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पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-प्रथम पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

सिंघलदीप कथा अब गावौं । औ सो पदुमिनी बरनि सुनावौं ॥
बरन क दरपन भाँति बिसेखा । जौ जेहि रूप सो तैसई देखा ॥
धनि सो दीप जहँ दीपक-बारी । औ पदमिनि जो दई सँवारी ॥
सात दीप बरनै सब लोगू । एकौ दीप न ओहि सरि जोगू ॥
दियादीप नहिं तस उँजियारा । सरनदीप सर होइ न पारा ॥
जंबूदीप कहौं तस नाहीं । लंकदीप सरि पूज न छाहीं ॥
दीप कुसस्थल आरन परा । दीप महुस्थल मानुस-हरा ॥

सब संसार परथमैं आए सातौं दीप ।
एक दीप नहिं उत्तिम सिंघलदीप समीप ॥1

अर्थ: अब मैं सिंहलद्वीप की कथा सुनाता हूँ और पद्मिनी का वर्णन करता हूँ. यह वर्णन दर्पण की तरह जिसमें हर व्यक्ति वैसा ही देखेगा ,जैसा उसका रूप है. अर्थात् हर व्यक्ति अपने स्वभावानुसार इसका आस्वादन करेगा. वह द्वीप धन्य है, जहाँ ईश्वर ने सौन्दर्य के दीपक के समान प्रकाश बिखेरने वाली पद्मिनी को जन्म दिया है. सभी लोग सात द्वीपों का वर्णन करते हैं,लेकिन उनमें से कोई भी सिंहलद्वीप के समान नहीं है. दिया द्वीप (दीउ) नाम का ही दिया है, उसमें सिंहल द्वीप के समान प्रकाश नहीं है . सरन द्वीप (सुमात्रा) भी इसकी तुलना में नहीं है. जम्बूद्वीप भी इसके जैसा नहीं. लंका द्वीप तो उसकी छाया के बराबर भी नहीं है. कुशा द्वीप जंगल के समान है और मरुस्थल निर्जन पड़ा है.

इस संसार में सर्वप्रथम इन्हीं सात द्वीपों को माना जाता था,लेकिन इनमें से कोई भी द्वीप सिंहलद्वीप के समकक्ष नहीं है.

ग्रंध्रबसेन सुगंध नरेसू । सो राजा, वह ताकर देसू ॥
लंका सुना जो रावन राजू । तेहु चाहि बड ताकर साजू ॥
छप्पन कोटि कटक दल साजा । सबै छत्रपति औ गढ -राजा ॥
सोरह सहस घोड घोडसारा । स्यामकरन अरु बाँक तुखारा ॥
सात सहस हस्ती सिंघली । जनु कबिलास एरावत बली ॥
अस्वपतिक-सिरमोर कहावै । गजपतीक आँकुस-गज नावै ॥
नरपतीक क कहाव नरिंदू । भुअपती क जग दूसर इंदू ॥
ऐस चक्कवै राजा चहूँ खंड भय होइ ।
सबै आइ सिर नावहिं सरबरि करै न कोइ   ॥2

अर्थ: सिंहलद्वीप के  राजा गंधर्वसेन के यश की सुगंध चारों ओर फैली हुई है. जैसा वह राजा है, वैसा ही उसका यह देश है. रावण की लंका से भी ज्यादा शोभा गंधर्वसेन के राज की है. उसके यहाँ छप्पन करोड़ सैनिकों की सेना है और सारे छत्रपति राजा उसकी सेवा करते हैं. उसके अस्तबल में तुषार देश से लाये गये श्यामकर्ण जाति के सोलह हजार बलशाली घोड़े हैं. उसके पास सात हजार सिंहली हाथी हैं, जो स्वर्ग के ऐरावत हाथी के समान बलशाली हैं. वह अश्वपति राजाओं का सिरमौर कहा जाता है. दूसरे राजा उसके समक्ष ऐसे ही झुकते हैं, जैसे गजपति के अंकुश के सामने हाथी झुक जाता है. वह राजाओं का राजा कहा जाता है और भूपतियों के लिए इंद्र के समान है.

ऐसे चक्रवर्ती नरेश का भय चारों ओर व्याप्त है. सारे राजा उसके पास सिर झुका कर आते हैं . कोई उसकी बराबरी नहीं कर सकता.

जबहि दीप नियरावा जाई । जनु कबिलास नियर भा आई ॥
घन अमराउ लाग चहुँ पासा । उठा भूमि हुत लागि अकासा ॥
तरिवर सबै मलयगिरि लाई । भइ जग छाँह रैनि होइ आई ॥
मलय-समीर सोहावन छाहाँ । जेठ जाड लागै तेहि माहाँ ॥
ओही छाँह रैनि होइ आवै । हरियर सबै अकास देखावै ॥
पथिक जो पहुँचै सहि कै घामू । दुख बिसरै, सुख होइ बिसरामू ॥
जेइ वह पाई छाँह अनूपा । फिरि नहिं आइ सहै यह धूपा ॥

अस अमराउ सघन घन, बरनि न पारौं अंत ।
फूलै फरै छवौ ऋतु , जानहु सदा बसंत ॥3

अर्थ: जैसे जैसे द्वीप के निकट आते हैं, ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग के निकट आ गये. चारों ओर इतनी घनी और विशाल अमराइयाँ लगी है कि लगता है पृथ्वी से उठ कर आकाश तक गई हैं. वृक्ष इतने सुगन्धित हैं,जैसे मलय पर्वत से लाये गए हैं. इन वृक्षों की छाया इतनी सघन है कि दिन में रात का भ्रम उत्पन्न होता है. इस छाँह में मलय की हवा सुहावनी लगती है. शीतल मलय वायु के कारण यहाँ जेठ में भी जाड़ा रहता है. वृक्षों की हरीतिमा के कारण संपूर्ण आकाश हरा प्रतीत होता है. जो पथिक धूप और गर्मी सहकर यहाँ तक पहुँच जाता है, वह अपने सारे कष्ट भूलकर सुख और आराम पा जाता है. जो भी इस अनुपम छाया का अनुभव कर लेता है , वह फिर धूप के कष्ट नहीं सहता.

इस अमराई का वर्णन संभव नहीं है, जहाँ छहो ऋतुओं में फल लगे रहते हैं और इस प्रकार सदैव वसंत का मौसम होता है.

फरै आँब अति सघन सोहाए । औ जस फरे अधिक सिर नाए ॥
कटहर डार पींड सन पाके । बडहर, सो अनूप अति ताके ॥
खिरनी पाकि खाँड अस मीठी । जामुन पाकि भँवर अति डीठी ॥
नरियर फरे फरी फरहरी । फुरै जानु इंद्रासन पुरी ॥
पुनि महुआ चुअ अधिक मिठासू । मधु जस मीठ, पुहुप जस बासू ॥
और खजहजा अनबन नाऊँ । देखा सब राउन-अमराऊ ॥
लाग सबै जस अमृत साखा । रहै लोभाइ सोइ जो चाखा ॥

लवग सुपारी जायफल सब फर फरे अपूर ।
आसपास घन इमिली औ घन तार खजूर ॥4

अर्थ: सिंहलद्वीप में आमों से लदे सघन वन सुहावने लग रहे हैं. वृक्षों में जितने ज्यादा फल लगे हुए हैं, उनकी शाखाएं उतनी ही ज्यादा झुकी हुई हैं. कटहल की शाखाएं तनों तक पकी हुई हैं. यहाँ के बड़हर भी अनूठे हैं. पकी हुई खिरनियाँ खांड जैसी मीठी लग रही हैं. पके हुए जामुन भौंरों की तरह काले दिखाई दे रहे हैं. नारियल के फल और खुरहुरी की बेलें भी लगी हुई हैं. फूलों से लदा उपवन इंद्र के नंदन कानन की तरह लग रहा है. वृक्षों से टपकने वाले महुए में अत्यधिक मिठास है. ये शहद के समान मीठे और फूलों के समान सुगन्धित हैं. यहाँ इतने तरह के फल हैं कि उनके नाम भी याद नहीं आते. इतने फल यहाँ के अतिरिक्त सिर्फ रावण के उपवन में देखे जा सकते हैं. ये सारे फल अमृत के समान हैं. जो भी इन्हें चख लेता है, वह इसके लोभ में पड़ जाता है.

यहाँ इन फलों के अतिरिक्त लौंग, सुपारी,जायफल, इमली ताड़ और खजूर के वृक्ष भी लगे हुए हैं.

2 thoughts on “पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-प्रथम पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

  1. मै कहने ही वाला था। . इस कहानी के लिए . .
    धन्यवाद।
    गुरू जी

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