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हाहाकार – रामधारी सिंह दिनकर

दिव की ज्वलित शिखा सी उड़ तुम जब से लिपट गयी जीवन में,
तृषावंत मैं घूम रहा कविते ! तब से व्याकुल त्रिभुवन में !

उर में दाह, कंठ में ज्वाला, सम्मुख यह प्रभु का मरुथल है,
जहाँ पथिक जल की झांकी में एक बूँद के लिए विकल है।

घर-घर देखा धुआं पर, सुना, विश्व में आग लगी है,
‘जल ही जल’ जन-जन रटता है, कंठ-कंठ में प्यास जगी है।

सूख गया रस श्याम गगन का एक घुन विष जग का पीकर,
ऊपर ही ऊपर जल जाते सृष्टि-ताप से पावस सीकर !

मनुज-वंश के अश्रु-योग से जिस दिन हुआ सिन्धु-जल खारा,
गिरी ने चीर लिया निज उर, मैं ललक पड़ा लख जल की धारा।

पर विस्मित रह गया, लगी पीने जब वही मुझे सुधी खोकर,
कहती- ‘गिरी को फाड़ चली हूँ मैं भी बड़ी विपासित होकर’।

यह वैषम्य नियति का मुझपर, किस्मत बढ़ी धन्य उन कवि की,
जिनके हित कविते ! बनतीं तुम झांकी नग्न अनावृत छवि की ।

दुखी विश्व से दूर जिन्हें लेकर आकाश कुसुम के वन में,
खेल रहीं तुम अलस जलद सी किसी दिव्य नंदन-कानन में।

भूषन-वासन जहाँ कुसुमों के, कहीं कुलिस का नाम नहीं है।
दिन-भर सुमन-हार-गुम्फन को छोड़ दूसरा काम नहीं है।

वही धन्य, जिनको लेकर तुम बसीं कल्पना के शतदल पर,
जिनका स्वप्न तोड़ पाती है मिटटी नहीं चरण-तल बजकर !

मेरी भी यह चाह विलासिनी ! सुन्दरता को शीश झुकाऊं,
जिधर-जिधर मधुमयी बसी हो, उधर वसंतानिल बन जाऊं !

एक चाह कवि की यह देखूं, छिपकर कभी पहुँच मालिनी तट,
किस प्रकार चलती मुनिबाला यौवनवती लिए कटी पर घट !

झांकूं उस माधवी-कुंज में, जो बन रहा स्वर्ग कानन में;
प्रथम परस की जहाँ लालिमा सिहर रही तरुणी- आनन में ।

जनारण्य से दूर स्वप्न में मैं भी निज संसार बसाऊँ,
जग का आर्त्तनाद सुन अपना हृदय फाड़ने से बच जाऊँ ।

मिट जाती ज्यों किरण बिहँस सारा दिन कर लहरों पर झिल–मिल,
खो जाऊँ त्यों हर्ष मनाता, मैं भी निज स्वप्नों से हिलमिल ।

पर, नभ में न कुटी बन पाती, मैंने कितनी युक्ति लगायी,
आधी मिटती कभी कल्पना, कभी उजड़ती बनी-बनायी ।

रह-रह पंखहीन खग-सा मैं गिर पड़ता भू की हलचल में ;
झटिका एक बहा ले जाती स्वप्न-राज्य आँसू के जल में ।

कुपित देव की शाप-शिखा जब विद्युत् बन सिर पर छा जाती,
उठता चीख हृदय विद्रोही, अन्ध भावनाएँ जल जातीं ।

निरख प्रतीची-रक्त-मेघ में अस्तप्राय रवि का मुख-मंडल,
पिघल-पिघल कर चू पड़ता है दृग से क्षुभित, विवश अंतस्तल ।

रणित विषम रागिनी मरण की आज विकट हिंसा-उत्सव में;
दबे हुए अभिशाप मनुज के लगे उदित होने फिर भव में ।

शोणित से रंग रही शुभ्र पट संस्कृति निठुर लिए करवालें,
जला रही निज सिंहपौर पर दलित-दीन की अस्थि मशालें।

घूम रही सभ्यता दानवी, ‘शांति ! शांति !’ करती भूतल में,
पूछे कोई, भिगो रही वह क्यों अपने विष दन्त गरल में।

टांक रही हो सुई चरम पर, शांत रहें हम, तनिक न डोलें,
यही शान्ति, गर्दन कटती हो, पर हम अपनी जीभ न खोलें ?

बोलें कुछ मत क्षुधित, रोटियां श्वान छीन खाएं यदि कर से,
यही शांति, जब वे आयें, हम निकल जाएँ चुपके निज घर से ?

हमीं पढ़ें पाठ संस्कृति के खड़े गोलियों की छाया में;
यही शान्ति, वे मौन रहें जब आग लगे उनकी काया में ?

चूस रहे हों दनुज रक्त, पर, हों मत दलित प्रबुद्ध कुमारी !
हो न कहीं प्रतिकार पाप का, शांति या कि यह युद्ध कुमारी !

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है,
छूटे कभी संग बैलों का , ऐसा कोई याम नहीं है।

मुख में जीभ, शक्ति भुज में, जीवन में सुख का नाम नहीं है,
वसन कहाँ ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है।

विभव-स्वप्न से दूर, भूमि पर यह दुखमय संसार कुमारी!
खलिहानों में जहाँ मचा करता है हाहाकार कुमारी!

बैलों के ये बंधू वर्ष भर, क्या जाने, कैसे जीते हैं ?
बंधी जीभ, आँखे विषष्ण, गम खा, शायद आंसू पीते हैं।

पर, शिशु का क्या हाल, सीख पाया न अभी जो आंसू पीना ?
चूस-चूस सूखा स्तन माँ का सो जाता रो-विलप नगीना।

विवश देखती माँ, अंचल से नन्ही जान तड़प उड़ जाती,
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती।

कब्र-कब्र में अबुध बालकों की भूखी हड्डी रोती है,
‘दूध-दूध !’ की कदम कदम पर सारी रात सदा होती है।

‘दूध-दूध !’ ओ वत्स ! मंदिरों में बहरे पाषाण यहाँ हैं,
‘दूध-दूध !’ तारे, बोलो, इन बच्चों के भगवान् कहाँ हैं ?

‘दूध-दूध !’ दुनिया सोती है, लाऊं दूध कहाँ, किस घर से ?
‘दूध-दूध !’ हे देव गगन के ! कुछ बूँदें टपका अम्बर से !

‘दूध-दूध !’ गंगा तू ही अपने पानी को दूध बना दे,
‘दूध-दूध !’ उफ़ ! है कोई, भूखे मुर्दों को जरा मना दे ?

‘दूध-दूध !’ फिर ‘दूध !’ अरे क्या याद दुख की खो न सकोगे ?
‘दूध-दूध !’ मरकर भी क्या तुम बिना दूध के सो न सकोगे ?

वे भी यहीं, दूध से जो अपने श्वानों को नहलाते हैं।
वे बच्चे भी यही, कब्र में ‘दूध-दूध !’ जो चिल्लाते हैं।

बेक़सूर, नन्हे देवों का शाप विश्व पर पड़ा हिमालय !
हिला चाहता मूल सृष्टि का, देख रहा क्या खड़ा हिमालय ?

‘दूध-दूध !’ फिर सदा कब्र की, आज दूध लाना ही होगा,
जहाँ दूध के घड़े मिलें, उस मंजिल पर जाना ही होगा !

जय मानव की धरा साक्षिणी ! जय विशाल अम्बर की जय हो !
जय गिरिराज ! विन्ध्यगिरी, जय-जय ! हिंदमहासागर की जय हो !

हटो व्योम के मेघ ! पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं,
‘दूध, दूध ! …’ ओ वत्स ! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं !

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