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दावत की अदावत – अन्नपूर्णानंद वर्मा

यह मैंने आज ही जाना कि जिस सड़क पर एक फुट धूल की परत चढ़ी हो, वह फिर भी पक्की सड़क कहला सकती है. पर मेरे दोस्त झूठ तो बोलेंगे नहीं. उन्होंने कहा था कि पक्की सड़क है, साइकिल उठाना, आराम से चले आना.         धूल भी ऐसी-वैसी नहीं. मैदे की तरह बारीक होने के कारण उड़ने में हवा से बाजी मारती थी. मेरी नाक को तो उसने बाप का घर समझ लिया था. जितनी धूल इस समय मेरे बालों में और कपड़ों पर जमा हो गई थी, उतनी से ब्रह्मा नाम का कुम्हार मेरे ही जैसा एक और मिट्टी का पुतला गढ़ देता.पाँच मील का रास्ता मेरे लिए सहारा रेगिस्तान हो गया. मेरी साइकिल पग-पग पर धूल में फँसकर खुद भी धूल में मिल जाना चाहती थी. मैंने इतनी धूल फांक ली थी कि अपने फेफड़ों को इस समय बाहर निकालकर रख देता तो देखने वाले समझते कि सीमेंट के

अकबरी लोटा – अन्नपूर्णानंद वर्मा

लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कमी नहीं थी। काशी के ठठेरी बाजार में मकान था। नीचे की दुकानों से 100 रुपया मासिक के करीब किराया उतर आता था। कच्‍चे-बच्‍चे अभी थे नहीं, सिर्फ दो प्राणी का खर्च था। अच्‍छा खाते थे, अच्‍छा पहनते थे। पर ढाई सौ रुपए तो एक साथ कभी आंख सेंकने के लिए भी न मिलते थे।इसलिए जब उनकी पत्‍नी ने एक दिन यकायक ढाई सौ रुपए की मांग पेश की तब उनका जी एक बार जोर से सनसनाया और फिर बैठ गया। जान पड़ा कि कोई बुल्‍ला है जो बिलाने जा रहा है। उनकी यह दशा देखकर उनकी पत्‍नी ने कहा, 'डरिए मत, आप देने में असमर्थ हों तो मैं अपने भाई से मांग लूं।'लाला झाऊलाल इस मीठी मार से तिलमिला उठे। उन्‍होंने किंचित रोष के साथ कहा, 'अजी हटो! ढाई सौ रुपए के लिए भाई से भीख मांगोगी? मुझसे ले लेना।''लेकिन मुझे इसी जिंदगी में

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