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पद्मावत-सुआ खंड- भाग-1

पदमावति तहँ खेल दुलारी । सुआ मँदिर महँ देखि मजारी ॥
कहेसि चलौं जौ लहि तन पाँखा । जिउ लै उडा ताकि बन ढाँखा ॥
जाइ परा बन खँड जिउ लीन्हें । मिले पँखि, बहु आदर कीन्हें ॥
आनि धरेन्हि आगे फरि साखा । भुगुति भेंट जौ लहि बिधि राखा ॥
पाइ भुगुति सुख तेहि मन भएऊ । दुख जो अहा बिसरि सब गएऊ ॥
ए गुसाइँ तूँ ऐस विधाता । जावत जीव सबन्ह भुकदाता ॥
पाहन महँ नहिं पतँग बिसारा । जहँ तोहि सुनिर दीन्ह तुइँ चारा ॥

तौ लहि सोग बिछोह कर भोजन परा न पेट ।
पुनि बिसरन भा सुमिरना जनु सपने भै भेंट ॥1

 

अर्थ : उधर पद्मावती मानसरोवर तट पर सखियों के साथ खेल रही थी, इधर महल में तोता अपनी मृत्यु (मजारी- मार्जारी-बिल्ली; सांकेतिक अर्थ :मृत्यु) को सामने देख कर चिंतित था. उसने सोचा, ‘जब तक पंखों में शक्ति है, यहाँ से भागकर प्राण बचाने का प्रयत्न करना चाहिए.’ यह सोचकर वह ढाक के जंगलों की ओर उड़ चला. उड़ते-उड़ते जंगलों में पहुंचकर ही उसने दम लिया. वहाँ वन के पक्षियों ने उसे बहुत सम्मान दिया और उसके आगे बहुत सारे फल लाकर रख दिये. जो भोजन भाग्य ने उसे दिया, उसने उसका सुखपूर्वक सेवन किया और मन के सारे दुःख भूल गया. उसने कहा- ‘हे ईश्वर, तू ऐसा विधाता है, जो सबको भोजन देता है. तू पत्थर के अंदर रहने वाले कीड़े को भी नहीं भूलता. जो भी तुझे याद करता है, तू उसे भोजन देता है.

           वियोग का दुःख तभी तक होता है, जब तक पेट में भोजन न हो. भोजन मिलते ही प्रिय की स्मृतियाँ ऐसे ही भूल जाती हैं, जैसे सपने की मुलाक़ात हो.

पदमावति पहँ आइ भँडारी । कहेसि मँदिर महँ परी मजारी ॥
सुआ जो उत्तर देत रह पूछा । उडिगा, पिंजर न बोलै छूँछा ॥
रानी सुना सबहिं सुख गएऊ । जनु निसि परी, अस्त दिन भएऊ ॥
गहने गही चाँद कै करा । आँसु गगन जस नखतन्ह भरा ॥
टूट पाल सरवर बहि लागे । कवँल बूड, मधुकर उडि भागे ॥
एहि विधि आँसु नखत होइ चूए । गगन छाँ सरवर महँ ऊए ॥
चिहुर चुईं मोतिन कै माला । अब सँकेतबाँधा चहुँ पाला ॥

उडि यह सुअटा कहँ बसा खोजु सखी सो बासु ।
दहुँ है धरती की सरग, पौन न पावै तासु ॥2

 

अर्थ: पद्मावती के वापस लौटने पर भंडार के रखवाले ने उसके पास आकर बताया- ‘महल में बिल्ली के आ जाने के कारण तुम्हारा पूछने पर उत्तर देने वाला तोता उड़ गया. अब पिंजरा खाली है.’ यह खबर सुनते ही पद्मावती की सारी ख़ुशी गायब हो गई, जैसे सूरज दिन में ही डूब गया और रात का अँधकार छा गया. उसकी ऐसी दशा हो गयी,जैसे चाँद को ग्रहण लग गया हो. उसके आँसू आकाश के नक्षत्रों की तरह बिखरने लगे. आँसू ऐसे बहने लगे, जैसे बांध टूटने से सरोवर का जल बहने लगा हो. उस जल में उसके नेत्र रुपी कमल डूब गए और भौंरे रुपी पुतलियाँ उड़ गईं. आँसू नक्षत्र बनकर चू रहे थे, जिनसे पूरा सरोवर भर गया. पद्मावती आँसू रुपी मोतियों से अपने बालों को गूंथना चाहती है, यह सोचकर उसके बालों में पहले से गूंथे मोती टूटकर बिखरने लगे.

           दुःख से बिलखती पद्मावती सखियों से बोली-‘ वह तोता उड़कर कहाँ बस गया है, हे सखियों उसे ढूंढो. वह इस मृत्युलोक में है या स्वर्ग चला गया, कहीं से उसकी हवा नहीं मिलती.’

जौ लहि पींजर अहा परेवा । रहा बंदि महँ, कीन्हेसि सेवा ॥
तेहि बंदि हुति छुटै जो पावा । पुनि फिरि बंदि होइ कित आवा ?
वै उडान-फर तहियै खाए । जब भा पँखी, पाँख तन आए ॥
पींजर जेहिक सौंपि तेहि गएउ । जो जाकर सो ताकर भएउ ॥
दस दुवार जेहि पींजर माँहा । कैसे बाँच मँजारी पाहाँ ?
चहूँ पास समुझावहिं सखी । कहाँ सो अब पाउब, गा पँखी ॥
यह धरती अस केतन लीला । पेट गाढ अस, बहुरि न ढीला ॥

जहाँ न राति न दिवस है , जहाँ न पौन न पानि ।
तेहि बन सुअटा चलि बसा कौन मिलावै आनि ॥3

 

अर्थ:  सखियों ने पद्मावती को समझाया-‘जब तक पक्षी पिंजरे में था, वह हमारा बंदी था और उसने हमारी सेवा की. अब जो बंदी छूट गया, वह फिर कैद में क्यों आएगा. उड़ने का आनंद तो उसने उसी दिन पा लिया था, जिस दिन उसके पंख आये थे. अब जिसका पिंजरा था, उसे सौंपकर वह फिर उड़ने निकल गया. जिस पिंजरे में दस द्वार हों और उसके पास बिल्ली रुपी मृत्यु हो, उसमें पक्षी कैसे बच सकता है? (मृत्यु की अनिवार्यता की ओर संकेत). अब उस पक्षी को कैसे पाया जा सकता है? यह धरती ऐसे कितनों को निगल गई. इसका इतना गहरा पेट है कि कभी कुछ भी नहीं छोड़ती.

          वह तोता वहाँ चला गया है, जहाँ न रात है, न दिन. जहाँ न जल है, न वायु. अब उससे कौन वापस मिला सकता है?

सुए तहाँ दिन दस कल काटी । आय बियाध ढुका लेइ टाटी ॥
पैग पैग भुईं चापत आवा । पंखिन्ह देखि हिए डर खावा ॥
देखिय किछु अचरज अनभला । तरिवर एक आवत है चला ॥
एहि बन रहत गई हम्ह आऊ । तरिवर चलत न देखा काऊ ॥
आज तो तरिवर चल, भल नाहीं । आवहु यह बन छाँडि पराहीं ॥
वै तौ उडे और बन ताका । पंडित सुआ भूलि मन थाका ॥
साखा देखि राजु जनु पावा । बैठ निचिंत चला वह आवा ॥

पाँच बान कर खोंचा, लासा भरे सो पाँच ।
पाँख भरे तन अरुझा, कित मारे बिनु बाँच ॥4

 

अर्थ: तोते ने दस दिन वहाँ आराम से काटे. तब वहाँ टाटी (पेड़ की नकली डालियों से बनी आड़) के पीछे छिपता हुआ बहेलिया आया. वह धरती पर दबे पाँव चलता हुआ आया, जिसे देखकर पक्षी डर गए- ‘यह पेड़ चलता हुआ आ रहा है, यह बड़े अचरज की बात है. इस वन में हम इतने दिनों से रह रहे हैं, कभी पेड़ को चलते नहीं देखा. अब यहाँ रहना सही नहीं. आओ इस वन को छोड़कर चलें.’ ऐसा कहते हुए वे पक्षी किसी और वन की ओर उड़ चले, लेकिन अपने विचारों में मग्न तोता वहीँ बैठा रहा. पेड़ों की डालियों को देखकर उसे ऐसा लगा, जैसे राज की प्राप्ति हो गयी होगी और वह निश्चिंत होकर डाल पर बैठ गया.

          बहेलिये ने उन डालों पर गोंद लगा रखा था, जिसमें तोता चिपक गया. अब मृत्यु के सिवा वह कैसे बचेगा?

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