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कोठे की अक्का

कोठे की अक्का

बाज़ार रोज़ से ज्यादा गर्म था। जिस तरफ देखो रौनक थी। डेनियल यूँ तो हर साल इंडिया आता था पर ऐसे नज़ारे उसे यहाँ कम ही देखने को मिलते थे। वो छः फिट से निकलते कद का, कोई 50 की उम्र का होते हुए भी 35 से ऊपर न लगता था। ऐसा था मानों टॉम क्रूज़ की हाइट बढ़ा दी गयी हो। उसे चावड़ी बाज़ार से निकलते ही दिल्ली बुरी और भीड़ भरी लगने लगती थी।

वो दिल्ली के इस इलाके को किसी कसाई मुहल्ले सा समझता था; चारों तरफ़ मुर्गियां दौड़ रही हैं, लोग ज्यादा वजन वाली पहले खरीद रहे हैं। कोठो की श्रखलाओं से गुज़रता वो एक जगह ठिठका। पहली मंज़िल पर एक बमुश्किल 17 साल की लड़की, शरीर के ऊपरी हिस्से में न के बराबर कुछ पहने, चहलकदमी कर रही थी।

ठीक उस कोठे के नीचे अच्छी खासी भीड़ जमा थी। कोई रिक्शे वाला उसी भीड़ में से चिल्लाया “इतने बड़े तो आज तक इनमें से किसी के नहीं देखे बे, क्या खाती है ये यार”

प्रत्युत्तर मिला “वो छोड़, इसके सपने न देख, हज़ार रुपए से कम नहीं है इस वक़्त ये। वो भी बस एक बार का।”

डेनियल उस कोठे की सीढ़ियां चढ़ने लगा तो एक दलाल बीच में रोकता हुआ बोला “सर आर यू गोइंग फ़ॉर दी गर्ल हु स्टैंडिंग ओवर बालकनी?”

“हां” डेनियल ने हिंदी में जवाब दिया। “तुमसे अच्छी हिंदी आती है मुझे” हालांकि लहजा अंग्रेजी का ही था।

“ओह सॉरी सर” दलाल ने तुरंत खींसे निपोरी “सर ये लड़की ऐसे मिलेगी नहीं, 2 हफ़्ते की बुकिंग है इसके पास। मैं जुगाड़ लगाता हूँ, सिर्फ दो दिन में काम करा दूंगा, दो हज़ार एक्स्ट्रा लगेंगे बस।”

डेनियल ने कान से मक्खी उड़ाई। वो फिर सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। “जा मर साले भों*** के, दो हफ्ते से पहले मिल जाए तो कहियो” दलाल खिसिया गया। डेनियल ने उसकी गाली सुनी हो या गौर की हो, ऐसा कहीं से नहीं लगा।

“देख अंग्रेजी साहब आया है तेरे लिए बन्नों” एक अधेड़ उम्र की औरत, सुथरे नैन-नक्श वाली, बालकनी की तरफ चिल्लाती हुई बोली। जिस लड़की को बन्नों के नाम से पुकारा गया है था वो तुरंत आई। लेकिन ढकी हुई। जो शो वो बालकनी पर खड़ी होकर दिखा रही थी वो कोठे के अंदर मुफ़्त में हासिल नहीं था। डेनियल के बिना बोले ही वो बोल पड़ी, अक्का अगर इसी के लिए तू मुझे बुला रही थी तो मैं राज़ी हूँ।

डेनियल मुस्कुराया।

बन्नों और उसकी निगाह मिली। “अक्का ये हमारी ज़ुबान समझ तो नहीं रहा, देखो कैसे मुस्कुरा रहा है”

“अरे अंग्रेजों की आदत ही होती है मुस्कुराने की। तू कैसे चली जाएगी मरी, अभी तो तेरे पास दो हफ़्ते तक फुरसत नहीं है। या एक काम कर…” अक्का ने एक झलक डेनियल को देखा, वो लगातार उसी की तरफ देख रहा था। “5000 मांग इससे, बक्शीश अलग से, वैसे भी थाना इंचार्ज का लड़का तुझे 5 रूपए भी न देने वाला था। उसे टाल देंगे”

“ठीक है अक्का मैं राज़ी हूँ, यहाँ तो ये करेगा नहीं, इसके होटल ही…….” डेनियल ने बात पूरी न होने दी। “आपको कहीं जाने की ज़रुरत नहीं” हिंदी साफ़ थी। आप यहीं रहो। आपका नाम क्या है?”

बन्नों मन ही मन इतराई, ‘मैं न कहती थी ये हिंदी समझता है “मुझे यहाँ सब बन्नों कहते हैं” वो इतरा के बोली “बन्नों को अंग्रेजी में क्या कहोगे बाबू साहब?” और खुद ही हंस दी

डेनियल थोड़ा और मुस्कुराया और बोला “मैं आपका नहीं, इनका नाम पूछ रहा था” वो अक्का से संबोधित हुआ “आपका नाम क्या है?” एक मिनट के लिए पूरे कोठे में साइलेंसर लग गया।

फिर अक्का ही थोड़ा अटकते हुए बोली “पिछले दस सालों में किसी ने मेरा नाम पूछने की हिमाकत नहीं की अंग्रेजी बाबू, अपने आम से मतलब रखो, पेड़ मत गिनो”

हिमाकत शब्द डेनियल के सर के ऊपर से गया फिर भी उसने पूछने की ज़हमत न उठाई अक्का के और पास आकर बोला “मैं अपने आम से ही मतलब रख रहा हूँ, इसलिए पूछ रहा हूँ, आपका नाम क्या है मैडम?” लहज़ा अंग्रेजी होते हुए भी आँखों में इतना प्यार और बोली में अपनापन था कि अक्का एक पल को बहक गयी और बोलने ही लगा अपना वो नाम जो सालों से किसी ने नहीं लिया था कि बन्नों ने टोका “ओहो, पैसा पांच हज़ार हो गया तो अक्का को फुसलाने लगे अंग्रेज बाबू, दिल्ली आते ही यहाँ का रंग चढ़ गया”

अक्का संभली “बन्नों सही कह रही है, तुम्हें देखते ही उसकी ‘अपोंमेंट’ कैंसिल कराई मैंने, अब कंजूसी दिखा के कुछ नहीं होने वाला”

“मैं कंजूस नहीं डिअर” उसने बटुए से दो हज़ार के दो नोट निकाले और अक्का के हाथ में रख दिए, नोटों के साथ एक कार्ड भी था जिसके पीछे उसके होटल का नाम लिखा हुआ था। “मुझे आपसे मिलना है, कोई जल्दी नहीं, जब आप फुरसत से हो मुझे कॉल करो, मैं एक हफ़्ता अभी दिल्ली में ही हूँ, बात पैसे की है तो इतने ही और दे दूंगा मिलने पर, नहीं आए तो शिकायत नहीं करूँगा” फिर बन्नों की तरफ घूमा और उसके सिर पर हाथ रखता हुआ बोला “योर बॉडी इज सो ब्यूटीफुल एंड एट्रक्टिव। फाइंड अ मैचिंग सोल फॉर इट, तुम बहुत खूबसूरत हो, नो डाउट, तुम्हें एडवरटाइजिंग की ज़रुरत नहीं”

डेनियल घूमा और वापस जाने लगा, अक्का ने दहाड़ मारी “ओ अंग्रेज बाबूसाहब” डेनियल ठिठका

हम यहाँ कोठा चलाते हैं, भीख नहीं मांगते, पैसा दिया है तो अहसान न करो, या तो जिस काम के लिए आए थे वो करो या ये नोट उठा के ले जाओ और दुबारा यहाँ आने से तौबा कर लो। खैरात नहीं चाहिए” फिर एक दलाल से संबोधित हुई “हुसैन, ये अंग्रेज दुबारा सीढ़ी के पास भी दिखे तो भगा दियो साले को”

“डोंट शाउट, ओके, आई एम एग्री, आप पैसा रख लो”

अक्का ने फिर सिर से पाँव तक देखा डेनियल को और अपनी सूझ बूझ को शाबाशी दी। “कैसे ले जाओगे? गाड़ी लाये हो?”

“नहीं मैं यहीं ठीक हूँ” डेनियल ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।

अक्का ने बन्नों को पास बुलाया और बोली “ऊपर का तीसरा कमरा सजवा बन्नों” थोड़ा और करीब बुलाकर उसके कान में बोली “इस अंग्रेज को दिखा दे बन्नों की तू क्या है, ऐसा मज़ा दे कि ये सिर्फ़ तेरा नाम ही जपे, लंदन जाकर भी बन्नो-बन्नों कहे मरा” दोनों धीरे से हंसी।

ऊपर का कमरा सजा और डेनियल अंदर पहुँचा, कमर पर हाथ रखे बन्नों पहले से वहीँ खड़ी मिली। उसने अपना एक होंठ दांत से दबाया हुआ था, आँखों में शरारत और वासना मिली जुली थीं। कहीं ईर्षा और अपमान भी थे लेकिन छुपे हुए, वो सामने आकर धंधा ख़राब कर सकते थे। डेनियल बेड पर लेट गया। बन्नों हरकतों पर उतर आई। उसने पहले डेनियल के कपड़े उतारे फिर अपने, डेनियल के शरीर ने कुछ महसूस किया हो, कम से कम ऐसा बन्नों को तो नहीं लगा। वो अकेली सब कुछ करती रही। अंत में खिलजिला गयी और गुस्से से बोली “आदमी हो कि मुर्दा? जो देखकर ऊपर आए थे कम से कम उन्हें हाथ तो लगाओ”

डेनियल मुस्कुराया “हाँ मैं ज़रूर तुम्हारी छाती देखकर यहाँ आया था, लेकिन जब मैंने तुम्हारी अक्का की आँखें देखी तो न जाने क्यों मुझे ऐसा जैसे इन आँखों से खाली दुनिया में कुछ है ही नहीं। यहाँ सबको किसी न किसी चीज़ की चाह है, लेकिन तुम्हारी अक्का की आँखें मुझे निर्विकार दिखी। जैसे उनकी ज़िन्दगी का कोई मकसद ही नहीं। कोई लालच नहीं, वो अपने लिए कुछ न कर रही हो जैसे! मैं इसलिए उनसे एक बार अकेले में मिलना चाहता हूँ और जानना चाहता हूँ कि क्या ख्वाहिश है उसके दिल में, आखिर वो अपने लिए क्या चाहती है”

बन्नों अवाक् डेनियल का मुंह देखती रही।

“इसका मतलब ये नहीं बन्नों कि मैं तुम्हें कुछ समझता नहीं, तुमने मुझे देखते ही हाँ बोल दी तो वो सिर्फ पैसे के लिए नहीं थी। मैं समझता हूँ इस बात को। तुम्हें अट्रेक्शन हुआ जिसके मोह से तुम खुद को निकाल नहीं पाई।”

बन्नों ने निगाह झुका ली फिर धीरे से बोली “क्या तुम मुझे हाथ भी नहीं लगाओगे? इतनी गंदी हूँ मैं?”

डेनियल ने जवाब देने की बजाये उसे अपने करीब खींचा और अपने होंठ उसके चेहरे की तरफ बढ़ाए, बन्नों ने आँखें मूँद लीं और अपने लबों को ज़रा सा खोल दिया, एक साल में उसने किसी को भी अपने होठों को छूने नहीं दिया था, हरामजादे उसे काटने लगते थे। डेनियल ने अपने होठों को उसके माथे पर रख दिया। एक बार उसे कस के गले लगाया और छोड़ दिया। बन्नों वहीँ जड़ हो गयी।

डेनियल उठा और कपड़े पहनने लगा, उसने दो हज़ार का नोट बेड के पास रखा और बन्नों के सिर पर हाथ फेरता हुआ बोला “मैं गलत था। तुम बहुत खूबसूरत हो बन्नों, तन से ही नहीं, मन से भी”

डेनियल नीचे उतरा तो सबकी निगाहें उसी की तरफ थीं। वो फिर अक्का के करीब आया और आँखों में प्यार घोलता बोला “मैं आपका इंतज़ार करूँगा”

और चला गया। कोठे की सारी लड़कियों के बीच एक ही सुगबुगाहट थी। ‘क्या अक्का जाएँगी?’

काफ़ी देर तक बन्नों को कमरे से निकलता न पाकर अक्का खुद ऊपर गयी। ‘कहीं हरामजादे अंग्रेज ने नोच खसोट तो नहीं लिया मेरी बन्नों को’ वो कमरे में घुसी तो बन्नों पलंग पर घुटने मोड़कर बैठी थी। दो हज़ार का नोट खिड़की की ग्रिल से जा लगा था और किसी भी वक़्त नीचे गली में गिर सकता था। अक्का ने झट उसे काबू में किया और चिल्लाई “मरी पागल हो गयी है तू, अभी तेरी बक्शीश को गली में खड़े दल्ले लूट रहे होते, पैसे का ध्यान तो…..” फिर बन्नों की हालत देख रुक गयी। पलंग पर बैठी और बोली “क्या हुआ री? जबरदस्ती मारा तो नहीं तुझे? कहाँ लगी दिखा?”

बन्नों ने अपने दिल पर हाथ रखकर इशारा किया। उसकी आँखें भीगी हुई थीं। अक्का को लगा उसके वक्ष पर चोट लगी है। वो घबरा गयी “अरें कहीं काट तो नहीं लिया हरामजादे……”

“अक्का, गाली न बको उसको” बन्नों ने अक्का के मुंह पर हाथ रख दिया।

“क्या हुआ री तुझे? तू ठीक तो है?”

बन्नों अचानक अक्का के गले से लग गयी और फूट-फूट कर रोने लगी। अक्का फिर कुछ न बोलीं। वो समझ गयी कि इस मुर्दा जिस्म में कोई आत्मा फूंक गया।

एक हफ्ते तक कोठे में ये अफवाह और गर्म हो गयी कि अक्का भी उस अंग्रेज के साथ रंगरलियाँ मनाने जाएगी। अक्का में फिर जवानी जोर मारने लगेगी। ये सुगबुगाहट अक्का के कानों में भी पड़ रही थीं पर उसपे कोई फर्क पड़ रहा हो ऐसा नहीं लग रहा था। वो खुद से कई बार कह चुकी थी ‘मैं रंडी नहीं रही अब, मुझे इन सरफिरों से कोई मतलब नहीं’

अचानक लड़कियों के बीच हो-हल्ला होने लगा, पिछले दरवाज़े से बन्नों आई थी, उसकी चाल में लंगड़ाहट थी। अक्का भागती हुई गयी उसके पास, “अरी क्या हुआ तुझे ये क्या गत बन गयी तेरी?”

बन्नों कुछ न बोली। वो पास ही के एक कमरे में गयी और कराहती हुई बिस्तर पर लेट गयी। अक्का ने अपनी ख़ास दो लड़कियों को अपने साथ रखा बाकी सबको बाहर जाने का हुक्म दे दिया।

क्या हुआ री? तुझे तो फिर से थानेदार के लड़के ने बुलाया था न? तो ये हाल किसने किया?”

बन्नों ऐसे बोली जैसे जिंदा न हो “उसने मुझसे सबकुछ करवाया, मैंने किया, आखिर में बोला कि मैं दुनिया की सबसे घटिया रंडी हूँ। मुझमें वो गर्मी नहीं रही। मैं कुछ न बोली, हमेशा की तरह उसे गाली न दी, उसके सीने को अपनी एड़ी से नहीं कुचला, उसे लगता था मैं उसे बहुत पसंद करती हूँ। वो भी तो मुझे दिलो जान से चाहता था। बाकी सारी लड़कियों में मुझे ही चुनता था। उसने जो कुछ कहा मैंने किया पर मैं हमेशा जैसी मुसकुराहट न ला पाई चेहरे पर, फिर उसने मुझे मारना शुरू किया। मेरे चेहरे पर घूसे मारने लगा। मैंने फिर भी उसे नहीं रोका” कहते कहते बन्नों की आँखें बहने लगीं। फिर अचानक वो जबरदस्ती करने लगा, काटने लगा, नोचने लगा। मैं चुप-चाप पड़ी रही, लेकिन पता है अक्का इतने सब के बाद भी……”

“क्या बन्नों?”

“…..इतने सब के बाद भी वो, वो हार गया। उसने हार मान ली और मुझे बाहर फिंकवा दिया” बन्नों ने आँखें बंद कर ली।

अक्का कुछ देर शांत रही। अचानक उसे गुस्सा आने लगा, आग बबूला हो गयी। अपनी गद्दी के पास आकर सीधे थाने में फ़ोन लगाया और चिल्लाई “जानवर को बेटा कहते हो तो पहले बताना था, मैं कोई डंगर भेजती यहाँ से अपना फूल न भेजती। हरामजादे ने ऐसे मारा है जैसे रुई का गद्दा हो वो। एक हफ़्ते तक बिस्तर से उठ नहीं पायेगी वो, और एक बात समझ ले, अगर लड़की मर गयी या ‘किसी’ काम की न रही तो सारी रंडियों को लेकर तेरे थाने में आकर वो हंगामा करुँगी की जिंदगी भर पुलिसगिरी भूल जायेगा।

इससे पहले की थानेदार कुछ जवाब देता, अक्का ने फ़ोन पटक दिया।

उसका गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ। ‘जिस दिन से वो मरा अंग्रेज़ आया है, उसी दिन से ये लड़की बिगड़ गयी। वरना वो थानेदार का लौंडा तो हमेशा अच्छी बक्शीश देकर भेजता था। अक्का उसका दिया हुआ कार्ड ढूँढने लगी।

यहाँ वहां हर जगह देख लिया पर नहीं मिला। ‘शायद उसने फेंक दिया? नहीं, वो ऐसे कोई चीज़ न फेंकती। उसे कार्ड से छुटकारा पाना होता तो वो उसे जला देती। पर फेंकती नहीं’ उसे जाने क्या सूझी कि वो बन्नों के कमरे में गयी। बन्नों नीचे वाले कमरे में जीती-मरती पड़ी थी, उसका अपना कमरा खाली था। उसे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी, वो कार्ड उसे ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में ही मिल गया।

वो दनदनाती हुई नीचे उतरी, पता चला थानेदार का हरकारा आकर एक पुलिंदा दे गया है और लड़के की तरफ से माफ़ी के साथ अगले शनिवार को फिर भेजने के लिए कहा है।

अक्का ने वो पैसे तिजोरी किए और पिछले दरवाज़े से निकलती हुई शबाना से बोली “अभी आती हूँ 1 घंटे में” ‘

रात साढ़े ग्यारह बजे एक घंटे के लिए अक्का चली गयी, धंधे का सबसे ख़ास टाइम तो यही होता है’ शबाना खुद से बड़बड़ाने लगी।

अक्का ने पल्लू खोसा, ऑटो पकड़ा और सीधे उस अंग्रेज के होटल की ओर चल दी। बीस मिनट में पहाड़गंज आ गया। होटल शानदार था, यहाँ ऐसे जाना ठीक न था। उसने होटल की लॉबी से ही फ़ोन लगाया, घंटी देर तक बजती रही, वो फ़ोन वापस रखने ही वाली थी कि फ़ोन उठा “हेल्लो आई एम डेनियल, हु इज़ ओन लाइन?”

अक्का कुछ देर चुप रही फिर बोली “मैं आ गयी हूँ अंग्रेज बाबू, कहाँ मिलना हैं?”

डेनियल ने पूछा “कहाँ हो आप? मैं अभी आता हूँ”

“तुम रहने दो, कमरा नम्बर बताओ मैं खुद आती हूँ तुम्हारे पास”

“408, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ”

अक्का ने फ़ोन रखा और लिफ्ट की तरफ बढ़ी। चार सौ आठ का दरवाज़ा ठकठकाने से पहले वो फिर ठिठकी कि अगले पर दरवाज़ा खुल गया। अंदर अँधेरा था। वो गेट पर ही ठिठकी रही। “शू बाहर ही उतारकर आना”

“सुनो मुझे तुमसे ज़रूरी बात करनी है तुम ये लुकाछुपी का खेल बंद करो” अक्का ने चप्पल उतारी, जैसे ही अंदर पैर रखा तो पैर ज़मीन को छूने से पहले किसी मखमली चीज़ से छू गया। लाइट्स जल गयीं। फर्श पर गुलाब की पत्तियां बिखरी पड़ी थीं। डेनियल सामने नहीं था। अक्का का गुस्सा एक पल को बिलकुल छू हो गया। लेकिन उसने खुद को संभाला और भावें फिर से तिरछी करीं। फूल बेडरूम के कमरे तक बिखरे पड़े थे। मानों कोई रास्ता दिखा रहा हो। वो दरवाज़ा ठेलकर बेडरूम में घुसी। अंदर घुसते ही फिर फूलों की बरसात उसपर हो गयी। डेनियल सामने ही था। मुस्कुराता हुआ। चारज़ू इत्र की खुशबू थी। समा बंध गया था। अक्का धम्म से बिस्तर पर बैठ गयी।

डेनियल उसे लिटाने लगा। अक्का का मन अचानक तिरस्कार से भर गया। ‘ये भी बाकियों की तरह जिस्म का भूखा?’ लेकिन अगले ही पल डेनियल ने अक्का का सिर अपने हाथ पर रख लिया और उससे लगकर लेट गया। कोई हरकत नहीं, कोई ‘फायदा’ उठाने की कोशिश नहीं। जैसे उफनती नदी अचानक शांत हो जाए।

कई लम्हें ऐसे ही गुजर गये। अक्का जैसे अलग ही दुनिया में थी। डेनियल की बाहें उसे जन्नत लग रही थीं। लेकिन वो चेती, टाइम बीता जा रहा था, एक घंटे में लौट आने का वायदा करके आई थी शबाना से, वो क्या सोचेगी।

अक्का उठने लगी।

डेनियल ने फिर लिटाना चाहा!

अक्का फिर उठने लगी

“आज रात यहीं रुक जाओ, प्लीज”

“क्यों? आखिर क्यों कर रहे हो तुम ये सब? क्या साबित करना चाहते हो तुम?”

“तुम्हारा नाम क्या है?” सवाल से बिलकुल विपरीत एक सवाल हुआ।

“मैंने जो पूछा है वो बताओ? क्यों तुम दुनिया भर की लड़कियों को छोड़कर, मुझ बुढ़िया के पीछे भाग रहे हो?”

डेनियल फिर मुस्कुराया “तुम्हारा नाम क्या है?”

“उफ्फ्फ़” अक्का परेशान हुई पर वो भी मुस्कुरा दी “आज रात की कीमत चुका पाओगे तुम, पूरी ज़िन्दगी भी दांव पर लग सकती है?”

“चाहें जो मांग लो” डेनियल ने हाथ बढ़ाया! “मैं चाहता हूँ कि तुम अपने लिए कुछ मांगो, बताओ मुझे कि जैसे सबकी कोई न कोई चाहत होती है वैसे तुम्हारी भी है, मैं तुम्हें हमेशा के लिए यहाँ से ले जाना चाहता हूँ” अक्का मुस्कुराई और अपने होंठ उसके कान के पास ले गयी। डेनियल एक पल को संजीदा हुआ फिर मुस्कुरा दिया. वो सही था. सबकी कोई न कोई चाहत तो होती ही है.

अक्का मुस्कुराई और उसके हाथ पर फिर लेट गयी “सरोज कहता था मेरा खसम मुझे, जिस घर से आई थी उसने कभी कोई नाम रखा ही नहीं, बस 17 साल की उम्र में ही ब्याह हो गया। आदमी बहुत प्यार करता था पर जब उसे पता चला कि मैं कभी माँ नहीं बन सकती, वो मुझे फुसला के दिल्ली ले आया और अच्छे दामों में बेच दिया। मुझसे कहता था ‘चाहे कुछ हो जाए, तू रहेगी मेरी ही’। उसकी बात सच निकली, मैं उसकी ही रही। शुरू में मैं बहुत रोई, चीखी, फिर मुझे आदत हो गयी। इस कोठे की जो पिछली अक्का थी, उससे मेरी बहुत बनती थी। मेरी उम्र बढ़ी और अक्का की तबियत बिगड़ी, पता ही नहीं चला कब मैं रंडी से इन रंडियों की देखभाल करने वाली बन गयी”

काफी देर की ख़ामोशी के बाद डेनियल बोला “सरोज, तुम फ़िक्र मत करो, सब ठीक हो जायेगा। कल सुबह की मेरी फ्लाइट है, फिर सब ठीक हो जायेगा। तुम्हें सुकून मिले, मुझे और क्या चाहिए”

अक्का ने कोई जवाब नहीं दिया। डेनियल उसकी पीठ से लगा हुआ था कि उसने करवट बदली। डेनियल का मुंह उसके मुंह के ठीक सामने हो गया। दोनों की आँखें मिली। कम से कम एक रात के लिए वो फिर से सरोज बन गयी।

सुबह नीम अँधेरे वो पछली गली के रास्ते से कोठे में घुसी। शबाना उसे देखते ही उसकी तरफ दौड़ी और धीरे से बोली “कहाँ थी तू अक्का, तुझे पता है क्या हो गया है?”

“क्या हो गया? कहाँ आग लग गयी?”

“बन्नों के ‘वहां’ से बहुत खून आया था। बड़ी मुश्किल से आधा घंटा पहले सोई है वो”

“कोई बात नहीं ठीक हो जाएगी तू फ़िक्र न कर, ज्यादा हुआ तो उसे हॉस्पिटल भेज दूंगी, तू जा जाकर सोजा, रात की थकी होगी”

“थकी तो तू लग रही है अक्का” शबाना फुसफुसाई

अक्का ने घूर कर देखा “क्या बोली तू?”

“कुछ…कुछ नहीं” वो दौड़ गयी।

अक्का जल्दी से उपरले कमरे में पहुंची और एक पुराने से बैग में जल्दी-जल्दी कपड़े भरने लगी। ‘इस बन्नों को भी अभी बीमार पड़ना था, अब इसे हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा, नास हो उस हरामजादे का, मेरी फूल सी बेटी को इतना कूटा उसने’। बैग बंद किया और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। इस वक़्त ज्यादातर लड़कियां सो गयी होती थीं। वो बन्नों के कमरे में गयी। उसे टहोका, बन्नों कुनमुनाई। उसका माथा छुआ तो बुखार लगा। उसने जबरन बन्नों को उठाया।

“अक्का तू है क्या?” इतना कहते ही बन्नों अक्का के कलेजे से लग गयी। अक्का कुछ पल चुप रही फिर धीरे से बोली “वक़्त का गया है बन्नों की तू मेरी जगह ले ले”

“क्या अक्का?”

“खैर तू वो सब छोड़, तुझे अभी डाक्टर के पास चलना है, तेरी हालत बहुत खराब हो रही है, चल उठ”

बन्नों ने उठने की कोशिश की, लेकिन फिर बैठ गयी। जैसे तैसे वो उठी, अक्का ने फ़ोन करके एक काबिल ऑटो वाले को बुला लिया। बन्नों को बिठाया और बोली “ध्यान से ले जइयो, डाक्टर को फ़ोन कर दिया है मैंने”

“अक्का तू भी चल…”

“तू पहुँच मैं आती हूँ”

शबाना के साथ दो लड़कियां और वहीँ आ गयीं।

“अक्का इसे अकेले न भेज, मुझे या किसी दूसरी को साथ भेज दे, ये कहीं गिर न पड़े”

“नहीं गिरेगी, तू फ़िक्र न कर, मुझे है फ़िक्र इस लड़की की” फिर ऑटो वाले से संबोधित हुई “वसीम, ध्यान से ले जइयो, कुछ हो गया इसको तो बोटी-बोटी काट दूंगी तेरी”

वसीम गर्दन हिलाता चला गया।

बन्नों एक शॉल ओढ़े थी। सुबह के 5 बजे होंगे। उसे फिर नींद लग गयी।

उसकी आँख खुली तो उसने महसूस किया कोई उसके साथ बैठा है। वो फिर सो गयी।

बन्नों को फिर होश आया तो उसने खुद को एक कमरे में पाया। वो उठ के सीधी हुई। डेनियल एक कुर्सी डाले उसके सामने बैठा उसे निहार रहा था।

उस एक रात की कीमत, बन्नों की पूरी ज़िन्दगी थी। अक्का ने फिर डेनियल को सही साबित कर दिया, और अपनी जगह बन्नों को दे दी!

सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ यूँ तो रहते दिल्ली में हैं, लेकिन अपने घर ‘अमृतसर’ से कभी अपना हाथ छुड़ा नहीं पाए । दिल्ली में पले-बढ़े सिद्धार्थ ने लिखने की शुरूआत करने से पहले क्राइम राइटिंग के बादशाह ‘श्री सुरेंद्र मोहन पाठक’ को घोट कर पढ़ने से करी । सिद्धार्थ आठवीं से पाठक साहब को पढ़ रहे हैं । फिर अचानक इनका मन साहित्य की तरफ भागा । उसके बाद से ‘गुलज़ार साहब’ को सुनने से ज्यादा पढ़ना शुरू कर दिया । अक्सर नई किताबें खरीद कर पढ़नी शुरू कर देते हैं, अगर आधी पढ़ने के बाद समझ न आए या पसंद न आए तो वहीं छोड़ कर दूसरी किताब पढ़ने लग जाते हैं । किताबें पढ़ते पढ़ते जाने क्या सूझी कि खुद एक नॉवेल लिखनी शुरू कर दी । आने वाले समय में क्या बनना चाहते हैं ये बताना तो मुश्किल है पर लिखना चाहते हैं, ये पक्का है चाहें वो किसी भी श्रेणी में हो । फ़िलहाल प्राइवेट नौकरी बजा रहे हैं और सरकारी से दूरी बनाए हुए हैं । किस्से कहानियों के अलावा कुछ एक फ़िल्मी/किताबी रिव्यु भी लिखते हैं ।

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14 thoughts on “कोठे की अक्का

  1. चट्टान के हृदय में भी मीठे जल सोता छुपा रहता है ज़रूरत किसी के पुरुषार्थ की होती है उसे प्रकट करने के निमित्त बनने की
    अंतरतम गहरे दफन हो चुकी कोमल मानवीय भावनाओं को सहज स्वाभाविक रूप से प्रकट करने के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं

  2. सार्थक कहानी जो दिल को छू कर गुजर गई। कई दफा पढ़ने योग्य। कहानी की थीम और इसके संदेश ने पाठक तक जरूर पहुंच बनाई होगी। कहानी अंत तक पाठक को बांधे रखने में सक्षम है। लेखक से आगे भी ऐसी ही समसामयिक कहानी की उम्मीद रहेगी।

    1. लेखक आपका आभारी है राजीव जी। आपसे प्रेरणा लेकर ही अपना उपन्यास अधूरा छोड़े सामाजिक कहानियां लिख रहा है। लेखक आपको आदर्श मानता है। और नगर भी।

  3. बहुत अच्छी कहानी लेकिन आज के हालात से उलट एक नई सोच को उजागर करती हुई

    1. बिलकुल। आज इनमें से कोई भी पात्र बनना इम्पॉसिबल है। शुक्रिया

  4. भावुक करता है बन्नो की स्थिति
    कहानी का अंत कैसा होगा डर था
    लेकिन सुखान्त रहा बहुत अच्छा लगा

    1. मेरी कोशिश यही होती है, फर्स्ट प्रायोरिटी है सुखद अंत। आपको कहानी पसंद आई इसका बहुत बहुत शुक्रिया

  5. वाह, शानदार, और क्या लिखूं कोई शब्द नही…..अक्का एक रात को सरोज बनी और अपनी कीमत में उम्र भर के लिए माँ बन गई, ये थी उन खामोश आंखों की चाहत, गज्जब लिखे सिड भाई, सलाम है आपको🙏🙏🙏

  6. एक बेहतरीन कहानी. लेखक ने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि किसी मजबूरी वश वेश्या बनी हरेक औरत के सीने में एक दिल जरूर होता है, जिसको धंधे की मजबूरी की वजह से वो कितना भी छुपाये रहे, पर कभी कभी उस दिल से भी आवाज आती है. ऐसी हरेक औरत प्यार की भूखी होती है, बदले में वह भी सिर्फ प्यार की भाषा बोलना चाहती है. और यहां कोठा मालिक अक्का ने अपना प्यार बन्नो पर उंडेल दिया. शानदार.

  7. बहुत ही शानदार। लेखक ने अपनी कलम से माहौल को जीवंत किया। पढ़ने वाला खुद को उसी माहौल में रचा बसा पाता है।

  8. बहुत बढ़िया कहानी.. हालाँकि मैं सामाजिक कहानियाँ कम पढता हूँ पर तब भी खूब मजा आया..

  9. बुरा ना मानना सिद्धार्थ भाई मुझे यह कहानी पसंद नही आई।
    आप की और भी कहानियाँ पढी है आप काफी अचछा लिखते है। आशा है आप की क़लम से जल्दी ही कुछ बेहतरीन पढ़ने को मिलेगा।

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