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पद्मावत-मानसरोदक खंड- भाग-2 (हार का खोना)

धरी तीर सब कंचुकि सारी । सरवर महँ पैठीं सब बारी ॥
पाइ नीर जानौं सब बेली । हुलसहिं करहिं काम कै केली ॥
करिल केस बिसहर बिस-हरे । लहरैं लेहिं कवँल मुख धरे ॥
नवल बसंत सँवारी करी । होइ प्रगट जानहु रस-भरी ॥
उठी कोंप जस दारिवँ दाखा । भई उनंत पेम कै साखा ॥
सरवर नहिं समाइ संसारा । चाँद नहाइ पैट लेइ तारा ॥
धनि सो नीर ससि तरई ऊईं । अब कित दीठ कमल औ कूईं ॥

चकई बिछुरि पुकारै , कहाँ मिलौं, हो नाहँ ।
एक चाँद निसि सरग महँ, दिन दूसर जल माँह ॥5

अर्थ: पद्मावती और उसकी सखियों ने अपनी साड़ियाँ और अंगियाँ किनारे पर रखी और सरोवर में उतर गयीं. जैसे बेलें जल मिलने से खिल उठती हैं, वैसे ही सारी प्रसन्न होकर सरोवर में काम क्रीड़ा करने लगीं. उनके बिखरे हुए काले बाल सरोवर की लहरों के साथ लहरा रहे हैं. मुख रुपी कमलों को पकड़े होने के कारण वो लहरों के साथ बह नहीं पा रहे हैं. उनके यौवन का नव वसंत जैसे उनकों रस से भरे स्तनों के रूप में प्रस्फुटित हो रहा है. उनके अधर ऐसे हैं, मानो अनार और अंगूर में नई कोंपले आई हों. ऐसा लग रहा जैसे प्रेम की डाल फलों से लद कर झुक गई हो. सौंदर्य से परिपूर्ण इन स्त्रियों को पाकर सरोवर की ख़ुशी इस संसार में समा नहीं रही है. ऐसा लग रहा है, जैसे आकाश से चाँद तारों को साथ लेकर सरोवर में स्नान करने आ गया. वह जल धन्य है, जिसमें चाँद और तारे उदित हुए हैं. अब इसमें कमल और कुमुदिनी के दर्शन कहाँ?
अपने चकवे से बिछड़ी चकवी पुकार करने लगी- हे नाथ, अब तुम कैसे मिलोगे ? एक चाँद आकाश का था जो रात में वियोग कराता था और अब दूसरा दिन में वियोग कराने के लिए जल में घुस आया है.

लागीं केलि करै मझ नीरा । हंस लजाइ बैठ ओहि तीरा ॥
पदमावति कौतुक कहँ राखी । तुम ससि होहु तराइन्ह साखी ॥
बाद मेलि कै खेल पसारा । हार देइ जो खेलत हारा ॥
सँवरिहि साँवरि, गोरिहि । आपनि लीन्ह सो जोरी ॥
बूझि खेल खेलहु एक साथा । हार न होइ पराए हाथा ॥
आजुहि खेल, बहुरि कित होई । खेल गए कित खेलै कोई ?
धनि सो खेल खेल सह पेमा । रउताई औ कूसल खेमा ?

मुहमद बाजी पेम कै ज्यों भावै त्यों खेल । 
तिल फूलहि के सँग ज्यों होइ फुलायल तेल ॥6

अर्थ: सरोवर के जल में उनकी केलि क्रीड़ाओं को देखकर केलि में निपुण हँस शर्मिंदा होकर किनारे बैठ गया.सखियों ने पद्मावती को कौतुक देखनेवाली बनाकर बिठा दिया और कहा- हे सखि, तुम चाँद बनकर हम तारों के खेल की गवाह रहो. उसके बाद सखियों ने मिलकर अपना खेल शुरू किया. बाजी तय हुई कि जो सखि हारेगी, वह जीतनेवाली को अपना हार देगी. गोरी सखियों ने गोरी के साथ और सांवली सखियों ने सांवली के साथ अपनी जोड़ी बनाई. सब समझ बूझ कर खेल रही थीं, ताकि हारने के कारण अपना हार दूसरे को न देना पड़े. आज खेल लो , फिर यह मौका कहाँ मिलना? खेल के दिन समाप्त होने पर कौन खेलेगा? वह खेल धन्य है, जो प्रेम से पगा हुआ है. प्रभुता और कुशलता एक साथ कहीं और संभव नहीं है.

जायसी कहते हैं कि यह प्रेम की बाजी है, जिसे जैसा पसंद हो वैसा खेले. अंततः इस खेल में आनंद ही मिलना है. वैसे ही, जैसे सुंदर फूलों के संग के कारण तिल का तेल भी सुगन्धित हो जाता है.

सखी एक तेइ खेल ना जाना । भै अचेत मनि-हार गवाँना ॥
कवँल डार गहि भै बेकरारा । कासौं पुकारौं आपन हारा ॥ 
कित खेलै अइउँ एहि साथा । हार गँवाइ चलिउँ लेइ हाथा ॥
घर पैठत पूँछब यह हारू । कौन उतर पाउब पैसारू ॥
नैन सीप आँसू तस भरे । जानौ मोति गिरहिं सब ढरे ॥
सखिन कहा बौरी कोकिला । कौन पानि जेहि पौन न मिला?
हार गँवाइ सो ऐसै रोवा । हेरि हेराइ लेइ जौं खौवा ॥

लागीं सब मिलि हेरै बूडि बूडि एक साथ ।
कोइ उठी मोती लेइ, काहू घोंघा हाथ ॥7

अर्थ: उनमे एक सखी को खेलना नहीं आता. वह अपनी असावधानी के कारण अपना हार खो बैठती है. वह बेचैन होकर कमल नाल पकड़कर रोने लगती है- “मैं किससे अपना हार मांगूँ? मैं इनके साथ खेलने ही क्यों आई कि अपना हार खो बैठी. घर जाते ही जब घरवाले हार के बारे में पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूँगी?” उसकी सीप जैसी आँखों से आँसू गिरने लगे. ऐसा लग रहा, जैसे मोती गिर रहे हों. सखियों ने समझाने की कोशिश की, “अरी भोली कोयल, ऐसा कौन सा पानी होता, जिसमें हवा के कारण लहरें नहीं उठतीं अर्थात्, ऐसा कौन सा सुखी जीवन है, जिसमें दुःख के पल न हों. हार गँवाने के बाद ऐसे ही रोने से क्या होगा? हार को तुम भी ढूंढो, हम भी ढूंढती हैं.

       सभी सखियाँ एक साथ डुबकी लगाकर हार ढूँढने लगीं. उनमें से कोई मोती लेकर निकली तो किसी के हाथ सिर्फ घोंघा ही लगा.

कहा मानसर चाह सो पाई । पारस-रूप इहाँ लगि आई ॥
भा निरमल तिन्ह पायँन्ह परसे । पावा रूप रूप के दरसे ॥
मलय-समीर बास तन आई । भा सीतल, गै तपनि बुझाई ॥
न जनौं कौन पौन लेइ आवा । पुन्य-दसा भै पाप गँवावा
ततखन हार बेगि उतिराना । पावा सखिन्ह चंद बिहँसाना ॥
बिगसा कुमुद देखि ससि-रेखा । भै तहँ ओप जहाँ जोइ देखा ॥
पावा रूप रूप जस चहा । ससि-मुख जनु दरपन होइ रहा ॥

नयन जो देखा कवँल भा, निरमल नीर सरीर ।
हँसत जो देखा हंस भा, दसन-जोति नग हीर ॥8

 

अर्थ: मानसरोवर ने सोचा कि जो उसने चाहा था, वो मिल गया. पारस रुपी पद्मावती स्वयं यहाँ तक आ गयी. उसके पाँवों का स्पर्श करके मैं निर्मल हो गया हूँ. उसके रूप का दर्शन कर मुझे भी रूप की प्राप्ति हो गयी है, अर्थात् पद्मावती के सौन्दर्य ने मानसरोवर को भी सुंदरता प्रदान कर दी है. उसके तन से मलयगिरि से चलने वाली हवा जैसी चंदन की सुगंध आ रही है. उसकी शीतलता ने शरीर की तपन बुझा दी है, अर्थात् पद्मावती के स्पर्श से मानसरोवर शीतल हो गया. न जाने कौन सी हवा चली जो पद्मावती को यहाँ ले आई. निश्चय ही, यह मेरे पुण्यों का फल है. यह सोचकर मानसरोवर ने खोए हुए हार को उसी क्षण सतह पर तैरा दिया, जिसे पाकर सखियाँ प्रसन्न हो उठीं और पद्मावती रुपी चंद्र मुस्करा उठा. चन्द्रमा अर्थात् पद्मावती की मुस्कान देखकर कुमुदिनियाँ अर्थात् सखियाँ भी मुस्कुराने लगीं. पद्मावती ने जिस किसी की  ओर भी नज़र दौड़ाई , वह पद्मावती जैसा ही हो गया. जैसे वे सभी चंद्रमुखी पद्मावती के लिए दर्पण हों.

        मानसरोवर के जल में खिले कमल पद्मावती के नैनों के प्रतिबिंब हैं. सरोवर का स्वच्छ जल पद्मावती की निर्मल काया का प्रतिबिंब है, उसकी हँसी ही सरोवर में हंसों के रूप में दिख रही थी जबकि उसकी दंत पंक्तियाँ सरोवर में हीरे-मोती के रूप में जगमगा रही थीं.

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