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इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर

इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर

वैज्ञानिक कहते हैं ,चाँद पर जीवन नहीं है.         सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है.         विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है. फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलजिम की अँगुलियों के नहीं हैं. पर मातादीन उसे सजा दिला ही देते हैं.         मातादीन कहते हैं, ये वैज्ञानिक केस का पूरा इन्वेस्टीगेशन नहीं करते. उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है. मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ. वहाँ मनुष्य जाति है.         यह बात सही है क्योंकि अँधेरे पक्ष के मातादीन माहिर माने जाते हैं.         पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे. चाँद सरकार ने भारत

बस की यात्रा -हरिशंकर परसाई

हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें।पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घण्टे भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है।सुबह घर पहुँच जाएँगे।हम में से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था इसीलिए वापसी का यही रास्ता अपनाना जरूरी था।लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते।क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं?नहीं,बस डाकिन है। बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी।खूब वयोवृद्ध थी।सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी।लोग इसलिए इससे सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा।यह बस पूजा के योग्य थी।उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!   बस-कंपनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे।हमने उनसे पूछा-"यह बस चलती भी है?" वह बोले-"चलती क्यों नहीं है जी!अभी चलेगी।"  हमने कहा-"वही तो हम देखना चाहते हैं।अपने आप चलती है यह? हाँ

विश्व का प्रथम साम्यवादी – हरिशंकर परसाई

स्वयं वामपंथ से प्रेरित होते हुए भी परसाई जी ने भारतीय वामपंथ पर चुटकी लेने का कोई मौका नहीं छोड़ा. पढ़िए दिवाली के बहाने ऐसा ही एक व्यंग्य जिस दिन राम रावण को परास्त करके अयोध्या आए , सारा नगर दीपों से जगमगा उठा . यह दीपावली पर्व अनंत काल तक मनाया जाएगा . पर इसी पर्व पर व्यापारी खाता -बही बदलते हैं और खाता-बही लाल कपडे में बाँधी जाती है .प्रश्न है - राम के अयोध्या आगमन से खाता -बही बदलने का क्या संबंध ? और खाता -बही लाल कपडे में ही क्यों बाँधी जाती है ?बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गयी .वे कहने लगे - सेठजी , अब बड़ी आफत है .शत्रुघ्न के राज में तो पोल चल गयी . पर राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं . वे सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स की चोरी बर्दाश्त नहीं करेंगे .वे

टॉर्च बेचने वाले – हरिशंकर परसाई

फोटो कर्टसी : पत्रिका डॉट कॉमवह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था । बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा । कल फिर दिखा । मगर इस बार उसने दाढी बढा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था ।मैंने पूछा, '' कहाँ रहे? और यह दाढी क्यों बढा रखी है? ''उसने जवाब दिया, '' बाहर गया था । ''दाढीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढी पर हाथ फेरने लगा । मैंने कहा, '' आज तुम टार्च नहीं बेच रहे हो? ''उसने कहा, '' वह काम बंद कर दिया । अब तो आत्मा के भीतर टार्च जल उठा है । ये ' सूरजछाप ' टार्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं । ''मैंने कहा, '' तुम शायद संन्यास ले रहे हो । जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है । किससे दीक्षा ले आए? ''मेरी बात से उसे

भेड़ें और भेड़िये – हरिशंकर परसाई

एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए | और,एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो | पशु-समाज में इस `क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गयी कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया |जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं,उसमें भेंडें बहुत थीं–निहायत नेक , ईमानदार, दयालु , निर्दोष पशु जो घास तक को फूँक-फूँक कर खाता है |भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा | हम अपने प्रतिनिधियों से क़ानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारीकिसी को न सताए, न मारे | सब जिएँ और जीने दें | शान्ति,स्नेह,बन्धुत्त्व और सहयोग पर समाज आधारित हो |इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया | भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका

ठिठुरता हुआ गणतंत्र-हरिशंकर परसाई

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ़ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।इतना बेवकूफ़ भी नहीं कि मान लूँ , जिस साल मैं समारोह देखता हूँ, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र-दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है।आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है?जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस

दस दिन का अनशन—- हरिशंकर परसाई

आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर

विश्व का प्रथम साम्यवादी —— हरिशंकर परसाई

जिस दिन राम रावण को परास्त करके अयोध्या आए , सारा नगर दीपों से जगमगा उठा . यह दीपावली पर्व अनंत काल तक मनाया जाएगा . पर इसी पर्व पर व्यापारी खाता -बही बदलते हैं और खाता-बही लाल कपडे में बाँधी जाती है .प्रश्न है - राम के अयोध्या आगमन से खाता -बही बदलने का क्या संबंध ? और खाता -बही लाल कपडे में ही क्यों बाँधी जाती है ?बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गयी . वे कहने लगे - सेठजी , अब बड़ी आफत है .शत्रुघ्न के राज में तो पोल चल गयी . पर राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं . वे सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स की चोरी बर्दाश्त नहीं करेंगे .वे अपने खाता-बही की जाँच कराएंगे और अपने को सजा होगी .एक व्यापारी ने कहा - भैया , तब तो अपना नंबर दो का मामला भी पकड़ लिया

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