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सफरनामा सिंदबाद जहाजी का – कन्हैयालाल नंदन की बाल कथा

अरसा काफी लंबा गुजर चुका था. सिंदबाद के मन में यह लहर बार-बार दौड़ रही थी कि वह अपनी तिजारत को हिन्दुस्तान तक फैला दे. उसने एक दिन तय कर ही लिया कि वह हिन्दुस्तान जाएगा. उसने अपनी गठरियों में तिजारती सामान बाँध लिया. वह बसरा के लिए रवाना होने ही वाला था कि उसके पास एक आदमी दौड़ता हुआ आया. वह आदमी और कोई नहीं, वही हिंदबाद था जो बग़दाद की सड़कों पर टहलते हुए सिंदबाद के महल के नीचे आकर बैठ गया था. उसने बाइज्जत सिंदबाद को मशवरा दिया कि अब उसे समुद्री जहाज से जाने की ज़रुरत नहीं है. अब तो आपको हवाई जहाज से सफ़र करना चाहिए, वरना हिन्दुस्तान के लोग आपको निहायत पिछड़ा हुआ मानेंगे.         सिंदबाद ने मशविरे के लिए हिंदबाद का शुक्रिया अदा किया और अपना साफा संभालते हुए सोच में पड़ गया कि हवाई सफ़र पता नहीं कैसा हो. लेकिन तभी सिंदबाद को

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