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फूलचंद का स्कूटर- कुंदन यादव की कहानी

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      फूलचंद ठेकेदार दोपहर का भोजन करके सोने के बाद उठे, घड़ी की तरफ देखा. साढ़े तीन बजने वाले थे. उन्होंने जल्दी से चेहरा धोया और सुँघनी मंजन करते हुए घर से बाहर चबूतरे पर आए. मंजन करते हुए जब दाईं तरफ नज़र गई तो देखा स्कूटर नहीं था. थोड़ी देर में उनको अपनी निर्माणाधीन साइट पर जाना था . कुल्ला करके मुंह धोते हुए भीतर आए और पत्नी से पूछा राजू स्कूटर ले गया है क्या? पत्नी ने कहा नहीं वो तो ऊपर सो रहा है. चूंकि छोटा बेटा राजू स्कूटर बाइक आदि चलाना सीख ही रहा था इसलिए गाहे बगाहे वो स्कूटर लेकर गायब हो जाता. बेटी रीना टीवी देख रही थी. उन्होंने उससे भी स्कूटर की बाबत भी पूछा कि कोई मांग तो नहीं ले गया , लेकिन कोई सकारात्मक जवाब न देख वे चिंतित हो उठे. नीचे आकर कुर्ता पाजामा पहन बाहर निकले थे

आवभगत

बनारस शहर के दक्षिणी हिस्से में लंका से सामनेघाट होते हुए गंगा नदी के ऊपर बने पीपे के पुल वाले रास्ते में ही शिवधनी सरदार का घर था। खाते पीते परिवार के स्वामी थे । स्वयं विश्वविद्यालय में तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे । एक बांस बल्ली की दुकान थी, जहां निर्माणाधीन मकानों के लिए किराए पर बल्ली पटरे उपलब्ध थे। इसके साथ ही दो-तीन जगह पुश्तैनी जमीन थी । अधिकतर को उन्होंने कई साल पहले बंटाई पर दे रखा था। बंटाईदार भी सालों से फसल कटने के महीने दो महीने के भीतर शिवधनी का हिस्सा पहुंचा देते थे। यद्यपि शिवधनी जानते थे कि बंटाईदार हिस्से में बेईमानी कर रहे हैं, लेकिन वो उसको परमात्मा की कृपा मान हील हुज्जत नहीं करते थे। पत्नी फसल के दिनों में ही बार-बार कहती कि जाकर देख आओ कि कितना अनाज हुआ है। कहीं बेईमानी से कम तो नहीं दे रहे हैं सब? शिवधनी

कोतवाल रामलखन सिंह

कोतवाल रामलखन सिंह अपने कमरे में कुछ उदासी भरी सोच की मुद्रा में बैठे थे. उन्होंने सपने में भी न सोचा था कि जरा से बवाल से कप्तान उन्हें लाइन हाजिर कर देगा. ऐसा भी नहीं था कि वे पहले निलंबित या  लाइन हाजिर नहीं हुए थे. कई बार तो उन्होंने सिर्फ कोतवाल बने रहने के लिए और डीएसपी के प्रमोशन से बचने के लिए भी कोई न कोई कांड करवा दिया, जिससे वे थानेदार या कोतवाल ही रहें. कोतवाल के पद को लेकर उनके मन में मुगलकालीन भारत के कोतवाल जैसी छवि उतर आती थी. अक्सर वे अपनी इस मान्यता को कोतवाली में किसी खाली शाम को लोकल पत्रकारों के बीच साझा करते, “यार देखो पुलिस में सबसे पुराना असरदार पद कोतवाल का ही है. इ सब डीआईजी पीआईजी , एसपी टेसपी तो बाद में आए. अवध में नवाबों के जमाने से कहावत चली आ रही है कि, कोतवाल

कोठे की अक्का

कोठे की अक्का

बाज़ार रोज़ से ज्यादा गर्म था। जिस तरफ देखो रौनक थी। डेनियल यूँ तो हर साल इंडिया आता था पर ऐसे नज़ारे उसे यहाँ कम ही देखने को मिलते थे। वो छः फिट से निकलते कद का, कोई 50 की उम्र का होते हुए भी 35 से ऊपर न लगता था। ऐसा था मानों टॉम क्रूज़ की हाइट बढ़ा दी गयी हो। उसे चावड़ी बाज़ार से निकलते ही दिल्ली बुरी और भीड़ भरी लगने लगती थी। वो दिल्ली के इस इलाके को किसी कसाई मुहल्ले सा समझता था; चारों तरफ़ मुर्गियां दौड़ रही हैं, लोग ज्यादा वजन वाली पहले खरीद रहे हैं। कोठो की श्रखलाओं से गुज़रता वो एक जगह ठिठका। पहली मंज़िल पर एक बमुश्किल 17 साल की लड़की, शरीर के ऊपरी हिस्से में न के बराबर कुछ पहने, चहलकदमी कर रही थी। ठीक उस कोठे के नीचे अच्छी खासी भीड़ जमा थी। कोई रिक्शे वाला उसी भीड़ में से चिल्लाया

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