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हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

हम पंछी उन्‍मुक्‍त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्‍यासे, कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से, स्‍वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंचखोल चुगते तारक-अनार के दाने। होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी, या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की डोरी। नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्‍न-भिन्‍न कर डालो, लेकिन पंख दिए हैं, तो आकुल उड़ान में विघ्‍न न डालो।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी – सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़ महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह

यह कदम्ब का पेड़ -सुभद्रा कुमारी चौहान

यह कदंब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे मै भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे ले देती यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली किसी तरह नीची हो जाती यह कदम्ब की डाली तुम्हे नहीं कुछ कहता, पर मै चुपके चुपके आता उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता वही बैठ फिर बड़े मजे से मै बांसुरी बजाता अम्मा-अम्मा कह बंसी के स्वर में तुम्हे बुलाता सुन मेरी बंसी माँ, तुम कितना खुश हो जाती मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आती तुमको आती देख, बांसुरी रख मै चुप हो जाता एक बार माँ कह, पत्तो में धीरे से छिप जाता तुम हो चकित देखती, चारो ओर ना मुझको पाती व्याकुल-सी हो तब कदम्ब के नीचे तक आ जाती पत्तो का मरमर स्वर सुन, जब ऊपर आँख उठाती मुझे देख ऊपर डाली पर, कितना घबरा जाती गुस्सा होकर मुझे डांटती, कहती नीचे आ जा पर जब मै ना उतरता, हंसकर कहती मून्ना राजा नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्हे मिठाई दूंगी नए खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी मै हंसकर सबसे

बंदरलाल की ससुराल – प्रकाश मनु

एक दिन सूट पहनकर बढ़ियाभोलू बंदरलाल,शोर मचाते धूमधाम सेपहुँच गए ससुराल।गाना गाया खूब मजे सेऔर उड़ाए भल्ले,लार टपक ही पड़ी, प्लेट मेंदेखे जब रसगुल्ले।खूब दनादन खाना खायानही रहा कुछ होश,आखिर थोड़ी देर बाद हीगिरे, हुए बेहोश।फौरन डॉक्टर बुलवायाबस, तभी होश में आए,नहीं कभी इतना खाऊँगा-कहकर वे शरमाए!

अक्कड़ मक्कड़ -भवानीप्रसाद मिश्र

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,एक साथ एक बाट से लौटे।बात-बात में बात ठन गयी,बांह उठीं और मूछें तन गयीं।इसने उसकी गर्दन भींची,उसने इसकी दाढी खींची।अब वह जीता, अब यह जीता;दोनों का बढ चला फ़जीता;लोग तमाशाई जो ठहरे सबके खिले हुए थे चेहरे!मगर एक कोई था फक्कड़,मन का राजा कर्रा - कक्कड़;बढा भीड़ को चीर-चार करबोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर।अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,सही बात पर झुकना पड़ा!उसने कहा सधी वाणी में,डूबो चुल्लू भर पानी में;ताकत लड़ने में मत खोओचलो भाई चारे को बोओ!खाली सब मैदान पड़ा है,आफ़त का शैतान खड़ा है,ताकत ऐसे ही मत खोओ,चलो भाई चारे को बोओ।सुनी मूर्खों ने जब यह वाणीदोनों जैसे पानी-पानीलड़ना छोड़ा अलग हट गएलोग शर्म से गले छट गए।सबकों नाहक लड़ना अखराताकत भूल गई तब नखरागले मिले तब अक्कड़-बक्कड़खत्म हो गया तब धूल में धक्कड़अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़दोनों मूरख, दोनों

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