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उतरन -वाजिदा तबस्सुम की उर्दू कहानी

उतरन पर आधारित कामसूत्र : ए टेल ऑफ़ लव

वाजिदा तबस्सुम उर्दू की मशहूर अफसानानिगार रही हैं. 1975 में लिखी उतरन उनकी सर्वाधिक चर्चित कहानी है. अंग्रेजी में 'Cast-Offs' या 'Hand-Me Downs के नाम से अनूदित इस कहानी का कई भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ. टेलीविजन पर इसी नाम के धारावाहिक के अतिरिक्त मीरा नायर की चर्चित फिल्म ‘Kama Sutra: A Tale of Love’ की मूल प्रेरणा भी यही कहानी है. “निक्को अल्ला, मेरे को बहोत शरम लगती है.” “एओ, इसमें शरम की क्या बात है? मैं नई उतारी क्या अपने कपड़े?” “ऊं.....” चमकी शरमाई ! “अब उतारती है कि बोलूं अन्ना बी को?” शहजादी पाशा, जिसकी रग-रग में हुक्म चलाने की आदत रमी हुई थी, चिल्ला कर बोली. चमकी ने कुछ डरते-डरते, कुछ शरमाते-शरमाते अपने छोटे-छोटे हाथों से पहले तो अपना कुरता उतारा, फिर पायजामा ....फिर शहजादी पाशा

दुविधा

दुविधा

प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा की कहानी दुविधा पर हिन्दी में दो फ़िल्में बनी हैं. 1973 में मणि कौल ने दुविधा के नाम से ही पहली फिल्म बनाई ,जिसे वर्ष 1974 का Filmfare Critics Award for Best Movie भी प्राप्त हुआ. मणि कौल को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. मलयालम फिल्मों के अभिनेता रवि मेनन और रईसा पद्मसी (प्रख्यात चित्रकार अकबर पद्मसी की पुत्री ) ने इस फिल्म में केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाई थीं. 2005 में अमोल पालेकर ने दुविधा का रीमेक पहेली के नाम से बनाया, जिसमें शाहरुख़ खान और रानी मुखर्जी ने केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाईं. एक धनी सेठ था. उसके इकलौते बेटे की बरात धूमधाम से शादी सम्पन्न कर वापस लौटते हुए जंगल में विश्राम करने के लिए रुकी. घनी खेजड़ी की ठण्डी छाया. सामने हिलोरें भरता तालाब. कमल के फूलों से आच्छादित निर्मल पानी. सूरज सर पर चढ़ने लगा था. जेठ की तेज चलती

तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम – फनीश्वरनाथ रेणु

तीसरी कसम ....प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने जब रेणु की इस कहानी पर फिल्म बनाने का निश्चय किया तो हीरामन की भूमिका के लिए उनकी कल्पना में राज कपूर के सिवा कोई नाम नहीं था . मैं जितनी बार यह फिल्म देखता हूँ , मुझे लगता है कि जैसे कहानी लिखते वक्त रेणु जी की कल्पना में भी यही छवि थी हीरामन की ... राज कपूर और वहीदा रहमान का शानदार अभिनय , बासु भट्टाचार्य का निर्देशन ,कथासूत्रों को जोड़ते शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के गीत ,शंकर जयकिशन का कर्णप्रिय संगीत ....कहीं तो कमी नहीं रखी थी शैलेन्द्र ने . लेकिन फिल्म को समीक्षकों की वाहवाही ही हासिल हुई , दर्शकों की तालियाँ नहीं....कहते हैं , फिल्म की असफलता ने शैलेन्द्र को इस कदर तोड़ दिया कि वह दुनिया ही छोड़ गए . बाद में , फिल्म को कुछ सफलता भी मिली ,लेकिन उसे देखने के लिए शैलेन्द्र मौजूद नहीं थे....खैर

यही सच है -मन्नू भंडारी

डायरी या आत्मालाप शैली में लिखी 'यही सच है' मन्नू भंडारी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है . यह कहानी है दीपा की या यूं कहें कि उसके अंतर्द्वंद्व की . निशीथ से निराश दीपा संजय की बाहों में सहारा ढूंढती है. उसे लगता है कि वह निशीथ को भूल गयी है , लेकिन जाने अनजाने वह निशीथ और संजय की तुलना करने लगती है. संजय निशीथ नहीं है...उसका प्यार भी निशीथ के जैसा नहीं है. दीपा अपने मन की समझाती है ,लेकिन एक इंटरव्यू के सिलसिले में कलकत्ता जाने और वहां निशीथ से दुबारा मुलाक़ात होने के बाद उसे लगने लगता है ,जैसे उसने संजय को प्यार नहीं किया ...उसमें सहारा ढूँढा था . उसका मन फिर से निशीथ की ओर खिंचने लगता है . कानपुर वापस लौटने के बाद भी यह अंतर्द्वंद्व समाप्त नहीं होता . दीपा, निशीथ और संजय के इस त्रिकोण को आधार बना

शतरंज के खिलाड़ी -प्रेमचंद

फोटो : फिल्म शतरंज के खिलाड़ी से 1924 में पहली बार माधुरी में प्रकाशित 'शतरंज के खिलाड़ी' वाजिदअली शाह के समय के अवध की अनूठी दास्ताँ है. 1977 में सत्यजित राय ने इस कहानी पर इसी नाम से फिल्म भी बनाई . फिल्म में संजीव कुमार और सईद ज़ाफरी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई. इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित तीन फिल्मफेयर पुरस्कार मिले. वाजिदअली शाह का समय था. लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था. छोटे-बड़े, गरीब-अमीर सभी विलासिता में डूबे हुए थे. कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था, तो कोई अफीम की पीनक ही में मजे लेता था. जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्राधान्य था. शासन-विभाग में, साहित्य-क्षेत्र में, सामाजिक अवस्था में, कला-कौशल में, उद्योग-धंधों में, आहार-व्यवहार में सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही थी. राजकर्मचारी विषय-वासना में, कविगण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में, व्यवसायी सुरमे, इत्र, मिस्सी और

सद्गति – प्रेमचंद

तस्वीर सत्यजित राय की फिल्म सद्गति से सद्गति प्रेमचंद की चर्चित कहानियों में से एक है. शोषक ब्राह्मणवादी व्यवस्था किस प्रकार लोगों को अपनी मानसिक गुलामी का शिकार बनाती है , इसका मार्मिक चित्रण प्रेमचंद ने सद्गति में किया है. 1981 में सत्यजित राय ने इस कहानी को आधार बना कर इसी नाम से एक फिल्म भी बनायी , जिसमें ओम पुरी और स्मिता पाटिल ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं . अगर देखना चाहें तो पूरी फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है. फिल्म देखने के लिए क्लिक करें . दुखी चमार द्वार पर झाडू लगा रहा था और उसकी पत्नी झुरिया, घर को गोबर से लीप रही थी। दोनों अपने-अपने काम से फुर्सत पा चुके थे, तो चमारिन ने कहा, ‘तो जाके पंडित बाबा से कह आओ न। ऐसा न हो कहीं चले जायँ।‘ दुखी –‘ हाँ जाता हूँ, लेकिन यह तो सोच, बैठेंगे किस चीज पर ?’ झुरिया –‘ क़हीं से खटिया न मिल जायगी

काबुलीवाला – रविंद्रनाथ टैगोर

1892 में प्रकाशित काबुलीवाला रविंद्रनाथ टैगोर की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है . 1957 में तपन सिन्हा ने इस कहानी को आधार बना कर इसी नाम से एक बांग्ला फिल्म का निर्देशन किया . बाद में बिमल राय ने हिंदी में काबुलीवाला का निर्माण किया , जिसे हेमेन गुप्ता ने निर्देशित किया. हिंदी फिल्म में रहमत का केन्द्रीय चरित्र प्रख्यात अभिनेता बलराज साहनी ने निभाया था. मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह 'काक' को 'कौआ' कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है - आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग

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