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सिकंदर हार गया-अमृतलाल नागर

अपने जमाने से जीवनलाल का अनोखा संबंध था। जमाना उनका दोस्‍त और दुश्‍मन एक साथ था। उनका बड़े से बड़ा निंदक एक जगह पर उनकी प्रशंसा करने के लिए बाध्‍य था और दूसरी ओर उन पर अपनी जान निसार करनेवाला उनका बड़े से बड़ा प्रशंसक किसी ने किसी बात के लिए उनकी निंदा करने से बाज नहीं आता था, भले ही ऐसा करने में उसे दुख ही क्‍यों न हो। परिचित हो या अपरिचित, चाहे जीवनलाल का शत्रु ही क्‍यों न हो, अगर मुसीबत में है तो वह बेकहे-बुलाए आधी रात को भी तन-मन-धन से उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाते थे। उस समय वे अपने नफे-नुकसान की तनि‍क भी परवाह न करते थे। लेकिन व्‍यवहार में बड़ी ओछी तबीयत के थे, अपने टके के लाभ के लिए किसी की हजारों की हानि करा देने में उन्‍हें तनिक भी हानि न होती थी। वह स्‍त्री के संबंध में भी बड़े मनमाने थे। इज्जत-आबरूदार लोग उनसे अपने घर की स्त्रियों का परिचय कराने में हिचकते थे और ऐसा करने पर भी वे प्रायः जीवनलाल से जीत नहीं पाते थे। शहर के कई प्रतिष्ठित धनीमानियों की घेरलू अथवा व्‍यावसायिक अथवा दोनों तरह की आबरूओं को उन्‍होंने अपने खूबसूरत शिकंजे में जकड़ रखा था, वह भी इस तरह कि ‘हम मासूम हैं। तुम्‍हारे गुनाह में फँसाए गए हैं, खुद गुनहगार नहीं।’

जीवन बाबू तकदीर के सिकंदर थे। बहुत-से पुरुष सुंदर होते हैं, मगर अक्‍सर वे ही स्त्रियों को अपनी ओर आकर्षित कर पाते हैं, जिनका सौंदर्य नारी जैसा कोमल न होकर पुरुष जैसा कठोर होता है। ऐसे लोग पुरुषों के बीच में अपनी छाप छोड़ते हैं और स्त्रियों में धाक जमाते हैं। जीवनलाल ऐसा ही रूप और डील-डौल लेकर एक मामूली-से क्‍लर्क के यहाँ जन्‍मे थे। अपने स्‍कूल-कॉलेज के जीवन में वे न कभी फैल हुए और न ‘प्रोमोटेड’ जैसी निचली श्रेणी में ही पास हुए, मगर अध्‍ययन प्रिय लड़कों में उनकी गिनती कभी नहीं हुई। हाँ, खेल-कूद, नाटक-जलसे जैसे कामों में वे हमेशा चोटी के लीडर माने गए और यहीं से बड़े-बड़े घरों के सहपाठियों के सहारे उनके घरों में उनका आना-जाना भी आरंभ हुआ। शुरू से ही उन्‍हें ऊँची हैसियतवालों का साथ पसंद था। दस वर्ष पहले जीवनलाल ने एक नए स्‍थापित होनेवाले ईंटों की भट्ठे पर क्‍लर्की से अपना जीवन आरंभ किया था और आज वे स्‍वयं अपने भट्ठे के मालिक, रेलवे के बड़े ठेकेदार और अब शहरी इमारतों के भी ठेकेदार हो गए थे। शहर में उनके आठ मकान किराए पर उठे हुए थे। खुद अपने लिए भी एक छोटी-सी अमेरिकन स्‍टाइल की खूबसूरत बँगलिया उन्‍होंने बनवा ली थी। एक गाड़ी भी थी। रहन-सहन ठाटदार था। जीवनलाल देखते ही देखते नगर के प्रसिद्ध व्‍यक्तियों में से एक हो गए थे।

‘प्रकाश ब्रिक वर्क्‍स’ के मालिक लाला शंभूनाथ उनके एक सहपाठी के चचेरे भाई थे। तभी से दोस्‍ती हो गई थी। लाला शंभूनाथ यों तो स्‍वयं भी एक लखपति घराने के ही थे, लेकिन उनका विवाह एक ऐसे घर की इकलौती लड़की से हुआ, जो उत्‍तराधिकार में इतनी संपदा साथ लाई थी, जितनी उनके सम्मिलित कुटुंब की थी। शंभूनाथ बड़े गंभीर, दुनियादार और कुशल व्‍यवसाय-बुद्धि के थे। उन्‍होंने अपनी पत्‍नी की जायदाद को अपने श्रम से कुछ अधिक बढ़ाया। उनकी पत्‍नी प्रकाशो बीबी यों बड़ी पति-परायण थीं, पर उनके घमंड से पति परमेश्‍वर को भी दबना पड़ता था। शंभूनाथ ने अपनी पत्‍नी से बाकायदा। लिखा-पढ़ी करके पचीस हजार रुपया लिया और ईंटों का भट्ठा खोला था। जीवनलाल उन दिनों काम की तलाश में भटक रहे थे। संयोग से शंभूनाथ मिल गए। बातों-बातों में जीवनलाल ने कहा, ”यार, कोई काम बताओ।” तो शंभूनाथ ने कहा कि मेरे भट्ठे का हिसाब-किताब सँभालो। अभी सौ रुपये दूँगा, बाद में काम जम जाने पर बढ़ा दूँगा। जीवनलाल जब ‘प्रकाश ब्रिक वर्क्‍स’ के क्‍लर्क बने, उस समय शंभूनाथ की आयु पैंतीस-छत्‍तीस के लगभग थी, उनकी पत्‍नी उनसे पाँच-छह वर्ष छोटी थी। वे चार बच्‍चों के माता-पिता थे। जीवनलाल आयु में दोनों से छोटा 25 वर्ष का था, इसलिए घर में बच्‍चों का चाचा बनकर प्रवेश किया।

लाला शंभूनाथ तौलनेवाली नजर रखने के बावजूद शक्‍की स्‍वभाव के थे। वे शुरू से ही अपने-आपको जीवनलाल के व्‍यक्तित्‍व की चुंबक शक्ति से बचते रहे, फिर भी उन्‍होंने अपने को क्रमशः उनके वश में होते हुए पाया। वे उन्‍हें छोटे भाई की तरह प्‍यार करने लगे। पाँच वर्षों के अंदर ही जीवनलाल ‘प्रकाश ब्रिक वर्क्‍स’ के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक व्‍यक्ति बन गए। इनके काम, व्‍यवहार, ईमानदारी और कठिन परिश्रमी वृत्ति पर रीझकर लाला शंभूनाथ जब इन्‍हें अपना पूरा विश्‍वास दे बैठे थे, तब एक दिन अचानक उन्‍हें महसूस हुआ कि वे अपने जीवन का सबसे करारा धोखा खा गए हैं। उनका अत्‍यधिक विश्‍वासपात्र कर्मचारी उनकी अत्‍यधिक विश्‍वासपात्री गृहलक्ष्‍मी के प्रेम का साझेदार बन गया था।

प्रकाशो बीबी यों पुरुष-सुख की भूखी या अधिक बदनीयत न थीं। उन्‍हें अपने बाल-बच्‍चेदार और कुलीन होने का भी चौकस होश था, पर हुआ यह कि चतुर, दबंग और दूसरों पर हुकूमत करनेवाली नारी अपने जीवन में पहली बार किसी पुरुष को सच्‍चा आदर-भाव देने के लिए अपने-आप से मजबूर हो गई थी। भट्ठे का हिसाब-किताब सँभालते-सँभालते जीवनलाल शंभूनाथ की दौड़-धूप बचाने के लिए अक्‍सर प्रकाशो बीबी की जायदाद का काम भी सँभालने लगे। उनकी सलाहों पर चलकर जहाँ शंभूनाथ को अपने धंधे में मिला, वहाँ ही प्रकाशो बीबी के बैंक के खाते में भी ऐसी बढ़ोत्‍तरी दिखाई दी कि प्रकाशो बीबी ने अपने पति पर दबाव डालकर जीवनलाल को उनके भट्ठे की नौकरी से हटाकर अपनी जायदाद और अपने पैतृक काम-धंधे का मैनेजर बना दिया। उन्‍होंने कुछ एक जायदादों की खरीदी-बेची में प्रकाशो बीबी को कुछ ही महीनों में साढ़े पाँच लाख रुपयों का धनी बना दिया। प्रकाशो बीबी बेहोशी में जीवनलाल पर रीझी और जीवनलाल ने बड़ी होशियारी से उस रीझ को भुनाकर ऐसे कमजोर क्षणों में प्रकाशो बीबी को अपने वश में कर लिया कि उन्‍हें अपने पाप पर पछताने तक का अवसर न मिला। इसके बाद जैसे शंभूनाथ अपनी पत्‍नी के पैसे पर अपना स्‍वतंत्र विकास कर रहे थे, वैसे ही जीवनलाल भी करने लगे। शंभूनाथ उनसे ईर्ष्‍या करके भी उनसे अपना संबंध तोड़ नहीं पाते थे। ‘प्रकाश ब्रिक वर्क्‍स’ फर्म के अधीन ही उन्‍होंने रेलवे की इमारतें बनाने का ठेका प्रकाशो बीबी के पैसे के बूते लिया। मुनाफे में आठ आने अपने, छह प्रकाशो बीबी के और दो आने शंभूनाथ के भी रखे। इन ठेकों का खाता अलग था। फर्म का नाम एक ही था। शंभूनाथ अपनी इज्जत ओर मुनाफे के लालच में जीवनलाल से अपना नाता न तोड़ पाते थे। जीवनलाल उनके सामने बराबर यही झलकाता कि दोष मेरा नहीं तुम्‍हारी पत्‍नी का है। स्‍वयं प्रकाशो बीबी के ऊपर भी वह ऐसी धौंस जमा देता था, ”तुम रीझी थीं। तुम्‍हारी रीझ में अगर मेरा पुरुष-मन लुभा गया तो यह दोष मेरा नहीं।’ मन ही मन में एक जगह उनसे प्रकाशो बीबी भी कहती थी और शंभूनाथ भी। पर दोनों उन्‍हें छोड़ नहीं सकते थे, खासतौर से स्‍त्री का अपराध-जटिल हठीला मन अब अपने अपराध के कारण को छोड़ने के लिए तनिक भी तैयार न था।”

जीवनलाल के जीवन में यही एक घटना घटी हो सो बात नहीं। रईस स्त्रियों पर अपना रंगीन प्रभाव जमाने में वे कुछ तो चतुर थे और कुछ सिकंदर भी। हर शरीफ आदमी अपने घर में उनका आना हर्गिज पसंद नहीं करता था। फिर भी कोई उन्‍हें अपने घर में आने से रोक नहीं सकता था। उनकी आँखों की मोहिनी शक्ति, उनके व्‍यवहार की मिठास सबको मजबूर करती थी।

जीवनलाल की उम्र के छत्‍तीसवें साल में उनके जीवन में एक विशेष घटना घटी। शहर में लोहे के मशहूर व्‍यापारी लाला मुसद्दीलाल की विधवा बेटी से उनका विवाह हुआ। यह सदाचारी; व्‍यभिचारी अपने होनेवाले बच्‍चे की माता और उसके प्रतिष्ठित नानाकुल की मान-रक्षा के लिए ही विवाह करने को मजबूर हुआ था; मगर इस समय तक उनका मन कुछ इस तरह पक चुका था कि वे किसी भी स्‍त्री के चरित्र पर विश्‍वास ही न कर पाते थे। लीला इनके घर में क्‍या आई, कैद में पड़ गई और ये घर से बँधने लगे। अपने मन का संदेह इन्‍हें चैन नहीं लेने देता था। दिन में आठ-आठ, दस-दस बार बिना किसी काम-काज के ही ये अचानक घर का चक्‍कर काट जाते। रेलवे की इमारतों का ठेका होने की वजह से महीने में पंद्रह दिन इन्‍हें दौरे पर भी रहना पड़ता था। ये रात में अचानक लौटकर अपनी पत्‍नी के सतीत्‍व की परीक्षा करने के लिए बहाने-बहाने से सारे घर की जाँच किया करते थे। बहाने से पलंग के नीचे झाँकना, बहाने से कबर्ड खोलकर देखना, सर्दी की रातों में भी बहाने से छत झाँक आना इनकी आदत में शामिल हो गया।

लीला छह महीने में ही इनसे तंग आ गई। वह अक्‍सर झुँझला पड़ती थी, खीझ-खीझ उठती थी। लीला चतुर गृहिणी थी। वह अपने पति के कारोबार का हिसाब-किताब जाँचने-सहेजने के कारण एक प्रकार से उनकी प्राइवेट सेक्रेटरी भी हो गई थी। अपने पति के शक मिटाने के लिए उसने प्रयत्‍न किए, पर जितना ही वह एकनिष्‍ठ सिद्ध करने का प्रयत्‍न करती, उतना ही वे चौंकते जाते थे।

ए‍क दिन म्‍यूनिसिपैलिटी के एग्जीक्‍यूटिव अफसर श्री त्रिभुवननाथ कौल के घर उनके बेटे की सालगिरह के उपलक्ष्‍य में पति-पत्‍नी की दावत थी। अपने बच्‍चे विवेक को आया की निगरानी में घर पर छोड़कर वे लोग गए थे। कौल साहब ने दूसरे मेहमानों के लौट जाने के बाद भी इन्‍हें रोके रखा। मिसेज कौल से लीला का घना बहनापा था। कुछ बिजनेस का मामला भी था। म्‍यूनिसिपल बोर्ड शहर में कुछ इमारतें बनवाने जा रहा था। घरेलू रिश्‍ते ने स्‍वार्थ का रिश्‍ता भी बाँधा। कौल साहब के कारण ही जीवनलाल का तीस लाख का टेंडर मंजूर हो चुका था। इसलिए जीवनलाल का कौल साहब से स्‍वार्थ अटका था और कौल का जीवनलाल से। जीवनलाल कौल साहब का आग्रह टाल नहीं सकते थे।

रात के एक बजे घर लौटने पर कपड़े बदलते समय अचानक लीला ने उनसे कहा, ”तुम्‍हारे कौल साहब की नजर अच्‍छी नहीं।”

जीवनलाल के कलेजे में तीर बिंध गए। लीला ने आगे कहा, ”मनोरमा भी उनकी बदनजर को बढ़ावा देती है।”

जीवनलाल का खून बर्फ हो गया। लीला मिसेज कौल के साथ घर के अंदर ही बैठी रही थी, मिस्‍टर कौल उनसे बातें करते हुए बीच में पाँच-छह बार घर के अंदर गए थे। एक बार तो पंद्रह मिनट तक उन्‍हें अकेले ही बैठा रहना पड़ा था – यह सब उन्‍हें याद आने लगा। जीवनलाल गूँगे रह गए।

एक दिन लीला अपने पिता के घर गई थी। शाम को जीवनलाल जब अपने घर लौटकर आए तो उन्‍होंने बड़ी उतावली के साथ अपनी ससुराल में फोन किया। पता लगा कि लीला वहाँ से कौल साहब के यहाँ गई है। जीवनलाल को करारा आघात लगा। वे बिना खाए-पिए ही आरामकुर्सी पर पड़ रहे। एक बार जी में आया कि कौल के यहाँ टेलीफोन करें, मगर फिर उस इच्‍छा को दबा गए।

रात के साढ़े दस बजे लीला आई। जीवनलाल ने देखा, उसके गले में नौरतन का बड़ टीकोंवाला हार था। पता लगा कि मिस्‍टर कौल ने आठ हजार के दो हार खरीदे – एक अपनी पत्‍नी के लिए और दूसरा जीवनलाल की पत्‍नी के लिए। तीस लाख के टेंडर का लालच रहते हुए भी यह चार हजार का नौरतीनी हार जीवनलाल के संपूर्ण जीवन को निगलता हुआ नजर आया। जीवन फिर भी खामोश रहे।

इसके बाद अक्‍सर ही जब वे घर लौटकर आते तो उन्‍हें नौकरों से, बच्‍चे की आया से खबर मिलती कि सेठानी साहब कौल साहब के यहाँ गई हैं। कौल साहब से मिलने पर जीवनलाल कटकर रह जाते। इनकी नजरें उनके सामने उठती न थीं। उनके सामने इन्‍हें बार-बार ऐसा महसूस होता कि विश्‍व-विजेता सिकंदर किसी साधारण शत्रु से हार गया है। जीवनलाल कौल साहब से अक्‍सर मिलने के लिए मजबूर थे, क्‍योंकि ठेका स्‍वीकार कर लेने के बाद वे उसमें कई लाख रुपया फँसा चुके थे। यह रुपया उनका अपना न था। चार महाजनों से लिया गया था और उसका ब्‍याज उन पर दौड़ने लगा था। लक्ष्‍मी और महालक्ष्‍मी के मोह ने उन्‍हें झिंझोड़ना शुरू कर दिया। जीवनलाल अपने को कठघरे में बंद शेर की तरह अनुभव करते थे।

उनका बच्‍चा छह महीने का हो गया था। जीवनलाल अपने बच्‍चे को बेहद चाहते थे। इसके पहले भी वे पिता बने थे, मगर उन्‍हें पिता कहलाने का अधिकार इस बच्‍चे के द्वारा पहली बार प्राप्‍त हुआ था। जीवनलाल बच्‍चे की दुहाई देकर अपनी पत्‍नी को इशारे से समझाते और पत्‍नी सुनकर भी अनसुना कर जाती। जब कभी जवाब देती तो बहुत पैना।

आरंभ के चार महीनों में बात धीरे-धीरे ही बढ़ती रही। उनकी पत्‍नी का श्रीमती कौल के घर आना-जाना दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था। अक्‍सर ही पति-पत्‍नी इनके यहाँ खाने पर बुलाए जाते, अक्‍सर ही सिनेमा देखने का प्रोग्राम भी बनता था। किसी के घर में कोई खास चीज बनती तो दूसरे के यहाँ जरूर भेजी जाती। शुरू में अक्‍सर और फिर तो सुबह-शाम जब भी जीवनलाल घर में रहते, उनके कानों में दो-एक बार यह भनक अवश्‍य ही पड़ती, ”मेम साब, कौल साब का फोन है।” सुनकर मेम साब ऐसे भागतीं, जैसे लोहा चुंबक की ओर आता है। एक बार शाम को घर लौटकर आने पर मालूम हुआ कि मेम साहब कौल साहब की कोठी पर गई हैं। रात मैं लौटकर भी न आईं, न कोई संदेश ही मिला। दूसरे दिन सवेरे हारकर स्‍वयं ही फोन किया। श्रीमती कौल से बातें हुईं। पता लगा कि लीला तो त्रिभुवन के साथ कल शाम ही बाहर गई है, वह शायद आज तीसरे पहर तक आएगी।

जीवनलाल झटका खा गए। अपने ऊपर बहुत संयम रखकर उन्‍होंने बड़ी विनय के साथ श्रीमती कौल से कहा, ”मेरी तकदीर में जो कुछ बदा होगा सो होगा ही, मगर आप अपने जीवन को क्‍यों नष्‍ट कर रही हैं?”

श्रीमती कौल ने एक आह भरकर कहा, ”अब उसका क्‍या किया जाए जीवनलाल जी। फिर भी अपनी तरफ से मैं यह कोशिश कर रही हूँ कि लीला मेरी दुश्‍मन न बने। इसीलिए बच्‍चे को मैंने अपने पास ही रख लिया है। उन दोनों को आजादी दे दी है।”

”मैं अपने बेटे को लेने के लिए अभी आता हूँ।” जीवनलाल की अहंता उनके स्‍वर में अपने बेटे पर अधिकार करने के लिए केंद्रित हो उठी, किंतु उधर से श्रीमती कौल का उत्‍तर आया, ”इस समय आने का कष्‍ट न करें, लाल साहब! आपका फोन आने के वक्त मैं कार में बैठ चुकी थी। मैं अभी-अभी अपनी चचेरी बहन के यहाँ जा रही हूँ, रुक नहीं सकती, और बच्‍चा भी मेरे ही साथ जा रहा है।”

जीवनलाल तड़पकर रह गए। उस दिन वह काम-धाम में अपना मन न लगा सके। तीसरे पहर लीला जब अपने बेटे के साथ घर आई तो पति को घर में ही पाया। लीला को देखते ही एक बार तो उनकी आँखों में खून झलक आया, परंतु उन्‍होंने अपने-आप पर काबू पा लिया। ठंडे स्‍वर में बोले, ”मेरे साथ जो चाहो सो करो, पर अपने बच्‍चे के हक में क्‍यों काँटे बोती हो, लीला?”

सुनकर लीला की त्‍योरियाँ चढ़ गईं, कहा, ”बच्‍चे से तुम्‍हें क्‍या मतलब?”

सुनकर जीवनलाल के रोम-रोम में आग सुलग उठी, तड़पकर बोले, ”बच्‍चा मेरा है।”

वैसी ही तड़प-भरी आवाज में लीला का उत्‍तर मिला, ”वह तुम्‍हारे पाप से पैदा हुआ है, तुम्‍हारे पुण्‍य से नहीं। उसका बाप एक व्‍यभिचारी पुरुष है। व्‍यभिचारी किसी का पिता या पति नहीं होता, वह केवल बुरा होता है। फिर बुरा चाहे किसी भी नाम का हो, क्‍या फर्क पड़ता है।”

अहंता की कचोटें यह सुनकर एकाएक थम गईं। करारा आघात खाकर वह मानो जड़ हो गईं। मनोवृत्तियाँ निकम्‍मी पड़ने लगीं, आग की लपटें अपने-आप ही को खाकर क्रमशः मंद पड़ने लगीं। कमजोरी के अथाह सागर में आदर्श के तिनके का सहारा लेकर जीवनलाल ने कुछ उखड़ी और कुछ बुझी-सी आवाज में कहा, ”स्‍त्री जाति ही तो दुनिया की इज्जत है। औरत को लेकर ही इज्जत का सवाल उठता है। मेरी और तुम्‍हारी बुराई में बहुत अंतर है।”

”मगर मेरी बुराई की जड़ भी तुम्‍हीं हो। पराई औरतों की इज्जत बिगाड़ने में मजा आता है? मैं भी कभी पराई थी, तब उपदेश न दिया?”

जीवनलाल सिर झुकाए बैठे रहे, गोया कमरे में अकेले बैठे रहे, फिर तेजी से उठकर बाहर चले गए। उन्‍होंने इस तरह झटके के साथ कुर्सी छोड़ी, मानो पिस्‍तौल का ट्रिगर छोड़ा हो, इस तरह खटखट गए मानो गोली छूटी हो।

जीवनलाल उस समय सचमुच घातक मूड में थे। यदि उनके पास पिस्‍तौल होती तो शूट कर देते – शायद लीला को – शायद अपने को – या शायद दोनों को ही। हिंसा का जब मूड बना तो अपना सब-कुछ, घर-मकान, बाग-बाड़ी, जमीन-जायदाद, इज्जत-आबरू, दीन-दुनिया सब-कुछ, धूल-खाक कर देने की तमन्‍ना बवंडर-सी उठी और रोम-रोम पर छा गई, पर वे किसी को न मार सकते थे, वे अपने गुनाह के एहसास से बँधे हुए थे। उस बंधन को तोड़ नहीं सकते थे। जब लाला शंभूनाथ ने उनकी और प्रकाशो बीबी की चोरी पकड़ी, तब प्रकाशो बीबी ने किस दृढ़ता के साथ पति को अपने प्रेम में बाधक होने से रोका था। जीवनलाल तब मन ही मन में कितने प्रसन्‍न हुए थे। लाला शंभू के चरित्र में इस प्रकार की कोई खोट न थी। वे पत्‍नी के धन से दबे थे और इशारतन जीवनलाल उस दबाव को बढ़वाया ही करते थे। लेकिन अपने केस में वे खुद ही दबे थे। लीला को भी उन्‍होंने खींच-खींचकर अपनी वासना का भोग बनाया था। वे किस जबान से लीला को, श्री या श्रीमती कौल को बुरा कहते? अपने परोपकार से दबाकर उन्‍होंने कितना ही मध्‍यवर्गीय गरीब स्त्रियों और कुमारियों को अपनी इच्‍छा के आगे समर्पित कराया था। वे अपनी दुराचारी वृत्ति के दास थे। यह सच है कि वे इस लालच से ही परोपकार न करते थे, पर यह भी सच है कि अपनी इस कुदरती खूबी का फायदा वे अपने तन की प्‍यास बुझाने के लिए खूब उठाते थे।

दिन बीतने लगे। लीला और जीवनलाल की बोलचाल एकांत में एकदम बंद हो गई। चार के समाज में वे अपना रिश्‍ता कायम रखते थे। लीला उस समय इनसे इतना मीठा व्‍यवहार रखती कि इन्‍हें भी दिखावे से मजबूर होकर मिठास घोलनी ही पड़ती थी। जीवनलाल अधिक-से अधिक घर से बाहर रहने लगे। उन्‍होंने काम में अपने-आपको जी-जान से झोंक दिया। उनकी यह हार्दिक इच्‍छा थी कि म्‍यूनिसिपैलिटी का काम जितनी जल्‍द हो सके पूरा कर दिया जाए, जिससे कि भविष्‍य में वे कौल साहब के प्रभाव से बच सकें, शायद तब वे लीला के ऊपर भी अंकुश रख सकें। उनका ऐश-आराम छूट गया था, हाँ, फुरसत मिलने पर वे शराब अधिक पीने लगे। वे शहर की जानी-पहचानी नजरों से कन्‍नी काटने लगे थे। हर एक की नजरों में उन्‍हें अपने लिए मखौल और ताना भरा नजर आता था। अकेलेपन की साथी व्हिस्की के गिलास के साथ सन्‍नाटे के क्षणें में अक्‍सर उनके कानों में नगर-भर की काँव-काँव गूँजा करती, ”जीवन, तूने बहुत से पतियों, पिताओं और माताओं के कलेजे चीरे हैं… तू शहद-भरी छुरी है। तेरे कलेजे में घाव करने के लिए भी एक शहद-भरी छुरी आई। तेरा रकीब तेरे कलेजे में घाव कर तेरा उपकार करता है। याद कर, जब तू शंभूनाथ पर अपना उपकार लादता था, तब उनकी नजरें तेरी ही तरह झुकी रहती थीं। उस समय उनका चेहरा भी दिल की टीस को उसी तरह कसे रखता था, जैसे आजकल तू रखता है।”

उदार प्रकृति के लोग अपने दुर्भाग्‍य का बोझ पराए दोषों पर बहुत अधिक नहीं पटका करते, वे अपने दोषों के बोझ से स्‍वयं दबते और पीड़ा पाते रहते हैं। जीवनलाल ऊँची उमर में आकर विवाह के चक्‍कर में फँसे और विवाह के पहले ही बरस में ऐसी गाज गिरी कि उनके जीवन की धारा ही रुकती नजर आई। वे बिजनेस में अपना मन फेंकते-न फेंकते तो क्‍या करते-दिल के तपते रेगिस्‍तान को उठाए-उठाए उनके प्राण बावले हो जाते। जीवनलाल अपनी निगरानी में बनती हुई इमारतों के नक्शों में, निर्माण में, उसके हिसाब-किताब में सुबह से लेकर रात तक हठपूर्वक लगे रहते थे। उन्‍हें एक क्षण की छुट्टी नहीं थी। उन्‍हें चैन नहीं था। चैन सिर्फ दो ही चीजों में पाते थे। लीला के घर में न होने पर अपने बच्‍चे के साथ खेलने में या ड्राइंग-रूम को बंद कर व्हिस्की और सिगरेट को साथ लेकर दर्द से घुटने और फिलॉसफी सोचने में।

दस-ग्‍यारह महीनों में ही जीवनलाल का स्‍वास्‍थ्‍य गिर गया। उनके दोस्‍त-अहबाब चिंता करने लगे। लीला ने फिर भी पति के प्रति अपने व्‍यवहार का रूखापन और कसाव न छोड़ा। लीला इन्‍हें छेदने के लिए हरदम पैनी बनी रहती थी। लीला किसी भी बहाने सुना-सुनाकर कौल द्वारा दी भेंटों का बखान करती। कई गहने, कई साड़ियाँ लीला और मिसेज कौल के एक-से हो गए थे। बच्‍चे के लिए भी अक्‍सर आते-आते बहुत-से खिलौने त्रिभुवननाथ कौल की भेंट के रूप में जमा हो चुके थे। लीला के कमरे में एक बेशकीमती वार्डरोब भी कौल की भेंट के रूप में जीवनलाल की दृष्टि में हरदम चुभा करता था।

एक दिन बच्‍चे के कमरे में प्रवेश करने पर जीवनलाल ने देखा कि जहाँ उनकी, लीला की, लीला के पिता की तस्‍वीरें रक्‍खी हुई थीं, वहाँ अब एक और फोटोग्राफ भी शामिल हो गया था। इस फोटो में त्रिभुवननाथ कौल के एक ओर उनकी पत्‍नी खड़ी थी और दूसरी ओर लीला, उनका बच्‍चा विवेक त्रिभुवननाथ की गोद में था। देखते ही जीवनलाल पर ऐसी बीती कि मन का बाँध टूट गया। वे स्थिर न रह सके, आपा खो बैठे। तस्‍वीर हाथ में लिए हुए वे तेजी से बाहर निकल आए।

लीला अपने कमरे में लेटी हुई कोई उपन्‍यास पढ़ रही थी।

जीवनलाल ने कड़ककर आवाज दी, ”लीला !”

लीला चौंक गई। यह स्‍वर नया था। उसने घूमकर जीवनलाल को देखा और बैठी हो गई।

जीवनलाल उसके सामने आकर उसकी नजरों में एक बार देखकर क्रमशः अपनी उत्‍तेजना खोने लगे। एक सेकेंडों के लिए उनकी गति ठिठक गई, इतने में ही गालियाँ प्रार्थना बन गईं, कलेजे के गुबार निकलते समय अचानक अपील की तरह सामने आए। उन्‍होंने कहा, ”तुम भले ही गैर की हो जाओ, मगर मेरे बच्‍चे को मुझसे मत छीन।”

”मैंने कब छीना है?”

”यह-यह क्‍या है?” जीवनलाल ने तस्‍वीर दिखलाते हुए कहा, ”बड़े होने पर यह फोटो दिखला-दिखलाकर मेरे बच्‍चे को यह बहकाओगी कि जिसकी गोद में खड़ा है, वही उसका पिता है।”

”मैं तुमसे बदला लूँगी, क्‍योंकि मैं तुमसे घृणा करती हूँ, मगर अपने बच्‍चे से भला क्‍यों बदला लूँगी।”

”मेरे सवाल से इस जवाब का क्‍या संबंध है?”

”विवेक से झूठ बोलकर मुझे लाभ क्‍या होगा?”

”तब तुमने क्‍यों एक ऐसे शख्स की गोद में देकर उसका फोटो खिंचवाया है, जो कि उसका पिता नहीं है, लेकिन उसकी माँ का… और… वह तस्‍वीर होश सँभालने के पहले ही उसके कमरे में रख दी गई है…।”

”इसे रखते समय मेरी इच्‍छा तो यह थी कि तुम्‍हारी तस्‍वीर वहाँ से हटा दूँ। विवेक के होश सँभालने पर तस्‍वीरों के संबंध में पूछने पर मैं कम से कम अच्‍छे लोगों का परिचय उसे दे सकूँगी। तुम्‍हारे जैसे लंपट, दगाबाज, मीठी छुरी का परिचय देकर मैं अपने बेटे के कान अपवित्र नहीं करना चाहती।”

”लेकिन तुम, कौल या उसकी बदकार बीवी ही…।”

”हम तीनों…” जीवनलाल की पत्‍नी ने शेरनी की तरह तड़पकर कहा, ”हम तीनों में, वह पुरुष जिसकी गोद में विवेक खड़ा है, उसमें और तुममें वही फर्क है जो गंगा और नाले में है।”

”एक ही पाप के लिए मैं बुरा और वह…।”

”वह किसी ऐसे पाप के अपराधी नहीं हैं, उनकी पत्‍नी को इसका पूरा विश्‍वास है।”

”तुमने मुझसे कहा था कि त्रिभुवन और उसकी बीवी…।” जीवनलाल ने क्रांतिकारी के समान उत्‍तेजित होकर पूछा।

जीवनलाल की बात तेजी से काटते हुए लीला बोली, ”झूठ कहा था।”

”क्‍यों?”

”सुनोगे?” लीला बेहद पैने स्‍वर में बोली, ”मैं तुमसे घृणा करती हूँ। मेरा रोआँ-रोआँ प्रतिहिंसा से हर समय सुलगा करता है। तुमने मुझे मीठे ठग की तरह लूटा और जब मैं एक नई जान से मजबूर होकर तुम्‍हारे यहाँ आई तो तुम मेरे ऊपर शक और शुबहे से भरी निगरानी करने लगे। मेरे यहाँ आने के बाद भी खुद सब तरह के दुराचार करते हुए मुझे सतीत्‍व की जेल में कैद करना चाहा। मैं अपनी इच्‍छा से सती हूँ। एक पुरुष की पत्‍नी होना मेरे मिजाज को सुहाता है – यह अलग बात है। मगर तुम्‍हारे दबाए हरगिज न दबूँगी। यह सोचकर मैंने यह नाटक रचा। जो भेंटें कौल साहब के नाम से आई हैं, वह मैंने अपने पिता के पैसे से खरीदी हैं।”

जीवनलाल विश्‍वास-अविश्‍वास की रस्‍साकशी में जड़-से बन गए। कुछ क्षण बाद अचानक उन्‍होंने फिर पूछा, ”तुम्‍हारे और मिसेज कौल के कपड़े-जेवर जो एक-से।”

मिसेज कौल के पति से हमें करीब पाँच लाख की बचत का काम मिला है – उनसे रिश्‍ता बनाए रखने के लिए आठ-दस हजार रुपये खर्च कर देना बड़ी बात नहीं, तुम्‍हारी जानकारी में भी दे सकती थी, लेकिन मैं तुमसे घृणा करती हूँ – इतनी…।”

जीवनलाल ठहाका मार-मारकर हँस पड़े और काफी देर तक हँसते रहे। लीला कुछ न समझकर उन्‍हें देखती रही। हँसी का दौर कम होने पर हाँफते हुए और हँसते हुए कहा, ”तुम मुझे बहुत प्‍यार करती हो। वरना तुम्‍हारे मुँह से आज सच हरगिज न सुन पाता…। मेरे मन का मुर्दा बोझ उतर गया। ओह अब तुम मुझसे घृणा करो लीला, जी चाहे जितनी करो, मेरा जीवन मुरझाएगा नहीं और खिलेगा, नित नया होकर महकेगा।”

सहसा पासा पलट गया। सती पत्‍नी को दुराचारी पति की उदारता के सामने अपनी बदला लेने की संकीर्ण वृत्ति मन-ही-मन बुरी तरह से गड़ने लगी। हर व्‍यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुसार बुरा भी है और भला भी। लोग दूसरों की बुराइयों को मारना चाहते हैं और अपनी बुराइयों के प्रति करुणा प्रकट करते हैं। यह कैसा अन्‍याय है? अगर जीवनलाल ने एक तरह से अन्‍याय किया है तो लीला ने दूसरी तरह से। लीला सोचने लगी कि वह नारी होकर भी बेहद कठोर है। वह जीवनलाल से बहुत महँगा बदला ले रही है। क्‍या उसे अपने पति को घुला-घुलाकर मार डालना है?

लीला ने कनखियों से अपने पति की ओर देखा, ‘ये कितने दुबले हो गए हैं।’

पहली बार लीला को अपने पति के स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता हुई, वह पति जिससे उसे नफरत थी।

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