आप यहाँ हैं
होम > Posts tagged "आदिकाल"

मैथिली कोकिल विद्यापति

विद्यापति

रस सिद्ध और मैथिली कोकिल के नाम से विख्यात विद्यापति आदिकालीन कवियों में अन्यतम हैं. संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली - तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले विद्यापति अपनी रचनाओं में रसिक, चिंतक और भक्त की भूमिकाओं का समुचित निर्वाह करते नजर आते हैं. संस्कृत में पुरुष परीक्षा, भू परिक्रमा, शैव सर्वस्व सार, गंगा वाक्यावली आदि ; अवहट्ट में कीर्तिलता और कीर्तिपताका तथा मैथिली में पदावली उनकी रचना यात्रा के कीर्ति स्तंभ हैं. पदावली तो आज भी मिथिला क्षेत्र में विदापत के रूप में लोक जिह्वा पर विराजमान है. भाषा ही नहीं, वर्ण्य विषयों की दृष्टि से भी विद्यापति संधियों के कवि हैं. भक्ति और श्रृंगार - दोनों रसों का मणिकांचन संयोग इनकी कविताओं में मिलता है. डॉ शिवप्रसाद सिंह के अनुसार,  “विद्यापति वस्तुतः संक्रमण काल के प्रतिनिधि कवि हैं, वे दरबारी होते हुए भी जन-कवि हैं, शृंगारिक होते हुए भी भक्त हैं, शैव या शाक्त या वैष्णव होते हुए भी

अमीर खुसरो

अमीर खुसरो को खड़ी बोली हिन्‍दी का पहला कवि माना जाता है. इस भाषा का हिन्‍दवी नाम से उल्‍लेख सबसे पहले उन्‍हीं की रचनाओं में मिलता है. हालांकि वे फारसी के भी अपने समय के सबसे बड़े भारतीय कवि थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता का मूल आधार उनकी हिन्‍दी रचनाएं ही हैं. अबुल हसन यमीनुद्दीन मुहम्मद का उपनाम खुसरो था, जिसे दिल्ली के सुलतान ज़लालुद्दीन खिलज़ी ने अमीर की उपाधि दी. उन्होंने स्वयं कहा है- ‘’मैं तूती-ए-हिन्‍द हूं. अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो. मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूंगा.’’ एक अन्‍य स्थान पर उन्होंने लिखा है, ‘’तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब (अर्थात् मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूं, हिन्दवी में जवाब देता हूं.)’’  अमीर खुसरो को दिल्‍ली सल्‍तनत का राज्‍याश्रय हासिल था. अपनी दीर्घ जीवन-अवधि में उन्‍होंने गुलाम वंश, खिलजी वंश से लेकर तुगलक वंश तक 11 सुल्‍तानों का सत्ता-संघर्ष देखा था,लेकिन राजनीति का हिस्‍सा बनने

हिन्दी साहित्य का आदिकाल -नामकरण की समस्या

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल को वीरगाथा काल नाम दिया है. इसके लिए तर्क देते हुए वो कहते हैं- “ राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, श्रृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबंध परंपरा 'रासो' के नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने, 'वीरगाथाकाल' कहा है।             प्रवृत्ति के निर्धारण के लिए भी आचार्य शुक्ल ने दो कसौटियां निर्धारित की हैं: (क)   विशेष ढंग की रचना की प्रचुरता (ख)   विशेष  ढंग की रचना की लोक प्रसिद्धि            आदिकाल की समयसीमा में शुक्लजी ने हिन्दी भाषा की 12 रचनाएँ ढूंढ कर सामने रखी हैं- 1)      खुमाण रासो 2)      विजयपाल रासो 3)      हम्मीर रासो 4)      परमाल रासो (आल्हा) 5)      बीसलदेव रासो 6)      पृथ्वीराज रासो 7)      जयचंद्र प्रकाश 8)      जयमयङ्क जसचन्द्रिका 9)      कीर्तिलता 10)   कीर्तिपताका 11)   विद्यापति की पदावली 12)   अमीर खुसरो की पहेलियाँ शुक्लजी के अनुसार ,

यू पी एस सी - हिन्दी साहित्य कोचिंग के लिए संपर्क करें - 8800695993-94-95 या और जानकारी प्राप्त करें 

Top