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हींगवाला- सुभद्राकुमारी चौहान

लगभग 35 साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी – अम्मा… हींग लोगी?”
पीठ पर बँधे हुए पीपे को खोलकर उसने, नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया । भीतर बरामदे से नौ – दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया – अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ !”

पर खान भला क्यों जाने लगा ? जरा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- अम्मा, हींग ले लो, अम्मां ! हम अपने देश जाता हैं, बहुत दिनों में लौटेगा ।”  सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली – हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान ! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी ।”
वह उसी स्वर में फिर बोला-हेरा हींग है मां, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती है । एक ही तोला ले लो, पर लो जरूर ।इतना कहकर फौरन एक डिब्बा सावित्री के सामने सरकाते हुए कहा- तुम और कुछ मत देखो मां, यह हींग एक नंबर है, हम तुम्हें धोखा नहीं देगा ।
सावित्री बोली- पर हींग लेकर करूंगी क्या ढेर-सी तो रखी है ।खान ने कहा-कुछ भी ले लो अम्मां! हम देने के लिए आया है, घर में पड़ी रहेगी । हम अपने देश कूं जाता है । खुदा जाने, कब लौटेगा ?” और खान बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हींग तोलने लगा । इस पर सावित्री के बच्चे नाराज हुए । सभी बोल उठे-मत लेना मां, तुम कभी न लेना । जबरदस्ती तोले जा रहा है ।सावित्री ने किसी की बात का उत्तर न देकर, हींग की पुड़िया ले ली । पूछा-कितने पैसे हुए खान ?”

पैंतीस पैसे अम्मां!खान ने उत्तर दिया । सावित्री ने सात पैसे तोले के भाव से पांच तोले का दाम, पैंतीस पैसे लाकर खान को दे दिए । खान सलाम करके चला गया । पर बच्चों को मां की यह बात अच्छी न लगीं ।
बड़े लड़के ने कहा-मां, तुमने खान को वैसे ही पैंतीस पैसे दे दिए । हींग की कुछ जरूरत नहीं थी ।”  छोटा मां से चिढ़कर बोला-दो मां, पैंतीस पैसे हमको भी दो । हम बिना लिए न रहेंगे ।लड़की जिसकी उम्र आठ साल की थी, बड़े गंभीर स्वर में बोली-तुम मां से पैसा न मांगो । वह तुम्हें न देंगी । उनका बेटा वही खान है ।सावित्री को बच्चों की बातों पर हँसी आ रही थी । उसने अपनी हँसी दबाकर बनावटी क्रोध से कहा-चलो-चलो, बड़ी बातें बनाने लग गए हो । खाना तैयार है, खाओ ।
छोटा बोला- पहले पैसे दो । तुमने खान को दिए हैं ।
सावित्री ने कहा- खान ने पैसे के बदले में हींग दी है । तुम क्या दोगे?” छोटा बोला- मिट्टी देंगे ।” सावित्री हँस पड़ी- अच्छा चलो, पहले खाना खा लो, फिर मैं रुपया तुड़वाकर तीनों को पैसे दूंगी ।”
खाना खाते-खाते हिसाब लगाया । तीनों में बराबर पैसे कैसे बंटे ? छोटा कुछ पैसे कम लेने की बात पर बिगड़ पड़ा-कभी नहीं, मैं कम पैसे नहीं लूंगा!दोनों में मारपीट हो चुकी होती, यदि मुन्नी थोड़े कम पैसे स्वयं लेना स्वीकार न कर लेती । 
कई महीने बीत गए । सावित्री की सब हींग खत्म हो गई । इस बीच होली आई । होली के अवसर पर शहर में खासी मारपीट हो गई थी । सावित्री कभी- कभी सोचती, हींग वाला खान तो नहीं मार डाला गया? न जाने क्यों, उस हींग वाले खान की याद उसे प्राय: आ जाया करती थी । एक दिन सवेरे-सवेरे सावित्री उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठी कुछ बुन रही थी । उसने सुना, उसके पति किसी से कड़े स्वर में कह रहे हैं- क्या काम है ?’ भीतर मत जाओ । यहाँ आओ । ” उत्तर मिला-हींग है, हेरा हींग । और खान तब तक आंगन मैं सावित्री के सामने पहुँच चुका था । खान को देखते ही सावित्री ने कहा- बहुत दिनों में आए खान ! हींग तो कब की खत्म हो गई ।” 
खान बोला- अपने देश गया था अम्मां, परसों ही तो लौटा हूँ । सावित्री ने कहा- यहाँ तो बहुत जोरों का दंगा हो गया है ।”  खान बोला-सुना, समझ नहीं है लड़ने वालों में ।”
सावित्री बोली-खान, तुम हमारे घर चले आए । तुम्हें डर नहीं लगा ?”
दोनों कानों पर हाथ रखते हुए खान बोला-ऐसी बात मत करो अम्मां । बेटे को भी क्या मां से डर हुआ है, जो मुझे होता ?” और इसके बाद ही उसने अपना डिब्बा खोला और एक छटांक हींग तोलकर सावित्री को दे दी । रेजगारी दोनों में से किसी के पास नहीं थी । खान ने कहा कि वह पैसा फिर आकर ले जाएगा । सावित्री को सलाम करके वह चला गया ।
इस बार लोग दशहरा दूने उत्साह के साथ मनाने की तैयारी में थे । चार बजे शाम को मां काली का जुलूस निकलने वाला था ।  पुलिस का काफी प्रबंध था । सावित्री के बच्चों ने कहा- “हम भी काली का जुलूस देखने जाएंगे ।”
सावित्री के पति शहर से बाहर गए थे । सावित्री स्वभाव से भीरु थी । उसने बच्चों को पैसों का, खिलौनों का, सिनेमा का, न जाने कितने प्रलोभन दिए पर बच्चे न माने, सो न माने । नौकर रामू भी जुलूस देखने को बहुत उत्सुक हो रहा था । उसने कहा-  “भेज दो न मां जी, मैं अभी दिखाकर लिए आता हूँ ।”  लाचार होकर सावित्री को जुलूस देखने के लिए बच्चों को बाहर भेजना पड़ा । उसने बार-बार रामू को ताकीद की कि दिन रहते ही वह बच्चों को लेकर लौट आए ।
बच्चों को भेजने के साथ ही सावित्री लौटने की प्रतीक्षा करने लगी । देखते-ही-देखते दिन ढल चला । अंधेरा भी बढ़ने लगा, पर बच्चे न लौटे अब सावित्री को न भीतर चैन था, न बाहर । इतने में उसे -कुछ आदमी सड़क पर भागते हुए जान पड़े । वह दौड़कर बाहर आई, पूछा-ऐसे भागे क्यों जा रहे हो ? जुलूस तो निकल गया न ।”
एक आदमी बोला-दंगा हो गया जी, बडा भारी दंगा!सावित्री के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए । तभी कुछ लोग तेजी से आते हुए दिखे । सावित्री ने उन्हें भी रोका । उन्होंने भी कहा-दंगा हो गया है!
अब सावित्री क्या करे ? उन्हीं में से एक से कहा-भाई, तुम मेरे बच्चों की खबर ला दो । दो लड़के हैं, एक लड़की । मैं तुम्हें मुंह मांगा इनाम दूंगी ।एक देहाती ने जवाब दिया-क्या हम तुम्हारे बच्चों को पहचानते हैं मां जी ? ” यह कहकर वह चला गया ।
सावित्री सोचने लगी, सच तो है, इतनी भीड़ में भला कोई मेरे बच्चों को खोजे भी कैसे? पर अब वह भी करें, तो क्या करें? उसे रह-रहकर अपने पर क्रोध आ रहा था । आखिर उसने बच्चों को भेजा ही क्यों ? वे तो बच्चे ठहरे, जिद तो करते ही, पर भेजना उसके हाथ की बात थी । सावित्री पागल-सी हो गई । बच्चों की मंगल-कामना के लिए उसने सभी देवी-देवता मना डाले । शोरगुल बढ़कर शांत हो गया । रात के साथ-साथ नीरवता बढ़ चली । पर उसके बच्चे लौटकर न आए । सावित्री हताश हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी । उसी समय उसे वही चिरपरिचित स्वर सुनाई पड़ा- “अम्मा!
सावित्री दौड़कर बाहर आई उसने देखा, उसके तीनों बच्चे खान के साथ सकुशल लौट आए हैं । खान ने सावित्री को देखते ही कहा-वक्त अच्छा नहीं हैं अम्मां! बच्चों को ऐसी भीड़-भाड़ में बाहर न भेजा करो ।बच्चे दौड़कर मां से लिपट गए ।
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