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नया कवि : आत्म स्वीकार – अज्ञेय

किसी का सत्य था, मैंने संदर्भ से जोड़ दिया। कोई मधु-कोष काट लाया था, मैंने निचोड़ लिया। किसी की उक्ति में गरिमा थी, मैंने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया। कोई हुनरमंद था : मैंने देखा और कहा, 'यों!' थका भारवाही पाया- घुड़का या कोंच दिया, 'क्यों?' किसी की पौध थी, मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली, किसी की लगायी लता थी, मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली किसी की कली थी : मैंने अनदेखे में बीन ली, किसी की बात थी। मैंने मुँह से छीन ली। यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ : काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ? चाहता हूँ आप मुझे एक-एक शब्द सराहते हुए पढ़ें। पर प्रतिमा- अरे वह तो जैसी आपको रुचे आप स्वयं गढ़ें।

संध्या के बाद – सुमित्रानंदन पंत

जाड़ों की सूनी द्वाभा में
झूल रही निशि छाया गहरी,
डूब रहे निष्प्रभ विषाद में
खेत, बाग़, गृह, तरु, तट, लहरी।
बिरहा गाते गाड़ी वाले,
भूँक भूँक कर लड़ते कूकर,

आज हृदय भर-भर आता है – शमशेर

आज हृदय भर-भर आता है, सारा जीवन रुक-सा जाता; वह आँखों में छाए जाते कुछ भी देख नहीं मैं पाता ! कौन पाप हैं पूर्व-जन्म के, जिनका मुझको फल मिलता है? मैंने नगर जलाए होंगे, जो मेरा सब तन जलता है ! पथ नदियों के मोड़े होंगे, देश-देश तरसाया होगा, विकल सहस्त्र मीन सा तब तो यह पापी मन पाया होगा ! अनगिनती हृदयों की बस्ती, मैंने, आह! उजाड़ी होंगी, तब तो इतनी सूनी मेरे- प्राणों की फुलवाड़ी होगी! अपने लघु जीवन में कैसा छवि का निर्दय स्वप्न बसाया, जो सब कुछ हो स्वप्न गया है, मुझे बनाकर अपनी छाया ! घेर-घेर लेती है मुझको कैसी पतझर की सी आहें? बरसे आंसू का धुँधलापन रोक रहा है उर की राहें ! कितने करुणा के बादल हैं मेरे काल-क्षितिज के बाहर, जिनकी शीतल गति की छाया कभी-कभी पड़ती है मुझपर ! उठता सुख से सिहर मरुस्थल मेरे उर का- दो कण पाकर उस सुषमा की छाँह-निमिष का; जिस में अस्फुट-सा आशा-स्वर ! इस प्रकार कितनी आशाएँ . छोड़ गयीं निज शांत प्रतिस्वर, कितने प्रश्न हो गए उत्तर मौनह्रदय में ही उठ- उठ कर ! आज न जाने

शिशिर की राका-निशा – अज्ञेय

वंचना है चाँदनी सित, झूठ वह आकाश का निरवधि, गहन विस्तार- शिशिर की राका-निशा की शान्ति है निस्सार! दूर वह सब शान्ति, वह सित भव्यता, वह शून्यता के अवलेप का प्रस्तार- इधर-केवल झलमलाते चेतहर, दुर्धर कुहासे का हलाहल-स्निग्ध मुट्ठी में सिहरते-से, पंगु, टुंडे, नग्न, बुच्चे, दईमारे पेड़! पास फिर, दो भग्न गुम्बद, निविडता को भेदती चीत्कार-सी मीनार, बाँस की टूटी हुई टट्टी, लटकती एक खम्भे से फटी-सी ओढऩी की चिन्दियाँ दो-चार! निकटतर-धँसती हुई छत, आड़ में निर्वेद, मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में तीन टाँगों पर खड़ा, नतग्रीव, धैर्य-धन गदहा। निकटतम-रीढ़ बंकिम किये, निश्चल किन्तु लोलुप खड़ा वन्य बिलार- पीछे, गोयठों के गन्धमय अम्बार! गा गया सब राजकवि, फिर राजपथ पर खो गया। गा गया चारण, शरण फिर शूर की आ कर, निरापद सो गया। गा गया फिर भक्त ढुलमुल चाटुता से वासना को झलमला कर, गा गया अन्तिम प्रहर में वेदना-प्रिय, अलस, तन्द्रिल, कल्पना का लाड़ला कवि, निपट भावावेश से निर्वेद! किन्तु अब-नि:स्तब्ध-संस्कृत लोचनों का भाव-संकुल, व्यंजना का भीरु, फटा-सा, अश्लील-सा विस्फार। झूठ वह आकाश का निरवधि गहन विस्तार- वंचना है चाँदनी सित, शिशिर की

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,

नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! वह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अँधेरा, धूलि धूसर बादलों ने भूमि को इस भाँति घेरा, रात-सा दिन हो गया, फिर रात आ‌ई और काली, लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा, रात के उत्पात-भय से भीत जन-जन, भीत कण-कण किंतु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! वह चले झोंके कि काँपे भीम कायावान भूधर, जड़ समेत उखड़-पुखड़कर गिर पड़े, टूटे विटप वर, हाय, तिनकों से विनिर्मित घोंसलो पर क्या न बीती, डगमगा‌ए जबकि कंकड़, ईंट, पत्थर के महल-घर; बोल आशा के विहंगम, किस जगह पर तू छिपा था, जो गगन पर चढ़ उठाता गर्व से निज तान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों में उषा है मुसकराती, घोर गर्जनमय गगन के कंठ में खग पंक्ति गाती; एक चिड़िया चोंच में तिनका लि‌ए जो जा रही है, वह सहज में ही पवन उंचास को नीचा दिखाती! नाश के दुख से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख प्रलय की निस्तब्धता से सृष्टि का नव गान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का

ले चल वहाँ भुलावा देकर – जयशंकर प्रसाद

ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक ! धीरे-धीरे । जिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरी, निश्छल प्रेम-कथा कहती हो- तज कोलाहल की अवनी रे । जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया, ढीली अपनी कोमल काया,

प्रयाण गीत (चंद्रगुप्त नाटक से) – जयशंकर प्रसाद

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती 'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!' असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी! अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो, प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

सखि वे मुझसे कह कर जाते – मैथिलीशरण गुप्त

सखि, वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते? मुझको बहुत उन्होंने माना फिर भी क्या पूरा पहचाना? मैंने मुख्य उसी को जाना जो वे मन में लाते। सखि, वे मुझसे कहकर जाते। स्वयं सुसज्जित करके क्षण में, प्रियतम को, प्राणों के पण में, हमीं भेज देती हैं रण में - क्षात्र-धर्म के नाते सखि, वे मुझसे कहकर जाते। हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा, किसपर विफल गर्व अब जागा? जिसने अपनाया था, त्यागा; रहे स्मरण ही आते! सखि, वे मुझसे कहकर जाते। नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते, पर इनसे जो आँसू बहते, सदय हृदय वे कैसे सहते ? गये तरस ही खाते! सखि, वे मुझसे कहकर जाते। जायें, सिद्धि पावें वे सुख से, दुखी न हों इस जन के दुख से, उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ? आज अधिक वे भाते! सखि, वे मुझसे कहकर जाते। गये, लौट भी वे आवेंगे, कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे, रोते प्राण उन्हें पावेंगे, पर क्या गाते-गाते ? सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

हल्दीघाटी – द्वादश सर्ग – श्यामनारायण पाण्डेय

निर्बल बकरों से बाघ लड़े¸ भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से। घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी¸ पैदल बिछ गये बिछौनों से॥1॥ हाथी से हाथी जूझ पड़े¸ भिड़ गये सवार सवारों से। घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े¸ तलवार लड़ी तलवारों से॥2॥ हय–रूण्ड गिरे¸ गज–मुण्ड गिरे¸ कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे। लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे¸ भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे॥3॥ क्षण महाप्रलय की बिजली सी¸ तलवार हाथ की तड़प–तड़प। हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा¸ लेती थी बैरी वीर हड़प॥4॥ क्षण पेट फट गया घोड़े का¸ हो गया पतन कर कोड़े का। भू पर सातंक सवार गिरा¸ क्षण पता न था हय–जोड़े का॥5॥ चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी¸ लेकर अंकुश पिलवान गिरा। झटका लग गया¸ फटी झालर¸ हौदा गिर गया¸ निशान गिरा॥6॥ कोई नत–मुख बेजान गिरा¸ करवट कोई उत्तान गिरा। रण–बीच अमित भीषणता से¸ लड़ते–लड़ते बलवान गिरा॥7॥ होती थी भीषण मार–काट¸ अतिशय रण से छाया था भय। था हार–जीत का पता नहीं¸ क्षण इधर विजय क्षण उधर विजय॥8॥ कोई व्याकुल भर आह रहा¸ कोई था विकल कराह रहा। लोहू से लथपथ लोथों पर¸ कोई चिल्ला अल्लाह रहा॥9॥ धड़ कहीं पड़ा¸ सिर कहीं पड़ा¸ कुछ भी उनकी पहचान नहीं। शोणित का ऐसा वेग बढ़ा¸ मुरदे

रामदास – रघुवीर सहाय

चौड़ी सड़क गली पतली थी दिन का समय घनी बदली थी रामदास उस दिन उदास था अंत समय आ गया पास था उसे बता, यह दिया गया था, उसकी हत्या होगी धीरे धीरे चला अकेले सोचा साथ किसी को ले ले फिर रह गया, सड़क पर सब थे सभी मौन थे, सभी निहत्थे सभी जानते थे यह, उस दिन उसकी हत्या होगी खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर दोनों हाथ पेट पर रख कर सधे कदम रख कर के आए लोग सिमट कर आँख गड़ाए लगे देखने उसको, जिसकी तय था हत्या होगी निकल गली से तब हत्यारा आया उसने नाम पुकारा हाथ तौल कर चाकू मारा छूटा लोहू का फव्वारा कहा नहीं था उसने आखिर उसकी हत्या होगी? भीड़ ठेल कर लौट गया वह मरा पड़ा है रामदास यह 'देखो-देखो' बार बार कह लोग निडर उस जगह खड़े रह लगे बुलाने उन्हें, जिन्हें संशय था हत्या होगी।

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