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कबीर की माया

अद्वैत वेदान्त में सामान्यतः माया को ब्रह्म और जीव के बीच पड़े आवरण के रूप में जाना जाता है. यह माया ही है, जो जीव के ब्रह्म से अलग होने का भ्रम उत्पन्न करती है. जीव को ब्रह्म से विच्छिन्न करती है. कबीर दास जी भी माया को इसी भ्रम के रूप में देखते है. यह माया सतगुण, रजगुण और तम गुण की फांस लिये हुये डोलती रहती है और मीठी बानी के द्वारा लोगों को फंसाती है, उन्हें भ्रमित करती है-

                माया महाठगिनी हम जानी                तिरगुन फांस लिये कर डोले
                बोले मधुरी बानी.

कबीर के अनुसार त्रिगुणात्मक वृत्ति का ही दूसरा नाम माया है. त्रिगुणात्मक वृत्ति के द्वारा निर्गुण ब्रह्म को नहीं पाया जा सकता-

रजगुण, तमगुण, सतगुण कहिबे यह सब तेरी माया

इस माया के परदे को वेध कर ही ब्रह्म का साक्षात्कार हो सकता है. यह माया काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसी वृत्तियों का कारण है, जो जीव के हृदय को शुद्ध नहीं होने देती-

                माया मुई न मन मुआ, मरी-मरी गया शरीर                आशा, तृष्णा न मुई कहि गया दास कबीर.

कबीर के यहाँ माया कई अर्थों को ध्वनित करती है. यह माया जीव और परमात्मा के बीच आवरण का काम करती है. यह वेश बदकर नये-नये रूप धारण कर लोगों को रिझाती है. कबीर के यहाँ माया का सबसे प्रभावशाली और आक्रामक रूप है- कामिनी रूप. नारी पुरूष के सांसारिक आकर्षण को कबीर ने कामशक्ति कहा है, जो उनकी नजर में माया का ही कार्य है. यह माया मनुष्यों तो क्या देवों और मुनियों को भी नहीं छोड़ती. केशव के यहाँ यही कमला है और शिव के यहाँ भवानी. जोगियों के यहाँ यही जोगिनी है और राजा के यहाँ यही रानी.
कबीर के माया का दूसरा रूप है कंचन. कंचन का अर्थ है सोना अर्थात धन. माया के इस रूप में पड़कर भी जीव ईश्वर को भूल जाता है, परन्तु अंततः वह इसका उपभोग नहीं कर पाता है, अर्थात यह भ्रम ही साबित होती है-

                माया जोरि-जोरि करे इकट्ठी                हम खइहै लरिका व्यवसायी.
                सो धन चोरे मूस ले जाई
                रहा- सहा ले जाय जमाई..

जोग साधना में यही माया कुण्डलिनी है, जिसे गोरखनाथ ने वेश्या कहा है और सम्पूर्ण सृष्टि को वेश्या का पूत. इस कुण्डलिनी नाम की मनचली वेश्या को साधकर सुषुम्ना के माध्यम से ब्रह्मरन्ध्र तक  पहुंचाने से ही ब्रह्म की प्राप्ति होती है. 

कबीर दास जी दार्शनिक स्तर पर अद्वैतवादी हैं, जबकि धार्मिक स्तर पर व्यवहारवादी. कबीर के यहाँ जीव दो रूपों में है. आमतौर पर वे सांसारिक प्राणी के लिए जीव शब्द का प्रयोग करते हैं, लेकिन कई स्थानो पर उन्होंने ब्रह्म के लिए भी जीव शब्द का प्रयोग किया है. सांसारिक जीवों की 84 लाख योनियां है, जिनमें मनुष्य सर्वाधिक विशिष्ट है. इसलिए कबीर ने अपना सारा ध्यान इसी जीव (मनुष्य) पर केन्द्रित किया है. उनकी दृष्टि में जीव दो प्रकार का है मायालिप्त और मायामुक्त. कबीर के यहाँ यह मायामुक्त जीव ही ब्रह्म है. मायालिप्त जीव को मायामुक्त करने के लिए कबीर बार-बार फटकारते है. कबीर कहते हैं कि मायालिप्त जीव माया को ही सत्य मान लेता है, जैसे कोई रस्सी को सांप माप मान ले. यह स्थिति एक या दो मनुष्यों की नहीं है बल्कि समूचा संसार ही इस माया से ग्रसित है-

                एक न भूला, दुई न भूला, भूला सब संसार

कबीर की सारी चिन्ता इस मायालिप्त संसार को मायामुक्त कराने की है-

                सुखिया सब संसार है, खाये और सोये.
                दुखिया दास कबीर है, जागे और रोये.

कबीर ने जीव की भ्रमबद्ध स्थिति को अनेक उपमानों से समझाया है-

कस्तूरी कुण्डली बसे मृग ढूंढै वन माहि
ऐसे घटि-घटि राम है, दुनिया देखे नाहि.

जिस तरह एक कुत्ता शीशमहल में अपने अनेक प्रतिद्वंद्वियों  को देखकर उन पर भौंकता रहता है, उसी तरह मायालिप्त मनुष्य भी मायाजनित विभिन्न रूपों को देख कर उनके पीछे भागता रहता है.

                ब्रह्म से तदाकार होने के लिए माया से मुक्त है जरूरी है, जैसे ही जीव माया के वास्तविक को समझ लेता है, उसे अपनी असलियत का भी बोध होने लगा है. वह समझ जाता है कि वह ब्रह्म की सत्ता का ही एक अंश है और ब्रह्म से इतर उसका कोई अस्तित्व नहीं है. 

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