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कृष्ण की चेतावनी (रश्मिरथी) – दिनकर

वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे। दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह

कलम या कि तलवार – दिनकर

दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति अजेय अपार अंध कक्षा में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान जला ज्ञान का दीप सिर्फ़ फैलाओगे उजियाली अथवा उठा कृपाण करोगे घर की भी रखवाली कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, दिल ही नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे एक भेद है और वहाँ निर्भय होते नर -नारी, कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले, बादलों में बिजली होती, होते दिमाग में गोले जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार, क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार

जाग तुझको दूर जाना – महादेवी वर्मा

आज महादेवी के जन्मदिन पर...... चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले! या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले; आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया जागकर विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले! पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना! जाग तुझको दूर जाना! बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले? पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले? विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन, क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस गीले? तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना! जाग तुझको दूर जाना! वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया, दे किसे जीवन-सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया! सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्या? विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया? अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना? जाग तुझको दूर जाना! कह न ठंढी साँस में

पद्मावत रत्नसेन जन्म खंड

चित्रसेन चितउर गढ राजा । कै गढ कोट चित्र सम साजा ॥ तेहि कुल रतनसेन उजियारा । धनि जननी जनमा अस बारा ॥ पंडित गुनि सामुद्रिक देखा । देखि रूप औ लखन बिसेखा ॥ रतनसेन यह कुल-निरमरा । रतन-जोति मन माथे परा ॥ पदुम पदारथ लिखी सो जोरी । चाँद सुरुज जस होइ अँजोरी ॥ जस मालति कहँ भौंर वियोघी । तस ओहि लागि होइ यह जोगी । सिंघलदीप जाइ यह पावै । सिद्ध होइ चितउर लेइ आवै ॥ मोग भोज जस माना, विक्रम साका कीन्ह । परखि सो रतन पारखी सबै लखन लिखि दीन्ह ॥1॥   अर्थ:  चितौड़ का राजा चित्रसेन था, उसने अपने किले को विचित्र परकोटों से सुसज्जित किया था. रत्नसेन ने उसके यहाँ जन्म लेकर उसके कुल को प्रकाशित कर दिया. ऐसे बालक को जन्म देने वाली माता भी धन्य है. पंडितों, विद्वानों और ज्योतिषियों ने उसके रूप और लक्षणों को देख कर उसके भविष्य के बारे में बताया. उनके अनुसार, यह बालक निर्मल रत्न के

नींद उचट जाती है – नरेंद्र शर्मा

जब-तब नींद उचट जाती है पर क्‍या नींद उचट जाने से रात किसी की कट जाती है? देख-देख दु:स्‍वप्‍न भयंकर, चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर; पर भीतर के दु:स्‍वप्‍नों से अधिक भयावह है तम बाहर! आती नहीं उषा, बस केवल आने की आहट आती है! देख अँधेरा नयन दूखते, दुश्चिंता में प्राण सूखते! सन्‍नाटा गहरा हो जाता, जब-जब श्‍वन श्रृगाल भूँकते! भीत भवना, भोर सुनहली नयनों के न निकट लाती है! मन होता है फिर सो जाऊँ, गहरी निद्रा में खो जाऊँ; जब तक रात रहे धरती पर, चेतन से फिर जड़ हो जाऊँ! उस करवट अकुलाहट थी, पर नींद न इस करवट आती है! करवट नहीं बदलता है तम, मन उतावलेपन में अक्षम! जगते अपलक नयन बावले, थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम! साँस आस में अटकी, मन को आस रात भर भटकाती है! जागृति नहीं अनिद्रा मेंरी, नहीं गई भव-निशा अँधेरी! अंधकार केंद्रित धरती पर, देती रही ज्‍योति च‍कफेरी! अंतर्यानों के आगे से शिला न तम की हट पाती है!

जो बीत गई सो बात गई

जो बीत गई सो बात गई जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में वह था एक कुसुम थे उसपर नित्य निछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया मधुवन की छाती को देखो सूखी कितनी इसकी कलियाँ मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में मधु का प्याला था तुमने तन मन दे डाला था वह टूट गया तो टूट गया मदिरालय का आँगन देखो कितने प्याले हिल जाते हैं गिर मिट्टी में मिल जाते हैं जो गिरते हैं कब उठतें हैं पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है जो बीत गई सो बात गई मृदु मिटटी के हैं बने हुए मधु घट फूटा ही करते हैं लघु जीवन लेकर आए हैं प्याले टूटा ही करते हैं फिर भी

पद्मावत-सुआ खंड- भाग-2

बँधिगा सुआ करत सुख केली । चूरि पाँख मेलेसि धरि डेली ॥ तहवाँ बहुत पंखि खरभरहीं । आपु आपु महँ रोदन करही ॥ बिखदाना कित होत अँगूरा । जेहि भा मरन डह्न धरि चूरा ॥ जौं न होत चारा कै आसा । कित चिरिहार ढुकत लेइ लासा ?॥ यह बिष चअरै सब बुधि ठगी । औ भा काल हाथ लेइ लगी ॥ एहि झूठी माया मन भूला । ज्यों पंखी तैसे तन फूला ॥ यह मन कठिन मरै नहिं मारा । काल न देख, देख पै चारा ॥ हम तौ बुद्धि गँवावा विष-चारा अस खाइ । तै सुअटा पंडित होइ कैसे बाझा आइ ?॥5॥   अर्थ: सुखों में खेलता सुआ कैद हो गया. तब बहेलिये ने उसके पंख मरोड़ कर उसे पिटारे में डाल दिया. वहाँ और भी बहुत सारे पक्षी थे, जिनमें खलबली मची थी. सभी अपना-अपना रोना रो रहे थे. ईश्वर ने विष से भरा फल क्यों उत्पन्न किया, जिसे खाकर यूं मरना पड़ा और पंख तुड़वाने पड़े. अगर हम

पथ की पहचान – हरिवंशराय बच्चन

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी, हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी, अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या, पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी, यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है, खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले। पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले। है अनिश्चित किस जगह पर सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे, है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे, किस जगह यात्रा ख़तम हो जाएगी, यह भी अनिश्चित, है अनिश्चित कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा, आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले। पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले। कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में, देखते सब हैं इन्हें अपनी उमर, अपने समय में, और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता, ये उदय होते

खड़ा हिमालय बता रहा है – सोहनलाल द्विवेदी

खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आंधी पानी में। खड़े रहो तुम अविचल हो कर सब संकट तूफानी में। डिगो ना अपने प्राण से, तो तुम सब कुछ पा सकते हो प्यारे, तुम भी ऊँचे उठ सकते हो, छू सकते हो नभ के तारे। अचल रहा जो अपने पथ पर लाख मुसीबत आने में, मिली सफलता जग में उसको, जीने में मर जाने में।

तुम आयी – केदारनाथ सिंह

तुम आयी जैसे छीमियों में धीरे- धीरे आता है रस जैसे चलते-चलते एड़ी में कांटा जाए धंस तुम दिखी जैसे कोई बच्चा सुन रहा हो कहानी तुम हंसी जैसे तट पर बजता हो पानी तुम हिली जैसे हिलती है पत्ती जैसे लालटेन के शीशे में कांपती हो बत्ती तुमने छुआ जैसे धूप में धीरे-धीरे उड़ता है भुआ और अंत में जैसे हवा पकाती है गेहूं के खेतों को तुमने मुझे पकाया और इस तरह जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से तुमने मुझे खुद से अलगाया.

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