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सफरनामा सिंदबाद जहाजी का – कन्हैयालाल नंदन की बाल कथा

अरसा काफी लंबा गुजर चुका था. सिंदबाद के मन में यह लहर बार-बार दौड़ रही थी कि वह अपनी तिजारत को हिन्दुस्तान तक फैला दे. उसने एक दिन तय कर ही लिया कि वह हिन्दुस्तान जाएगा. उसने अपनी गठरियों में तिजारती सामान बाँध लिया. वह बसरा के लिए रवाना होने ही वाला था कि उसके पास एक आदमी दौड़ता हुआ आया. वह आदमी और कोई नहीं, वही हिंदबाद था जो बग़दाद की सड़कों पर टहलते हुए सिंदबाद के महल के नीचे आकर बैठ गया था. उसने बाइज्जत सिंदबाद को मशवरा दिया कि अब उसे समुद्री जहाज से जाने की ज़रुरत नहीं है. अब तो आपको हवाई जहाज से सफ़र करना चाहिए, वरना हिन्दुस्तान के लोग आपको निहायत पिछड़ा हुआ मानेंगे.         सिंदबाद ने मशविरे के लिए हिंदबाद का शुक्रिया अदा किया और अपना साफा संभालते हुए सोच में पड़ गया कि हवाई सफ़र पता नहीं कैसा हो. लेकिन तभी सिंदबाद को

मिर्ज़ा चोया – के. पी. सक्सेना

शुरू करता हूँ गणपति गणेश उर्फ़ अपने अल्ला मियाँ के नाम से, जिसने बनाया एक नन्हा सा शहर बरेली और उसमें फिट कर दिया मिर्ज़ा चोया को. हमें बचपन के मिर्ज़ा चोया और होली की मिली-जुली याद आती है तो हंसी छूट  जाती है. उन दिनों हमारा भरपूर बचपन था और मिर्ज़ा चोया की जवानी. मिर्ज़ा का नाम कुछ भी रहा हो, मगर मुंह के कोने से हर समय लार की बूँदें लीक होती रहने के कारण सब लोग उन्हें मिर्ज़ा चोया कहते थे. जहाँ बेचारे ने कुछ कहने को मुंह खोला कि टप से लार चू पड़ी.         लाल धारियों वाली घुटनों से नीची नेकर, बुंदकीदार ढीली-ढाली कमीज, गले में बंधा रोएँदार लार सोखने वाला बिब, पाँव में क्रिकेट वाले जूते-मोज़े, बगल में दबा बड़ा-सा गुब्बारा और हाथ में छोटा-सा बैडमिंटन रैकिट और ‘चुड़िया’ (वे शटल कॉक को चिड़िया की जगह ‘चुड़िया’ ही कहते थे) !          ऐसे थे हमारे नन्हे-मुन्ने

चन्दनवुड चिल्ड्रन स्कूल- के. पी. सक्सेना

आँख मुलमुल...गाल...गुलगुल...बदन थुलथुल, मगर आवाज बुलबुल ! वे मात्र वन पीस तहमद में लिपटे, स्टूल पर उकडूं बैठे, बीड़ी का टोटा सार्थक कर रहे थे ! रह-रह कर अंगुलियों पर कुछ गिन लेते और बीड़ी का सूंटा फेफड़ों तक खींच डालते थे! जहां वे बैठे थे वहाँ कच्ची पीली ईंट का टीन से ढका भैंसों का एक तवेला था ! न कोई खिड़की न रौशनदान ! शायद उन्हें डर था कि भैंसें कहीं रोशनदान के रास्ते ख़िसक ने जाएं ! सुबह सवेरे का टाइम था और भैंसें शायद नाश्तोपराँत टहलने जा चुकी थीं ! तवेला खाली पड़ा था ! उन्होंने मुझे भर आँख देखा भी नहीं और बीड़ी चूसते हुए अंगुलियों पर अपना अन्तहीन केल्क्यूलेशन जोड़ते रहे !... मैंने उनसे सन्दलवुड चिल्डन स्कूल का रास्ता पूछा तो उनकी आंखों और बीड़ी में एक नन्ही सी चमक उभरी !...धीरे से अंगुली आकाश की ओर उठा दी गोया नया चिल्ड्रन स्कूल कहीं अन्तरिक्ष

अगला स्टेशन – केशवचंद्र वर्मा

इस देश के तमाम लोगों की तरह मुझे भी यकीन हो रहा है कि इस देश के भविष्‍य का निर्माण करने का काम सिर्फ फिल्‍मों का है। जैसा संदेश लोगों में पहुँचाना हो, वैसी फिल्‍म बनाकर लोगों को दिखला दीजिए - बस, दुनिया अपने-आप बदलती चली जाएगी। इधर जैसे ही मुझे फिल्‍मों के जरिए यह संदेश मिला, कि 'समाज को बदल डालो', तैसे ही मैंने अपनी समाज-सेवा को अधिक गहरे स्‍तर पर करने का फैसला कर लिया, और मौके की तलाश करने लगा, ताकि मैं समाज को एक ही दाँव में बदल दूँ! इस तरह के मौके रोज-रोज आते नहीं, कि आपको समाज को बदल डालने का अधिकार सब लोग देते फिरें। लेकिन आदमी लगन का पक्‍का हो, तो समाज एक-न-एक दिन मौका देता ही है। और इस विचार को कार्य में बदल डालने की शुरुआत मैंने रेलवे-स्‍टेशन से करने का शुभ संकल्‍प किया। ऐसा कुछ पहले से तय नहीं था,

मुंडन – हरिशंकर परसाई

किसी देश की संसद में एक दिन बड़ी हलचल मची. हलचल का कारण कोई राजनीतिक समस्या नहीं थी, बल्कि यह था कि एक मंत्री का अचानक मुंडन हो गया था. कल तक उनके सिर पर लंबे घुँघराले बाल थे, मगर रात में उनका अचानक मुंडन हो गया था. सदस्यों में कानाफूसी हो रही थी कि इन्हें क्या हो गया है. अटकलें लगने लगीं. किसी ने कहा - शायद सिर में जूँ हो गई हों. दूसरे ने कहा - शायद दिमाग में विचार भरने के लिए बालों का पर्दा अलग कर दिया हो. किसी और ने कहा - शायद इनके परिवार में किसी की मौत हो गई. पर वे पहले की तरह प्रसन्न लग रहे थे. आखिर एक सदस्य ने पूछा - अध्यक्ष महोदय! क्या मैं जान सकता हूँ कि माननीय मंत्री महोदय के परिवार में क्या किसी की मृत्यु हो गई है? मंत्री ने जवाब दिया - नहीं. सदस्यों ने अटकल लगाई कि कहीं

भोलाराम का जीव- हरिशंकर परसाई

धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलाट करते आ रहे थे.पर ऐसा कभी नहीं हुआ था. सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे.गलती पकड में ही नहीं आ रही थी. आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोरों से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई . उसे निकालते हुए वे बोले, ''महाराज, रिकार्ड सब ठीक है.भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर अभी तक यहाँ नहीं पहुँचा.'' धर्मराज ने पूछा, ''और वह दूत कहाँ है?'' ''महाराज, वह भी लापता है.'' इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बड़ा बदहवास-सा वहां आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ''अरे तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का

लैला की शादी – राधाकृष्ण

आखिर को लैला की माँ ने मंजूर कर लिया, कहा - "अब लैला को मजनू के हाथ ही सौंप दूँगी!" सुननेवाले इस समाचार से खुश हो गए। लोगों ने लैला की माँ को बधाइयाँ दीं। मजनू बेचारा कितनी मुद्दत से लैला के पीछे तड़प रहा था। आशिकी के कारण इस दुनिया और उस दुनिया दोनों जगह बदनाम हो गया था। मिट्टी भारी हो गई थी और प्राणों में केवल आह भर ही बच रही थी। चलो, लैला की माँ का फैसला बड़ा अच्छा हुआ। आशिक-माशूक की जोड़ी मिल जाएगी। दोनों का भला होगा। और उधर लैला की माँ शादी का बजट बना रही थी - सत्तर गज कीम-खाब, एक सौ सत्तर गज तंजेब, सत्रह बोरे गेहूँ, बीस बोरे चावल; पन्द्रह कनस्तर घी... ! बजट तो बन गया, पास-पड़ोसवालों ने उसे पास भी कर दिया, लेकिन सौदा कैसे मिले? लैला की माँ ने बाजार में पहुँच कर देखा कि किराना वालों के यहाँ खरीददारों

शेखचिल्ली और चोरी में हिस्सा

शेखचिल्ली -चोरी में हिस्सा

शेखचिल्ली एक दिन अपने घर के सामने अहाते में बैठे भुने हुए चने खा रहे थे और साथ ही जल्दी-से-जल्दी अमीर बनने के सपने देख रहे थे. खुली आँखों से सपने देखते हुए कुछ चने खा रहे थे और कुछ नीचे गिरा रहे थे. संयोग से जमीन पर गिरे चने के दानों में एक दाना कच्चा था. कुछ ही दिनों में वहाँ चने का एक छोटा पौधा निकल आया. शेखचिल्ली अपनी इस अनजाने में की गयी खेती को देखकर खूब खुश हुए और जी जान से फसल की रखवाली में लग गए. उन्हें बड़ी चिंता थी कि उनके इकलौते चने के पौधे को कोई गाय-भैंस ना चर जाए, इसलिए अम्मी के सो जाने के बाद रात में भी फसल की निगरानी किया करते थे.               एक रात जब वो हाथ में डंडा लिए चने के पौधे की रखवाली कर रहे थे, तभी तीन-चार लोग खामोशी से छिपते-छिपाते कहीं जाते दिखाई दिए.

आप भी ‘ओ’ हैं – जी. पी. श्रीवास्तव

अनाज की पैदावार बढ़ी या नहीं, यह तो ईश्वर जाने या महंगाई, मगर हाकिमों की पैदावार का क्या कहना. कोई ए.ओ., बी.ओ., सी.ओ. हैं तो कोई ए.बी.ओ., बी.सी.ओ., सी.डी.ओ. और न जाने कितने ‘ओ’ हैं कि अंग्रेज़ी वर्णमाला के भी होश गुम हैं कि अब ओ के साथ कौन से अक्षर जोड़े जाएँ. उस पर उसे यह भी परेशानी है कि सुनने वाले किस ‘ओ’ परिवार का कौन-सा मतलब निकालेंगे. जैसे एम.ओ. ही को ले लीजिये. इससे मेडिकल ऑफिसर भी हो सकता और म्युनिसिपल ऑफिसर, मलेरिया ऑफिसर और मारकेटिंग ऑफिसर भी और घाते में मनीआर्डर भी समझना चाहें तो मजे में समझ सकते हैं.          खैर, समझने वाले जो चाहें, समझा करें. इसकी फ़िक्र मिस्टर सी.एम. गादुर को न थी, जिन्हें लोग आसानी के मारे मिस्टर चिमगादर ही कहते थे.          वे थे तो वकील, मगर जिस दिन से वे ‘ओथ ऑफिसर’ (शपथनामा अफसर) बना दिए गए, वे अपने नाम के आगे

इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर

इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर

वैज्ञानिक कहते हैं ,चाँद पर जीवन नहीं है.         सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है.         विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है. फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलजिम की अँगुलियों के नहीं हैं. पर मातादीन उसे सजा दिला ही देते हैं.         मातादीन कहते हैं, ये वैज्ञानिक केस का पूरा इन्वेस्टीगेशन नहीं करते. उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है. मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ. वहाँ मनुष्य जाति है.         यह बात सही है क्योंकि अँधेरे पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते हैं.         पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे. चाँद सरकार ने भारत

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