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रफूजी – स्वदेश दीपक

नानी बिल्कुल अनपढ़। अस्सी के ऊपर आयु होगी, लेकिन अँग्रेजी के कुछ शब्द उसे आते हैं—जैसे कि रिफ्यूजी, जिसे वह रफूजी बोलती है। कुछ शब्द इतिहास की उपज होते हैं, जो प्रतिदिन की जिन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। ये शब्द राजा अथवा रानी की देन होते हैं। अँग्रेज़ जाते-जाते बँटवारा करा गये और विरासत में एक शब्द दे गये—रिफ्यूजी। जैसा कुछ वर्ष पहले हमारी महारानी मरी और विरासत में एक शब्द दे गयी—उग्रवादी। सारा कस्बा उसे नानी कहकर बुलाता है। शायद परिवार के सदस्यों के अलावा किसी को भी असली नाम मालूम या याद नहीं। जिस्म के सारे हिस्से जिस्म का साथ छोड़ चुके हैं सिवा आवाज़ के। फटे ढोल की तरह की आवाज़—एकदम कानफाड़ और ऊँची। बेटे तो बँटवारे की भेंट चढ़ गये, एक लडक़ी बची थी, इसलिए कि विभाजन से पहले वह जालन्धर में ब्याही गयी। अब यह भी नहीं। उसके बेटे, अपने दोहते के साथ नानी रहती है,

सिक्का बदल गया- कृष्णा सोबती की कहानी

खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी. दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी. शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और 'श्रीराम, श्रीराम' करती पानी में हो ली. अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनीदी आंखों पर छींटे दिये और पानी से लिपट गयी! चनाब का पानी आज भी पहले-सा ही सर्द था, लहरें लहरों को चूम रही थीं. वह दूर सामने काश्मीर की पहाड़ियों से बंर्फ पिघल रही थी. उछल-उछल आते पानी के भंवरों से टकराकर कगारे गिर रहे थे, लेकिन दूर-दूर तक बिछी रेत आज न जाने क्यों खामोश लगती थी! शाहनी ने कपड़े पहने, इधर-उधर देखा, कहीं किसी की परछाई तक न थी. पर नीचे रेत में अगणित पांवों के निशान थे. वह कुछ सहम-सी उठी! आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में न जाने क्यों कुछ भयावना-सा लग रहा है.

उतरन -वाजिदा तबस्सुम की उर्दू कहानी

उतरन पर आधारित कामसूत्र : ए टेल ऑफ़ लव

वाजिदा तबस्सुम उर्दू की मशहूर अफसानानिगार रही हैं. 1975 में लिखी उतरन उनकी सर्वाधिक चर्चित कहानी है. अंग्रेजी में 'Cast-Offs' या 'Hand-Me Downs के नाम से अनूदित इस कहानी का कई भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ. टेलीविजन पर इसी नाम के धारावाहिक के अतिरिक्त मीरा नायर की चर्चित फिल्म ‘Kama Sutra: A Tale of Love’ की मूल प्रेरणा भी यही कहानी है. “निक्को अल्ला, मेरे को बहोत शरम लगती है.” “एओ, इसमें शरम की क्या बात है? मैं नई उतारी क्या अपने कपड़े?” “ऊं.....” चमकी शरमाई ! “अब उतारती है कि बोलूं अन्ना बी को?” शहजादी पाशा, जिसकी रग-रग में हुक्म चलाने की आदत रमी हुई थी, चिल्ला कर बोली. चमकी ने कुछ डरते-डरते, कुछ शरमाते-शरमाते अपने छोटे-छोटे हाथों से पहले तो अपना कुरता उतारा, फिर पायजामा ....फिर शहजादी पाशा

दुविधा

दुविधा

प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा की कहानी दुविधा पर हिन्दी में दो फ़िल्में बनी हैं. 1973 में मणि कौल ने दुविधा के नाम से ही पहली फिल्म बनाई ,जिसे वर्ष 1974 का Filmfare Critics Award for Best Movie भी प्राप्त हुआ. मणि कौल को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. मलयालम फिल्मों के अभिनेता रवि मेनन और रईसा पद्मसी (प्रख्यात चित्रकार अकबर पद्मसी की पुत्री ) ने इस फिल्म में केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाई थीं. 2005 में अमोल पालेकर ने दुविधा का रीमेक पहेली के नाम से बनाया, जिसमें शाहरुख़ खान और रानी मुखर्जी ने केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाईं. एक धनी सेठ था. उसके इकलौते बेटे की बरात धूमधाम से शादी सम्पन्न कर वापस लौटते हुए जंगल में विश्राम करने के लिए रुकी. घनी खेजड़ी की ठण्डी छाया. सामने हिलोरें भरता तालाब. कमल के फूलों से आच्छादित निर्मल पानी. सूरज सर पर चढ़ने लगा था. जेठ की तेज चलती

बस की यात्रा -हरिशंकर परसाई

हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें।पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घण्टे भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है।सुबह घर पहुँच जाएँगे।हम में से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना जरूरी था।लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते।क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं?नहीं,बस डाकिन है। बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी।खूब वयोवृद्ध थी।सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी।लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा।यह बस पूजा के योग्य थी।उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!   बस-कंपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे।हमने उनसे पूछा-"यह बस चलती भी है?" वह बोले-"चलती क्यों नहीं है जी!अभी चलेगी।"  हमने कहा-"वही तो हम देखना चाहते हैं।अपने आप चलती है यह? हाँ

वापसी -उषा प्रियंवदा

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई - दो बक्स, डोलची, बाल्टी। ''यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?'' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ''घरवाली ने साथ में कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।'' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।''कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।'' गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधता हुआ बोला।''कभी कुछ ज़रूरत हो तो लिखना गनेशी, इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।''गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखे पोछी, ''अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा। आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।''गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्वार्टर का

सयानी बुआ -मन्नू भंडारी

सब पर मानो बुआजी का व्यक्तित्व हावी है। सारा काम वहाँ इतनी व्यवस्था से होता जैसे सब मशीनें हों, जो कायदे में बँधीं, बिना रुकावट अपना काम किए चली जा रही हैं। ठीक पाँच बजे सब लोग उठ जाते, फिर एक घंटा बाहर मैदान में टहलना होता, उसके बाद चाय-दूध होता।उसके बाद अन्नू को पढने के लिए बैठना होता। भाई साहब भी तब अखबार और ऑफिस की फाइलें आदि देखा करते। नौ बजते ही नहाना शुरू होता। जो कपडे बुआजी निकाल दें, वही पहनने होते। फिर कायदे से आकर मेज पर बैठ जाओ और खाकर काम पर जाओ।सयानी बुआ का नाम वास्तव में ही सयानी था या उनके सयानेपन को देखकर लोग उन्हें सयानी कहने लगे थे, सो तो मैं आज भी नहीं जानती, पर इतना अवश्य कँगी कि जिसने भी उनका यह नाम रखा, वह नामकरण विद्या का अवश्य पारखी रहा होगा।बचपन में ही वे समय की जितनी पाबंद

दोस्त कहूं या दुश्मन? – भीष्म साहनी

हरभगवान मेरा पुराना दोस्त है. अब तो बड़ी उम्र का है, बड़ी-बड़ी मूंछें हैं, तोंद हैं. जब सोता है तो लंबी तानकर और जब खाता है, तो आगा-पीछा नहीं देखता. बड़ी बेपरवाह तबियत का आदमी है, हालांकि उसकी कुछ आदतें मुझे कतई पसंद नहीं. पान का बीड़ा हर वक्त मुँह में रखता है और कभी छुट्टी पर कहीं जा, तो सारा वक्त ताश खेलता रहता है. न सैर को जाता है, न व्यायाम करता है, यों बड़ा हंसमुख है, किसी बात का बुरा नहीं मानता. हमेशा दोस्तों की मदद करता है.    पर एक दिन उसने मेरे साथ बड़ी अजीब हरकत की.     शिमला में एक सम्मेलन होने वाला था. हम लोग उसमें भाग लेने के लिए गए. हरभगवान भी अपनी मूंछों समेत, तोंद सहलाता वहां पहुँच गया. और भी कुछ लोग वहां पहुंचे. ये सब लोग एक दिन पहले पहुँच गए, मैं किसी कारणवश दूसरे दिन पहुँच पाया. जब मैं

मुसीबत है बड़ा भाई होना- शांति मेहरोत्रा

बड़ा भाई होना कितनी बड़ी मुसीबत है, इसे वे ही समझ सकते हैं, जो सीधे दिखाई पड़ने वाले चालाक छोटे भाई-बहनों के जाल में फंसकर आये दिन उनकी शरारतों के लिए मेरी तरह खुद ही डांट खाते नजर आते हैं. घर में जिसे देखो वही दो-चार उपदेश दे जाता है और दो-चार काम सौंप जाता है. चाचाजी को फ़ौरन पानी चाहिए, चाचीजी को ऊपर के कमरे से ब्रुश मंगवाना है. पिताजी के मेहमानों के लिए भाग कर चौराहे से पान लाने हैं. छोटे भाई ने सुबह से जलेबी के लिए रट लगा रखी है. फिर मुझे भी अपने कपड़ों पर इस्तिरी करनी है, बस्ता लगाना है, जूते पॉलिश करने हैं और पौने नौ बजे स्कूल के लिए रवाना हो जाना है. यों हूँ तो मैं भी अभी छठी क्लास में ही, लेकिन तीन भाइयों में सबसे बड़ा होने के नाते सुबह से शाम तक चकरघिन्नी की तरह नाचता रहता हूँ.          

पहलवान की ढोलक – फणीश्वरनाथ रेणु

जाड़े का दिन . अमावस्या की रात – ठंढी और काली . मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव भयार्त शिशु की तरह थर-थर कांप रहा था. पुरानी और उजड़ी बांस-फूस की झोंपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य ! अँधेरा और निस्तब्धता !अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी. निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने ह्रदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी. आकाश में तारे चमक रहे थे. पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं . आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी. अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे.       सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी . गाँव की झोंपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज़ , ‘हे राम! हे भगवान!’ की टेर

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