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शेखचिल्ली और चोरी में हिस्सा

शेखचिल्ली -चोरी में हिस्सा

शेखचिल्ली एक दिन अपने घर के सामने अहाते में बैठे भुने हुए चने खा रहे थे और साथ ही जल्दी-से-जल्दी अमीर बनने के सपने देख रहे थे. खुली आँखों से सपने देखते हुए कुछ चने खा रहे थे और कुछ नीचे गिरा रहे थे. संयोग से जमीन पर गिरे चने के दानों में एक दाना कच्चा था. कुछ ही दिनों में वहाँ चने का एक छोटा पौधा निकल आया. शेखचिल्ली अपनी इस अनजाने में की गयी खेती को देखकर खूब खुश हुए और जी जान से फसल की रखवाली में लग गए. उन्हें बड़ी चिंता थी कि उनके इकलौते चने के पौधे को कोई गाय-भैंस ना चर जाए, इसलिए अम्मी के सो जाने के बाद रात में भी फसल की निगरानी किया करते थे.               एक रात जब वो हाथ में डंडा लिए चने के पौधे की रखवाली कर रहे थे, तभी तीन-चार लोग खामोशी से छिपते-छिपाते कहीं जाते दिखाई दिए.

शेखचिल्ली-बुखार का इलाज

शेखचिल्ली

शेखचिल्ली अपने घर के बरामदे में बैठे-बैठे खुली आँखों से सपने देख रहे थे. उनके सपनों में एक विशालकाय पतंग उड़ी जा रही और शेखचिल्ली उसके ऊपर सवार थे. कितना आनंद आ रहा था आसमान में उड़ते हुए नीचे देखने में. हर चीज़ छोटी नज़र आ रही थी. तभी अम्मी की तेज़ आवाज ने उन्हें ख्यालों की दुनिया से बाहर निकाल दिया- “शेखचिल्ली ! शेखचिल्ली ! कहाँ हो तुम ? ‘आया अम्मी’, ख्यालों की दुनिया से निकल कर शेखचिल्ली घर के आँगन में पहुँचे. “मैं सलमा आपा के घर जा रही हूँ.उनकी बेटी की शादी की तैयारी कराने. शाम में आऊँगी. आऊँगी तो तुम्हारे लिए मिठाइयाँ भी लेकर आऊँगी. तब तक तुम दरांती लेकर जंगल से पड़ोसी की गाय के लिए घास काट लाना. कुछ पैसे मिल जायेंगे.” “जी अम्मी” शेखचिल्ली ने कहा और दरांती उठाकर जंगल जाने के लिए तैयार हो गए. “सावधानी से जाना और दिन में सपने मत देखने लग जाना.

शेखचिल्ली और तेल का गिलास

शेखचिल्ली इस समय वही कर रहा था, जिसमें उसमें सबसे ज्यादा मज़ा आता था- पतंगबाज़ी . वो इस समय अपने घर की छत पर खड़ा था और आसमान में लाल-हरी पतंगों के उड़ने का मजा ले रहा था. शेख की कल्पना भी उड़ान भरने लगी. वह सोचने लगा- काश मैं इतना छोटा होता कि पतंग पर बैठकर हवा में उड़ पाता..... “बेटा, तुम कहाँ हो?” उसकी अम्मी ने धूप की चौंध से आँखों को बचाते हुए छत की ओर देखते हुए कहा. “बस अभी आया अम्मी.” शेख ने कहा. काफी दुखी होते हुए उसने अपनी उड़ती पतंग को जमीन पर उतारा और फिर दौड़ता हुआ नीचे गया. शेख अपनी माँ की इकलौती औलाद था. पति की मौत के बाद वही उनका एकमात्र रिश्तेदार था. इसलिए अम्मी शेख को बहुत प्यार करती थी.      “बेटा, झट से इसमें आठ आने का सरसों तेल ले आओ,” उन्होंने कहा और अठन्नी के साथ-साथ शेख को एक

टिपटिपवा – उत्तरप्रदेश की लोककथा

टिपटिपवा

राजीव रोशन के सौजन्य से एक थी बुढ़िया. उसका एक पोता था. पोता रोज़ रात में सोने से पहले दादी से कहानी सुनता. दादी रोज़ उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती. एक दिन मूसलाधार बारिश हुई. ऐसी बारिश पहले कभी नहीं हुई थी. सारा गाँव बारिश से परेशान था. बुढ़िया की झोंपड़ी में पानी जगह-जगह से टपक रहा था---- टिपटिप टिपटिप . इस बात से बेखबर पोता दादी की गोद में लेटा कहानी सुनने के लिए मचल रहा था. बुढ़िया खीझकर बोली—“अरे बचवा, का कहानी सुनाएँ? ई टिपटिपवा से जान बचे तब न ! पोता उठकर बैठ गया. उसने पूछा- दादी, ये टिपटिपवा कौन है? टिपटिपवा क्या शेर-बाघ से भी बड़ा होता है? दादी छत से टपकते पानी की तरफ़ देखकर बोली—हाँ बचवा, न शेरवा के डर, न बघवा के डर,

सबसे ऊपर

सबसे ऊपर

बारह साल बीत गए. एक युग से पावागढ़ को घेरे हुए था- गुजरात का बादशाह महमूद बेगड़ा. वह परेशान और थका हुआ था. एक दिन उसने अपने सेनापति से कहा- “लगता है कि हमें वापस ही लौटना पड़ेगा. यह हमारे लिये बड़े शर्म की बात होगी,” सेनापति ने कुछ देर सोचा फिर गंभीर होकर कहा, “जहाँपनाह, जहां बहादुरी हार जाती है, वहां अक्ल से काम लेना चाहिए. मैंने सब व्यवस्था कर ली है.” पावागढ़ पर महाराजा प्रतापसिंह चौहान का राज था. वह पताई रावत के नाम से विख्यात था. उसका एक नमकहराम साला था, सइया बाकलिया. सेनापति ने उसे ही लालच देकर अपनी ओर मिला लिया था. बादशाह ने पूछा : “कैसे?” “यह पावागढ़ के होने वाले नए महाराज सइया बाकलिया आपको बतायेंगे!” सेनापति ने अत्यन्त चापलूसी से कहा और एक अपरिचित व्यक्ति की ओर संकेत किया. बेगड़ा ने प्रश्न भरी निगाह से बाकलिया की ओर देखा. सेनापति ने फिर कहा, “यह पताई रावत के सगे साले हैं.

दोस्त कहूं या दुश्मन? – भीष्म साहनी

हरभगवान मेरा पुराना दोस्त है. अब तो बड़ी उम्र का है, बड़ी-बड़ी मूंछें हैं, तोंद हैं. जब सोता है तो लंबी तानकर और जब खाता है, तो आगा-पीछा नहीं देखता. बड़ी बेपरवाह तबियत का आदमी है, हालांकि उसकी कुछ आदतें मुझे कतई पसंद नहीं. पान का बीड़ा हर वक्त मुँह में रखता है और कभी छुट्टी पर कहीं जा, तो सारा वक्त ताश खेलता रहता है. न सैर को जाता है, न व्यायाम करता है, यों बड़ा हंसमुख है, किसी बात का बुरा नहीं मानता. हमेशा दोस्तों की मदद करता है.    पर एक दिन उसने मेरे साथ बड़ी अजीब हरकत की.     शिमला में एक सम्मेलन होने वाला था. हम लोग उसमें भाग लेने के लिए गए. हरभगवान भी अपनी मूंछों समेत, तोंद सहलाता वहां पहुँच गया. और भी कुछ लोग वहां पहुंचे. ये सब लोग एक दिन पहले पहुँच गए, मैं किसी कारणवश दूसरे दिन पहुँच पाया. जब मैं

मुसीबत है बड़ा भाई होना- शांति मेहरोत्रा

बड़ा भाई होना कितनी बड़ी मुसीबत है, इसे वे ही समझ सकते हैं, जो सीधे दिखाई पड़ने वाले चालाक छोटे भाई-बहनों के जाल में फंसकर आये दिन उनकी शरारतों के लिए मेरी तरह खुद ही डांट खाते नजर आते हैं. घर में जिसे देखो वही दो-चार उपदेश दे जाता है और दो-चार काम सौंप जाता है. चाचाजी को फ़ौरन पानी चाहिए, चाचीजी को ऊपर के कमरे से ब्रुश मंगवाना है. पिताजी के मेहमानों के लिए भाग कर चौराहे से पान लाने हैं. छोटे भाई ने सुबह से जलेबी के लिए रट लगा रखी है. फिर मुझे भी अपने कपड़ों पर इस्तिरी करनी है, बस्ता लगाना है, जूते पॉलिश करने हैं और पौने नौ बजे स्कूल के लिए रवाना हो जाना है. यों हूँ तो मैं भी अभी छठी क्लास में ही, लेकिन तीन भाइयों में सबसे बड़ा होने के नाते सुबह से शाम तक चकरघिन्नी की तरह नाचता रहता हूँ.          

दौड़ – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

नौगढ़ के टूर्नामेंट की बड़ी तैयारी की गई थी. सारा नगर सुसज्जित था. स्टेशन से लेकर स्कूल तक सड़क के दोनों ओर झंडियाँ लगाईं गई थीं. मोटरें खूब दौड़ रही थीं. टूर्नामेंट में पारितोषिक वितरण के लिए स्वयं कमिश्नर साहब आने वाले थे. इसीलिए शहर के सब अफसर और रईस व्यस्त थे. आज स्कूल के विस्तृत मैदान में दर्शकों की बड़ी भीड़ थी. नगरपालिका के सदस्य, सचिव, अध्यक्ष आदि सभी उपस्थित थे. दर्शकों में सेठों और साहूकारों का भी अभाव न था.    हेडमास्टर साहब तो प्रतिष्ठित लोगों का आदर-सत्कार करने में लगे हुए थे. पर इधर लड़कों में कुछ दूसरा ही जोश फैला हुआ था. यों तो कितने ही स्कूलों से लड़के आए थे, पर होड़ दो ही स्कूलों में थी – नौगढ़ और विजयगढ़. विजयलक्ष्मी भी इन्हीं दोनों के बीच में झूल रही थी. कभी वह नौगढ़ की ओर झुकती तो कभी विजयगढ़ की ओर. सभी लड़कों के ह्रदय

लोहार और तलवार -मोहनलाल महतो वियोगी

पुष्पदंतपुर के चौड़े राजपथ के एक किनारे जिस लोहार की दूकान थी , वह अपनी कला में प्रवीण था. किन्तु बहुत ही कम व्यक्ति उसे जानते थे.     वह लोहार सिर झुकाए अनवरत परिश्रम करता .उसकी दुकान के सामने से जुलूस जाते. सम्राट की सवारी जाती. फिर भी वह कभी सिर उठाकर किसी ओर नहीं देखता था. भाथी चलाता हुआ वह लोहार अपने काम में तन्मय रहता. उसके भारी घन की चोट से तपे हुए शुद्ध लोहे से चिंगारियों की फुलझड़ियाँ सी छूटा करतीं, जिन्हें वह बहुत ही पुलकित मन से देखा करता था. उसका सारा शरीर धूल और कालिख से भरा होता. काफी रात बीतने पर वह दुकान बंद करता और चुपचाप घर की राह लेता. नागरिक उस लोहार को गूंगा और बहरा कहा करते थे. किन्तु वह था कारीगर और कलाकार. उसके घन के नीचे पहुँचते ही वज्र से भी कठोर लोहा मोम की तरह मृदुल हो जाता. वह

बैल की बिक्री – सियारामशरण गुप्त

मोहन बरसों से ज्वालाप्रसाद का ऋण चुकाने की चेष्टा में था. परन्तु चेष्टा कभी सफल न होती थी. मोहन का ऋण दरिद्र के वंश की तरह दिन पर दिन बढ़ता ही जाता था. इधर कुछ दिनों से ज्वालाप्रसाद भी कुछ अधीर से हो उठे थे. रूपये अदा करने के लिए वह मोहन के यहाँ आदमी पर आदमी भेज रहे थे.समय की खराबी और महाजन की अधीरता के साथ मोहन को एक चिंता और थी. वह थी जवान लड़के शिबू की निश्चिन्तता. उसे घर के कामकाज से सरोकार न था.उस दिन कलेवा करके शिबू बाहर निकल रहा था. मोहन ने पीछे से कहा : 'लल्लू, आज मुझे एक जगह काम पर जाना है. बैल की सार साफ करके तुम उसे पानी पिला देना.'शिबू ने बाप की ओर मुड़कर कहा : 'मुझसे यह बेगार न होगी. मुझे भी एक जगह जाना है. वाहियात काम के लिए मुझे फुरसत नहीं.'मोहन झुंझला पड़ा. क्रुद्ध

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