आप यहाँ हैं
होम > कथा साहित्य > घुमक्कड़ शास्त्र -अध्याय-9-धर्म और घुमक्कड़ी

घुमक्कड़ शास्त्र -अध्याय-9-धर्म और घुमक्कड़ी

किसी-किसी पाठक को भ्रम हो सकता है, कि धर्म और आधुनिक घुमक्कड़ी में विरोध है। लेकिन धर्म से घुमक्कड़ी का विरोध कैसे हो सकता है, जबकि हम जानते हैं कि प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ ही कितने ही धर्मों के संस्‍थापक हुए, और कितनों ने धर्म से संबंधित हो अद्भुत साहस का परिचय देते दुनिया के दूर-दूर के देशों की खाक छानी। फाहियान की यात्रा हमने पढ़ी है, स्‍वेन्चांग और ईचिंग के भी दुर्दम्‍य साहस का परिचय उनकी यात्राओं से पाया है। मार्कोपोलो का उस समय की ज्ञात दुनिया में घूमना और देखी हुई चीजों का सजीव वर्णन आज भी घुमक्कड़ों के हृदय को उल्‍लसित कर देता है।
जिन घुमक्कड़ों ने अपने यात्रा-वृत्तांत लिखे, उनमें भी सबका विवरण हम तक नहीं पहुँचा, लेंकिन उनमें बहुत भारी संख्‍या तो ऐसे घुमक्कड़ों की है, जिन्‍होंने अपना कोई यात्रा-वृत्तांत नहीं लिखा। तिब्‍बत में गये दो सौ से ऊपर भारतीय पंडितों ने कितना कष्‍ट सहा होगा? घुमक्कड़-राज स्‍मृतिज्ञान कीर्ति (1042ई.) ने कितनी साहसपूर्ण यात्रा आज से नौ सौ वर्ष पहले की थी। स्‍मृति ने अपने और दूसरों के लिखे कई संस्कृत ग्रंथों का भोटिया भाषा में अनुवाद किया, जो अब भी सुरक्षित हैं, किंतु उन्‍होंने अपनी यात्रा के बारे में कुछ नहीं लिखा। हमें तिब्‍बत वालों का कृतज्ञ होना चाहिए, जिनके द्वारा स्‍मृतिज्ञान-कीर्ति की कुछ बातें हम तक पहुँचीं। स्‍मृतिज्ञान-कीर्ति मगध के किसी बड़े विद्यापीठ के मेधावी तरुण पंडित थे। उस समय भारत-मही घुमक्कड़-वीरों से विहीन नहीं हुई थी। हमारे तरुणों में दुनिया देखने और वहाँ अपने देश से संदेश पहुँचाने की धुन रहती थी। दुनिया में भी भारत के सांस्‍कृतिक दूतों की माँग थी, क्‍योंकि भारतीय संस्‍कृति का सितारा उस वक्‍त ओज पर था। किसी विद्याप्रेमी तिब्‍बती बौद्ध ने भारत आकर अपने देश ले जाने के लिए पंडितों की खोज की। स्‍मृति और उनका एक तरुण साथी तैयार हो गये। विद्यापीठ के बंधु-बांधवों ने उनके संकल्‍प को जानकर बहुत प्रसन्‍नता प्रकट की और बढ़ी धूमधाम से विदाई दी। स्‍मृति और उनके साथी पैदल चलकर नेपाल पहुँचे। नेपाल में तिब्‍बत ले जाने वाला पुरुष हैजे से मर गया। दोनों तरुण बड़ी कठिनाई में पड़े। उन्‍हें भाषा भी नहीं मालूम थी और जिसके सहारे आए थे, वह संग छोड़कर चल बसा। स्‍मृति ने कहा -हम अपनी नाव डुबा चुके है, पीछे लौटकर परले पार जाने का कोई उपाय नहीं है। मगध में लौटकर लोगों को क्या जवाब देंगे, जब वे कहेंगे – ”आ गये तिब्‍बत में धर्म-विजय करके?” अंत में आगे चलने का निश्‍चय करके दोनों तिब्‍बत के भीतर घुसे। यद्यपि स्‍मृति ने अपने साथी को ठोक-पीटकर वहाँ तक पहुँचाया, तो भी वह उस धातु का नहीं बना था, जिसके कि स्‍मृतिज्ञान-कीर्ति थे। स्‍मृति संस्कृत के धुरंधर पंडित थे, लेकिन वह देख रहे थे कि तिब्‍बती भाषा जाने बिना उनका सारा गुण गोबर है। उन्‍होंने निश्‍चय किया, पहले तिब्‍बती भाषा पर अधिकार प्राप्‍त करना चाहिए। यह कोई मुश्किल बात न थी, बस सब-कुछ छोड़कर तिब्‍बती मानव-समाज में डूब जाने की आवश्‍यकता थी। उस वक्‍त तिब्‍बत में जहाँ-तहाँ संस्कृत के जानने वाले व्‍यक्ति भी मिलते थे, स्‍मृति ने उनका परिचय अपने लिए भारी विघ्‍न समझा। भारत आने वाले मार्ग के पास के गाँव डांग में उन्‍हें इसका हर लगा, वह ब्रह्मपुत्र पार और दो दिन के रास्‍ते पर तानक् चले गये। ग्‍यारहवीं शताब्‍दी के मध्‍य में तानक् के लोग कैसे रहे होंगे, यह इसी से समझा जा सकता है कि आज भी वहाँ के लोग खेती पर नहीं अधिकतर मेषपालन पर गुजारा करते हैं और उनका अधिक समय भी स्‍थायी घरों में नहीं बल्कि काले तंबुओं में बीतता है। स्‍मृति एक फटा-पुराना चीथड़ा लपेटे, बड़ी गरीबी की हालत में तानक् पहुँचे। टूटी-फूटी बोली में मजूरी ढूँढ़ते हुए खाने-कपड़े पर किसी के यहाँ नौकर हो गये। स्‍मृति के मालिक मालकिन अधिक कठोरहृदय के थे, विशेषकर मालकिन तो फूटी आँखों नहीं देखना चाहती थीं कि स्‍मृति एक क्षण भी बिना काम के बैठें। स्‍मृति ने सब कष्‍ट सहते हुए कई साल तानक् में बिताए। तिब्‍बती भाषा को उससे भी अच्छा बोल सकते थे जैसा कि एक तिब्‍बती, साथ ही उन्‍होंने लुक-छिपकर अक्षर और पुस्‍तकों से भी परिचय प्राप्‍त कर लिया था। शायद स्‍मृति और भी कुछ साल अपनी भेड़ों और चमरियों को लिए एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते, परंतु इसी समय किसी तिब्‍बती विद्याप्रेमी को पता लगा। वह स्‍मृति को पकड़ ले गया। स्‍मृति को घुमक्कड़ी का चस्‍का लग गया था, और वह किसी एक खूँटे से बराबर के लिए बँध नहीं सकते थे। स्‍मृति ने फिर अपनी मातृभूमि का मुँह नहीं देखा और नेपाल की सीमा से चीन की सीमा तक कुछ समय जहाँ-तहाँ ठहरते, शिष्‍यों को पढ़ाते और ग्रंथों का अनुवाद करते हुए सारा जीवन बिता दिया। स्‍मृति का बौद्ध-धर्म से अनुराग था। हर एक घुमक्कड़ का स्‍मृति से अनुराग होगा; फिर कैसे हो सकता है कि कोई व्‍यक्ति स्‍मृति के धर्म (बौद्ध धर्म) को अवहेलना की दृष्टि से देखे। एक स्‍मृति नहीं हजारों बौद्ध-स्‍मृति एसिया के कोने-कोने में अपनी हड्डयों को छोड़कर अत्यंत निद्रा में विलीन हो गये। एसिया ही नहीं मकदूनिया, क्षुद्र-एसिया, मिश्र से लेकर बोर्नियो और फिलिपाइन के द्वीपों तक में उनकी पवित्र अस्थियाँ बिखरी पड़ी हैं। बौद्ध ही नहीं उस समय के ब्राह्मण-धर्मी भी कूप-मंडूक नहीं थे, वह भी जीवन के सबसे मूल्‍यवान वर्षों को विद्या और कला के अध्‍ययन में लगाकर बाहर निकल पड़ते थे। रत्‍नाकर की लहरें आज भी उनके साहस की साक्षी हैं। जावा को उन्‍होंने संस्‍कृति का पाठ पढ़ाया। चंपा और कंबोज में एक-से-एक धुरंधर विद्वान् भारतीय घुमक्कड़ पहुँचते रहे। वस्‍तुत: पीछे के तेली के बैलों को ही नहीं बल्कि उस समय के इन घुमक्कड़ों को देखकर कहा गया था – ”एतद्देशप्रसूतस्‍य सकाशादग्रजन्‍मन:। स्‍वं स्‍वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्‍यां सर्वमानवा:॥” आज भी जावा के बड़े-बड़े संस्कृत के शिलालेख, कंबोज के सुंदर गद्य-पद्यमय विशाल अभिलेख हमारे उन यशस्वी घुमक्कड़ों की कीर्ति को अमर किए हुए हैं। लाखों, करोड़ों, अरबों आदमी तब से भारत में पैदा हुए और मर गये, लेकिन ऐसे कीट-पतंगों के जन्‍म से क्या लाभ? ये हमारे घुमक्कड़ थे जो डेढ़ हजार वर्ष पहले साइबेरिया की बाइकाल झील का चक्कर काट आए थे। आज भी भारत का नाम वहाँ उन्‍हीं की तपस्‍या के कारण अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। कोरिया के बज्र पर्वत में जाइए, या जापान के मनोरम कोयासान में, तुंग हुवान् की सहस्र-बुद्ध गुहाओं में जाइए या अफगानिस्‍तान के बामियान में -सभी जगह अपने घुमक्कड़ों के गौरवपूर्ण चिह्न को देखकर हमारी छाती गज-भर हो जाती है, मस्‍तक दुनिया के सामने उन्‍नत और उनके सामने विनम्र विनम्र हो जाता है। जिस भूमि ने ऐसे यशस्वी पुत्रों को पैदा किया, क्या वह आज केवल घरघुसुओं को पैदा करने लायक ही रह गई है? हमारे ये भारती घुमक्कड़ बौद्ध भी थे, ब्राह्मण भी थे। उन्‍होंने एक बड़े पुनीत कार्य के लिए आपस में होड़ लगाई थी और अपने कार्य को अच्छी तरह संपादित भी किया था। धर्म की सभी बातों में विश्‍वास करना किसी भी बुद्धिवादी पुरुष के लिए संभव नहीं हैं, न हर एक घुमक्कड़ के सभी तरह के आचरणों से सहमत होने की आवश्‍यकता है, घुमक्कड़ इस बात को अच्छी तरह से जानता है, इसलिए यह नानात्‍व में एकत्‍व को ढूँढ़ निकालता है। मुझे याद है 1913 की वह शाम, मैं कर्नाटक देश में होसपेट स्‍टेशन पर उतरकर विजय नगरम् के खंडहरों में पहुँचा था – वही, खंडहर, जिसमें किसी समय मानव जीवन की सुंदर मदिरा रही थी, कहीं मणिमणिक्‍य, मुक्‍ता-सुवर्ण से भरी हुई आपण-शालाएँ जगमगा रही थीं, कहीं संगीत और साहित्‍य की चर्चा चल रही थी, कहीं शिल्‍पी अपने हाथ से छूकर जादू की तरह सुंदर वस्‍तुओं का निर्माण कर रहे थे,कहीं नाना प्रकार के पकवान और मिठाइयाँ तैयार करके सजाई हुई थीं, जिनकी सुगंधि से जीन को सिक्‍त होने से रोकना मुश्किल था। आज जो उजड़े दीखते हैं उस समय में वे भव्‍य देवालय थे, जिनकी गंध-धूप से चारों ओर सुगंधि छिटक रही थी और जिनकी बाहर की वीथियों में तरह-तरह की सुगंधित पुष्‍पों की मालाए सामने रखे मालिनें बैठी रहती थीं। इसी सायं काल को तरुणियाँ नवीन परिधान पहले भ्रमर-सदृश काले-चमकीले केश पाशों को सुंदर पुष्‍पों से सजाये अपने यौवन और सौंदर्य से दिशाओं को चमत्‍कृत करते घूमते निकलती थीं। प्राचीन विजयनगर के अतीत के चित्र को अपने मानस नेत्रों से देखता और पैरों से उसके बीहड़ कंकाल में घूमता हुआ मैं एक इमली के पेड़ के नीचे पहुँचा। एक पुराने चबूतरे पर वहाँ एक वृद्ध बैठा था – साधारण आदमी नहीं घुमक्कड़। वृद्ध ने एक तरुण घुमक्कड़ को देखकर कहा – आओ संत, थोड़ा आराम करो। तरुण घुमक्कड़ उसके पास बैठ गया। सामने आग जल रही थी। दक्षिणी अमेरिकी से तीन सौ ही वर्ष पहले आए तंबाकू ने साधारण लोगों के जीवन की ही शुष्‍कता को कुछ हद तक दूर नहीं कर दिया, बल्कि उसके गुणों के कारण आज घुमक्कड़ भी उसके कृतज्ञ हैं। वहाँ आग भी उसी के लिए जल रही थी। नहीं कह सकता, ज्‍येष्‍ठ घुमक्कड़ के पास गाँजा था या नहीं। या नहीं। यह भी नहीं कह सकता, कि उस महीने में तरुण गाँजापान से विरत था या नहीं। खैर, ज्‍येष्‍ठ घुमक्कड़ ने सूखे तमाखू की चिलम भरी और फिर दोनों बारी-बारी से चिलम का दम लगाते देश-देशांतर की बातें करने लगे। थोड़ी देर में एक तीसरा घुमक्कड़ भी आ गया। चिलम कुछ देर से हाथ में आने लगी, किंतु अब गोष्‍ठी में तीन कंठों से बातें निकल रही थीं। सूर्य अस्‍त हो गया, अँधेरा होने की नौबत आई। तीसरे घुमक्कड़ ने तरुण से कहा – ”चलें तुंगभ्रदा के तीर, वहाँ और भी तीन मूर्तियाँ है।” ज्‍येष्‍ठ घुमक्कड़ से एक चिरपरिचित बंधु की तरह विदाई ले तरुण उसके साथ चल पड़ा। जानते हैं वे तीनों घुमक्कड़ कौन से धर्म को मानते थे। उनका सर्वोपरि धर्म या घुमक्कड़ी, किंतु उन्‍होंने अपने-अपने व्‍यक्तिगत धर्म भी मान रखे थे। ज्‍येष्‍ठ घुमक्कड़ एक मुसलमान फकीर, अच्छा घुमक्कड़ था, तरुण घुमक्कड़ इन्‍हीं पंक्तियों का लेखक था, और उस समय शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के पंथों के बीच में लटक रहा था, तथा पूछताछ में थोड़ा ही उदार हो पाया था। तीसरा घुमक्कड़ शायद कोई संन्यासी था। तुंगभद्रा के किनारे पत्‍थर की मढ़ियों और घरों की क्या कमी थी, जब कि विजयनगर की सारी नगरी वहाँ बिखरी हुई थी। मढ़ी नहीं पत्‍थर का ओसारा जैसा था। लड़की की कमी नहीं थी,यह इसी से स्‍पष्ट था कि धुनी में मन-मन-भर के तीन-चार कुंदे लगे हुए थे। उसे प्रदेश में जाड़ा अधिक नहीं होता, तो भी यह पूस-माघ का महीना था। पाँच मूर्तियाँ धुनी के किनारे बैठी हुई थीं। किसी के नीचे कंबल था, किसी के नीचे मृगछाला। दूकान शायद पास में नहीं थी, यदि रही होती तो अवश्य उनमें से किसी ने भी अपने गाँठ के पैसे को खोलने में कम उतावलापन नहीं दिखलाया होता। घुमक्कड़ी का रस यहाँ छल्-छल् बह रहा था, किसी में ‘मैं’ और ‘मेरे’ की भावना न थी, न किसी तरह की चिंता थी। उनमें न जाने कौन कहाँ पैदा हुआ था। घुमक्कड़ जब तक कोई विशेष प्रयोजन न हो, किसी का जन्‍मस्‍थान नहीं पूछते और जात-पाँत पूछना तो घटिया श्रेणी के घुमक्कड़ों में ही देखा जाता है। किसी ने आटे को गूँध दिया और किसी ने बड़े-बड़े टिक्‍कर धुनी की एक ओर हटाई निर्धूम आग में डाल दिये, किसी ने चिलम भरकर भीगी साफी के साथ दोनों हाथों से सर्वज्‍येष्‍ठ पुरुष के हाथ में दिया और उसने ”लेनाहो शंकर, गांजा है न कंकर। कैलाशपति के राजा, दम लगाना हो तो आ जा।” कहकर एक हल्‍की और दूसरी कड़ी टान खींची, फिर मुँह से धुएँ की विशाल राशि को चारो ओर बिखेरते हुए अपने बगल के घुमक्कड़ के हाथ में दे दिया। चिलम इसी तरह घूमती रही, उधर देश-देशांतर की बातें भी होती रहीं। किसी ने किसी नवीन स्‍थान की बातें सुनकर वहाँ जाने का संकल्‍प किया; किसी ने अपने देखे हुए स्‍थानों की बातें कहकर दूसरे का समर्थन किया। भोजन चाहे सूखी रोटी और नमक का ही हो, लेकिन वह कितना मधुर रहा होगा, इसका अनुमान एक घुमक्कड़ ही कर सकता है। बड़ी रात तक इसी तरह घुमक्कड़ों का सत्‍संग चलता रहा। वेदांत, वैराग्‍य का वहाँ कोई नाम नहीं लेता था, न हरिकीर्तन की कोई पूछ थी (अभी हरिकीर्तन की बीमारी बहुत बढ़ी नहीं थी)। घुमक्कड़ जानते हैं, यह दुनिया ठगने की चीज है। प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ इस तरह की प्रवंचना से अलग रहना चाहते हैं। हाँ, तो धर्मों की संकीर्ण सीमाओं को घुमक्कड़ पार कर जाता है, उसके लिए यह भेदभाव तुच्‍छ-सी चीज हैं, तभी तो वहाँ इमली के नीचे मुसलमान घुमक्कड़ ने दो काफिर घुमक्कड़ों का स्वागत किया और तुंगभद्रा के तट पर पाँचों मूर्तियों ने संन्‍यासी, वैरागी का कोई ख्‍याल नहीं रखा। लेकिन घुमक्कड़ की उदारता के रहते हुए भी धर्मों की सीमाएँ हैं, जिनके कारण घुमक्कड़ और ऊपर नहीं उठने पाता। यदि यह नहीं होता तो तरुण घुमक्कड़ को इमली के नीचे रात बिताने में उज्र नहीं होना चाहिए था। आखिर वहाँ धुनी रमाये शाहसाहब दो टिक्‍कर पैदा कर सकते थे, जिसमें एक तरुण को भी मिल जाता। यहाँ आवश्‍यकता थी कि घुमक्कड़ सारे बंधनों को तोड़ फेंकता। वहाँ तक पहुँचने में इन पंक्तियों के लेखक को पंद्रह-सोलह वर्ष और लगे और उसमें सफलता मिली बुद्ध की कृपा से, जिसने हृदय की ग्रंथियों को भिन्‍न कर दिया, सारी समस्याओं को छिन्न कर दिया। ईसाई घुमक्कड़ ब्राह्मण-धर्मी घुमक्कड़ से इस बात में अधिक उदार हो सकता है; मुसलमान फकीर भी घुमक्कड़ी के नशे में चूर होने पर किसी तरह के भेदभाव को नहीं पूछता। लेकिन, सबसे हीरा धर्म घुमक्कड़ के लिए हो सकता है, वह है बौद्ध धर्म, जिसमें न छुआछूत की गुंजाइश है, न जात-पाँत की। वहाँ मंगोल चेहरा और भारतीय चेहरा, एसियाई रंग और सूरोपीय रंग, कोई भेदभाव उपस्थित नहीं कर सकते। जैसे नदियाँ अपने नाम-रूप को छोड़कर समुद्र में एक हो जाती हैं, उसी तरह यह बुद्ध धर्म है। इस धर्म ने घुमक्कड़ों के लिए एसिया के बड़े भाग का दर्वाजा खोल दिया है। चीन में जाओ या जापान में, कोरिया में जाओ या कंबोज में, स्‍याम में जाओ या सिंहल में, तिब्‍बत में जाओ या मंगोलिया में, सभी जगह आत्‍मीयता देखने में आती है। लेकिन घुमक्कड़ को यह आत्‍मीयता किसी संकीर्ण अर्थ में नहीं लेनी चाहिए। उसके लिए चाहे कोई रोमन कैथालिक या ग्रीक संप्रदाय का भिक्षु हो, यदि वह भिक्षुपन की उच्‍च सीढ़ी अर्थात प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ के पद पर पहुँच गया है, तो उसे ईसाई साधु को देखकर उतना ही आनंद होगा जितना अपने संप्रदाय के व्‍यक्ति से मिलकर। उसके बर्ताव में उसी समय बिलकुल अंतर हो जायगा कि कैथालिक साधु तेली का बैल नहीं है और न रेलों तथा जहाजों तक ही गति रखता है। जहाँ उसने अफ्रिका के सेहरा, सीनाई पर्वत की यात्रा की कुछ बातें बतलाई कि दोनों में सगापन स्‍थापित हो गया। साधु सुंदर सिंह के नाम को कौन सम्‍मान से नहीं लेगा। वह एक ईसाई घुमक्कड़ थे और हिमालय के दुर्गम प्रदेशों में बराबर इधर-से-उधर जाते रहने में रस लेते थे। ऐसा ही किसी यात्रा में उन्‍होंने कहीं पर अपने शरीर को छोड़ दिया। साधु सुंदर सिंह के ईसाई के भक्त होने में कौन-सा अंतर पड़ जाता है? घुमक्कड़ वस्‍तुत: धर्म को व्‍यक्तिगत चीज समझता है। धर्मों और संप्रदायों का ऊपरी प्रश्‍न घुमक्कड़ के लिए कोई बात नहीं है। दोनों मध्‍य एसिया में इस्‍लाम के पहुँचने के पहले घुमक्कड़ साधुओं का बोलबाला था। देश-देश के घुमक्कड़ वहाँ पहुँचते थे। दक्षिण से भारतीय, पूर्व से चीनी बौद्ध आते, पश्चिम से नेस्‍तोरी (ईसाई) और मानी-पंथी साधु आते। उनके अलग-अलग मठ और मंदिर भी थे, किंतु साथ ही एक-दूसरे के मंदिर के द्वार भी किसी के लिए बंद नहीं थे। सुदूर उत्तर एसिया की घुमंतू जाति में भी व‍ह बहुत घूमा करते थे। वह भी एक जगह मिलने पर उसी तरह का दृश्‍य उपस्थित करते, जैसा कि उस दिन तुंगभद्रा के किनारे देखने में आया था। लेकिन हजार-ग्‍यारह सौ वर्ष पहले मध्‍य एसिया में इस्‍लाम जैसा कट्टर धर्म पहुँच गया। उसने समझाने की जगह तलवार से काम लेना चाहा। मध्‍य एसिया में ऐसे कई उदाहरण मिले हैं, जब कि बौद्ध, मानी और नेस्‍तोरी पंथ के साधुओं ने एक छत के नीचे रहकर अपना जीवन बिताया और उसी छत के नीचे इस्‍लामी तलवार के नीचे अपनी गर्दनें दे दीं। यहाँ तक कि जब पूर्वी मध्‍य एसिया से बौद्ध साधु भागकर दक्षिण में लदाख के बौद्ध देश में आए, तो वह अपने साथ नेस्‍तोरी बंधुओं को भी लेते आए। इस महान भ्रातृभाव को इस्‍लामी मुल्‍लाओं ने नहीं समझ पाया। आगे चलकर उनमें घुमक्कड़ी का बीज जब जमने लगा, तो सभी धर्मों के साथ सहिष्‍णुता भी उनके फकीरों में आने लगी। धर्मों के संबंध में घुमक्कड़ का क्या भाव होना चाहिए, यह ऊपर के कथन से स्‍पष्‍ट हो गया होगा। घुमक्कड़ी व्रत और संकीर्ण सांप्रदायिकता एक साथ नहीं चल सकती। प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ को हम श्रेष्‍ठ पुरुष मानते हैं। वह मानव-मानव में संकीर्ण भेदभाव को नहीं पसंद करता। सभी धर्मों ने मानवता की जो अमूल्‍य सेवाएँ भिन्‍न-भिन्‍न क्षेत्रों में की हैं, उसकी वह कदर करता है, यद्यपि धर्मांधों को वह क्षमा नहीं कर सकता। सभी धर्मों ने केवल देववाद और पूजा-पाखंड तक ही अपने कर्तव्‍य की इतिश्री नहीं समझी। उन्‍होंने अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उच्‍च साहित्‍य का सृजन किया, उच्‍चकला का निर्माण किया, वहाँ के लोगों के मानसिक विकास के तल को ऊँचा किया, साथ ही आर्थिक साधनों को भी उन्‍नत बनाने में सहायता की। यही सेवाएँ हैं, जिनके कारण तत्तद्-देशों में अपने-अपने धर्म के प्रति विशेष सद्भाव और प्रेम देखा जाता है, तथा कोई अपने ऐसे सेवक धर्म को सहसा छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। जिस तरह धर्मों ने सारे देश और जाति की सेवा की है, उसी तरह उसने घुमक्कड़ी आदर्श के विकास और विस्‍तार में भी भाग लिया है। इसलिए धर्मों की सारी निर्दोष भावनाओं और प्रवृत्तियों के प्रति घुमक्कड़ की सहानुभूति होती है। हो सकती है, घुमक्कड़ का किसी एक धर्म के प्रति अधिक सम्‍मान हो, किंतु अनेक बार घुमक्कड़ को सभी रूपों में देखा जा सकता है। इसे सिद्धांतहीनता नहीं कहा जा सकता। सिद्धांतहीनता तो तब हो, जब घुमक्कड़ अपने उक्‍त सद्भाव को छिपाना चाहें। लेकिन आजकल ऐसे भी घुमक्कड़ मिल सकते हैं जो धर्म से बिलकुल संबंध नहीं रखते। ऐसा घुमक्कड़ बुरा नहीं कहा जा सकता, बल्कि आजकल तो कितने ही प्रथम श्रेणी के घुमक्कड़ इसी तरह के विचार के होते हैं। विस्‍तृत भूखंड की यात्रा करने और शताब्दियों के अपरिमित ज्ञान के आलोड़न करने पर वह धर्मों से संन्यास ले सकते हैं, तो भी उच्‍चतम घुमक्कड़ी आदर्श को जो अपने जीवन का अंग बनाते हैं, वह सबसे अधिक अपने घुमक्कड़ बंधुओं और सारी मानवता के हितैषी होते हैं। समय पड़ने पर नास्तिक घुमक्कड़ अपने विचारों को स्‍पष्‍ट करते नहीं हिचकिचाता, किंतु साथ ही सच्‍चे भाव से धर्म में श्रद्धा रखने वाले किसी अपने घुमक्कड़ बंधु के दिल को वह कठोर वाग्वाण का लक्ष्‍य भी नहीं बना सकता। उसका लक्ष्‍य है, सबको मित्रतापूर्ण दृष्टि से देखना।
(Visited 3 times, 1 visits today)

Leave a Reply

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top
%d bloggers like this: