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संवत्सर –अज्ञेय

संवत्सर –अज्ञेय

मैं उन लोगों में से नहीं हूँ, जो बड़े तड़के उठकर टहलने जाते हैं और पौ फटने से पहले ही लौट भी आते हैं. ऐसे लोगों का विशेष प्रशंसक भी नहीं हूँ. ये लोग रोज़ नियमपूर्वक इतनी जल्दी उठ लेते हैं, इससे तो प्रभावित हूँ; और तर्क के लिए यह भी मान लूँगा कि सवेरे की हवा बहुत अच्छी होती है. लेकिन मैं घूमने जाता हूँ तो अँधेरा तो देखने नहीं जाता – कम-से-कम रोज़ केवल अँधकार देखने की बात तो मेरी समझ में नहीं आती. कभी- कभी अवश्य अँधेरा भी सुंदर लगता है. और उसकी यह उपयोगिता भी मैं स्वीकार कर लूँगा कि वह अपने को देखने में सहायक होता है. अपने को देखना भी कभी-कभी तो ठीक है.

      बाहर निकल कर नयी-नयी धूप देखी तो बढ़ता चला गया और पाया कि सैर को निकल पड़ा हूँ. उन ब्राह्म मुहूर्त वालों की तरह मेरे लिए सैर का अर्थ केवल सड़क की लंबाई नापना नहीं है, इसलिए जब सैर को निकल ही पड़ा तो बगीचे की ओर मुड़ गया. जानता था कि फूल इन दिनों नहीं होंगे और घास पर कुहरा भी होगा और गहरी ओस तो होगी ही. पर ओस पर धूप का अपना सौन्दर्य होता है.

      ओस पर धूप की ओर भी लोगों का ध्यान जाता है और गया है: लेकिन सोचता हूँ कि कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोग जो चीज़ देखते हैं उसकी तरफ़ उनका ‘ध्यान’ जाता है और उनकी ‘दृष्टि’ नहीं जाती. अब ओस की बूँद को ही लीजिये : आप उसे देखें और सवेरे की धूप में देखें तो कई चीज़ें देखने की होती हैं. वैसे उम्र के भी भार से घास की अनी नीचे को झुक जा सकती है: कितनी नरम है घास लेकिन कितनी जिजीविषु ! धूप में ओस की बूँद कैसी चमक उठती है और धूप-किरणों को रंगों में विकसित कर देती है. छायावादी मुहावरे में कहा जाता है कि ‘मरकत-शिला पर हीरक-कण’ बिखरे हैं. लेकिन मैं छायावादी नहीं हूँ और मुझे दूब की हरियाली पर ओस मरकत-शिला पर हीरक-कण की अपेक्षा कहीं अधिक सुंदर और प्राणवान् दिखती है.

     लेकिन मैं कह रहा था कि बहुत से लोग ध्यान देते हैं और देखते नहीं हैं. अब उन लोगों को क्या कहिए जिन्हें ओस की बूँद में केवल नश्वरता दिखती है और धूप का चमत्कार नहीं दिखता: यह ठीक है कि धूप पड़ते ही ओस की बूँद भाप बन कर उड़ने लगती है. यह भी ठीक है कि भोर की पहली किरण के साथ ही प्रायः हवा भी सरसरा उठती है और घास की पत्तियों के हिलने से ओस की बूँदें एक-दूसरे से मिलती हैं और मिलते ही भार के कारण झर जाती हैं- देखने वाले न हों तो इसमें यह भी ‘देखेंगे’ कि मिलन का क्षण भी कितना नश्वर है.

     लेकिन जो लोग देखना भूल कर केवल ध्यान देने में खो जाते हैं वे भी ध्यान भी तो पूरा नहीं देते: नहीं तो ध्यान में तो यह बात भी आनी चाहिए कि  ये सारी छोटी क्रियाएँ एक महान प्रक्रिया की अंग हैं और वह महान प्रक्रिया न सान्त है, न नश्वर है. अगर हमें जो सामने है उसे देखना नहीं है, उसकी ओर केवल ध्यान देना है, तो ध्यान देने की बात नश्वरता की नहीं बल्कि इस अनाद्यंत प्रक्रिया की है जिसमें ओस की बूँद भी है और घास की पत्ती भी, हमारा ध्यान, हमारी दृष्टि और स्वयं हम भी; जिसमें किरण ही नहीं, सूर्य,चंद्र, तारा-मंडल सभी कुछ है.

    ओस की बूँद ही क्यों, मैं तो झरते पत्ते को देखकर भी अटक जाता हूँ. सचमुच अटक जाता हूँ, पहले झरना ही लीजिये. एक तरफ़ वह झर कर गिरता है तो दूसरी तरफ़ वह झरना, प्रपात की स्त्रोतस्विता है : पत्ता भी झरता है और वन-झरना भी झरता है और वन झरने की धार भी झरती है – और उसका झरना ही अनन्त प्रक्रिया है. झरता पत्ता भी अगर एक ओर अपने अन्त का संकेत देता है तो दूसरी ओर क्या उस प्रक्रिया का भी संकेत नहीं देता जिसमें अन्त है ही नहीं, केवल अर्थ-क्रियाओं की सनातनता है? इसीलिए झरता पत्ता तो मैंने कई बार देखा है, लेकिन हर बार उसमें अटक गया हूँ. और तब से तो चिरकाल के लिए उसमें अटक गया हूँ जबसे मैंने देखा कि डाल से झरता पत्ता नीचे न गिर कर अधर में ही एक दूसरी डाल से अटक गया – जो दूसरी डाल अभी हरी थी :
झरना : झरता पत्ता

हरी डाल से

अटक गया

मेरी समझ में तो यह प्रक्रिया का पूर्ण चित्र है और मैं इसी चित्र में बहुत अटका हूँ. मेरी दीठ भी वहीँ अटकी है और मेरा ध्यान भी वहीँ अटका है. नश्वरता का मेरे लिए कभी कुछ विशेष अर्थ नहीं हुआ, लेकिन हर चीज़ मिटती हुई किसी प्राणवान चीज़ की प्राणवत्ता में अपना योग दे जाती है, यह मैंने बार-बार देखा है और हर बार पाया है कि इससे एक अंतःस्फूर्ति मिलती है जो स्वयं प्राणदायिनी है. हो सकता है ऐसा इसलिए है कि मैं जंगलों में अधिक रहा हूँ, प्रकृति के निकट अधिक रहा हूँ.

         तर्क के लिए तो कोई यह भी स्मरण दिला सकता है कि ध्यान (ज्झान) परंपरा के श्रमण भी प्रकृति के निकट रहते थे और प्रकृति से उन्हें नश्वरता-भंगुरता- का ही सन्देश मिलता था.  लेकिन मैं कहूँगा कि ध्यान-सम्प्रदाय की चर्चा में केवल यहीं तक जाकर रुक जाना उसे अधूरा ही देखना-समझना है. वे प्रकृति के निकट रहने का आग्रह करते थे तो केवल नश्वरता की याद बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि ‘सतत आवर्तन’ की याद बनाए रखने के लिए. जो कुछ है सब मिटता जाएगा—लेकिन मिट जाने के लिए नहीं, इसलिए कि दूसरा कुछ बनता जाएगा.

         पुराने आरण्यक-आश्रमिक भी प्रकृति के निकट रहते थे. वे भी देखते थे कि जो बनता है वह मिटता भी है. लेकिन इस देखने में उन्होंने जीवन की नश्वरता नहीं देखी. मुझे लगता है कि वे लोग देखकर भी देखते रह सके, केवल ध्यान में नहीं खो गए. उन्होंने जीवन को नश्वर नहीं माना, सनातन आवर्तन-प्रक्रिया में योग देने से अपना हाथ नहीं खींचा. ओस की बूँद में धूप की चमक देखकर उन्हें मृत्यु का स्मरण नहीं आया बल्कि उन्होंने उस सवितृ का स्तवन किया जो सारी प्रक्रिया की गति बढ़ाता है. साथ-साथ हमारी प्रत्यभिज्ञा-संपन्न बुद्धि की भी—धियो यो नः प्रचोदयात् . तभी तो वे कह सके: देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति.

          मेरी समझ में तो ऐसा देखना ही देखना है जो कि ध्यान में ऐसा खो नहीं जाता कि दिखना बंद हो जाए—जिसमें केंद्रित अवधारणा ‘देखने’ की गहराई बढ़ाकर उसे ‘पहचान’ का रूप दे देती है, केवल रूपक अथवा रूपकात्मक चिंतन का आधार नहीं बना देती.

         और कभी-कभी सोचता हूँ कि वनाश्रम में बैठा हुआ यह दर्शक-चिंतक कैसे द्रष्टा बन गया—कितनी दूर-दूर तक वह नहीं देखता रहा ! इसीलिए तो वह कभी मरण का दार्शनिक नहीं बना, जीवन का ही दार्शनिक बना रहा और निरंतर जीवन का ही स्तवन करता रहा. यहाँ तक कि मृतक के संस्कार में भी वह यह नहीं भूला कि जो देह शव होकर अपवित्र हो जाती है वह भी प्रक्रिया में पड़कर जो जीवित है उसकी प्राणवत्ता में योग देती है—धुआँ बनकर, चाँदनी बनकर, मेघ बनकर, वर्षा बनकर, पृथ्वी की उर्वरा शक्ति बनकर….

         वह द्रष्टा देखता है कि प्रक्रिया सनातन है: प्रक्रिया भी है और सनातन भी है इसलिए मूलतः स्थिर भी है और गतिमान भी है. शिव भी है और शक्ति भी, पुरुष भी है और प्रकृति भी, काल भी है और ऋत भी, सत्य भी है और ऋतु भी. उस द्रष्टा के लिए संवत्सर प्रजापति था. संवत्सर मृत्यु भी था, लेकिन वह विनाश नहीं करता था क्योंकि उसके पास ऋतु-कर्म का अक्षय भंडार था. संवत्सर ही एक यज्ञ था : रातें यज्ञ-सामग्री का अक्षय भंडार थीं और दिवस उस अग्नि-चयन की यजुष्मती ईंटें थीं. संवत्सर ही अग्नि था जो सब के भीतर क्रियाशील प्राण-स्रोत है. और इस यज्ञ में जीव-मात्र निरंतर योग दे रहा था—बिना उसके योग के संवत्सर की गति नहीं थी. और प्रजापति भी मानो पंगु होकर रह जाता था.

          और यह भी नहीं कि बौद्ध चिंतन ने भी केवल नश्वरता को ही देखा. उसके लिए भी प्रक्रिया प्रधान थी और सनातन थी, नश्वरता तो उसका एक लक्षण मात्र था. उसके तर्क में भी तो काल सनातन था और दिक् की वैसी कोई सत्ता नहीं थी. आश्चर्य होता है जब आज हम पाते हैं कि आधुनिक वैज्ञानिक भी जब यह देखता है कि न तो वह दिक् का सहारा लिए बिना काल को प्रमाणित कर सकता है, न काल का सहारा लिए बिना दिक् को प्रमाणित कर सकता है, तब वह देश काल सातत्य की अवधारणा करके मानो सारी समस्या ही टाल जाता है. यह जो सातत्य है यह बौद्धों के संसार से कहाँ भिन्न है ? – यानी कहाँ भिन्न है जहाँ तक कि उस भेद को जान सकना हमारे लिए संभव है या होगा ! इसी बात में न, कि बौद्ध चिंतक की अवधारणा में इसकी गुंजाइश थी कि हम कभी उस प्रक्रिया के बाहर चले जाएँ—काल ही निर्वापित हो जाए —-और वैज्ञानिक उस सातत्य से बाहर किसी तरह के ‘होने’ की कल्पना नहीं करता, नहीं कर सकता? लेकिन जहाँ तक परिणाम का प्रश्न है, न तो हम देश-काल-सातत्य के बाहर जाकर उसे देख सकते हैं, न निर्वाण में पहुँचकर जान सकते हैं कि वह क्या होता है. उसके बारे में कुछ पूछना अतिप्रश्न हो जाता है. यम भी नचिकेता को यह आशीर्वाद देकर भी कि ‘तेरे जैसे पूछने वाले और भी हुआ करें!’ इस प्रश्न पर पहुंचकर उसे टोक देता है. ….

        सचमुच कुछ प्रश्नों की सफलता इसी बात में होती है कि हम उस प्रश्न पर पहुँच गए हैं. उस प्रश्न का उत्तर भी हो, इसकी अपेक्षा वहाँ नहीं रहती. दूसरे शब्दों में, ऐसे प्रश्नों का सही उत्तर यही होता है कि यह जिज्ञासु भाव लेकर हम जीवन की ओर लौट आएँ और उसे जिज्ञासुवत् हो जिएँ. निरे छिद्रान्वेषी को भले ही यह लगता रहे कि वह प्रश्न अनुत्तरित रह गया, वह अपना काम पूरा कर चुका होता है; उसने अर्थवत्ता का एक नया आयाम हमारे समक्ष खोल दिया होता है. जो इस प्रश्न तक पहुँच जाते हैं, साहस करके यह प्रश्न पूछ लेते हैं, उनका जीवन ही बदल जाता है. शायद पहुँचे हुए होने का अर्थ यही है— उस प्रश्न-भाव तक पहुँचे हुए होना. जिसके सहारे हम जीवन के एक दूसरे आयाम की देहरी पर पहुँच जाते हैं. मुझे तो लगता है कि यहाँ पहुँचना उस बिंदु पर पहुँचना है जहाँ हम केवल ऋतु में न जीकर काल में जीने लगते हैं, केवल प्रकृति से घिरे और बंधे न रहकर पुरुष से जुड़ जाते हैं.

       और शायद यज्ञ के यजमान मात्र न रहकर उसके प्रजापति भी हो जाते हैं.

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