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कबीर का रहस्यवाद

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भक्ति को रहस्यवाद से जोड़ा है और इसे एक प्रतिक्रियावादी दर्शन मानकर कबीर की आलोचना की है. शुक्लजी के मत की समीक्षा करने से पहले आवश्यक है कि रहस्यवाद को समझा जाय.
आमतौर पर उस कथन या अनुभव को रहस्यवाद की संज्ञा दी जाती है, जिसमें अज्ञात ब्रह्म की अनुभूति शामिल है. महादेवी वर्मा ने ज्ञात अपूर्ण से अज्ञात  पूर्ण के तादात्मय को रहस्यवाद की संज्ञा दी है. इस अर्थ में रहस्यवाद वस्तुतः आत्म चेतना से विश्व चेतना का एकीकरण है. मध्यकालीन यूरोप में सेन्ट थेरेसा जैसे रहस्यवादी सन्तों ने सामंती जकड़न और चर्च की अनीतियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया था. कबीर के जीवन और उनके सम्पूर्ण साहित्य को देखें, तो उनकी स्थिति मध्यकालीन यूरोपीय रहस्यवादी संतों जैसी ही है. निश्चय ही यह प्रतिक्रियावाद नहीं है. रहस्यवादी अनुभूति के कारण कबीर को प्रतिक्रियावादी कहना शुक्ल जी का अन्याय ही प्रतीत होता है.
                इसमें कोई शक नहीं कि कबीर की भक्ति रहस्यवादी भक्ति है. कबीर के यहाँ रहस्यवाद ईश्वर के स्वरूप, उसकी अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति तीनों स्तरों पर देखा जा सकता है. उपनिषदों में ब्रह्म को अपरोक्ष अनुभूति कहा गया है- यत साक्षात् अपरोक्षानुभूति ब्रह्म. अनुभूति अपने-आप में रहस्य है, क्योंकि अनुभूति गोपन होती है. ब्रह्म की अपरोक्ष अनुभूति तो रहस्य के सिवा कुछ हो भी नहीं सकती. इस ब्रह्म को शब्दों से समझाया नहीं जा सकता, क्योंकि शब्द विकल्प मात्र होते है, जबकि ब्रह्म निर्विकल्प है. सीमित व्याप्ति वाले शब्द असीम ब्रह्म की व्याख्या नहीं कर सकते. कबीर तर्को, प्रतीकों और उपमानों के सहारे इस ब्रह्म को समझाने की कोशिश करते हैं, परन्तु थक हार कर कह बैठते है-

बोलन का कहिए रे भाईबोलत-बोलत तत्व नसाई.

अन्डर हिल्स ने रहस्यवाद की पांच अवस्थायें बताई है-
  1.       परिवर्तन
  2.        आत्मज्ञान
  3.        उद्भाषण
  4.       आत्मसमर्पण
  5.        मिलन

कबीर के यहाँ रहस्यवाद की ये पांचों अवस्थायें इसी क्रम में देखी जा सकती है.
सांसारिक मोह-माया से ग्रस्त जीव का ब्रह्म की ओर उन्मुख होना ही परिवर्तन है. यह एक अध्यात्मिक जागरण है, जिससे सांसारिक कर्मों में लगा जीव अपने जीवन की निस्तरता को समझ कर ब्रह्म की ओर उन्मुख होता है. कबीर के यहाँ परिवर्तन की भूमिका गुरु निभाता है. गुरु की महिमा पर कबीर ने सर्वाधिक बल दिया है क्योंकि गुरु ही वह शक्ति है जो सांसारिक जीव को सही राह पर डालती है-

कबीर लागा जाई था, लोक वेद के साथआगे थे सद्गुरु मिल्या, दीपक दिया हाथ.

गुरु की महत्ता कबीर की नजर में इतनी अधिक है कि कई बार वे उसे गोविन्द के बरवस भी रख देते है-

गुरु गोविनद दोउ खड़े काके लागू पांवबलिहारी गुरु आपणों, जो गोविन्द दिये बताय.

कबीर के यहाँ गुरु साधन भी और मंजिल भी. साधक गुरू की बताई राह पर चलकर ब्रह्म तक पहुंचता है. इस अवस्था में गुरु साधन की भूमिका निभाता है लेकिन जैसे ही ब्रह्म के साथ साक्षात्कार होता है, कबीर को गुरु और गोविन्द में कोई फर्क नजर नहीं आता-

                ‘गुरु गोविन्द तो एक है, दूजा यह आकार

यहाँ पहुंच कर साधन की भूमिका निभाने वाला गुरु मंजिल बन जाता है.
गुरु की बताई राह पर चलकर जीव की आत्मज्ञान होता है उसे इस संसार में अपनी वास्तविक स्थिति का पता चलता है. वह समझ जाता है कि उसका अस्तित्व ब्रह्म से विच्युत एक स्फुलिंग से ज्यादा कुछ नहीं है. उसका अन्तिम लक्ष्य ब्रह्म के साथ तदाकार हो जाना है. इस अवस्था में जीव आचरण की शुद्धता, नैतिक पवित्रता आदि के द्वारा अपने हृदय को निर्मल बनाता है, क्येांकि निर्मल हृदय में ही ईश्वर का प्रतिबम्बन हो सकता है.
                ईश्वरोन्मुख आत्मा का ब्रह्म के साथ साक्षात्कार उद्भाषण है. यहाँ जीव का ब्रह्म के साथ एकीकरण हो जाता है. ब्रह्म के सिवाय साधक को कुछ और दिखाई नहीं देता है. यह परम आनन्द  की अनुभूति है-

                                पारब्रह्म के तेज का कैसा है उन्मान
                                कहिबे की सोभा नहीं देखा है परमाण

साधक अब दिन-रात इसी स्थिति में रहना चाहता हैं यह जागरण की अवस्था है. निद्रा विस्मृति है ब्रह्म से, ब्रह्म के स्मरण से. यहाँ जागरण की अवस्था में साधक दिन-रात ब्रह्म का समरण करता है. साधक और ब्रह्म के बीच से माया का पर्दा छंटने लगता है.

                संतों आयी ज्ञान की आंधी       भ्रम की टांटी सबै उड़ानी     माया रहे न बांधी रे.

यह प्रेम की अनन्य अनुभूति की अवस्था है. साधक को ब्रह्म के सिवाय और कुछ नहीं दिखता. वह दिन-रात ब्रह्म के ख्यालों में खोया रहता है. अपने अहम् का विसर्जन कर साधक स्वयं को ब्रह्म के प्रति समर्पित कर देता है. कबीर की रहस्यवादी साधना प्रेम की साधना है. प्रेम पर जितना बल कबीर ने दिया है, उतना शायद ही किसी और ने दिया हो. कबीर का यह प्रेम निःशर्त प्रेम है. वहाँ पहुंचने के लिए अहम् का त्याग आवश्यक है-

                कबीर यह घर प्रेम का
      खाला का घर नाहिं
      सीस उतारे भू धरे
      तब पैठे घर माहि.

कबीर का प्रेम का ढाई अक्षर राम राम ही है. अपने अराध्य के प्रति, अपने प्रिय के प्रति यह अगाध समर्पण कबीर की भक्ति को दास्य भक्ति से भी जोड़ती है-

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊं                गले राम की जेवड़ी जित खीचे तित जाऊं.

अहम के विगलन के कारण कबीर के अपने व्यक्तित्व का लोप हो गया है. अब उनके चारों ओर हरि ही हरि है-

                जब मैं था तब हरि नहीं
                अब हरि हैं मैं नाहिं.

कबीर के प्रेम की चरम पराकाष्ठा विरह में दिखाई देती है. विरह में कबीर की मार्मिक पुकार ब्रह्म को आने के लिए विवश कर देती हैं. शुक्ल जी ने रहस्यवाद को शुष्कता की भूमि कहा है, परन्तु कबीर के विरह  वर्णन की मार्मिकता से शायद उन्हें भी इन्कार नहीं होगा-

                अख्ड़या झाई पड़ी पंथ निहारि-निहारि.
                जीभड़या छाला पड़ा नाम पुकारी-पुकारी.

कबीर को ब्रह्म के विरह में कहीं भी चैन नहीं है. वह बार-बार लगातार अनथक उसे याद करते है. उसके बिना न नींद है न चैन-

अन्न न भावें, नींद न आवे, गृहबन धरे न धीर रे.

                विरह की पराकाष्ठा के बाद कबीर का ब्रह्म से मिलन होता है. अब कबीर और उनके राम में कोई अंतर नहीं रह जाता है. यह ब्रह्म से एकीकरण की अवस्था है-

                मेरी बिलगी बिलगायी हो
                कोई कहे कबीर, कोई राम राई हो.

                कबीर का रहस्यवाद उन्हें ब्रह्म से एकान्तिक रूप से जोड़ता है पर इस ब्रह्म का बरताव करना बच्चों का खेल नहीं है. रहस्यवाद यहां अनुभूति के स्तर पर ही नहीं, अभिव्यक्ति के स्तर पर भी है. कबीर कहते है

                एक कहे तो है नहीं
                दुई कहें तो गारी.

इस तरह कबीर का रहस्यवाद ब्रह्म के प्रति उनके आत्यंतिक प्रेम की अनुभूति है न कि प्रतिक्रियावाद. सांसारिक जीवन में कबीर जैसे प्रखर व्यवस्था विरोधी को प्रतिक्रियावादी कहना न सिर्फ उनके प्रति, बल्कि सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य के प्रति अन्याय है.

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