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चंद्रकांता संतति- भाग-3 (बयान 1 से 5 )

बयान – 1

पाठक समझ ही गये होंगे कि रामशिला के सामने फलगू नदी के बीच में भयानक टीले के ऊपर रहने वाले बाबाजी के सामने जो दो औरतें गई थीं वे माधवी और उसकी सखी तिलोत्तमा थीं। बाबाजी ने उन दोनों से वादा किया था कि तुम्हारी बात का जवाब कल देंगे इसलिए दूसरे दिन वे दोनों आधी रात के समय फिर बाबाजी के पास गईं। किवाड़ खटखटाते ही अंदर से बाबाजी ने दरवाजा खोल दिया और उन दोनों को बुलाकर अपने पास बैठाया।

बाबा – कहो माधवी अच्छी हो!

माधवी – अच्छी क्या रहूंगी, अपने किये को पछताती हूं!

बाबा – अब भी अपने को सम्हालो तो मैं वादा करता हूं कि राजा वीरेंद्रसिंह से कहकर तुम्हारा राज्य तुम्हें दिलवा दूंगा।

माधवी – अजी अब भीख मांगने की इच्छा नहीं होती, अब तो जहां तक बन पड़ेगा अपने दुश्मनों को मार के ही कलेजा ठंडा करूंगी और चाहे इसके लिए मेरी जान भी जाय तो कोई परवाह नहीं!

बाबा – अगर यही खयाल है तो तुम्हें अपने दीवान अग्निदत्त से बदला लेना चाहिए, वीरेंद्रसिंह के लड़कों ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा!

माधवी – आपका कहना ठीक है मगर मैंने जो कुछ सोच रखा है वही करूंगी। मैं अपना इरादा किसी तरह बदल नहीं सकती और इसमें आपको हर तरह से मेरी मदद करनी ही होगी।

बाबा – खैर, जिस तरह बनेगा मैं तुम्हारी मदद करूंगा मगर यह तो बताओ कि सिवाय मेरे इस समय और भी कोई तुम्हारा मददगार है या नहीं।

माधवी – कल तक तो मेरा मददगार कोई भी न था मगर आज मेरे कई मददगार पहुंच गये हैं और अब मेरा काम जरूर हो जायेगा इसमें शक नहीं है।

बाबा – कौन मददगार पहुंच गया है?

माधवी – मेरा भाई भीमसेन।

बाबा – शिवदत्त का लड़का भीमसेन!

माधवी – जी हां।

बाबा – तब तो तुम्हारा काम जरूर हो जायेगा।

माधवी – तो भी आपको मेरी मदद करनी ही होगी।

बाबा – मैं जरूर मदद करूंगा, जो कुछ कहो मैं तैयार हूं!

माधवी – कल भीमसेन उस मकान में जाने का उद्योग करेगा जिसमें किशोरी रहती है। उसने मौका पाते ही अपनी बहिन किशोरी को मार डालने की कसम खाई है। अगर कल वह उस मकान के अंदर किसी तरह जा सका तो जरूर ही किशोरी को मार डालेगा। फिर मुझे किसी तरह का तरद्दुद न रहेगा और न आपसे मदद लेने की ही जरूरत पड़ेगी लेकिन वह उस मकान के अंदर न जा सका तो जिस तरह हो आपको ऐसी कोई तरकीब करनी पड़ेगी जिससे किशोरी उस मकान को छोड़ दे।

बाबा – भरसक तो मेरी मदद की जरूरत ही न पड़ेगी।

माधवी – ऐसा न कहिए! अगर उस मकान में कमंद लगाने की जगह होती तब तो कोई बात ही न थी, अब तक मैं अपना काम निकाल लिए होती।

बाबा – हां, यह तो मैं भी जानता हूं कि तुम्हारे पिता ने उस मकान के बनवाने में बड़ी कारीगरी खर्च की है, मगर तो भी भीमसेन ने उसके अंदर जाने की कोई तरकीब सोची ही होगी।

माधवी – जी हां, देखना चाहिए कल क्या होता है।

बाबा – अच्छा, अब तुम परसों मुझसे जरूर मिलना, अगर तुम्हारा काम हो गया तो ठीक ही है नहीं तो चौथे दिन मैं सहज में ही तुम्हारा काम कर दूंगा।

”बहुत अच्छा” कहकर माधवी वहां से उठी और अपनी सखी तिलोत्तमा को साथ लिये अपने डेरे पर चली आई।

माधवी के चले जाने पर थोड़ी देर तक बाबाजी कुछ सोचते रहे, इसके बाद कुटी के बाहर निकले और दो-चार दफे जोर से ताली बजाई। यकायक इधर-उधर पेड़ों की आड़ में से चार-पांच आदमी निकलकर बाबाजी के पास आये और एक ने बढ़कर पूछा, ”कहिये क्या हाल है’

बाबाजी ने कहा, ”आज अब तुम लोगों की कोई जरूरत नहीं है जहां चाहो चले जाओ, मगर कल एक घंटे जाते-जाते तुम लोग यहां जरूर जुट जाओ!”

एक – क्यों खैर तो है, मैं बिना कुछ हाल सुने जाने वाला नहीं!

बाबा – अच्छा तो फिर सुन लो कि कल क्या होगा और हम लोग क्या करेंगे।

सभों को लेकर बाबाजी कुटी के अंदर गये, किवाड़ बंद कर न मालूम क्या बातचीत करने लगे।

अब हम उसी मकान में पहुंचते हैं जिसमें किशोरी और किन्नरी का डेरा है या जहां इंद्रजीतसिंह को लेकर कमला गई है।

किशोरी के चिल्लाने की आवाज सुनकर किन्नरी हाथ में तलवार लिए बहुत जल्द नीचे उतर गई। कमला ने किवाड़ खटखटाया है, दरवाजा खोलना चाहिए इसका खयाल तो जाता रहा और इधर-उधर किशोरी को ढूंढ़ने लगी मगर इसे ढूंढ़ने में उसने ज्यादा देर न लगाई, दो ही चार दफे दालान और कोठरियों में घूमकर वह लौटी और सदर दरवाजा खोलकर कमला को मकान के अंदर कर लिया।

दरवाजा खुलने में देर हुई इसी से कमला समझ गई कि भीतर कुछ गोलमाल हुआ है। अंदर आते ही उसने पूछा, ”क्यों क्या हुआ’ जिसके जवाब में बदहवास किन्नरी केवल इतना ही कह सकी, ”दरवाजा खोलने के लिए किशोरी नीचे उतरी मगर न मालूम चिल्लाकर कहां गायब हो गई।”

कमला ने इस बात का कुछ जवाब न दिया। उसने सबके पहले छत पर जाकर कुंअर इंद्रजीतसिंह को कमंद लगाने में मदद की। जब वे और तारासिंह ऊपर चढ़ आये तो उन दोनों को भी साथ ले वह नीचे आंगन में उतर आई और किन्नरी की तरह ही संक्षेप में किशोरी के गायब हो जाने का हाल कहकर इधर-उधर ढूंढ़ने लगी।

ये सब बातें थोड़ी ही देर में हो गईं और अंधेरा होने पर भी बात की बात में कमला ने नीचे की कुल कोठरियों में किशोरी को ढूंढ़ डाला, परेशान और बदहवास इंद्रजीतसिंह उसके साथ घूमते रहे।

ढूंढ़ते-ढूंढ़ते कमला जब उस कोठरी में पहुंची जिसकी पीठ खंडहर की तरफ पड़ती थी तो यकायक चांदना मालूम पड़ा। भीतर घुसी, ओैर तुरंत निश्चय हो गया कि खंडहर की तरफ से कोई दीवार में सेंध लगाकर इस मकान के अंदर घुसा और यह आफत मचा गया। उस खुलासा सेंध की राह से ये चारों आदमी भी बाहर खंडहर में निकल गये और वहां एक विचित्र तमाशा देखा।

बयान – 2

शिवदत्तगढ़ में महाराज शिवदत्त बैठा हुआ बेफिक्री का हलुआ नहीं उड़ाता। सच पूछिये तो तमाम जमाने की फिक्र ने उसको आ घेरा है। वह दिन-रात सोचा ही करता है और उसके ऐयारों और जासूसों का दिन दौड़ते ही बीतता है। चुनार, गयाजी और राजगृही का हाल तो उसे रत्ती-रत्ती मालूम है क्योंकि इन तीनों जगहों की खबरें पहुंचाने के लिए उसने पूरा बंदोबस्त किया हुआ है। आज यह खबर पाकर कि गयाजी का राज्य राजा वीरेंद्रसिंह के कब्जे में आ गया, माधवी राज ही छोड़कर भाग गई, और किशोरी दीवान अग्निदत्त के हाथ फंसी हुई है, शिवदत्त घबड़ा उठा और तरह-तरह की बातें सोचने में इतना लीन हो गया कि तनोबदन की सुध जाती रही। किशोरी के ऊपर इसे इतना गुस्सा आया कि अगर वह यहां मौजूद होती तो अपने हाथ से टुकड़े-टुकड़े कर डालता। इस समय भी वह प्रण करके उठ खड़ा हुआ कि ‘जब तक किशोरी के मरने की खबर न पाऊंगा अन्न न खाऊंगा’ और सीधा महल में चला गया, हुक्म देता गया कि भीमसेन को हमारे पास भेज दो।

राजा शिवदत्त महल में जाकर अपनी रानी कलावती के पास बैठ गया। उसके चेहरे की उदासी और परेशानी का सबब जानने के लिए कलावती ने बहुत कुछ उद्योग किया मगर जब तक उसका लड़का भीमसेन महल में न गया उसने कलावती की बात का कुछ भी जवाब न दिया। मां-बाप के पास पहुंचते ही भीमसेन ने प्रणाम किया और पूछा, ”क्या आज्ञा होती है’

शिव – किशोरी के बारे में जो कुछ खबर आज पहुंची तुमने भी सुनी होगी!

भीम – जी हां।

शिव – अफसोस, फिर भी तुम्हें अपना मुंह दिखाते शर्म नहीं आती! न मालूम तुम्हारी बहादुरी किस दिन काम आयेगी और तुम किस दिन अपने को इस लायक बनाओगे कि मैं तुम्हें अपना लड़का समझूं!!

भीम – मुझे जो आज्ञा हो तैयार हूं।

शिव – मुझे उम्मीद नहीं कि तुम मेरी बात मानोगे।

भीम – मैं यज्ञोपवीत हाथ में लेकर कसम खाता हूं कि जब तक जान बाकी है उस काम के करने की पूरी कोशिश करूंगा जिसके लिए आप आज्ञा देंगे!

शिव – मेरा पहला हुक्म है कि किशोरी का सिर काटकर मेरे पास लाओ।

भीम – (कुछ सोच और ऊंची सांस लेकर) बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। और क्या हुक्म होता है

शिव – इसके बाद वीरेंद्रसिंह या उनके लड़कों में से जब तक किसी को मार न लो यहां मत आओ। यह न समझना कि यह काम मैं तुम्हारे ही सुपुर्द करता हूं। नहीं, मैं खुद आज इस शिवदत्तगढ़ को छोड़ूंगा और अपना कलेजा ठंडा करने के लिए पूरा उद्योग करूंगा। वीरेंद्रसिंह का चढ़ता प्रताप देखकर मुझे निश्चय हो गया कि लड़कर उन्हें किसी प्रकार नहीं जीत सकता इसलिए आज से मैं उनके साथ लड़ने का खयाल छोड़ देता हूं और उस ढंग पर चलता हूं जिसे ठग, चोर या डाकू लोग पसंद करते हैं।

भीम – अख्तियार आपको है जो चाहें करें। मुझे आज्ञा हो तो इसी समय चला जाऊं और जो कुछ हुक्म हुआ है उसे पूरा करने का उद्योग करूं!

शिव – अच्छा जाओ मगर यह कहो कि अपने साथ किस-किस को ले जाते हो

भीम – किसी को नहीं।

शिव – तब तुम कुछ न कर सकोगे। दो-तीन ऐयार और दस-बीस लड़कों को अपने साथ जरूर लेते जाओ।

भीम – आपके यहां ऐसा कौन ऐयार है जो वीरेंद्रसिंह के ऐयारों का मुकाबला करे और ऐसा कौन बहादुर है जो उन लोगों के सामने तलवार उठा सके!

शिव – तुम्हारा कहना ठीक है मगर तुम्हारे साथ गये हुए ऐयारों की कार्रवाई तब तक बहुत अच्छी होगी जब तक दुश्मनों को यह न मालूम हो जाय कि शिवदत्तगढ़ का कोई आया है! सिवाय इसके में बहादुर नाहरसिंह को तुम्हारे साथ भेजता हूं जिसका मुकाबला करने वाला वीरेंद्रसिंह की तरफ कोई नहीं है।

भीम – बेशक नाहरसिंह ऐसा ही है मगर मुश्किल तो यह है कि नाहरसिंह जितना बहादुर है उससे ज्यादा इस बात को देखता है कि अपने कौल का सच्चा रहे। उसका कहना है कि ‘जिस दिन कोई बहादुर द्वंद्व-युद्ध में मुझे जीत लेगा उसी दिन मैं उसका हो जाऊंगा।’ ईश्वर न करे कहीं ऐसी नौबत पहुंची तो वह उसी दिन से हम लोगों का दुश्मन हो जायगा।

शिव – यह सब तुम्हारा खयाल है, द्वंद्व-युद्ध में उसे वहां कोई जीतने वाला नहीं है।

भीम – अच्छा जो आज्ञा।

शिव – (खड़े होकर) चलो मैं इसी वक्त चलकर तुम्हारे जाने का बंदोबस्त कर देता हूं।

शिवदत्त और भीमसेन के बाहर चले जाने के बाद रानी कलावती ने जो बहुत देर से इन लोगों की बातें सुन-सुनकर गरम-गरम आंसू गिरा रही थी सिर उठाया और लंबी सांस लेकर कहा, ”हाय, अब तो जमाने का उलट-फेर ही दूसरा हुआ चाहता है। बेचारी किशोरी का क्या कसूर वह आप से आप तो चली ही नहीं गई उसने अपने आप तो कोई ऐसा काम किया ही नहीं जिससे उसकी इज्जत में फर्क आवे! हाय, किस कलेजे से भीमसेन अपनी बहिन को मारने का इरादा करेगा! मेरी जिंदगी अब व्यर्थ है क्योंकि बेचारी लड़की तो अब मारी ही जायेगी, भीमसेन भी वीरेंद्रसिंह से दुश्मनी करके अपनी जान नहीं बचा सकता, दूसरे उस लड़के का भरोसा ही क्या जो अपने हाथ से अपनी बहिन का सिर काटे। अगर इन सब बातों को भूल जाऊं और यही सोचकर बैठ रहूं कि मेरा सर्वस्व तो पति है मुझे लड़के-लड़कियों से क्या मतलब, तो भी नहीं बनता, क्योंकि वे भी डाकू-वृत्ति लिया चाहते हैं। इस अवस्था में वे किसी प्रकार का सुख नहीं पा सकते। फिर जीते जी अपने पति को दुख भोगते मैं कैसे देखूंगी हाय! वीरेंद्रसिंह! वही वीरेंद्रसिंह है जिसकी बदौलत मेरी जान बची थी, न मालूम बुर्देफरोशों की बदौलत मेरी क्या दुर्दशा होती! वही वीरेंद्रसिंह है जिसने कृपा कर मुझे अपने पति के पास खोह में भिजवा दिया था! वही वीरेंद्रसिंह है जिसने हम लोगों का कसूर एकदम माफ कर दिया था और चुनार की गद्दी लौटा देने को भी तैयार था। किस-किस बात की तरफ देखूं वीरेंद्रसिंह के बराबर धर्मात्मा तो कोई दुनिया में न होगा! फिर किसको दोष दूं, अपने पति को नहीं कभी नहीं, यह मेरे किए न होगा! यह सब दोष तो मेरे कर्मों ही का है। फिर जब भाग्य ही बुरे हैं तो ऐसे भाग्य को लेकर दुनिया में क्यों रहूं अपनी छुट्टी तो आप ही कर लेती हूं फिर मेरे पीछे क्या जाने क्या होगा इसकी खबर ही किसे है!”

रानी कलावती पागलों की तरह बहुत देर तक न जाने क्या-क्या सोचती रही, आखिर उठ खड़ी हुई और ताली का गुच्छा उठाकर अपना एक संदूक खोला। न मालूम उसमें से क्या निकालकर उसने अपने मुंह में रख लिया और पास ही पड़ी हुई सोने की सुराही में से जल निकालकर पीने के बाद कलम-दवात और कागज लेकर कुछ लिखने बैठ गई। लेख समाप्त होते-होते तक उसकी सखियां भी आ पहुंचीं। कलावती ने लिखे हुए कागज को लपेटकर अपनी एक सखी के हाथ में दिया और कहा, ”जब महाराज मुझे पूछें तो यह कागज उनके हाथ में दे देना। बस अब तुम लोग जाओ अपना काम करो, मैं इस समय सोना चाहती हूं, जब तक मैं खुद न उठूं खबरदार, मुझको कभी मत उठाना!”

हुक्म पाते ही उसकी लौंडियां वहां से हट गईं और रानी कलावती ने पलंग पर लेटकर आंचल से मुंह ढांप लिया।

दो ही पहर के बाद मालूम हो गया कि रानी कलावती सो गई, आज के लिए नहीं बल्कि वह हमेशा के लिए सो गई, अब वह किसी के जगाये नहीं जाग सकती।

शाम के वक्त जब महाराज शिवदत्त फिर महल में आये तो महारानी का लिखा कागज उनके हाथ में दिया गया। पढ़ते ही शिवदत्त दौड़ा हुआ उस कमरे में गया जिसमें कलावती सोई हुई थी। मुंह पर से कपड़ा हटाया, नब्ज देखी, और तुरंत लौटकर बाहर चला गया।

अब तो उसकी सखियों और लौंडियों को भी मालूम हो गया कि रानी कलावती हमेशा के लिए सो गईं। न मालूम बेचारी ने किन-किन बातों को सोचकर जान दे देना ही मुनासिब समझा। उसकी प्यारी सखियां जिन्हें वह जान से ज्यादे मानती थी पलंग के चारों तरफ जमा हो गईं और उसकी आखिरी सूरत देखने लगीं। भीमसेन चार घंटे पहले ही मुहिम पर रवाना हो चुका था। उसे अपनी प्यारी मां के मरने की कुछ खबर ही नहीं और यह सोचकर कि वह उदास और सुस्त होकर अपना काम न कर सकेगा, शिवदत्त ने भी कलावती के मरने की खबर उसके कान तक पहुंचने न दी।

बयान – 3

ऐयारों और थोड़े से लड़कों के सिवाय नाहरसिंह को साथ लिए हुए भीमसेन राजगृही की तरफ रवाना हुआ। उसका साथी नाहरसिंह बेशक लड़ाई के फन में बहुत ही जबर्दस्त था। उसे विश्वास था कि कोई अकेला आदमी लड़कर कभी मुझसे जीत नहीं सकता। भीमसेन भी अपने को ताकतवर और होशियार लगाता था मगर जब से लोभवश नाहरसिंह ने उसकी नौकरी कर ली और आजमाइश के तौर पर दो-चार दफे नाहरसिंह और भीमसेन से नकली लड़ाई हुई तब से भीमसेन को मालूम हो गया कि नाहरसिंह के सामने वह एक बच्चे के बराबर है। नाहरसिंह लड़ाई के फन में जितना होशियार और ताकतवर था उतना ही नेक और ईमानदार भी था और उसका यह प्रण करना बहुत ही मुनासिब था कि उसे जिस दिन जो कोई जीतेगा वह उसी दिन से उसकी ताबेदारी कबूल कर लेगा।

ये लोग पहले राजगृही में पहुंचे और एक गुप्त खोह में डेरा डालने के बाद भीमसेन ने ऐयारों को वहां का हाल मालूम करने के लिए मुस्तैद किया। दो ही दिन की कोशिश में ऐयारों ने कुल हाल वहां का मालूम कर लिया और भीमसेन ने जब यह सुना कि माधवी वहां मौजूद नहीं है तब बिना छेड़छाड़ मचाए गयाजी की तरफ कूच किया।

इस समय राजगृही को अपने कब्जे में कर लेना भीमसेन के लिए कोई बड़ी बात न थी, मगर इस खयाल से कि गयाजी में राजा वीरेंद्रसिंह की अमलदारी हो गई है राजगृही दखल करने से कोई फायदा न होगा और वीरेंद्रसिंह के मुकाबले में लड़कर भी जीतना बहुत ही मुश्किल है उसने राजगृही का खयाल छोड़ दिया। सिवाय इसके जाहिर होकर वह किसी तरह किशोरी को अपने कब्जे में कर भी नहीं सकता था, उसे लुक-छिपकर पहले किशोरी ही पर सफाई का हाथ दिखाना मंजूर था।

गयाजी के पास पहुंचते ही एक गुप्त और भयानक पहाड़ी में उन लोगों ने डेरा डाला और खबर लेने के लिए ऐयारों को रवाना किया। जिस तरह भीमसेन के ऐयार लोग घूम-घूमकर टोह लिया करते थे उसी तरह माधवी की सखी तिलोत्तमा भी अपना काम साधने के लिए भेष बदलकर चारों तरफ घूमा करती थी। इत्तिफाक से भीमसेन के ऐयारों की मुलाकात तिलोत्तमा से हो गई और बहुत जल्द माधवी की खबर भीमसेन को तथा भीमसेन की खबर माधवी को लग गई।

भीमसेन के साथ जितने लड़के थे उन सभों को खोह में ही छोड़ सिर्फ भीमसेन और नाहरसिंह को माधवी ने उस मकान में बुला लिया जिसका हाल हम ऊपर लिख चुके हैं।

आज किशोरी के घर में घुसकर आफत मचाने वाले ये ही भीमसेन और नाहरसिंह हैं। अपने ऐयारों की मदद से उस मकान के बगल वाले खंडहर में घुसकर भीमसेन ने उस मकान में सेंध लगाई और उस सेंध की राह नाहरसिंह ने अंदर जाकर जो कुछ किया पाठकों को मालूम ही है।

नाहरसिंह मकान के अंदर घुसकर उसी सेंध की राह किशोरी को लेकर बाहर निकल आया और उस बेचारी को जमीन पर गिराकर मालिक के हुक्म के मुताबिक उसे मार डालने पर मुस्तैद हुआ। मगर एक बेकसूर औरत पर इस तरह जुल्म करने का इरादा करते ही उस जवांमर्द का कलेजा दहल गया। वह किशोरी को जमीन पर रख दूर जा खड़ा हुआ और भीमसेन से जो मुंह पर नकाब डाले उस जगह मौजूद था बोला, ”लीजिए, इसके आगे जो कुछ करना है आप ही कीजिए। मेरी हिम्मत नहीं पड़ती! मगर मैं आपको भी…!”

हाथ में खंजर लेकर भीमसेन फौरन बेचारी किशोरी की छाती पर जो उस समय डर के मारे बेहोश थी जा चढ़ा, साथ ही इसके किशोरी की बेहोशी भी जाती रही और उसने अपने को मौत के पंजे में फंसा हुआ पाया जैसे कि हम ऊपर लिख आये हैं।

भीमसेन ने खंजर उठाकर ज्यों ही किशोरी को मारना चाहा, पीछे से किसी ने उसकी कलाई थाम ली और खंजर लिये उसके मजबूत हाथ को बेबस कर दिया। भीमसेन ने फिरकर देखा तो एक साधु की सूरत नजर पड़ी। वह किशोरी को छोड़ उठ खड़ा हुआ और उसी खंजर से उसने साधु पर वार किया।

यह साधु वही है जो रामशिला पहाड़ी के सामने फलगू नदी के बीच में भयानक टीले पर रहता था जिसके पास मदद के लिए माधवी और तिलोत्तमा का जाना और उन्हीं के पास देवीसिंह का पहुंचना भी हम लिख आये हैं। इस समय साधु इस बात पर मुस्तैद दिखाई देता है कि जिस तरह बने इन दुष्टों के हाथों से बेचारी किशोरी को बचावे।

चांदनी रात में दूर खड़ा नाहरसिंह यह तमाशा देखता रहा मगर भीमसेन को साधु से जबर्दस्त समझकर मदद के लिए पास न आया। भीमसेन के चलाए हुए खंजर ने साधु का कुछ भी नुकसान न किया और उसने खंजर का वार बचाकर फुर्ती से भीमसेन के पीछे जा उसकी टांग पकड़कर इस ढंग से खींची कि भीमसेन किसी तरह सम्हल न सका और धम्म से जमीन पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही साधु हट गया और बोला, ”उठ खड़ा हो और फिर आकर लड़!”

गुस्से में भरा हुआ भीमसेन उठ खड़ा हुआ और खंजर जमीन पर फेंक साधु से लिपट गया क्योंकि वह कुश्ती के फन में अपने को बहुत होशियार समझता था, मगर साधु से कुछ पेश न गई। थोड़ी ही देर में साधु ने भीमसेन को सुस्त कर दिया और कहा, ”जा मैं तुझे छोड़ देता हूं, अगर अपनी जिंदगी चाहता है तो अभी यहां से भाग जा।”

भीमसेन हैरान होकर साधु का मुंह देखता रह गया, कुछ जवाब न दे सका। जमीन पर पड़ी हुई बेचारी किशोरी यह कैफियत देख रही थी मगर डर के मारे न तो उससे उठा जाता था और न वह चिल्ला ही सकती थी।

भीमसेन को इस तरह बेदम देखकर नाहरसिंह से न रहा गया। वह झपटकर साधु के पास आया और ललकारकर बोला, ”अगर बहादुरी का दावा रखता है तो इधर आ। मैं समझ गया कि तू साधु नहीं बल्कि मक्कार है।”

साधु महाशय नाहरसिंह से भी उलझने को तैयार हो गये मगर ऐसी नौबत न आई क्योंकि उसी समय ढूंढ़ते हुए सेंध की राह से कुंअर इंद्रजीतसिंह और तारासिंह भी खंडहर में आ पहुंचे और उनके पीछे-पीछे किन्नरी और कमला भी आ मौजूद हुईं। कुंअर इंद्रजीतसिंह को देखते ही वे साधुराम तो हट गये और खंडहर की दीवार फांद न मालूम कहां चले गये। उधर एक पेड़ के पास गड़े हुए अपने नेजे को नाहरसिंह ने उखाड़ लिया और उसी से इंद्रजीतसिंह का मुकाबला किया। उधर तारासिंह ने उछलकर एक लात भीमसेन को ऐसी लगाई कि वह किसी तरह सम्हल न सका, तुरंत जमीन पर लोट गया। भीमसेन एक लात खाकर जमीन पर लोट जाने वाला न था मगर साधु के साथ लड़कर वह बदहवास और सुस्त हो रहा था इसलिए तारासिंह की लात से सम्हल न सका। तारासिंह ने भीमसेन की मुश्कें बांध लीं और उसे एक किनारे रख के नाहरसिंह की लड़ाई का तमाशा देखने लगा।

आधे घंटे तक नाहरसिंह और इंद्रजीतसिंह के बीच लड़ाई होती रही। इंद्रजीतसिंह की तलवार ने नाहरसिंह के नेजे को टुकड़े कर दिया और नाहरसिंह की ढाल पर बैठकर कुंअर इंद्रजीतसिंह की तलवार कब्जे से अलग हो गई। थोड़ी देर के लिए दोनों बहादुर ठहर गए। कुंअर इंद्रजीतसिंह की बहादुरी देख नाहरसिंह बहुत खुश हुआ और बोला –

नाहर – शाबाश! तुम्हारे ऐसा बहादुर मैंने आज तक नहीं देखा।

इंद्र – ईश्वर की सृष्टि में एक से एक बढ़के पड़े हैं, तुम्हारे या हमारे ऐसों की बात ही क्या है।

नाहर – आपका कहना बहुत ठीक है, मेरा प्रण क्या है आप जानते हैं

इंद्र – कह जाइए, अगर नहीं जानता हूं तो अब मालूम हो जायेगा।

नाहर – मैंने प्रण किया है कि जो कोई लड़कर मुझे जीतेगा मैं उसकी ताबेदारी कबूल करूंगा।

इंद्र – तुम्हारे ऐसे बहादुर का यह प्रण बेमुनासिब नहीं है। फिर आइए कुश्ती से निपटारा कर लिया जाय।

नाहर – बहुत अच्छा आइए!

दोनों में कुश्ती होने लगी। थोड़ी ही देर में कुंअर इंद्रजीतसिंह ने नाहरसिंह को जमीन पर दे मारा और पूछा, ”कहो अब क्या इरादा है’

नाहर – मैं ताबेदारी कबूल करता हूं।

इंद्रजीतसिंह उसकी छाती पर से उठ खड़े हुए और इधर-उधर देखने लगे। चारों तरफ सन्नाटा था। किशोरी, किन्नरी या कमला का कहीं पता नहीं, भीमसेन और उसके साथियों का भी (अगर कोई वहां हो) नाम-निशान नहीं, यहां तक कि अपने ऐयार तारासिंह की सूरत भी उन्हें दिखाई न दी।

इंद्र – यह क्या! चारों तरफ सन्नाटा क्यों छा गया

नाहर – ताज्जुब है! इसके पहले तो यहां कई आदमी थे, न मालूम वे सब कहां गए

इंद्र – तुम कौन हो और तुम्हारे साथ कौन था

नाहर – मैं आपका ताबेदार हूं, मेरे साथ शिवदत्तसिंह का लड़का भीमसेन और इसके पहले मैं उसका नौकर था, आशा है कि आप भी अपना परिचय मुझे देंगे।

इंद्र – मेरा नाम इंद्रजीतसिंह है।

नाहर – हैं!!

नाम सुनते ही नाहरसिंह उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला, ”मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि उसने मुझे आपकी ताबेदारी में सौंपा! यदि किसी दूसरे की ताबेदारी कबूल करनी पड़ती तो मुझे बड़ा दुख होता!”

नाहरसिंह ने सच्चे दिल से कुमार की ताबेदारी कबूल की। इसके बाद बड़ी देर तक दोनों बहादुर चारों तरफ घूम-घूमकर उन लोगों को ढूंढ़ते रहे मगर किसी का पता न लगा, हां एक पेड़ के नीचे भीमसेन दिखाई पड़ा जिसके हाथ-पैर कमंद से मजबूत बंधे हुए थे। भीमसेन ने पुकारकर कहा, ”क्यों नाहरसिंह! क्या मेरी मदद न करोगे’

नाहर – अब मैं तुम्हारा ताबेदार नहीं हूं।

इंद्र – (भीमसेन से) तुम्हें किसने बांधा?

भीम – मैं पहचानता तो नहीं मगर इतना कह सकता हूं कि आपके साथी ने।

इंद्र – और वह बाबाजी कहां चले गये?

भीम – क्या मालूम?

इतने में ही खंडहर की दीवार फांदकर आते हुए तारासिंह भी दिखाई पड़े। इंद्रजीतसिंह घबड़ाए हुए उनकी तरफ बढ़े और पूछा, ”तुम कहां चले गये थे’

तारा – जिस समय हम लोग यहां आये थे एक बाबाजी भी इस जगह मौजूद थे मगर न मालूम कहां चले गये! मैं एक आदमी की मुश्कें बांध रहा था कि उसी समय (हाथ का इशारा करके) उस झाड़ी में छिपे कई आदमी बाहर निकले और किशोरी को जबर्दस्ती उठाकर उसी तरफ ले चले। उन लोगों को जाते देख किन्नरी और कमला भी उसी तरफ लपकीं। मैंने यह सोचकर कि कहीं ऐसा न हो कि आपको लड़ाई के समय धोखा देकर वह आदमी पीछे से आप पर वार करे झटपट उसकी मुश्कें बांधी और फिर मैं भी उसी तरफ लपका जिधर वे लोग गये थे। वहां कोने में खुली हुई खिड़की नजर आई, मैं यह सोच उस खिड़की के बाहर गया कि बेशक इसी राह से वे लोग निकल गये होंगे।

इंद्र – फिर कुछ पता लगा

तारा – कुछ भी नहीं, न मालूम वे लोग किधर गायब हो गये! मैं आपको लड़ते हुए छोड़ गया था इसलिए तुरंत लौट आया। अब आप घर चलिए, आपको पहुंचाकर मैं उन लोगों को खोज निकालूंगा। (नाहरसिंह की तरफ इशारा करके) इनसे क्या निपटारा हुआ

इंद्र – इन्होंने मेरी ताबेदारी कबूल कर ली।

तारा – सो तो ठीक है, मगर दुश्मन का…

नाहर – आप इन सब बातों को न सोचिये, ईश्वर चाहेगा तो आप मुझे बेईमान कभी न पावेंगे!

तारा – ईश्वर ऐसा ही करे!

रात की अंधेरी बिल्कुल जाती रही और अच्छी तरह सबेरा हो गया, मुहल्ले के कई आदमी उस खिड़की की राह खंडहर में चले आये और अपने राजा को वहां पा हैरान हो देखने लगे। कुंअर इंद्रजीतसिंह, तारासिंह और नाहरसिंह अपने साथ भीमसेन को लिए हुए महल में पहुंचे और इंद्रजीतसिंह ने सब हाल अपने भाई आनंदसिंह से कहा।

आज रात की वारदात ने दोनों कुमारों को हद से ज्यादे तरद्दुद में डाल दिया। किन्नरी और किशोरी के इस तरह मिलकर भी पुनः गायब हो जाने से दोनों ही पहले से ज्यादा उदास हुए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

 बयान – 4

आधी रात का समय है और सन्नाटे की हवा चल रही है। बिल्लौर की तरह खूबी पैदा करने वाली चांदनी आशिकमिजाजों को सदा ही भली मालूम होती है लेकिन आज सर्दी ने उन्हें भी पस्त कर दिया, यह हिम्मत नहीं पड़ती कि जरा मैदान में निकलें और इस चांदनी की बहार लें मगर घर में बैठे दरवाजे की तरफ देखा करने और उसांसें लेने से होता ही क्या है। मर्दानगी कोई और ही चीज है, इश्क किसी दूसरी ही वस्तु का नाम है, तो भी इश्क के मारे हुए माशूक की नागिन-सी जुल्फों से अपने को डसाना ही जवांमर्दी समझते हैं और दिलबर की तिरछी निगाहों से अपने कलेजे को छलनी बनाने में बहादुरी मानते हैं। मगर वे लोग जो सच्चे बहादुर हैं घर बैठे ‘ओफ’ करना पसंद नहीं करते और समय पड़ने पर तलवार को ही अपना माशूक मानते हैं। देखिये इस सर्दी और ऐसे भयानक स्थान में भी एक सच्चे बहादुर को किसी पेड़ की आड़ में बैठ जाना भी बुरा मालूम होता है।

अब रात पहर भर से भी कम बाकी है। एक पहाड़ी के ऊपर जिसकी ऊंचाई बहुत ज्यादे नहीं तो इतनी कम भी नहीं है कि बिना दम लिए एक ही दौड़ में कोई ऊपर चढ़ जाये, एक आदमी मुंह पर नकाब डाले काले कपड़े से तमाम बदन को छिपाये इधर-उधर टहल रहा है। चारों तरफ सन्नाटा है, कोई उसे पहचानने वाला यहां मौजूद नहीं, शायद इसी खयाल से उसने नकाब उलट दी और कुछ देर के लिए खड़े होकर मैदान की तरफ देखने लगा।

इस पहाड़ी के बगल में एक दूसरी पहाड़ी है जिसकी जड़ इस पहाड़ी से मिली हुई है। मालूम होता है कि एक पहाड़ी के दो टुकड़े हो गए हैं। बीच में डाकुओं और लुटेरों के आने-जाने लायक रास्ता है जिसे भयानक दर्रा कहना मुनासिब जान पड़ता है। इस आदमी की निगाह घड़ी-घड़ी उस दर्रे की तरफ दौड़ती और सन्नाटा पाकर मैदान की तरफ घूम जाती है जिससे मालूम होता है कि उसकी आंखें किसी ऐसे को ढूंढ़ रही हैं जिसके आने की इस समय पूरी उम्मीद है।

टहलते – टहलते उसे बहुत देर हो गई, पूरब तरफ आसमान पर कुछ-कुछ सफेदी फैलने लगी जिसे देख यह कुछ घबड़ाया-सा हो गया और दस कदम आगे बढ़कर मैदान की तरफ देखने लगा, साथ ही इसके चौंका और धीरे से बोल उठा, ”आ पहुंचे!”

उस आदमी ने धीरे से सीटी बजाई। इधर-उधर चट्टानों की आड़ में छिपे हुए दस-बारह आदमी निकल आये जिन्हें देख वह हुकूमत के तौर पर बोला, ”देखो वे लोग आ पहुंचे, अब बहुत जल्द नीचे उतर चलना चाहिए।”

बात के अंदाज से मालूम हो गया कि वह आदमी जो बहुत देर से पहाड़ी के ऊपर टहल रहा था उन सभों का सरदार है। अब उसने अपने चेहरे पर नकाब डाल ली और अपने साथियों को लेकर तेजी के साथ पहाड़ी के नीचे उतर आने वालों का मुहाना रोक लिया।

कपड़े में लपेटी हुई एक लाश उठाए और उसे चारों तरफ से घेरे हुए कई आदमी उस दर्रे में घुसे। वे लोग कदम बढ़ाये जा रहे थे। उन्हें स्वप्न में भी यह गुमान न था कि हम लोगों के काम में बाधा डालने वाला इस पहाड़ के बीच में से कोई निकल आएगा।

जब लाश उठाए हुए वे लोग उस दर्रे के बीच में घुसे बल्कि उन लोगों ने जब आधा दर्रा तै कर लिया, तब यकायक चारों तरफ से छिपे हुए कई आदमी उन लोगों पर टूट पड़े और हर तरह से उन्हें लाचार कर दिया। वे लोग किसी तरह भी लाश को न ले जा सके और तीन-चार आदमियों के घायल होने तथा एक के मर जाने पर उसी जगह उस लाश को छोड़ आखिर सभों को भाग ही जाना पड़ा।

दुश्मनों के भाग जाने पर उस सरदार ने जो पहले ही से उस पहाड़ी पर मौजूद था जिसका जिक्र हम कर आये हैं, अपने साथियों को पुकारकर कहा, ”पीछा करने की कोई जरूरत नहीं हमारा मतलब निकल गया, मगर यह देख लेना चाहिए कि यह किशोरी ही है या नहीं!”

एक ने बटुए में से मोमबत्ती निकालकर जलाई और उस लाश के मुंह पर से कपड़ा हटाकर देखने के बाद कहा, ”किशोरी ही तो है।” सरदार ने किशोरी की नब्ज पर हाथ रखा और कहा –

सरदार – ओफ! इसे बहुत तेज बेहोशी दी गई है, देखो तुम भी देख लो!

एक – (नब्ज देखकर) बेशक बहुत ज्यादे बेहोशी दी गई है, ऐसी हालत में अक्सर जान निकल जाती है!

दूसरा – इसे कुछ कम करना चाहिए।

सरदार ने अपने बटुए में से एक डिबिया निकाली तथा खोलकर किशोरी को सुंघाने के बाद फिर नब्ज पर हाथ रखा और कहा, ”बस इससे ज्यादे बेहोशी कम करने से यह होश में आ जायेगी। चलो उठाओ, अब यहां ठहरना मुनासिब नहीं है।”

किशोरी को उठाकर वे लोग उसी दर्रे की राह घूमते हुए पहाड़ी के पार हो गये और न मालूम किस तरफ चले गये। इनके जाने के बाद उसी जगह जहां पर लड़ाई हुई थी छिपा हुआ एक आदमी बाहर निकला और चारों तरफ देखने लगा। जब वहां किसी को मौजूद न पाया तो धीरे से बोल उठा –

”मेरा पहले ही से यहां पहुंचना कैसा मुनासिब हुआ! मैं उन लोगों को खूब पहचानता हूं जो लड़-भिड़कर बेचारी किशोरी को ले गये! खैर, क्या मुजायका है, मुझसे भागकर ये लोग कहां जायेंगे। मेरे लिए तो दोनों ही बराबर हैं, वे ले जाते तब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती, और ये लोग ले गये हैं तब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ेगी। खैर हरि इच्छा, अब बाबाजी को ढूंढ़ना चाहिए। उन्होंने भी इसी जगह मिलने का वादा किया था।”

इतना कह वह आदमी चारों तरफ घूमने और बाबाजी को ढूंढ़ने लगा। इस समय इस आदमी को यदि माधवी देखती तो तुरंत पहचान लेती क्योंकि यह वही साधु है जो रामशिला पहाड़ी के सामने टीले पर रहता था, जिसके पास माधवी गई थी, या जिसने भीमसेन के हाथ से उस समय किशोरी की जान बचाई थी जब खंडहर के बीच में वह उसकी छाती पर सवार हो खंजर उसके कलेजे के पार किया ही चाहता था।

साफ सबेरा हो चुका था बल्कि पूरब तरफ सूर्य की लालिमा ने चौथाई आसमान पर अपना दखल जमा लिया था। वह साधु इधर-उधर घूमता – फिरता एक जगह अटक गया और सोचने लगा कि किधर जाय या क्या करे इतने ही में सामने से इसी की सूरत-शक्ल के दूसरे बाबाजी आते हुए दिखाई पड़े। देखते ही यह उनकी तरफ बढ़ा और बोला, ”मैं बड़ी देर से आपको ढूंढ़ता रहा हूं क्योंकि इसी जगह मिलने का आपने वादा किया था।”

अभी आए हुए बाबाजी ने कहा, ”मैं भी वादा पूरा करने के लिए आ पहुंचा। (हंसकर) बहुत अच्छे! यदि इस समय कोई देखे तो अवश्य बावला हो जाय और कहे कि एक ही रंग और सूरत-शक्ल के दो बाबाजी कहां से पैदा हो गये अच्छा हमारे पीछे-पीछे चले आओ।”

दोनों बाबाजी ने एक तरफ का रास्ता लिया और देखते-देखते न मालूम किधर गायब हो गये या किसी खोह में जा छिपे।

किशोरी की जब आंख खुली तो उसने अपने को एक सुंदर मसहरी पर लेटे हुए पाया और उम्दा कपड़ों और जेवरों से सजी हुई कई औरतें भी उसे दिखाई पड़ीं। पहले तो किशोरी ने यही समझा कि वे सब अच्छे अमीरों और सरदारों की लड़कियां हैं मगर थोड़ी ही देर बाद उनकी बातचीत और कायदे से मालूम हो गया कि लौंडियां हैं। अपनी बेबसी और बदकिस्मती पर रोती हुई किशोरी को यह जानने की बड़ी उत्कंठा हुई कि किस महाराजाधिराज के मकान में आ फंसी हूं जिसकी लौंडियां इस शान और शौकत की दिखाई पड़ती हैं।

किशोरी को होश में आते देख उनमें की दो-तीन लौंडियां न मालूम कहां चली गईं मगर किशोरी ने समझ लिया कि मेरे होश में आने की किसी को खबर करने गई हैं।

ताज्जुब-भरी निगाहों से किशोरी चारों तरफ देखने लगी। वाह-वाह, क्या सुंदर कमरा बना हुआ है। चारों तरफ दीवारों पर मीनाकारी का काम किया हुआ है, छत में सुनहरी बेल और बीच-बीच में जड़ाऊ फूलों को देखकर अक्ल दंग होती है, न मालूम इसकी तैयारी में कितने रुपये खर्च हो गये होंगे! छत से लटकती हुई बिल्लोरी हांडियों की परइयों में मानिक की लोलकें लटक रही हैं, जड़ाऊ डारों पर बेशकीमती दीवारगीरें अपनी बहार दिखा रही हैं, दरवाजों की महराबों पर बेलें और उस पर बैठी हुई छोटी-छोटी खूबसूरत चिड़ियों के बनाने में कारीगर ने जो कुछ मेहनत की होगी उसका जानना बहुत ही मुश्किल है। उन अंगूरों में कहीं पके अंगूर की जगह मानिक और कच्चे की जगह पन्ना काम में लाया गया था। अलावा इन सब बातों के उस कमरे में कुल सजावट का हाल अगर लिखा जाय तो हमारा असल मतलब बिल्कुल छूट जायेगा और मुख्तसर लिखावट के वादे में फर्क पड़ जायगा, अस्तु इस बारे में हम कुछ नहीं लिखते।

इस मकान को देख किशोरी दंग हो गई। उसकी हालत को लिखना बहुत ही मुश्किल है। जिधर उसकी निगाह जाती उधर ही की हो रहती थी, पर उस जगह की सजावट किशोरी अच्छी तरह देखने भी न पाई थी कि पहले की-सी और कई लौंडियां वहां आ मौजूद हुईं और बोलीं, ”महाराज को साथ लिए रानी साहिबा आ रही हैं!”

महाराज को साथ लिए रानी साहिबा उस कमरे में आ पहुंचीं। बेचारी किशोरी को भला क्या मालूम कि ये दोनों कौन हैं या कहां के राजा हैं तो भी इन दोनों की सूरत-शक्ल देखते ही किशोरी रुआब में आ गई। महाराज की उम्र लगभग पचास वर्ष की होगी। लंबा कद, गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें, चौड़ी पेशानी, ऊपर को उठी हुई मूंछें, बहादुरी चेहरे पर बरस रही थी। रानी साहिबा की उम्र भी लगभग पैंतीस वर्ष के होगी फिर भी उनके बदन की बनावट और खूबसूरती नौजवान परीजमालों की आंखें नीची करती थी। उनकी बड़ी-बड़ी रतनार आंखों में अब भी वही बात थी जो उनकी जवानी में होगी। उनके अंगों की लुनाई में किसी तरह का फर्क नहीं आया था। इस समय एक कीमती धानी पोशाक उनकी खूबसूरती को बढ़ा रही थी और जड़ाऊ जेवरों से उनका बदन भरा हुआ था मगर देखने वाला यही कहेगा कि उन्हें जेवरों की कोई जरूरत नहीं, यह तो हुस्न ही के बोझ से दबी जाती हैं।

उन दोनों के रुआब ने किशोरी को पलंग पर पड़े रहने न दिया। वह उठ खड़ी हुई और उनकी तरफ देखने लगी। रानी साहिबा चाहे कैसी ही खूबसूरत क्यों न हों और उन्हें अपनी खूबसूरती पर चाहे कितना ही घमंड क्यों न हो, मगर किशोरी की सूरत देखते ही वे दंग हो गईं और इनकी शेखी हवा हो गई। इस समय वह हर तरह से सुस्त और उदास थी, किसी तरह की सजावट उसके बदन पर न थी, तो भी महारानी के जी ने गवाही दे दी कि इससे बढ़कर खूबसूरत दुनिया में कोई न होगा। किशोरी उनकी खूबसूरती के रुआब में आकर पलंग के नीचे नहीं उतरी थी बल्कि इज्जत के लिहाज से और यह सोचकर कि जब इस कमरे की इतनी बड़ी सजावट है तो उनके खास कमरे की क्या नौबत होगी और वह कितने बड़े राज्य और दौलत की मालिक होंगी, उठ खड़ी हुई थी।

राजा और रानी दोनों ने प्यार की निगाह से किशोरी की तरफ देखा और राजा ने आगे बढ़कर किशोरी की पीठ पर हाथ फेरकर कहा, ”बेशक यह मेरी ही पतोहू होने के लायक है।”

इस आखिरी शब्द ने किशोरी के साथ वह काम किया जो नमक जख्म के साथ, आग फूस की झोंड़ड़ी के साथ, तीर कलेजे के साथ, शराब धर्म के साथ, लालच ईमान के साथ और बिजली गिरकर तनोबदन के साथ करती है।

बयान – 5

कुंअर इंद्रजीतसिंह नाहरसिंह और तारासिंह को साथ लिए घर आये और अपने छोटे भाई से सब हाल कहा। वे भी सुनकर बहुत उदास हुए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। दोनों कुमार बड़े ही तरद्दुद में पड़े। अगर तारासिंह को पता लगाने के लिए भेजें तो गया में कोई ऐयार न रह जायगा और यह बात अगर उनके पिता सुनें तो बहुत रंज हों, जिसका खयाल उन्हें सबसे ज्यादा था। दो पहर दिन चढ़े तक दोनों भाई बड़े ही तरद्दुद में पड़े रहे, दोपहर बाद उनका तरद्दुद कुछ कम हुआ जब पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह और जगन्नाथ ज्योतिषी वहां आ मौजूद हुए। तीनों के वहां पहुंचने से दोनों कुमार बहुत खुश हुए और समझा कि अब हमारा काम अटका न रहेगा।

कुंअर इंद्रजीतसिंह आनंदसिंह, तारासिंह, पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह और ज्योतिषीजी ये सब बाग की बारहदरी में एकांत समझकर चले गये और बातचीत करने लगे।

आनंद – लीजिए साहब अब तो दुश्मन लोग यहां भी बहुत से हो गये।

ज्योतिषी – कोई हर्ज नहीं।

इंद्र – भैरोसिंह, पहले तुम अपना हाल कहो, यहां से जाने के बाद क्या हुआ

भैरो – मुझे तो रास्ते में ही मालूम हो गया था कि किशोरी वहां नहीं है।

इंद्र – यह सब हाल मुझे भी मालूम हुआ था।

भैरो – ठीक है, वह आदमी आपके पास भी आया होगा जिसने मुझे खबर दी थी।

इंद्र – खैर तब क्या हुआ

भैरो – फिर भी मैं वहां चला गया (बद्रीनाथ और ज्योतिषीजी की तरफ इशारा करके) और इन लोगों के साथ मिलकर काम करने लगा। ये लोग दो सौ बहादुरों के साथ वहां पहले से मौजूद थे। आखिर यह हुआ कि दीवान अग्निदत्त और दो-तीन उसके साथी गिरफ्तार करके चुनार भेज दिये गये। माधवी का पता नहीं कि वह कहां गई, वहां की रियाया सब अग्निदत्त से रंज थी इसलिए राजगृही अपने कब्जे में कर लेना हम लोगों को बहुत ही सहज हुआ। अब उन्हीं दो सौ आदमियों के साथ पन्नालाल को वहां छोड़ आया हूं।

बद्री – आप यहां का हाल भी कहिये। सुना है यहां बड़े-बड़े बेढब मामले हो गये हैं!

इंद्र – यहां का हाल भैरोसिंह की जबानी आपने सुना ही होगा, इसके बाद आज रात को एक अजीब बात हो गई है।

तारासिंह ने रात भर का कुल हाल उन लोगों से कहा जिसे सुन वे लोग बहुत ही तरद्दुद में पड़ गये।

इन लोगों की बातचीत हो रही थी कि एक चोबदार ने आकर अर्ज किया कि ”अखंडनाथ बाबाजी बाहर खड़े हैं और यहां आना चाहते हैं।” अखंडनाथ नाम सुन ये लोग सोचने लगे कि कौन हैं और कहां से आये हैं। आखिर इंद्रजीतसिंह ने उन्हें अपने पास बुलाया और सूरत देखते ही पहचान लिया।

पाठक, ये अखंडनाथ बाबाजी वही हैं जो रामशिला के सामने फलगू के बीच भयानक टीले पर रहते थे, जिनके पास माधवी जाती थी, तथा जिन्होंने उस समय किशोरी की जान बचाई थी जब खंडहर में उसकी छाती पर सवार हो भीमसेन खंजर उसके कलेजे में भोंका ही चाहता था और जिसका कुल हाल इसी भाग के तीसरे बयान में हम लिख आये हैं। इन बाबाजी को तारासिंह भी पहचानते थे क्योंकि कल रात यह भी इंद्रजीतसिंह के साथ ही थे।

इंद्रजीतसिंह ने उठकर बाबाजी को प्रणाम किया। इनको उठते देख और सब लोग भी उठ खड़े हुए। कुमार ने अपने पास बाबाजी को बैठाया और ऐयारों की तरफ देख के कहा, ”इन्हीं का हाल मैं कह चुका हूं, इन्होंने ही उस खंडहर में किशोरी की जान बचाई थी।”

बाबा – जान बचाने वाला तो ईश्वर है मैं क्या कर सकता हूं। खैर, यह तो कहिये उस मामले के बाद की भी आपको खबर है कि क्या हुआ!

इंद्रजीत – कुछ भी नहीं, हम लोग इस समय इसी सोच-विचार में पड़े हैं।

बाबा – अच्छा तो फिर मुझसे सुनिये। दो औरतें और जो उस मकान में थीं उनका हाल तो मुझे मालूम नहीं कि किशोरी की खोज में कहां गईं, मगर किशोरी का हाल मैं खूब जानता हूं।

बाबाजी की बातों ने सभों का दिल अपनी तरफ खींच लिया और सब लोग एकाग्र होकर उनकी बातें सुनने लगे। बाबाजी ने यों कहना शुरू किया –

”नाहरसिंह से जब कुमार लड़ रहे थे उस समय भीमसेन के साथियों को जो उसी जगह छिपे हुए थे मौका मिला और वे लोग किशोरी को लेकर शिवदत्तगढ़ की तरफ भागे, मगर ले न जा सके क्योंकि रास्ते ही में रोहतासगढ़1 के राजा के ऐयार लोग छिपे हुए थे जिन लोगों ने लड़कर किशोरी को छीन लिया और रोहतासगढ़ ले गये। किशोरी की खूबसूरती का हाल सुनकर रोहतासगढ़ के राजा ने इरादा कर लिया कि अपने लड़के के साथ उसे ब्याहेगा और बहुत दिन से उसके ऐयार लोग किशोरी की धुन में लगे हुए भी थे। अब मौका पाकर वे लोग अपना काम कर गये। अगर आप लोग जल्द उसके छुड़ाने की फिक्र न करेंगे तो बेचारी के बचने की उम्मीद जाती रहेगी। लड़-भिड़कर रोहतासगढ़ के किले को फतह करना बहुत मुश्किल है, चाहे फौज और दौलत में आप लोग बढ़ के क्यों न हों मगर पहाड़ के ऊपर के उस आलीशान किले के अंदर घुसना बड़ा ही कठिन है मगर फिर भी चाहे जो हो आप लोग हिम्मत न हारें। किशोरी का खयाल चाहे न भी हो मगर यह सोचकर कि आपके समीप का यह मजबूत किला आप ही के

1.रोहतासगढ़ बिहार के इलाके में मशहूर है। यह किला पहाड़ के ऊपर है। उस जमाने में इस किले की लंबाई-चौड़ाई लगभग दस कोस की होगी। बड़े-बड़े राजा लोग भी इसको फतह करने का हौसला नहीं कर सकते थे। आजकल यह इमारत बिल्कुल टूट-फूट गई है तो भी देखने योग्य है।

योग्य है, जरूर मेहनत करनी चाहिए। ईश्वर आपको विजय देगा और जहां तक हो सकेगा मैं आपकी मदद करूंगा।”

बाबाजी की जुबानी सब हाल सुनकर कुंअर इंद्रजीतसिंह बहुत प्रसन्न हुए। एक तो किशोरी का पता लगने की खुशी दूसरे रोहतासगढ़ के राजा से बड़ी भारी लड़ाई लड़कर जवानी का हौसला निकालने और मशहूर किले पर अपना दखल जमाने की खुशी से गद्गद हो गये और जोश भरी आवाज में बाबाजी से बोले –

इंद्रजीतसिंह – बड़े-बड़े वीरों की आत्माएं स्वर्ग से झांककर देखेंगी कि रोहतासगढ़ की लड़ाई कैसी होती है और किस तरह हम लोग उस किले को फतह करते हैं। रोहतासगढ़ का हाल हम बखूबी जानते हैं, मगर बिना कोई सबब हाथ लगे ऐसा इरादा नहीं कर सकते थे।

बाबा – अच्छा एक लोटा जल मंगाइये।

तुरंत जल आया। बाबाजी ने अपनी दाढ़ी नोचकर फेंक दी और मुंह धो डाला। अब तो सभों ने पहचान लिया कि ये देवीसिंह हैं।

पाठक, रामशिला पहाड़ी के सामने भयानक टीले पर रहने वाले बाबाजी से देवीसिंह का मिलना आप भूले न होंगे और आपको यह भी याद होगा कि देवीसिंह से बाबाजी ने कहा था कि ‘कल इस स्थान को हम छोड़ देंगे।’ बस बाबाजी के जाने के बाद देवीसिंह ही उनकी सूरत में उस गद्दी पर जा विराजे और जो कुछ काम किया आप जानते ही हैं। उस दिन बाबाजी की सूरत में देवीसिंह ही थे जिस दिन माधवी ने मिलकर कहा था कि ‘हमारी मदद के लिए भीमसेन आ गया है।’ असली बाबाजी भी उस पहाड़ी पर देवीसिंह से मिल चुके हैं जहां हमने लिखा है कि एक ही सूरत के दो बाबाजी इकट्ठे हुए हैं और उन्हीं बाबाजी की जुबानी रोहतासगढ़ का मामला देवीसिंह ने सुना था।

देवीसिंह ने अपना बिल्कुल हाल दोनों कुमारों से कहा और आखिर में बोले, ”अब रोहतासगढ़ पर हम जरूर चढ़ाई करेंगे।”

इंद्र – बहुत अच्छी बात है, हम लोगों का हौसला भी तभी दिखाई देगा! हां यह तो कहिए नाहरसिंह से कैसा बर्ताव किया जाय

देवी – कौन नाहरसिंह

इंद्र – उस खंडहर में जो मुझसे लड़ा था बड़ा ही बहादुर है। उसने प्रण कर रखा था कि जो मुझे जीतेगा उसी का मैं ताबेदार हो जाऊंगा। अब उसने भीमसेन का साथ छोड़ दिया और हम लोगों के साथ रहने को तैयार है।

देवी – ऐसे बहादुर पर जरूर मेहरबानी करनी चाहिए मगर आज हम उसे आजमावेंगे। आज से उसके लिए एक मकान दे दें और हर तरह के आराम का बंदोबस्त कर दें।

इंद्र – बहुत अच्छा।

कुंअर इंद्रजीतसिंह ने उसी समय नाहरसिंह को अपने पास बुलाया और बड़ी मेहरबानी के साथ पेश आये। एक मकान देकर अपने सेनापति की पदवी उसे दी और भीमसेन को कैद में रखने का हुक्म दिया।

अपने ऊपर कुमार की इतनी मेहरबानी देख नाहरसिंह बहुत प्रसन्न हुआ। कुछ देर तक बातें करता रहा, तब सलाम करके अपने ठिकाने चला गया और सेनापति के काम को ईमानदारी के साथ पूरा करने का उद्योग करने लगा।

आधी रात जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। गलियों और सड़कों पर चौकीदारों के ”जागते रहियो, होशियार रहियो” पुकारने की आवाज आ रही है। नाहरसिंह अपने मकान में पलंग पर लेटा हुआ कोई किताब देख रहा है और सिरहाने शमादान जल रहा है।

नाहरसिंह के हाथ में श्रुति स्मृति या पुराण की कोई पुस्तक नहीं है, उसके हाथ में तस्वीरों की एक किताब है जिसके पन्ने वह उलटता है और एक-एक तस्वीर को देर तक बड़े गौर से देखता है। इन तस्वीरों में बड़े-बड़े राजाओं और बहादुरों की मशहूर लड़ाइयों का नक्शा दिखाया गया है और पहलवानों की बहादुरी और दिलावरों की दिलावरी का खाका उतरा हुआ है जिसे देख-देखकर नाहरसिंह की रगें जोश मारती हैं और वह चाहता है कि ऐसी लड़ाइयों में हमें भी कभी हौसला निकालने का मौका मिले।

तस्वीरें देखते-देखते बहुत देर हो गई और नाहरसिंह की नींद भरी आंखें भी बंद होने लगीं। आखिर उसने किताब बंद करके एक तरफ रख दी और थोड़ी ही देर बाद गहरी नींद में सो गया।

इस मकान के किसी कोने में एक आदमी न मालूम कब का छिपा हुआ था जो नाहरसिंह को सोता जानकर उस कमरे में चला आया और पलंग के पास खड़ा हो उसे गौर से देखने लगा। इस आदमी को हम नहीं पहचानते क्योंकि यह मुंह पर नकाब डाले हुए है। थोड़ी देर बाद अपनी जेब से उसने एक पुड़िया निकाली और एक चुटकी बुकनी नाहरसिंह की नाक के पास ले गया। सांस के साथ धूरा दिमाग में पहुंचा और वह छींक मारकर बेहोश हो गया।

उस आदमी ने अपनी कमर से एक रस्सी खोली और नाहरसिंह के हाथ-पैर मजबूती से बांधकर उसे होशियार करने के बाद तलवार खेंच मुंह पर से नकाब हटा सामने खड़ा हो गया। होश में आते ही नाहरसिंह ने अपने को बेबस और हाथ में नंगी तलवार लिए महाराज शिवदत्त को सामने मौजूद पाया।

शिव – क्यों नाहरसिंह, एक नाजुक समय में हमारे लड़के का साथ छोड़ देना और उसे दुश्मनों के हाथ में फंसा देना क्या तुम्हें मुनासिब था

नाहर – जब तक बहादुर इंद्रजीतसिंह ने मुझ पर फतह नहीं पाई तब तक मैं बराबर तुम्हारे लड़के का साथ देता रहा, जब कुमार ने मुझे जीत लिया था तो अपने कौल के मुताबिक मैंने उनकी ताबेदारी कबूल कर ली। मेरे कौल को तुम भी जानते ही थे।

शिव – जो कुछ तुमने किया है उसकी सजा देने के लिए इस समय मैं मौजूद हूं।

नाहर – खैर ईश्वर की जो मर्जी।

शिव – अब भी अगर तुम हमारा साथ देना मंजूर करो तो छोड़ सकता हूं।

नाहर – यह नहीं हो सकता। ऐसे बहादुर का साथ छोड़ तुम्हारे ऐसे बेईमान का संग करना मुझे मंजूर नहीं।

शिव – (डपटकर और तलवार उठाकर) क्या तुम्हें अपनी जान देना मंजूर है?

नाहर – खुशी से मंजूर है मगर मालिक का संग छोड़ना कबूल नहीं है!

शिव – देखो फिर तुम्हें समझाता हूं, सोचो और मेरा साथ दो!

नाहर – बस, बहुत बकवाद करने की जरूरत नहीं, जो कुछ तुम कर सको कर लो। मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता।

शिवदत्त ने बहुत समझाया और डराया-धमकाया मगर बहादुर नाहरसिंह की नीयत न बदली। आखिर लाचार होकर शिवदत्त ने अपने हाथ से तलवार दूर फेंक दी और नाहरसिंह की पीठ ठोंककर बोला –

”शाबाश बहादुर! तुम्हारे ऐसे जवांमर्द का दिल अगर ऐसा न होगा तो किसका होगा मैं शिवदत्त नहीं हूं, कुमार का ऐयार देवीसिंह हूं, तुम्हें आजमाने के लिए आया था!”

इतना कहकर उन्होंने नाहरसिंह की मुश्कें खोल दीं और वहां से फौरन चले गये। देवीसिंह ने यह हाल दोनों कुमारों से कहकर नाहरसिंह की तारीफ की मगर बहादुर नाहरसिंह ने अपनी जिंदगी भर इस आजमाने का हाल किसी से न कहा।

दूसरे दिन देवीसिंह चुनार चले गये और कह गए कि रोहतासगढ़ की चढ़ाई का बंदोबस्त करके मैं बहुत जल्द आऊंगा।

यह जानकर कि किशोरी को रोहतासगढ़ वाले ले गये हैं कुंअर इंद्रजीतसिंह की बेचैनी हद से ज्यादे बढ़ गई। दम भर के लिए भी आराम करना मुश्किल हो गया, दो ही पहर में सूरत बदल गई। किसी का बुलाना या कुछ पूछना उन्हें जहर-सा मालूम पड़ने लगा। इनकी ऐसी हालत देख भैरोसिंह से न रहा गया, निराले में बैठे उन्हें समझाने लगा।

इंद्र – तुम्हारे समझाने से मेरी हालत किसी तरह बदल नहीं सकती और किशोरी की जान का खतरा जो मुझे लगा हुआ है किसी तरह कम नहीं हो सकता।

भैरो – किशोरी को अगर शिवदत्तगढ़ वाले ले जाते तो बेशक उसकी जान का खतरा था, क्योंकि शिवदत्त रंज के मारे बिना उसकी जान लिये न रहता, मगर अब तो वह रोहतासगढ़ के राजा के कब्जे में है और वह अपने लड़के से उसकी शादी किया चाहता है, ऐसी हालत में किशोरी की जान का दुश्मन वह क्योंकर हो सकेगा

इंद्र – मगर जबर्दस्ती किशोरी की शादी कर दी गई तब क्या होगा

भैरो – हां, अगर ऐसा हो तो जरूर रंज होगा, खैर आप चिंता न करिये, ईश्वर चाहेगा तो पांच ही सात दिन में कुल बखेड़ा तय कर देता हूं।

इंद्र – क्या किशोरी को वहां से ले आओगे

भैरो – रोहतासगढ़ के किले में घुसकर किशोरी को निकाल लाना तो दो-तीन दिन का काम नहीं, इसके अतिरिक्त क्या रोहतासगढ़ का किला ऐयारों से खाली होगा

इंद्र – फिर तुम पांच-सात दिन में क्या करोगे

भैरो – कोई ऐसा काम जरूर करूंगा जिससे किशोरी की शादी रुक जाय।

इंद्र – वह क्या

भैरो – जिस तरह बनेगा वहां के राजकुमार कल्याणसिंह को पकड़ लाऊंगा, जब हम लोगों का फैसला हो जायेगा तब छोड़ दूंगा।

इंद्र – हां अगर ऐसा करो तो क्या बात है!

भैरो – आप चिंता न कीजिए। मैं अभी यहां से रवाना होता हूं, आप किसी से मेरे जाने का हाल न कहिएगा।

इंद्र – क्या अकेले जाओगे

भैरो – जी हां।

इंद्र – वाह! कहीं फंस जाओ तो मैं तुम्हारी राह ही देखता रह जाऊं, कोई खबर देने वाला भी नहीं।

भैरो – ऐसी उम्मीद न रखिए।

कुंअर इंद्रजीतसिंह से वादा करके भैरोसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए, मगर भैरोसिंह का अकेले रोहतासगढ़ जाना इंद्रजीतसिंह को न भाया। उस समय तो भैरोसिंह की जिद से चुप हो रहे मगर उसके बाद कुमार ने सब हाल पंडित बद्रीनाथ से कहकर दोस्त की मदद के लिए जाने का हुक्म दिया। हुक्म पाते ही पंडित बद्रीनाथ भी रोहतासगढ़ रवाना हुए और रास्ते में ही भैरोसिंह से जा मिले।

दो रोज चलकर ये दोनों आदमी रोहतासगढ़1 पहुंचे और पहाड़ के ऊपर चढ़ किले में दाखिल हुए। यह बहुत बड़ा किला पहाड़ पर निहायत खूबी का बना हुआ था और इसी के अंदर शहर भी बसा था जो बड़े-बड़े सौदागरों, महाजनों, व्यापारियों और जौहरियों के कारबार से अपनी चमक-दमक दिखा रहा था। इस शहर की खूबी और सजावट का हाल इस जगह लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती और इतना समय भी नहीं है, हां मौके पर दो-चार दफे पढ़कर इसकी खूबी का हाल पाठक मालूम कर लेंगे।

  1. राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने अपनी किताब जान-जहांनुमा में लिखा है – ”आरे से करीब पचहत्तर मील के दक्खिन-पश्चिम को झुकता हुआ हजार फीट ऊंचे पहाड़ के ऊपर का एक बड़ा ही मजबूत किला ”रोहतासगढ़” जिसका असल नाम ”रोहताश्म” है दस मील मुरब्बा की बसअत में सोन नदी के बाएं किनारे पर उजाड़ पड़ा हुआ है। उसमें जाने के वास्ते सिर्फ एक ही रास्ता दो कोस की चौड़ाई का तंग-सा बना है बाकी सब तरफ वह पहाड़, जंगल और नदियों से ऐसा घिरा हुआ है कि किसी तौर से वहां आदमी का गुजर नहीं हो सकता। उस किले के अंदर दो मंदिर अगले जमाने के अभी मौजूद हैं बाकी सब इमारतें महल, बाग, तालाब वगैरह जिनका अब सिर्फ निशान भर रह गया है मुसलमान बादशाहों के बनाये हुए हें।”

(ग्रंथकर्ता) – मगर अकबर के जमाने में जो ”बिहार” का हाल लिखा गया है उससे मालूम होता है कि यह मुकाम मुसलमानों की अमलदारी के पहले से बना हुआ है।

इस किले के अंदर एक छोटा किला और भी था जिसमें महाराज और उनके आपस वाले रहा करते थे और लोगों में वह महल के नाम से मशहूर था।

इस पहाड़ पर छोटे झरने और तालाब बहुत हैं। ऊपर जाने के लिए केवल एक ही राह है और वह भी बहुत बारीक है। उसके चारों तरफ घना जंगल इस ढंग का है कि जरा भी आदमी कूदा और राह भूलकर कई दिन तक भटकने की नौबत आई। दुश्मनों का और किसी तरह से इस पहाड़ पर चढ़ना बहुत ही मुश्किल है और वह बारीक राह भी इस लायक नहीं कि पांच-सात आदमी से ज्यादा एक साथ चढ़ सकें। भेष बदले हुए हमारे दोनों ऐयार रोहतासगढ़ पहुंचे और वहां की रंगत देखकर समझ गये कि इस किले को फतह करने में बहुत मुश्किल पड़ेंगी।

भैरोसिंह और पंडित बद्रीनाथ मथुरिया चौबे बने हुए रोहतासगढ़ में घूमने और एक-एक चीज को अच्छी तरह देखने लगे। दोपहर के समय एक शिवालय पर पहुंचे जो बहुत ही खूबसूरत और बड़ा बना हुआ था, सभामंडल इतना बड़ा था कि सौ-डेढ़ सौ आदमी अच्छी तरह उसमें बैठ सकते थे। उसके चारों तरफ खुला-सा सहन था जिस पर कई ब्राह्मण और पुजारी बैठे धूप सेंक रहे थे। उन्हीं लोगों के पास जाकर हमारे दोनों ऐयार खड़े हो गये और गरजकर बोले – ”जै जमुना मैया की!”

पुजारियों ने हमारे दोनों चौबों को खातिदारी से बैठाया और बातचीत करने लगे।

एक पुजारी – कहिये चौबेजी, कब आना हुआ

बद्री – बस अभी चले ही तो आते हैं महाराज! पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते थक गये, गला सूख गया, कृपा करके सिल-लुढ़िया दो तो भंग छने और चित्त ठिकाने हो।

पुजारी – लीजिये, सिल-लुढ़िया लीजिये, मसाला लीजिये, चीनी लीजिये, खूब भंग छानिये।

भैरो – भंग मसाला तो हमारे साथ है, आप ब्राह्मणों का क्यों नुकसान करें।

पुजारी – नहीं, नहीं, हमारा कुछ नहीं है, यहां सब चीजें महाराज के हुक्म से मौजूद रहती हैं, ब्राह्मण परदेशी जो कोई आवे सभी को देने का हुक्म है।

बद्री – वाह-वाह, तब क्या बात है! लाइये फिर महाराज की जयजयकार मनावें!

पुजारी ने इन दोनों को सब सामान दिया और इन दोनों ने भंग बनाई, आप भी पी और पुजारियों को भी पिलाई। दोनों ऐयारों ने बातचीत और मसखरेपन से वहां के पुजारियों को अपने बस में कर लिया। बड़े पुजारी बहुत प्रसन्न हुए और बोले, ”चौबेजी महाराज, बड़े भाग्य से आप लोगों के दर्शन हुए हैं। आप लोग दो-चार रोज यहां जरूर रहिये! इसी जगह आपको महाराजकुमार से भी मिलावेंगे और आप लोगों को बहुत कुछ दिलावेंगे। महाराजकुमार बहुत ही हंसमुख, नेक और बुद्धिमान हैं। आप उन्हें देख बहुत प्रसन्न होंगे!”

बद्री – बहुत खूब महाराज, आप लोगों की इतनी कृपा है तो हम जरूर रहेंगे और आपके महाराजकुमार से भी मिलेंगे। वे यहां कब आते हैं

पुजारी – प्रातः और सायंकाल दोनों समय यहां आते हैं और इसी मंदिर में संध्या-पूजा करते हैं।

भैरो – तो आज भी उनके दर्शन होंगे

पुजारी – अवश्य।

यह मंदिर किले की दीवार के पास ही था। इसके पीछे की तरफ एक छोटी-सी लोहे की खिड़की थी जिसकी राह ये लोग किले के बाहर जंगल में जा सकते थे। पुजारी के हुक्म से भंग पीने के बाद दोनों ऐयार उसी राह से जंगल में गए और मैदान होकर लौट आये, पुजारी लोग भी उसी राह से जंगल मैदान गये।

संध्या समय महाराजकुमार भी वहां आये और मंदिर के अंदर दरवाजा बंद करके घंटे भर से ज्यादे देर तक संध्या-पूजा करते रहे। उस समय केवल एक बड़ा पुजारी उस मंदिर में तब तक मौजूद रहा जब तक महाराजकुमार नित्य नेम करते रहे। दोनों ऐयारों ने भी महाराजकुमार को अच्छी तरह देखा मगर पुजारी को कह दिया था कि आज महाराजकुमार को यह मत कहना कि यहां दो चौबे आये हैं, कल सायंकाल को हम लोगों का सामना कराना।

दोनों ऐयारों ने रात भर उसी मंदिर में गुजारा किया और अपने मसखरेपन से पुजारी महाशय को बहुत ही प्रसन्न किया, साथ ही इसके उन्हें इस बात का भी विश्वास दिलाया कि इस पहाड़ के नीचे एक बड़े भारी महात्मा आये हुए हैं, आपको उनसे जरूर मिलावेंगे, हम लोगों पर उनकी बड़ी कृपा रहती है।

सबेरे उठकर इन दोनों ने फिर भंग घोटकर पी और सभों को पिलाने के बाद उसी खिड़की की राह मैदान गये। दोनों ऐयार तो अपनी धुन में थे, महाराजकुमार को यहां से उड़ाने की फिक्र-सोच में रहे थे तथा उसी खिड़की की राह निकल जाने का उन्होंने मौका तजवीजा था, इसलिए मैदान जाते समय इस जंगल को दोनों आदमी अच्छी तरह देखने लगे कि इधर से सीधी सड़क पर निकल जाने का क्योंकर हम लोगों को मौका मिल सकता है। इस काम में उन्होंने दिन भर बिता दिया और रास्ता अच्छी तरह समझ-बूझकर शाम होते-होते मंदिर में लौट आये।

पुजारी – कहिये चौबेजी महाराज! आप लोग कहां चले गये थे

बद्री – अजी महाराज, कुछ न पूछो! जरा आगे क्या बढ़ गये बस जहन्नुम में मिल गये। ऐसा रास्ता भूले कि बस हमारा ही जी जानता है।

भैरो – ईश्वर की ही कृपा से इस समय लौट आये नहीं तो कोई उम्मीद यहां पहुंचने की न थी।

पुजारी – राम-राम, यह जंगल बड़ा ही भयानक है, कई दफे तो हम लोग इसमें भूल गये हैं और दो-दो दिन तक भटकते ही रह गये हैं, आप बेचारे तो नये ठहरे। आइये, बैठिये, कुछ जलपान कीजिये।

भैरो – अजी कहां का खाना कैसा पीना! होश तो ठिकाने ही नहीं हैं, बस भंग पीकर खूब सोवेंगे। घूमते-घूमते ऐसे थके कि तमाम बदन चूर-चूर हो गया। कृपानिधान, आज भी हम लोगों की इत्तिला कुमार से ना कीजिएगा, हम लोग मिलाने लायक नहीं हैं, इस समय तो खूब गहरी छनेगी!!

पुजारी – खैर ऐसा ही सही! (हंसकर) आइये, बैठिये तो।

दोनों ऐयारों ने भंग पी और बाकी लोगों को भी पिलाई। इसके बाद कुछ देर आराम करके बाजार में घूमने-फिरने के लिए गये और अच्छी तरह देख-भालकर लौट आये। सोते समय फिर उन्हीं महात्मा का जिक्र पुजारी से करने लगे जिनसे मिलाने का वादा कर चुके थे और यहां तक उनकी तारीफ की कि पुजारीजी उनसे मिलने के लिए जल्दी करने लगे और बोले, ”यह तो कहिये, कल आप उनके दर्शन करावेंगे या नहीं’

बद्री – जरूर, बस कुमार यहां से संध्या-पूजा करके लौट जायं तो चले चलिये, मगर अकेले आप ही चलिए, नहीं तो महात्मा बड़ा बिगड़ेंगे कि इतने आदमियों को क्यों ले आए। वह जल्दी किसी से मिलने वाले नहीं हैं।

पुजारी – हमें क्या गरज पड़ी है जो किसी को साथ ले जायें, अकेले आपके साथ चलेंगे।

भैरो – बस तभी तो ठीक होगा।

दूसरे दिन जब महाराजकुमार संध्या-पूजा करके लौट गए तो बद्रीनाथ और भैरोसिंह पुजारी को साथ ले वहां से रवाना हुए और पहाड़ के नीचे उतरने के बाद बोले, ”बस अब यहीं बूटी छान लें तब आगे चलें इसीलिए लुटिया लेता आया हूं।

पुजारी – क्या हर्ज है, बूटी छान लीजिए।

बद्री – आपके हिस्से की भी बनाऊं न

पुजारी – इस दोपहर के समय क्या बूटी पिलाइएगा! हमें तो इतनी आदत न थी, आप ही लोगों के सबब दो दिन से खूब पीने में आती है।

बद्री – क्या हर्ज है, थोड़ा-सा पी लीजिएगा।

पुजारी – जैसी आपकी मर्जी।

हमारे बहादुर ऐयारों ने एक पत्थर की चट्टान पर भंग घोंटकर पी और नजर बचा थोड़ी-सी बेहोशी की दवा मिला पुजारी को भी पिलाई। थोड़ी ही देर में पुजारीजी महाराज तो चीं बोल गए और गहरी बेहोशी में मस्त हो गए। दोनों ऐयार उन्हें उठाकर ले गए और एक झाड़ी में छिपा आए।

बद्री – अब क्या करना चाहिए

भैरो – आप यहां रहिए मैं उसी तरकीब से कुमार को उठा लाता हूं।

बद्री – अच्छी बात है, मैं अपने हाथ से इस पुजारी की सूरत तुम्हें बनाता हूं।

भैरो – बनाइए।

पुजारी की सूरत बना बद्रीनाथ को उसी जगह छोड़ भैरोसिंह लौटे। संध्या होने के पहले ही मंदिर में पहुंचे। लोगों ने पूछा, ”कहिये पुजारीजी महात्मा से मुलाकात हुई या नहीं और अकेले क्यों लौटे, चौबेजी कहां रह गए’

नकली पुजारी ने कहा – ”महात्मा से मुलाकात हुई। वाह क्या बात है, महात्मा क्या वह तो पूरे सिद्ध हैं। दोनों चौबों को बहुत मानते हैं। उन्हें तो आने न दिया मगर मैं चला आया। अब चौबेजी कल आवेंगे।”

समय पर महाराजकुमार भी आ पहुंचे और संध्या करने के लिए मंदिर के अंदर घुसे। मामूली तौर पर पुजारी के बदले में नकली पुजारी अर्थात भैरोसिंह मंदिर के अंदर रहे और कुमार के अंदर आने पर भीतर से किवाड़ बंद कर लिया। संध्या करने के समय महाराजकुमार के साथ मंदिर के अंदर घुसकर पुजारी क्या-क्या करते थे यह दोनों ऐयारों ने उनसे बातों-बातों में पहले ही दरियाफ्त कर लिया था। पुजारीजी मंदिर के अंदर बैठे कुछ विशेष काम नहीं करते थे, केवल पूजा का सामान कुमार के आगे जमा कर देते और एक किनारे बैठे रहते थे। चलती समय प्रसादी में माला कुमार को देते थे और वे उसे सूंघ आंखों से लगा उसी जगह रख चले जाते थे। आज इन सब कामों को हमारे ऐयार पुजारीजी ने ही पूरा किया।

इस मंदिर में चारों तरफ चार दरवाजे थे। आगे की तरफ तो कई आदमी और पहरे वाले बैठे रहते थे बाईं तरफ के दरवाजे पर होम करने का कुंड बना हुआ था, दाहिने दरवाजे पर फूलों के कई गमले रखे हुए थे, और पिछला दरवाजा बिल्कुल सन्नाटा पड़ता था।

मंदिर के अंदर दरवाजा बंद करके कुमार संध्या करने लगे। प्राणायाम के समय मौका जानकर नकली पुजारी ने आशीर्वाद में देने वाली फूलों की माला में बेहोशी का धूरा मिलाया। जब कुमार चलने लगे, पुजारी ने माला गले में डाली, कुमार ने उसे गले से निकाल सूंघा और माथे से लगाकर उसी जगह रख दिया।

माला सूंघने के साथ ही कुमार का सिर घूमा और वे बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। भैरोसिंह ने झटपट उनकी गठरी बांधी और पिछले दरवाजे की राह बाहर निकल आये, इसके बाद उसी छोटी खिड़की की राह किले के बाहर हो जंगल का रास्ता लिया और दो ही घंटे में उस जगह जा पहुंचे जहां पंडित बद्रीनाथ को छोड़ गये थे। वे दोनों कुमार कल्याणसिंह को ले गयाजी की तरफ रवाना हुए।

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