया और खुद तुमको छुड़ाने के लिए आई है, यहां हम लोगों से भी मुलाकात हो गई। (इंद्रजीतसिंह की तरफ देखकर) बस अब यहां ठहरकर अपने को इस सुरंग के अंदर ही फंसाकर मार डालना मुनासिब नहीं।

इंद्र – बेशक यहां ठहरना ठीक न होगा, चले चलो, जो होगा देखा जायेगा।

तीनों वहां से चल पड़े और सुरंग के दूसरे मुहाने अर्थात उस कमरे में पहुंचे जिसमें माधवी को दीवान साहब के साथ बैठे हुए इंद्रजीतसिंह ने देखा था। वहां इस समय सूरत बदले हुए कमला मौजूद थी और रोशनी बखूबी हो रही थी। इन तीनों को देखते ही कमला चौंक पड़ी और किशोरी को गले लगा लिया मगर तुरंत ही अलग होकर चपला से बोली, ‘‘सुबह की सफेदी निकल आई यह बहुत बुरा हुआ।’’

चपला – जो हो, अब कर ही क्या सकते हैं!

कमला – खैर जो होगा देखा जायेगा, जल्दी नीचे उतरो।

इस खुशनुमा और आलीशान मकान के चारों तरफ बाग था जिसके चारों तरफ चहारदीवारियां बनी हुई थीं। बाग के पूरब तरफ बहुत बड़ा फाटक था जहां बारी-बारी से बीस आदमी नंगी तलवार लिए घूम-घूमकर पहरा देते थे। चपला और कमला कमंद के सहारे बाग की पिछली दीवार लांघकर यहां पहुंची थीं और इस समय भी ये चारों उसी तरह निकल जाना चाहते थे।

हम यह कहना भूल गये कि बाग के चारों कोनों में चार गुमटियां बनी हुई थीं जिनमें सौ सिपाहियों का डेरा था और आजकल तिलोत्तमा के हुक्म से वे सभी हरदम तैयार रहते थे। तिलोत्तमा ने उन लोगों को यह भी कह रखा था कि जिस समय मैं अपने बनाये हुए बम के गोले को जमीन पर पटकूं और उसकी भारी आवाज तुम लोग सुनो, फौरन हाथ में नंगी तलवारें लिए बाग के चारों तरफ फैल जाओ, जिस आदमी को आते-जाते देखो तुरंत गिरफ्तार कर लो।

चारों आदमी सुरंग का दरवाजा खुला छोड़ नीचे उतरे और कमरे के बाहर हो बाग की पिछली दीवार की तरफ जैसे ही चले कि तिलोत्तमा पर नजर पड़ी। चपला यह खयाल करके कि अब बहुत ही बुरा हुआ, तिलोत्तमा की तरफ लपकी और उसे पकड़ना चाहा मगर वह शैतान लोमड़ी की तरह चक्कर मार निकल ही गई और एक किनारे पहुंच मसाले से भरा हुआ एक गेंद जमीन पर पटका जिसकी भारी आवाज चारों तरफ गूंज गई और उसके कहे मुताबिक सिपाहियों ने होशियार होकर चारों तरफ से बाग को घेर लिया।

तिलोत्तमा के भागकर निकल जाते ही चारों आदमी जिनके आगे-आगे हाथ में नंगी तलवार लिए इंद्रजीतसिंह थे बाग की पिछली दीवार की तरफ न जाकर सदर फाटक की तरफ लपके मगर वहां पहुंचते ही पहरे वाले सिपाहियों से रोके गये और मार-काट शुरू हो गई। इंद्रजीतसिंह ने तलवार तथा चपला और कमला ने खंजर चलाने में अच्छी बहादुरी दिखाई।

हमारे ऐयार लोग भी बाग के बाहर चारों तरफ लुके-छिपे खड़े थे, तिलोत्तमा के चलाये हुए गोले की आवाज सुनकर और किसी भारी फसाद का होना खयाल कर फाटक पर आ जुटे और खंजर निकाल माधवी के सिपाहियों पर टूट पड़े। बात की बात में माधवी के बहुत से सिपाहियों की लाशें जमीन पर दिखाई देने लगीं और बहुत बहादुरी के साथ लड़ते-भिड़ते हमारे बहादुर लोग किशोरी को लिए निकल ही गये।

ऐयार लोग तो दौड़ने-भागने में तेज होते ही हैं, इन लोगों का भाग जाना कोई आश्चर्य न था, मगर गोद में किशोरी को उठाये इंद्रजीतसिंह उन लोगों के बराबर में कब दौड़ सकते थे और ऐयार लोग भी ऐसी अवस्था में उनका साथ कैसे छोड़ सकते थे! लाचार जैसे बना उन दोनों को भी साथ लिए हुए मैदान का रास्ता लिया। इस समय पूरब की तरफ सूर्य की लालिमा अच्छी तरह फैल चुकी थी।

माधवी के दीवान अग्निदत्त का मकान इस बाग से बहुत दूर न था और वह बड़े सबेरे उठा करता था। तिलोत्तमा के चलाये हुए गोले की आवाज उसके कान में पहुंच ही चुकी थी, बाग के दरवाजे पर लड़ाई होने की खबर भी उसे उसी समय मिल गई। वह शैतान का बच्चा बहुत ही दिलेर और लड़ाका था, फौरन ढाल-तलवार ले मकान के नीचे उतर आया और अपने यहां रहने वाले कई सिपाहियों को साथ ले बाग के दरवाजे पर पहुंचा। देखा कि बहुत से सिपाहियों की लाशें जमीन पर पड़ी हुई हैं और दुश्मन का पता नहीं है।

बाग के चारों तरफ फैले हुए सिपाही भी फाटक पर जुटे थे और गिनती में एक सौ से ज्यादे थे। अग्निदत्त ने सभी को ललकारा और साथ ले इंद्रजीतसिंह का पीछा किया। थोड़ी ही दूर उन लोगों को पा लिया और चारों तरफ से घेर मार-काट शुरू कर दी।

अग्निदत्त की निगाह किशोरी पर जा पड़ी। अब क्या पूछना था सब तरफ का खयाल छोड़ इंद्रजीतसिंह के ऊपर टूट पड़ा। बहुत से आदमियों से लड़ते हुए इंद्रजीतसिंह किशोरी को सम्हाल न सके और उसे छोड़ तलवार चलाने लग,े अग्निदत्त को मौका मिला, इंद्रजीतसिंह के हाथ से जख्मी होने पर भी उसने दम न लिया और किशोरी को गोद में उठा ले भागा। यह देख इंद्रजीतसिंह की आंखों में खून उतर आया। इतनी भीड़ को काटकर उसका पीछा तो न कर सके मगर अपने ऐयारों को ललकारकर इस तरह की लड़ाई की कि उन सौ में से आधे बेदम होकर जमीन पर गिर पड़े और बाकी अपने सरदार को चला गया देख जान बचा भाग गये। इंद्रजीतसिंह भी बहुत से जख्मों के लगने से बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। चपला और भैरोसिंह वगैरह बहुत ही बेदम हो रहे थे तो भी वे लोग बेहोश इंद्रजीतसिंह को उठा वहां से निकल गये और फिर किसी की निगाह पर न चढ़े।

बयान – 10

जख्मी इंद्रजीतसिंह को लिए हुए उनके ऐयार लोग वहां से दूर निकल गये और बेचारी किशोरी को दुष्ट अग्निदत्त उठाकर अपने घर ले गया। यह सब हाल देख तिलोत्तमा वहां से चलती बनी और बाग के अंदर कमरे में पहुंची। देखा कि सुरंग का दरवाजा खुला हुआ है और ताली भी उसी जगह जमीन पर पड़ी है। उसने ताली उठा ली और सुरंग के अंदर जा किवाड़ बंद करती हुई माधवी के पास पहुंची। माधवी की अवस्था इस समय बहुत ही खराब हो रही थी। दीवान साहब पर बिलकुल भेद खुल गया होगा यह समझ मारे डर के वह घबड़ा गई और उसे निश्चय हो गया कि अब किसी तरह कुशल नहीं है क्योंकि बहुत दिनों की लापरवाही में दीवान साहब ने तमाम रियाया और फौज को अपने कब्जे में कर लिया था। तिलोत्तमा ने वहां पहुंचते ही माधवी से कहा –

तिलो – अब क्या सोच रही है और क्यों रोती है मैंने पहले ही कहा था कि इन बखेड़ों में मत फंस, इसका नतीजा अच्छा न होगा! वीरेंद्रसिंह के ऐयार लोग बला की तरह जिसके पीछे पड़ते हैं उसका सत्यानाश कर डालते हैं, परंतु तूने मेरी बात न मानी, अब यह दिन देखने की नौबत पहुंची।

माधवी – वीरेंद्रसिंह का कोई ऐयार यहां नहीं आया, इंद्रजीतसिंह जबर्दस्ती मेरे हाथ से ताली छीनकर चले गये, मैं कुछ न कर सकी।

तिलो – आखिर तू उनका कर ही क्या सकती थी

माधवी – अब उन लोगों का क्या हाल है

तिलो – वे लोग लड़ते-भिड़ते तुम्हारे सैकड़ों आदमियों को यमलोक पहुंचाते निकल गये। किशोरी को अपने दीवान साहब उठा ले गये। जब उनके हाथ किशोरी लग गई तब उन्हें लड़ने-भिड़ने की जरूरत ही क्या थी किशोरी की सूरत देखकर तो आसमान की चिड़िया भी नीचे उतर आती है फिर दीवान साहब क्या चीज हैं अब वह दुष्ट इस धुन में होगा कि तुम्हें मार पूरी तरह से राजा बन जाये और किशोरी को रानी बनाये, तुम उसका कर ही क्या सकती हो!

माधवी – हाय, मेरे बुरे कर्मों ने मुझे मिट्टी में मिला दिया! अब मेरी किस्मत में राज्य नहीं है, अब तो मालूम होता है कि मैं भिखमंगिनों की तरह मारी-मारी फिरूंगी।

तिलो – हां अगर किसी तरह यहां से जान बचाकर निकल जाओगी तो भीख मांगकर भी जान बचा लोगी नहीं तो बस यह भी उम्मीद नहीं है।

माधवी – क्या दीवान साहब मुझसे इस तरह की बेमुरव्वती करेंगे

तिलो – अगर तुझे उन पर भरोसा है तो रह और देख कि क्या होता है, पर मैं तो अब एक पल टिकने वाली नहीं।

माधवी – अगर किशोरी उसके हाथ न पड़ गई होती तो मुझे किसी तरह की उम्मीद होती और कोई बहाना भी कर सकती थी मगर अब तो…

इतना कहकर माधवी बेतरह रोने लगी, यहां तक कि हिचकी बंध गईं और वह तिलोत्तमा के पैरों पर गिरकर बोली –

‘‘तिलोत्तमा, मैं कसम खाती हूं कि आज से तेरे हुक्म के खिलाफ कोई काम न करूंगी।’’

तिलो – अगर ऐसा है तो मैं भी कसम खाकर कहती हूं कि तुझे फिर उसी दर्जे पर पहुंचाऊंगी और वीरेंद्रसिंह के ऐयारों और दीवान साहब से भी ऐसा बदला लूंगी कि वे भी याद करेंगे।

माधवी – बेशक मैं तुम्हारा हुक्म मानूंगी और जो कहोगी सो करूंगी।

तिलो – अच्छा तो आज रात को यहां से निकल चलना और जहां तक जमा पूंजी अपने साथ चलते बने ले लेना चाहिए!

माधवी – बहुत अच्छा, मैं तैयार हूं, जब चाहो चलो, मगर यह तो कहो कि मेरी इन सखी-सहेलियों की क्या दशा होगी

तिलो – बुरों की संगत करने से जो फल सब भोगते हैं सो ये भी भोगेंगी। मैं इनका कहां तक खयाल करूंगी जब अपने पर आ बनती है तो कोई किसी की खबर नहीं लेता।

दीवान अग्निदत्त किशोरी को लेकर भागे तो सीधे अपने घर में आ घुसे। ये किशोरी की सूरत पर ऐसे मोहित हुए कि तनोबदन की सुध जाती रही। सिपाहियों ने इंद्रजीतसिंह और उनके ऐयारों को गिरफ्तार किया या नहीं अथवा उनकी बदौलत सभों की क्या दशा हुई इसकी परवाह तो उन्हें जरा न रही, असल तो यह है कि इंद्रजीतसिंह को वे पहचानते भी न थे।

बेचारी किशोरी की क्या दशा थी और वह किस तरह रो-रोकर अपने सिर के बाल नोच रही थी इसके बारे में इतना ही कहना बहुत है कि अगर दो दिन तक उसकी यही दशा रही तो किसी तरह जीती न बचेगी और ‘हा इंद्रजीतसिंह, हा इंद्रजीतसिंह’ कहते प्राण छोड़ देगी।

दीवान साहब के घर में उनकी जोरू और किशोरी ही के बराबर की एक कुंआरी लड़की थी जिसका नाम कामिनी था और वह जितनी खूबसूरत थी उतनी ही स्वभाव की भी अच्छी थी। दीवान साहब की स्त्री का भी स्वभाव और चाल-चलन अच्छा था, मगर वह बेचारी अपने पति के दुष्ट स्वभाव बुरे व्यवहारों से बराबर दुखी रहा करती थी और डर के मारे कभी किसी बात में कुछ रोक-टोक न करती, तिस पर भी आठ-दस दिन पीछे वह अग्निदत्त के हाथ से जरूर मार खाया करती।

बेचारी किशोरी को अपनी जोरू और लड़की के हवाले कर हिफाजत करने के अतिरिक्त समझाने-बुझाने की भी ताकीद कर दीवान साहब बाहर चले आये और अपने दीवानखाने में बैठ सोचने लगे कि किशोरी को किस तरह राजी करना चाहिए। यह औरत कौन और किसकी लड़की है, जिन लोगों के साथ यह थी वे लोग कौन थे, और यहां आकर धूम-फसाद मचाने की उन्हें क्या जरूरत थी चाल-ढाल और पोशाक से तो वे ऐयार मालूम पड़ते थे मगर यहां उन लोगों के आने का क्या सबब था इसी सब सोच-विचार में अग्निदत्त को आज स्नान तक करने की नौबत न आई। दिन भर इधर-उधर घूमते तथा लाशों को ठिकाने पहुंचाते और तहकीकात करते बीत गया मगर किसी तरह इस बखेड़े का ठीक पता न लगा, हां महल के पहरे वालों ने इतना कहा कि दो-तीन दिन से तिलोत्तमा हम लोगों पर सख्त ताकीद रखती थी और हुक्म दे गई थी कि ‘जब मेरे चलाये बम के गोले की आवाज तुम लोग सुनो तो फौरन मुस्तैद हो जाओ और जिसको आते देखो गिरफ्तार कर लो।’

अब दीवान साहब का शक माधवी और तिलोत्तमा के ऊपर हुआ और देर तक सोचने-विचारने के बाद उन्होंने निश्चय कर लिया कि इस बखेड़े का हाल बेशक ये दोनों पहले ही से जानती थीं मगर यह भेद मुझसे छिपाये रखने का कोई विशेष कारण अवश्य है।

चिराग जलने के बाद अग्निदत्त अपने घर पहुंचा। किशोरी के पास न जाकर निराले में अपनी स्त्री को बुलाकर उसने पूछा, ‘‘उस औरत की जुबानी कुछ हाल-चाल तुम्हें मालूम हुआ या नहीं’

अग्निदत्त की स्त्री ने कहा, ‘‘हां, उसका हाल मालूम हो गया। वह महाराज शिवदत्त की लड़की है और उसका नाम किशोरी रानी है। राजा वीरेंद्रसिंह के लड़के इंद्रजीतसिंह पर माधवी मोहित हो गई थी और उनको अपने यहां किसी तरह से फंसा लाकर खोह में रख छोड़ा था। इंद्रजीतसिंह का प्रेम किशोरी पर था इसलिए उसने ललिता को भेजकर धोखा दे किशोरी को भी अपने फंदे में फंसा लिया था। वह कई दिनों से यहां कैद थी और वीरेंद्रसिंह के ऐयार लोग भी कई दिनों से इसी शहर में टिके हुए थे। किसी तरह मौका मिलने पर इंद्रजीतसिंह किशोरी को ले खोह से बाहर निकल आये और यहां तक नौबत आ पहुंची।’’

राजा वीरेंद्रसिंह और उनके ऐयारों का नाम सुन मारे डर के अग्निदत्त कांप उठा, बदन के रोंगटे खड़े हो गए, घबराया हुआ बाहर निकल आया और अपने दीवानखाने में पहुंच मसनद के ऊपर गिर भूखा-प्यासा आधी रात तक यही सोचता रह गया कि अब क्या करना चाहिए।

अग्निदत्त समझ गया कि कोतवाल साहब को जरूर वीरेंद्रसिंह के ऐयारों ने पकड़ लिया है और अब किशोरी को अपने यहां रखने से किसी तरह जान न बचेगी, तिस पर भी वह किशोरी को छोड़ना नहीं चाहता था और सोचते-विचारते जब उसका जी ठिकाने आता तब यही कहता कि ‘चाहे जो हो, किशोरी को कभी न छोड़ूंगा!’

किशोरी को अपने यहां रखकर सलामत रहने की सिवाय इसके उसे कोई तरकीब न सूझी कि वह माधवी को मार डाले और स्वयं राजा हो बैठे। आखिर इसी सलाह को उसने ठीक समझा और अपने घर से निकल माधवी से मिलने के लिए महल की तरफ रवाना हुआ, मगर वहां पहुंचकर बिल्कुल बातें मामूल के खिलाफ देख और भी ताज्जुब में हो गया। उसे उम्मीद थी कि खोह का दरवाजा बंद होगा मगर नहीं, खोह का दरवाजा खुला हुआ था और माधवी की कुल सखियां जो खोह के अंदर रहती थीं, महल में ऊपर-नीचे चारों तरफ फैली हुई थीं और रोती हुई इधर-उधर माधवी को खोज रही थीं।

रात आधी से ज्यादा जा चुकी थी, बाकी रात भी दीवान साहब ने माधवी की सखियों का इजहार लेने में बिता दी और दिन-रात पूरा अखंड व्रत किये रहे। देखना चाहिए इसका फल उन्हें क्या मिलता है

शुरू से लेकर माधवी के भाग जाने तक का हाल उसकी सखियों ने दीवान साहब को कह सुनाया। आखिर में कहा, ‘‘सुरंग की ताली माधवी अपने पास रखती थी इसलिए हम लोग लाचार थीं, यह सब हाल आपसे कह न सकीं।’’

अग्निदत्त दांत पीसकर रह गया। आखिर यह निश्चय किया कि कल दशहरा (विजयदशमी) है, गद्दी पर खुद बैठ राजा बन और किशोरी को रानी बना नजरें लूंगा फिर जो होगा देखा जायगा। सुबह को वह जब अपने घर पहुंचा और जैसे ही पलंग पर जाकर लेटना चाहा वैसे ही तकिए के पास एक तह किये हुए कागज पर उसकी नजर पड़ी। खोलकर देखा तो उसी की तस्वीर मालूम पड़ी, छाती पर चढ़ा हुआ एक भयानक सूरत का आदमी उसके गले पर खंजर फेर रहा था। इसे देखते ही वह चौंक पड़ा। डर और चिंता ने उसे ऐसा पटका कि बुखार चढ़ आया मगर थोड़ी ही देर में चंगा हो घर के बाहर निकल फिर तहकीकात करने लगा।

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