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एक रात -जैनेन्द्र

एक रात - जयराज - सुदर्शना

जयराज की तीस वर्ष की अवस्था होगी. धुन में बँधा, सदा कामकाज में रहता है. अपने प्रांत की कांग्रेस का वही प्राण है. लोग उसे बहुत मानते हैं. उन्हें छोड़ और वह रहता किसके लिए है? अविवाहित है और उससे विवाह का प्रस्ताव करने की हिम्मत किसी को नहीं होती. सबेरे का वक्त था. नौ का समय होगा. आधी बाँहों का कुर्ता और जाँघिया पहने वह एक परिषद के लिए अपना भाषण लिख रहा था. उसी समय उससे पूछा गया कि एक डेपुटेशन मिलने के लिए आया है, क्या जयराज मिल सकेंगे? क्या डेपुटेशन अंदर आए? 'अवश्य.' जयराज ने कागज वहीं छोड़ दिए और वह डेपुटेशन की प्रतीक्षा में खड़ा हो गया. डेपुटेशन के सज्जन आए और उसने जानना चाहा कि उसके लिए क्या आज्ञा है? प्रतिनिधिगण जयराज को अपने कस्बे में ले जाना चाहते हैं. कस्बे का नाम हरीपुर है. जयराज ने कहा, 'हरीपुर!' 'आप कभी वहाँ नहीं पधारे हैं. हमारे यहाँ सन 30 में कई बार

तत्सत -जैनेन्द्र

एक गहन वन में दो शिकारी पहुंचे. वे पुराने शिकारी थे. शिकार की टोह में दूर – दूर घूम रहे थे, लेकिन ऐसा घना जंगल उन्हें नहीं मिला था. देखते ही जी में दहशत होती थी. वहां एक बड़े पेड़ की छांह में उन्होंने वास किया और आपस में बातें करने लगे.एक ने कहा, “आह, कैसा भयानक जंगल है.”दूसरे ने कहा, “और कितना घना!”इसी तरह कुछ देर बात करके और विश्राम करके वे शिकारी आगे बढ़ गए.उनके चले जाने पर पास के शीशम के पेड़ ने बड़ से कहा, “बड़ दादा, अभी तुम्हारी छांह में ये कौन थे? वे गए?”बड़ ने कहा, “हां गए. तुम उन्हें नहीं जानते हो?”शीशम ने कहा, “नहीं, वे बड़े अजब मालूम होते थे. कौन थे, दादा?”दादा ने कहा, “जब छोटा था, तब इन्हें देखा था. इन्हें आदमी कहते हैं. इनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना है. देखा, वे चलते कैसे हैं? अपने तने की

खेल -जैनेन्द्र

मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुकास्थल पर एक बालक और बालिका सारे विश्व को भूल, गंगा-तट के बालू और पानी से खिलवाड़ कर रहे थे।बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को उछाल रहा था। बालिका अपने पैर पर रेत जमाकर और थोप-थोपकर एक भाड़ बना रही थी।बनाते-बनाते बालिका भाड़ से बोली- "देख ठीक नहीं बना, तो मैं तुझे फोड़ दूंगी।" फिर बड़े प्यार से थपका-थपकाकर उसे ठीक करने लगी। सोचती जाती थी- "इसके ऊपर मैं एक कुटी बनाउंगी, वह मेरी कुटी होगी। और मनोहर...? नहीं, वह कुटी में नहीं रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ में पत्ते झोंकेगा। जब वह हार जाएगा, बहुत कहेगा, तब मैं उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूंगी।मनोहर उधर पानी से हिल-मिलकर खेल रहा था। उसे क्या मालूम कि यहाँ अकारण ही उस पर रोष और अनुग्रह किया जा रहा है।बालिका सोच रही थी- "मनोहर कैसा

पत्नी – जैनेंद्र

शहर के एक ओर तिरस्कृत मकान। दूसरा तल्ला, वहां चौके में एक स्त्री अंगीठी सामने लिए बैठी है। अंगीठी की आग राख हुई जा रही है। वह जाने क्या सोच रही है। उसकी अवस्था बीस-बाईस के लगभग होगी। देह से कुछ दुबली है और संभ्रांत कुल की मालूम होती है।एकाएक अंगीठी में राख होती आग की ओर स्त्री का ध्यान गया। घुटनों पर हाथ देकर वह उठी। उठकर कुछ कोयले लाई। कोयले अंगीठी में डालकर फिर किनारे ऐसे बैठ गई मानो याद करना चाहती है कि अब क्या करुँ? घर में और कोई नहीं और समय बारह से ऊपर हो गया है।दो प्राणी घर में रहते हैं-पति और पत्नी। पति सवेरे से गए हैं कि लौटे नहीं और पत्नी चौके में बैठी है।सुनन्दा सोचती है- नहीं, सोचती कहां है? असल-भाव से वह तो वहां बैठी ही है। सोचने को है तो यही कि कोयले न बुझ जाएं।...वे जाने कब आ

शरणदाता – अज्ञेय

‘‘यह कभी हो ही नहीं सकता, देविन्दरलालजी!’’रफ़ीकुद्दीन वकील की वाणी में आग्रह था, चेहरे पर आग्रह के साथ चिन्ता और कुछ व्यथा का भाव। उन्होंने फिर दुहराया, ‘‘यह कभी नहीं हो सकता देविन्दरलालजी!’’देविन्दरलालजी ने उनके इस आग्रह को जैसे कबूलते हुए, पर अपनी लाचारी जताते हुए कहा, ‘‘सब लोग चले गये। आपसे मुझे कोई डर नहीं, बल्कि आपका तो सहारा है, लेकिन आप जानते हैं, जब एक बार लोगों को डर जकड़ लेता है, और भगदड़ पड़ जाती है, तब फिजा ही कुछ और हो जाती है, हर कोई हर किसी को शुबहे की नज़र से देखता है, और खामखाह दुश्मन हो जाता है। आप तो मुहल्ले के सरवरा हैं, पर बाहर से आने-जाने वालों का क्या ठिकाणा है? आप तो देख ही रहे है, कैसी-कैसी वारदातें हो रही हैं-’’रफ़ीकुद्दीन ने बात काटते हुए कहा, ‘‘नहीं साहब, हमारी नाक कट जाएगी! कोई बात है भला कि आप घर-बार छोड़कर अपने

पाजेब – जैनेंद्र

बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे। बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी।मैंने कहा, कैसी पाजेब?बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है।मैंने कहा, अच्छा-अच्छा।बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी।मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही।उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी।बुआ ने

रोज (गैंग्रीन) – अज्ञेय

दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते ही मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य, किन्तु फिर भी बोझिल और प्रकम्पमय और घना-सा फैल रहा था...मेरी आहट सुनते ही मालती बाहर निकली। मुझे देखकर, पहचानकर उसकी मुरझायी हुई मुख-मुद्रा तनिक-सी मीठे विस्मय से जागी-सी और फिर पूर्ववत् हो गयी। उसने कहा, ‘‘आ जाओ।’’ और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये भीतर की ओर चली। मैं भी उसके पीछे हो लिया।भीतर पहुँचकर मैंने पूछा, ‘‘वे यहाँ नहीं हैं?’’‘‘अभी आए नहीं, दफ्तर में हैं। थोड़ी देर में आ जाएँगे। कोई डेढ़-दो बजे आया करते हैं।’’‘‘कब से गये हुए हैं?’’‘‘सवेरे उठते ही चले जाते हैं।’’मैं ‘हूँ’ कहकर पूछने को हुआ, ‘‘और तुम इतनी देर क्या करती हो?’’ पर फिर सोचा आते ही एकाएक प्रश्न ठीक नहीं है। मैं कमरे के चारों ओर देखने लगा।मालती एक पंखा उठा लायी, और

जाह्नवी – जैनेंद्र

जैनेंद्र कुमार आज तीसरा रोज़ है. तीसरा नहीं, चौथा रोज़ है. वह इतवार की छुट्टी का दिन था. सबेरे उठा और कमरे से बाहर की ओर झांका तो देखता हूं, मुहल्ले के एक मकान की छत पर कांओं-कांओं करते हुए कौओं से घिरी हुई एक लड़की खड़ी है. खड़ी-खड़ी बुला रही है, “कौओ आओ, कौओ आओ.” कौए बहुत काफ़ी आ चुके हैं, पर और भी आते-जाते हैं. वे छत की मुंडेर पर बैठ अधीरता से पंख हिला-हिलाकर बेहद शोर मचा रहे हैं. फिर भी उन कौओं की संख्या से लड़की का मन जैसे भरा नहीं है. बुला ही रही है, “कौओ आओ, कौओ आओ.”देखते-देखते छत की मुंडेर कौओं से बिल्कुल काली पड़ गयी. उनमें से कुछ अब उड़-उड़कर उसकी धोती से जा टकराने लगे. कौओं के खूब आ घिरने पर लड़की मानो उन आमंत्रित अतिथियों के प्रति गाने लगी-“कागा चुन-चुन खाइयो…”गाने के साथ उसने अपने हाथ की रोटियों में से तोड़-तोड़कर

रेल की रात – इलाचन्द्र जोशी

प्रेमचंद जहाँ कथा साहित्य को सामाजिक समस्याओं से लड़ने के अस्त्र के रूप में विकसित करने का प्रयत्न कर रहे थे, वहीं उन्हीं के समकालीन जैनेन्द्र इसे समाज से व्यक्ति की ओर, बाहर से भीतर की ओर ले जा रहे थे. जैनेन्द्र, अज्ञेय और इलाचन्द्र जोशी जैसे कथाकारों ने व्यक्ति मन की गहराइयों की छानबीन को ही अपने कथा लेखन का उद्देश्य बनाया.... गाड़ी आने के समय से बहुत पहले ही महेंद्र स्टेशन पर जा पहुँचा था। गाड़ी के पहुँचने का ठीक समय मालूम न हो, यह बात नहीं कही जा सकती। जिस छोटे शहर में वह आया हुआ था, वहाँ से जल्दी भागने के लिए वह ऐसा उत्सुक हो उठा था कि जान-बूझ कर भी अज्ञात मन से शायद किसी अबोध बालक की तरह वह समझा था कि उसके जल्दी स्टेशन पर पहुँचने से संभवत: गाड़ी भी नियत समय से पहले ही आ जायगी। होल्डाल में बँधे हुए बिस्तरे और

प्रेमचंद का गोदान: यदि मैं लिखता—-जैनेन्द्र कुमार

अगर मैं गोदान लिखता? लेकिन निश्चय है मैं नहीं लिख सकता था, लिखने की सोच भी नहीं सकता था। पहला कारण कि मैं प्रेमचंद नहीं हूँ, और अंतिम कारण भी यही कि प्रेमचंद मैं नहीं हूँ। वह साहस नहीं, वह विस्तार नहीं। गोदान आसपास ५०० पृष्ठों का उपन्यास है। उसके लिए धारणा में ज्यादा क्षमता चाहिए, और कल्पना में ज्यादा सूझबूझ। वह न होने से मेरा कोई उपन्यास ढाई सौ पन्नों से ज्यादा नहीं गया। मैं लिखता ही तो गोदान करीब दो सौ पन्नों का हो जाता। गोदान का एक संक्षिप्त संस्करण भी निकला है और मानने की इच्छा होती है कि उसमें मूल का सार सुरक्षित रह गया है। यानी दो सौ-ढाई सौ में भी गोदान आ सकता था। और क्या विस्मय, मोटापा कम होने से उसका प्रभाव कम के बजाय और बढ़ जाता, अब यदि फैला है तो तब तीखा हो जाता।पुस्तक जब शुरु में निकली थी तभी

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