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नागमती का विरह वर्णन

पद्मावत की व्याख्या आमतौर पर एक सूफ़ी काव्य के रूप में होती रही है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचकों ने भी पद्मावत के लौकिक प्रेम की अलौकिक व्याख्या करने की कोशिश की है. यदि गौर से देखें तो पायेंगे कि पद्मावत में मुल्ला दाऊद, उस्मान और कुतुबन जैसे रचनाकारों के प्रेमाख्यानों की अपेक्षा आध्यात्मिकता का पुट  काफ़ी कम है. जायसी का जोर लौकिक प्रेम पर ज्यादा है. पद्मावत मूलतः युद्ध और प्रेम की ही कथा प्रतीत होती है, जिसमें यत्र-तत्र किंचित आध्यात्मिकता का पुट भी है. अपने पूर्ववर्तियों की तरह जायसी कथा को गूढ़ प्रभाव से युक्त नहीं मानते और न ही इसके पढ़ने से किसी आध्यात्मिक लाभ की आशा दिलाते हैं. जायसी के अनुसार, पद्मावत ‘प्रेम की पीर’ का काव्य है, जिसे पढ़कर पाठक की आंखों में आंसू ही आयेंगे.

मुहम्मद कवि यह जोरि सुनावाIसुना सो प्रेम पीर गा पावा II                

जोरि   लाई  रकत   के   लेई I गाढि  प्रीति नैन जल भेई II

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी नागमती के विरह वर्णन  को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि घोषित किया है. इस विरह वर्णन ने शुक्लजी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने जायसी को अपनी त्रिवेणी में स्थान दिया. वस्तुतः पद्मावत के पढ़ने के उपरान्त पाठक के मन पर रत्नसेननागमती और  पद्मावती के प्रेम एवं उनके विरह के अतिरिक्त और कोई प्रभाव शेष नहीं रह जाता.
                यह प्रेम की अनन्यता ही है, जिसने रत्नसेन को राजसिहांसन से उतारकर दर-दर का भिखारी बना दिया. तोते से पद्मावती के सौन्दर्य के बारे में सुनकर ही रत्नसेन के मन में वह प्रेम उत्पन्न हुआ, जो उसे सिंहलद्वीप तक ले पहुँचा. गुणकथन, स्वप्नदर्शन या चित्रदर्शन द्वारा प्रेम का उदय होना हिन्दी काव्य की पुरानी परिपाटी रही है. पद्मावत में जायसी ने भी गुणकथन के द्वारा रत्नसेन के हृदय में पद्मावती के प्रति प्रेम का उद्भव होते दिखाया है. पद्मावती के प्रेम में पागल रत्नसेन देश-देश की खाक छानता हुआमार्ग के संकटों का सामना करता हुआ अंततः पद्मावती के देश सिंहलद्वीप पहुँच जाता है. यह रत्नसेन के प्रेम की चरम परिणति है , जहाँ उसके लिए पद्मावती के सिवा जीवन में और कोई पक्ष नहीं बचता.
                रत्नसेन और पद्मावती का विवाह हो जाता है. जायसी ने उनके संयोग श्रृंगार का चित्रण भी किया है, परन्तु वे प्रेम के पीर की गाथा लिख रहे थे, इसलिए उनका ध्यान रत्नसेन और पदमावती के संयोग की कथा कहने से ज्यादा उस नागमती पर है, जो रत्नसेन के जाते ही उसके विरह में तड़पने लगती है. यह एक पत्नी का पति के प्रति प्रेम है, जिसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता. यह एकनिष्ठ दाम्पत्य प्रेम है. रत्नसेन भले ही पद्मावती के लिए नागमती को छोड़कर चला गया है, परन्तु नागमती रत्नसेन को एक पल के लिए भी भूल नहीं पाती. वह उसका पति हैउसके जीवन का एकमात्र आश्रय. रत्नसेन के बिना यह पूरा जीवन उसके लिए निःसार है. आचार्य शुक्ल जैसे आलोचक नागमती के विरह वर्णन को पद्मावत का सबसे सशक्त पक्ष मानते हैं. आचार्य शुक्ल के अनुसार, वियोग में नागमती अपना रानीपन भूल जाती है और साधारण स्त्री की तरह आचरण करने लगती है. नागमती का विरह इतना तीव्र हो जाता है कि सारी प्रकृति जैसे उसके भावों से ही संचालित होने लगती है. भूमि पर रेंगने वाली वीर-बहूटियां और कुछ नहीं, बल्कि उसकी आंखों से टपकने वाले आसू रुपी रक्त की बूंदे ही हैं.
                पलास और कुन्दरू के फल उसके रक्त से ही रंग कर लाल हो गये हैं. परवल उसके दुःख में पीला पड़ गया है. उसके दुख से ही गेहूँ का हृदय फट गया है.

तेहि दुख भए परास निपाते । लोहू बुडि उठे होइ राते ॥

राते बिंब भीजि तेहि लोहू । परवर पाक, फाट हिय गोहूँ ॥

                नागमती रत्नसेन के विरह में दिन-रात सुलगती रहती है. न तो पूरी तरह जलकर समाप्त होती और न ही जलन किसी भांति कम होती. उसकी विरह- ज्वाला से निकले धुएं से कौए और भंवरे सभी काले पड़ गये हैं.
                प्राण जाने में कोई कसर शेष नहीं रह गयी , बस एक रत्नसेन से मिलने की आस ही उसके प्राण को अटकाये हुऐ हैं. वह वृक्ष से जुड़े ऐसे पीले पत्ते के समान ही गयी है, जिसे हवा का झोंका  कभी भी उड़ा कर ले जा सकता है. विरह-ज्वाला ने प्राणरूपी हंस पंखों को जला डाला है. इसी कारण वह प्राणरुपी हंस उसके शरीर को छोड़कर नहीं जा पा रहा है.
                नागमती को उम्मीद है कि एक न एक दिन उसका प्रियतम उसके प्रेम को याद करके वापस लौटेगा. यही आशा उसे विरह के इन विषम दिनों में भी जिलाए हुये हैं. वह मनुष्यों से पति के पास सन्देश पहुँचाने की कोशिश से हारकर वनवासी हो जाती है, ताकि पक्षियों को अपना  सन्देशवाहक बना सके, परन्तु जैसे ही किसी पक्षी के पास अपनी विरह गाथा सुनाने जाती है तो न सिर्फ वह पक्षी बल्कि वह पेड़ भी जिस पर पक्षी बैठा है, जलकर राख हो जाता है.
रत्नसेन के बिना नागमती का कोई सहारा नहीं हैसमाज में उसकी कोई पूछ नहीं है. होलीदिवाली जैसे त्यौहार उसके लिए निरर्थक हो गये हैं. जब पति ही साथ नहीं तो क्या साज क्या श्रृंगार !
                संयोग के क्षणों में जो वस्तुएं आनन्द प्रदान करती थी, अब वही उन क्षणों की स्मृति दिलाकर विरह और काम भावना को और तीव्र करती हैं. जो वस्तुएं मिलन के क्षणों को आह्लादक बना जाती थी, वही विरह की तीव्रता को और घनीभूत कर देती है. सारी प्रकृति ही जैसे नागमती की वेदना पर अपनी सम्मति देते हुए आंसू बहाने लगती है. प्रकृति का रेशा-रेशा नागमती के विरह को महसूस करने लगता है. यह जायसी की काव्य प्रतिभा ही है, जिसने परम्परा से चले आ रहे बारहमासे को नागमती के विरह वर्णन के माध्यम से नया संस्कार दे दिया. साहित्यकार की श्रेष्ठता इसी में है कि वह परम्परा में कुछ नया जोड़ जाय. नागमती के विरह वर्णन की अद्वितीयता बारहमासे के चित्रण में नहीं, बल्कि विरह की मार्मिक व्यंजना में है. नागमती की विरह वेदना सम्पूर्ण प्रकृति को प्रभावित करती हुई पाठक तक पहुँचती है और उसे एक गहरे टीस की अनुभूति दे जाती है.
                यह सही है कि नागमती के विरह वर्णन में कहीं कहीं ऊहात्मकता दिखाई देती है, परन्तु यह ऊहात्मकता नागमती के विरह के प्रभाव को बढ़ाती ही हैरीतिकाल के कवियों की तरह यह हास्यास्पद हद तक नहीं जाती है. यह विरह की पराकाष्ठा है, जहाँ पहुँचकर नागमती को समूची सृष्टि अपने विरह भावों की साक्षी और सहभागी जान पड़ने लगती है.
                                
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