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लोभ और प्रीति

जिस प्रकार सुख या आनंद देनेवाली वस्तु के संबंध में मन की ऐसी स्थिति को जिसमें उस वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं। दूसरे की वस्तु का लोभ करके उसे लोग लेना चाहते हैं, अपनी वस्तु का लोभ करके उसे लोग देना या नष्ट होने देना नहीं चाहते। प्राप्य या प्राप्त सुख के अभाव या अभाव कल्पना के बिना लोभ की अभिव्यक्ति नहीं होती। अत: इसके सुखात्मक और दु:खात्मक दोनों पक्ष हैं। जब लोभ अप्राप्य के लिए होता है तब तो दु:ख स्पष्ट ही रहता है। प्राप्य के संबंध में दु:ख का अंग निहित रहता है और अभाव के निश्चय या आशंका मात्र पर व्यक्त हो जाता है। कोई सुखद वस्तु पास में रहने पर भी मन में इस इच्छा का बीज रहता है कि उसका अभाव न हो। पर अभाव का जब तक ध्या न नहीं

दुविधा

दुविधा

प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा की कहानी दुविधा पर हिन्दी में दो फ़िल्में बनी हैं. 1973 में मणि कौल ने दुविधा के नाम से ही पहली फिल्म बनाई ,जिसे वर्ष 1974 का Filmfare Critics Award for Best Movie भी प्राप्त हुआ. मणि कौल को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. मलयालम फिल्मों के अभिनेता रवि मेनन और रईसा पद्मसी (प्रख्यात चित्रकार अकबर पद्मसी की पुत्री ) ने इस फिल्म में केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाई थीं. 2005 में अमोल पालेकर ने दुविधा का रीमेक पहेली के नाम से बनाया, जिसमें शाहरुख़ खान और रानी मुखर्जी ने केन्द्रीय भूमिकाएँ निभाईं. एक धनी सेठ था. उसके इकलौते बेटे की बरात धूमधाम से शादी सम्पन्न कर वापस लौटते हुए जंगल में विश्राम करने के लिए रुकी. घनी खेजड़ी की ठण्डी छाया. सामने हिलोरें भरता तालाब. कमल के फूलों से आच्छादित निर्मल पानी. सूरज सर पर चढ़ने लगा था. जेठ की तेज चलती

हूक-चंद्रगुप्त विद्यालंकार

जब तक गाड़ी नहीं चली थी, बलराज जैसे नशे में था। यह शोरगुल से भरी दुनिया उसे एक निरर्थक तमाशे के समान जान पड़ती थी। प्रकृति उस दिन उग्र रूप धारण किए हुए थी। लाहौर का स्टेशन। रात के साढ़े नौ बजे। कराँची एक्सप्रेस जिस प्लेटफार्म पर खड़ा था, वहाँ हजारों मनुष्य जमा थे। ये सब लोग बलराज और उसके साथियों के प्रति, जो जान-बूझ कर जेल जा रहे थे, अपना हार्दिक सम्मान प्रकट करने आए थे। प्लेटफार्म पर छाई हुई टीन की छतों पर वर्षा की बौछारें पड़ रही थीं। धू-धू कर गीली और भारी हवा इतनी तेजी से चल रही थी कि मालूम होता था, वह इन सब संपूर्ण मानवीय निर्माणों को उलट-पुलट कर देगी; तोड़-मोड़ डालेगी। प्रकृति के इस महान उत्पात के साथ-साथ जोश में आए हुए उन हजारों छोटे-छोटे निर्बल-से देहधारियों का जोशीला कंठस्वर, जिन्हें 'मनुष्य' कहा जाता है।बलराज राजनीतिक पुरुष नहीं है। मुल्क की बातों

तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम – फनीश्वरनाथ रेणु

तीसरी कसम ....प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने जब रेणु की इस कहानी पर फिल्म बनाने का निश्चय किया तो हीरामन की भूमिका के लिए उनकी कल्पना में राज कपूर के सिवा कोई नाम नहीं था . मैं जितनी बार यह फिल्म देखता हूँ , मुझे लगता है कि जैसे कहानी लिखते वक्त रेणु जी की कल्पना में भी यही छवि थी हीरामन की ... राज कपूर और वहीदा रहमान का शानदार अभिनय , बासु भट्टाचार्य का निर्देशन ,कथासूत्रों को जोड़ते शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के गीत ,शंकर जयकिशन का कर्णप्रिय संगीत ....कहीं तो कमी नहीं रखी थी शैलेन्द्र ने . लेकिन फिल्म को समीक्षकों की वाहवाही ही हासिल हुई , दर्शकों की तालियाँ नहीं....कहते हैं , फिल्म की असफलता ने शैलेन्द्र को इस कदर तोड़ दिया कि वह दुनिया ही छोड़ गए . बाद में , फिल्म को कुछ सफलता भी मिली ,लेकिन उसे देखने के लिए शैलेन्द्र मौजूद नहीं थे....खैर

यही सच है -मन्नू भंडारी

डायरी या आत्मालाप शैली में लिखी 'यही सच है' मन्नू भंडारी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक है . यह कहानी है दीपा की या यूं कहें कि उसके अंतर्द्वंद्व की . निशीथ से निराश दीपा संजय की बाहों में सहारा ढूंढती है. उसे लगता है कि वह निशीथ को भूल गयी है , लेकिन जाने अनजाने वह निशीथ और संजय की तुलना करने लगती है. संजय निशीथ नहीं है...उसका प्यार भी निशीथ के जैसा नहीं है. दीपा अपने मन की समझाती है ,लेकिन एक इंटरव्यू के सिलसिले में कलकत्ता जाने और वहां निशीथ से दुबारा मुलाक़ात होने के बाद उसे लगने लगता है ,जैसे उसने संजय को प्यार नहीं किया ...उसमें सहारा ढूँढा था . उसका मन फिर से निशीथ की ओर खिंचने लगता है . कानपुर वापस लौटने के बाद भी यह अंतर्द्वंद्व समाप्त नहीं होता . दीपा, निशीथ और संजय के इस त्रिकोण को आधार बना

आकाशदीप – जयशंकर प्रसाद

"बंदी!''''क्या है? सोने दो।''''मुक्त होना चाहते हो?''''अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।''''फिर अवसर न मिलेगा।''''बडा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।''''आंधी की संभावना है। यही एक अवसर है। आज मेरे बंधन शिथिल हैं।''''तो क्या तुम भी बंदी हो?''''हां, धीरे बोलो, इस नाव पर केवल दस नाविक और प्रहरी है।''''शस्त्र मिलेगा?''''मिल जाएगा। पोत से संबद्ध रज्जु काट सकोगे?''''हां।''समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बंदी आपस में टकराने लगे। पहले बंदी ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। दूसरे का बंधन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा-स्नेह का असंभावित आलिंगन। दोनों ही अंधकार में मुक्त हो गए। दूसरे बंदी ने हर्षातिरेक से उसको गले से लगा लिया। सहसा उस बंदी ने कहा-''यह क्या? तुम स्त्री हो?''''क्या स्त्री होना कोई पाप है?'' - अपने को अलग करते हुए स्त्री ने कहा।''शस्त्र कहां है -

गुंडा – जयशंकर प्रसाद

वह पचास वर्ष से ऊपर था। तब भी युवकों से अधिक बलिष्ठ और दृढ़ था। चमड़े पर झुर्रियाँ नहीं पड़ी थीं। वर्षा की झड़ी में, पूस की रातों की छाया में, कड़कती हुई जेठ की धूप में, नंगे शरीर घूमने में वह सुख मानता था। उसकी चढ़ी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह, देखनेवालों की आँखों में चुभती थीं। उसका साँवला रंग, साँप की तरह चिकना और चमकीला था। उसकी नागपुरी धोती का लाल रेशमी किनारा दूर से ही ध्यान आकर्षित करता। कमर में बनारसी सेल्हे का फेंटा, जिसमें सीप की मूठ का बिछुआ खुँसा रहता था। उसके घुँघराले बालों पर सुनहले पल्ले के साफे का छोर उसकी चौड़ी पीठ पर फैला रहता। ऊँचे कन्धे पर टिका हुआ चौड़ी धार का गँड़ासा, यह भी उसकी धज! पंजों के बल जब वह चलता, तो उसकी नसें चटाचट बोलती थीं। वह गुंडा था।ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में वही काशी

उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी ‘

बडे-बडे शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगायें। जब बडे़-बडे़ शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरे को चींधकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लङ्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर, ‘बचो खालसाजी।‘ ‘हटो भाईजी।‘ ‘ठहरना भाई जी।‘ ‘आने दो लाला जी।‘ ‘हटो बाछा।‘ - कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्नें और खोमचे और

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